कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर स्थित सर्किट हाउस में देर रात कमरा खाली कराने के मामले को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। उन्होंने नदिया जिले के तीन वरिष्ठ अधिकारियों पर संसदीय प्रोटोकॉल के कथित उल्लंघन और अवमाननापूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया है। देर रात सर्किट हाउस खाली करने को कहा महुआ मोइत्रा के अनुसार, वह 14 अगस्त की शाम करीब 6:15 बजे नदिया सर्किट हाउस पहुंची थीं। उन्हें कमरा आवंटित किया गया और शाम को चाय तथा रात में भोजन भी उपलब्ध कराया गया। इसके बाद रात करीब 9:47 बजे अतिरिक्त जिलाधिकारी ने उन्हें फोन कर सर्किट हाउस खाली करने को कहा। कारण पूछने पर कथित तौर पर बताया गया कि यह आदेश ऊपर से आया है। तीन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग मोइत्रा ने अपने नोटिस में नदिया के जिलाधिकारी श्रीकांत पाली, अतिरिक्त जिलाधिकारी नृपेंद्र सिंह और नाजरेथ डिप्टी कलेक्टर अनामिका बेरा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मामले को लोकसभा की विशेषाधिकार समिति के पास भेजने का आग्रह किया है। मोइत्रा का आरोप है कि उन्हें देर रात सर्किट हाउस खाली करने के लिए कहा गया, जबकि पहले से उनकी बुकिंग थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें कोई वैकल्पिक ठहरने की व्यवस्था नहीं दी गई। सांसदों के प्रोटोकॉल का उठाया मुद्दा महुआ मोइत्रा ने अपने नोटिस में सांसदों के लिए निर्धारित सरकारी प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए कहा कि अपने निर्वाचन क्षेत्र के दौरे पर आए सांसद को निर्धारित सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने इस घटना को अपने संसदीय दायित्वों के निर्वहन में बाधा और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि भविष्य में उनके निर्वाचन क्षेत्र में दौरे के दौरान उन्हें बिना किसी दबाव या उत्पीड़न के संसदीय जिम्मेदारियां निभाने की सुविधा मिले। माकपा सांसद ने भी जांच की मांग की मामले में माकपा सांसद के. राधाकृष्णन ने भी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि एक मौजूदा महिला सांसद के साथ इस तरह का व्यवहार गंभीर मामला है और सांसदों की सुरक्षा एवं संसदीय गरिमा से जुड़े प्रोटोकॉल को स्पष्ट किया जाना चाहिए। महुआ मोइत्रा की ओर से दिए गए विशेषाधिकार नोटिस के बाद यह मामला अब संसद के स्तर पर जांच और कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ सकता है। हालांकि, संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से लगाए गए आरोपों पर अंतिम स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हुई है।
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन गुरुवार को लोकसभा की कार्यवाही बेहद संक्षिप्त रही। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ का सामूहिक गान हुआ और इसके तुरंत बाद लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई प्रमुख नेता सदन में मौजूद थे। विपक्ष की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी सदन में उपस्थित रहे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में पहुंचते ही ‘वंदे मातरम’ के गान की घोषणा की। राष्ट्रगीत के बाद सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के बजाय अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र के आखिरी दिन नहीं हुआ लंबा कामकाज मानसून सत्र के अंतिम दिन सदन में सामान्य विधायी कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। कार्यवाही की शुरुआत ‘वंदे मातरम’ से हुई और इसके बाद सदन स्थगित कर दिया गया। इससे पहले पूरे मानसून सत्र के दौरान भी संसद में कई मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली थी। कई मौकों पर हंगामे और विरोध के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मानसून सत्र में लोकसभा का वास्तविक कामकाज करीब 15 घंटे ही हो सका। सदन में मौजूद रहे प्रधानमंत्री और प्रमुख नेता सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी सदन में मौजूद रहे। विपक्ष की ओर से राहुल गांधी समेत कई सांसद सदन में पहुंचे। ऐसे में अंतिम दिन ‘वंदे मातरम’ के सामूहिक गान के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी ने इसे खास बना दिया। ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व ‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय गीत है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। संसद में ‘वंदे मातरम’ का सामूहिक गान राष्ट्रीय महत्व की परंपरा से जुड़ा हुआ है। मानसून सत्र के अंतिम दिन सदन की शुरुआत इसी राष्ट्रगीत से होना राजनीतिक और संसदीय दृष्टि से भी चर्चा का विषय बना। हंगामे की आशंका के बीच सीधे स्थगित हुई कार्यवाही सत्र के दौरान विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति बनी रही थी। ऐसे में अंतिम दिन भी हंगामे की संभावना के बीच लोकसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही को लंबा खींचने के बजाय शुरुआत में ही स्थगित करने का निर्णय लिया। इस तरह मानसून सत्र का समापन ‘वंदे मातरम’ के गान के साथ हुआ। अब संसद का अगला सत्र कब बुलाया जाएगा, इस पर सरकार की ओर से आगे कार्यक्रम तय किया जाएगा। लेकिन मानसून सत्र का कम कामकाज, लगातार राजनीतिक गतिरोध और अंतिम दिन की संक्षिप्त कार्यवाही आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का मुद्दा बनी रह सकती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध मंगलवार को और बढ़ गया। NDA सांसदों ने संसद के मकर द्वार की ओर मार्च कर विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन किया। NDA सांसदों ने आरोप लगाया कि विपक्ष झारखंड में छात्रों के आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर संसद में चर्चा से बच रहा है, जबकि सरकार की ओर से गृह मंत्री अमित शाह के चर्चा में जवाब देने की तैयारी जताई गई है। ‘मंगल मिलन’ बैठक के बाद निकला मार्च NDA सांसदों का यह मार्च गठबंधन की साप्ताहिक ‘मंगल मिलन’ बैठक के बाद हुआ। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और NDA के अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हुए थे। बैठक के बाद NDA सांसद हाथों में पोस्टर और तख्तियां लेकर संसद की ओर बढ़े। प्रदर्शन के दौरान विपक्ष पर छात्र आंदोलन के मुद्दे पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया गया। विपक्ष पर चर्चा से भागने का आरोप NDA नेताओं का कहना है कि सरकार संसद में छात्रों के प्रदर्शन और उस दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर चर्चा के लिए तैयार है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कहा है कि गृह मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर सदन में विस्तृत जवाब देने के लिए तैयार हैं। NDA सांसदों ने इसी आधार पर विपक्ष से सदन की कार्यवाही चलने देने की मांग की। उनका आरोप है कि विपक्ष लगातार हंगामा करके चर्चा और संसदीय कामकाज को बाधित कर रहा है। विपक्ष की मांग अलग, संसद में जारी गतिरोध दूसरी ओर विपक्ष छात्र आंदोलन में पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार से स्पष्ट जवाब मांग रहा है। विपक्षी सांसदों की मांग है कि गृह मंत्री अमित शाह इस मामले पर संसद में बयान दें और पुलिस कार्रवाई से जुड़े सवालों का जवाब दें। लोकसभा में विपक्षी सांसदों के विरोध के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी विपक्षी दलों से प्रदर्शन समाप्त कर सदन को सुचारु रूप से चलने देने की अपील की। इसके बावजूद गतिरोध जारी रहा। संसद के बाहर भी आमने-सामने सत्ता पक्ष और विपक्ष छात्र आंदोलन का मुद्दा अब संसद के अंदर की राजनीति से निकलकर संसद परिसर के विरोध-प्रदर्शन तक पहुंच गया है। एक ओर NDA सांसद विपक्ष पर चर्चा से बचने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं विपक्ष पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहा है। ऐसे में मानसून सत्र के दौरान आने वाले दिनों में भी छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और संसद में चर्चा को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव जारी रहने के आसार हैं।
संसद के मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी पर तीखा हमला बोला। दोनों नेताओं ने बिलकीस बानो मामले का जिक्र करते हुए जोशी पर गंभीर आरोप लगाए। वहीं सरकार ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कांग्रेस से माफी की मांग की है। राहुल गांधी ने साधा निशाना लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे व्यक्ति को शिक्षा मंत्री बनाया है, जो कथित तौर पर बलात्कारियों का बचाव करता है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास कई अन्य विकल्प थे, लेकिन शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को देना हैरान करने वाला फैसला है। प्रियंका गांधी ने भी उठाया बिलकीस बानो का मुद्दा लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी बिलकीस बानो मामले से जुड़ी एक अखबार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी पर टिप्पणी की। हालांकि, उनकी इस टिप्पणी पर सत्तापक्ष के सदस्यों ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद सदन में कुछ समय तक हंगामा हुआ। बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने संबंधित टिप्पणी को कार्यवाही से हटाने के निर्देश दिए। सरकार ने बताया निराधार आरोप संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बिना किसी सत्यापन के किसी मंत्री के चरित्र पर इस तरह के आरोप लगाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस सांसद अपने आरोपों को साबित नहीं कर सकतीं तो उन्हें सदन से माफी मांगनी चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी कहा कि संसद में तथ्यों के आधार पर ही बयान दिए जाने चाहिए और बिना प्रमाण के किसी पर आरोप लगाना उचित नहीं है। प्रह्लाद जोशी ने की कार्रवाई की मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि प्रियंका गांधी इस तरह निराधार आरोप लगाकर बच नहीं सकतीं। उन्होंने मांग की कि कांग्रेस सांसद सदन से माफी मांगें और उनके खिलाफ संसदीय नियमों के तहत कार्रवाई की जाए। वहीं प्रियंका गांधी ने कहा कि वह अपने आरोपों के समर्थन में उचित माध्यम से तथ्यों को सदन के सामने रखेंगी। संसद में इस मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
नई दिल्ली: संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले दिल्ली की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हुए सांसदों को लेकर नई राजनीतिक गतिविधियां सामने आ रही हैं। सूत्रों के अनुसार, 19 जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक में एनसीपीआई को आमंत्रित किए जाने की संभावना जताई जा रही है। सुदीप बंद्योपाध्याय बन सकते हैं सदन के नेता सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय को लोकसभा में एनसीपीआई का नेता चुना जा सकता है। वहीं शताब्दी रॉय को उपनेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाए जाने की संभावना है। पार्टी अपने संसदीय दल के गठन को अंतिम रूप देने में जुटी है। लोकसभा अध्यक्ष से की मुलाकात जानकारी के अनुसार, सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की। इस दौरान एनसीपीआई के 20 सांसदों के लिए लोकसभा में बैठने की व्यवस्था और नए संसद भवन में पार्टी कार्यालय आवंटित करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। एनडीए को समर्थन पर भी चर्चा सूत्रों का कहना है कि एनसीपीआई के नेताओं की यह सक्रियता संसदीय मान्यता हासिल करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। बताया जा रहा है कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की थी। एनडीए का सहयोगी दल बनने की प्रक्रिया के तहत पार्टी से केंद्र सरकार को समर्थन संबंधी औपचारिक पत्र देने को कहा गया है। टीएमसी ने दायर की अयोग्यता याचिकाएं दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी छोड़ने वाले 20 सांसदों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। लोकसभा में टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत सभी 20 सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करते हुए अलग-अलग याचिकाएं सौंपी हैं। टीएमसी का आरोप है कि इन सांसदों ने दूसरे दल में शामिल होकर स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष के साथ हुई बैठक में इन अयोग्यता याचिकाओं पर चर्चा नहीं हुई। विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई बगावत 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में असंतोष बढ़ा और कई सांसदों एवं विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बागी सांसदों ने दावा किया कि उन्हें दो-तिहाई से अधिक समर्थन प्राप्त है और बाद में उन्होंने एनसीपीआई में विलय की घोषणा कर दी। अब संसद के मानसून सत्र से पहले एनसीपीआई की संसदीय मान्यता, सर्वदलीय बैठक में संभावित भागीदारी और टीएमसी की अयोग्यता याचिकाओं पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
TMC के 3 बैंक अकाउंट फ्रीज, इनमें ₹440 करोड़ कोलकाता, एजेंसियां। कोलकाता एयरपोर्ट पर शुक्रवार रात भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (TMC) कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई, जिससे वहां अफरा-तफरी मच गई। इस दौरान एक महिला बेहोश हो गई। TMC कार्यकर्ता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का स्वागत करने एयरपोर्ट पहुंचे थे, जो दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर लौट रहे थे। अभिषेक के एक समर्थक ने आरोप लगाया कि भाजपा से जुड़े कुछ लोग एयरपोर्ट पर आए और TMC कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी करने लगे। समर्थक का दावा है कि उनके हाथों में अंडे थे और बाद में उन्होंने हथियार भी निकाले। उन्होंने सवाल उठाया कि एयरपोर्ट अथॉरिटी और सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद हथियार अंदर कैसे पहुंचे। 31 मई को भी अभिषेक के साथ मारपीट हुई थी इससे पहले भी 31 मई को पश्चिम बंगाल के सोनारपुर दक्षिण में अभिषेक से मारपीट हुई थी। यहां वे चुनाव के बाद हुई हिंसा के पीड़ित टीएमसी कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंचे थे। TMC के 3 बैंक एकाउंट फ्रीज वहीं, शुक्रवार देर रात TMC के HDFC बैंक के 3 अकाउंट्स 50200059108322, 50200063079047, 50200063079034 को फ्रीज किया गया। इनमें कुल मिलाकर लगभग ₹440 करोड़ जमा हैं।
850 सीटों वाली संसद की तैयारी, दो-तिहाई बहुमत के लिए ब्लूप्रिंट तैयार, 44 सांसदों की जरूरत मुंबई, एजेंसियां। मानसून सत्र से पहले लोकसभा में संख्या बल बढ़ाने की राजनीतिक कवायद तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के बाद अब तमिलनाडु में DMK को अगला लक्ष्य माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, मकसद दो-तिहाई बहुमत जुटाकर परिसीमन (850 सीटें करने), महिला आरक्षण के क्रियान्वयन और 'वन नेशन, वन इलेक्शन' जैसे बड़े संवैधानिक बदलावों का रास्ता आसान करना है। बताया जा रहा है कि पिछले सत्र में परिसीमन समेत अहम बिलों पर जरूरी समर्थन नहीं मिलने के बाद सरकार ने संख्या बल बढ़ाने की रणनीति बनाई है। चर्चा है कि TMC और शिवसेना (UBT) के कुछ सांसद पाला बदल सकते हैं। लोकसभा में NDA की संख्या बढ़ सकती है इससे लोकसभा में NDA की संख्या बढ़ सकती है। हालांकि, दो-तिहाई बहुमत के लिए अभी और सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी। पार्टी के रणनीतिकार का कहना है कि अगर सरकार दो तिहाई बहुमत के करीब पहुंच गई, तो संसद का विशेष सत्र बुलाकर भी परिसीमन बिल पारित कराया जा सकता है। उद्धव गुट की शिवसेना ने बैठक में सभी सांसदों को बुलाया शिवसेना (यूबीटी) ने अपने सभी लोकसभा सांसदों को व्हिप जारी कर गुरुवार को होने वाली संसदीय दल की बैठक में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। पार्टी की ओर से 16 जून को जारी सर्कुलर में कहा गया है कि विभिन्न संगठनात्मक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा के लिए यह महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। बैठक गुरुवार सुबह 11 बजे संसद भवन स्थित संसदीय दल के कार्यालय में होगी। 6 सांसदों ने बगावत कर दी है यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब यूबीटी के 9 में से 6 सांसदों ने बगावत कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, छह सांसदों ने बुधवार सुबह 9:30 बजे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को शिंदे गुट में विलय के लिए चिट्ठी भेजी। हालांकि, अभी स्पीकर या बागी गुट की तरफ से इसकी पुष्टि नहीं की गई है। स्पीकर को शिंदे गुट में विलय के लिए चिट्ठी भेजने की चर्चा यूबीटी के बागी सांसदों में नागेश पाटिल आष्टीकर और संजय दीना पाटिल शामिल हैं। संजय ने बुधवार सुबह ही पार्टी छोड़ने की खबरों को खारिज किया था। संजय राउत ने बागियों को गाली दी इस बीच दिल्ली में राज्यसभा सांसद संजय राउत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बागी सांसदों को गाली दी। राउत ने कहा- ये साले #$% के। ये बेईमान लोग हैं। बेईमानी उनके खून में हैं। राउत ने बाद में सफाई देते हुए कहा- मराठी में ऐसे शब्द आम बोलचाल का हिस्सा हैं। राउत की प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिवसेना (UBT) के 9 में से सिर्फ 3 सांसद, अनिल देसाई, राजाभाऊ वाजे और अरविंद सावंत मौजूद रहे। राउत ने कहा कि बाकी सांसदों को खुद सामने आकर अटकलों का खंडन करना चाहिए। शिवसेना में दूसरी टूट शिवसेना में चार साल में यह दूसरी बड़ी टूट है। जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 39 विधायकों ने बगावत कर शिवसेना का अलग गुट बनाया था।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी सियासी संकट के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बागी सांसदों और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट, दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही कोई फैसला लेंगे। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों ने खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का दावा करते हुए लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। बागी सांसदों ने किया एनसीपीआई में विलय का दावा बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए ज्ञापन पर 20 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। उन्होंने दावा किया कि सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का फैसला किया है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का निर्णय लिया है। टीएमसी का आरोप- केवल दो घंटे पहले दी गई मुलाकात की सूचना ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने आरोप लगाया कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की सूचना केवल दो घंटे पहले दी गई। टीएमसी सूत्रों के मुताबिक, सोमवार दोपहर करीब दो बजे लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से ई-मेल भेजकर शाम चार बजे मुलाकात के लिए कहा गया था। उस समय अभिषेक बनर्जी कोलकाता स्थित ईडी कार्यालय में पूछताछ में सहयोग कर रहे थे। कीर्ति आजाद ने स्पीकर कार्यालय को दी जानकारी सूत्रों के अनुसार, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को सूचित किया कि अभिषेक बनर्जी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में शामिल हैं और निर्धारित समय पर उपस्थित नहीं हो पाएंगे। बाद में आजाद ने स्वयं स्पीकर से मुलाकात कर स्थिति से अवगत कराया। कानूनी राय ले सकते हैं लोकसभा अध्यक्ष संसद से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष इस पूरे मामले पर केंद्रीय विधि मंत्रालय और संवैधानिक विशेषज्ञों की राय ले सकते हैं। इस मुद्दे पर कोई भी निर्णय संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले लिया जा सकता है, जो आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। संविधान विशेषज्ञों ने उठाए सवाल लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी राजनीतिक दल का विलय केवल राजनीतिक संगठन स्तर पर हो सकता है। सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकते। वहीं, निर्वाचन आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा एनसीपीआई में विलय की योजना को "असामान्य और कानूनी रूप से जटिल" बताया है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति का स्पष्ट उल्लेख न तो दलबदल विरोधी कानून में है और न ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में मिलता है। क्या है एनसीपीआई? नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने जनवरी 2023 में खुद को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराया था। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और राष्ट्रीय राजनीति में इसकी मौजूदगी अब तक सीमित रही है। क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला? अगर बागी सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता मिलती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति और लोकसभा में टीएमसी की स्थिति पर बड़ा असर डाल सकता है। वहीं, स्पीकर का फैसला दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या और संसदीय परंपराओं के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों के एनसीपीआई में प्रस्तावित विलय और उन्हें अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता देने की मांग पर तत्काल कोई फैसला नहीं करेंगे। सूत्रों के अनुसार, इस मामले में सभी पक्षों की बात सुनने के बाद ही निर्णय लिया जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय ने टीएमसी के संबंधित सांसदों को बैठक के लिए बुलाया है, जिसके बाद कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। मानसून सत्र से पहले आएगा निर्णय लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के मुताबिक, इस मामले पर अंतिम फैसला संसद के मानसून सत्र से पहले लिया जाएगा, जिसकी शुरुआत जुलाई के तीसरे सप्ताह में होने की संभावना है। निर्णय लेने से पहले केंद्रीय विधि मंत्रालय से लिखित कानूनी राय मांगी जाएगी। मंत्रालय वरिष्ठ विधि अधिकारियों से परामर्श के बाद अपनी राय देगा, ताकि यदि भविष्य में इस फैसले को अदालत में चुनौती दी जाए तो वह न्यायिक जांच की कसौटी पर टिक सके। संवैधानिक प्रावधानों पर विशेषज्ञों की आपत्ति संवैधानिक विशेषज्ञों ने प्रस्तावित विलय की वैधता पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव और संवैधानिक मामलों के जानकार पीडीटी आचारी का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 के अनुसार केवल कोई राजनीतिक दल ही दूसरे दल में विलय कर सकता है। केवल सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी अन्य दल में विलय नहीं कर सकते। उनके अनुसार, दल के आधिकारिक निर्णय के बाद ही सांसदों या विधायकों की सहमति का प्रावधान लागू होता है। कानूनी रूप से नया और जटिल मामला निर्वाचन आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने भी इस प्रस्तावित विलय को कानूनी दृष्टि से एक नया और जटिल मामला बताया है। उनका कहना है कि ऐसी व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख न तो दलबदल विरोधी कानून में है और न ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में। ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय कानूनी राय और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही तय होगा।
नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में एक बार फिर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का फैसला किया है। इस दावे के बाद पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को कहा कि इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भी सौंपा गया है। उन्होंने दावा किया कि यह निर्णय कई सांसदों के बीच विस्तृत चर्चा और सहमति के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा, “हमने लोकसभा अध्यक्ष को अपने निर्णय से अवगत करा दिया है। यह फैसला सांसदों के बीच विचार-विमर्श के बाद लिया गया है।” दावे से बढ़ी राजनीतिक हलचल काकोली घोष दस्तीदार के अनुसार, इस फैसले के समर्थन में करीब 20 सांसद हैं। टीएमसी के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं, ऐसे में यह दावा पार्टी के भीतर संभावित बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। लोकसभा सचिवालय की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में दावे की वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में उत्सुकता बनी हुई है। पार्टी नेतृत्व की चुप्पी ने बढ़ाई अटकलें काकोली घोष दस्तीदार के बयान के बाद भी तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी तथा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व की चुप्पी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अटकलों को और बढ़ा दिया है। पहले भी सामने आ चुके हैं असंतोष के संकेत पिछले कुछ समय से तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। कई नेताओं द्वारा संगठनात्मक मुद्दों और नेतृत्व शैली को लेकर अलग-अलग मंचों पर अपनी राय रखी गई थी। ऐसे में काकोली घोष दस्तीदार का यह दावा पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। विपक्षी राजनीति पर पड़ सकता है असर यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ व्यापक राजनीतिक एकजुटता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि टीएमसी के भीतर बड़े स्तर पर कोई राजनीतिक पुनर्संरचना होती है, तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी गठबंधन की रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व और लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर हैं, जहां से इस पूरे मामले पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
लोकसभा में बिल गिरने के बाद भाजपा का पलटवार, कल से देशभर में आंदोलन शुरू महिला आरक्षण बिल संसद में पास न होने के बाद अब देश की राजनीति गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी दलों ने विपक्ष के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोलते हुए देशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। यह फैसला उस समय लिया गया जब संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर पाया और गिर गया। हर जिले में प्रदर्शन की तैयारी पार्टी सूत्रों के मुताबिक, BJP ने अपने सभी राज्य इकाइयों को निर्देश दिया है कि वे देश के हर जिला मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करें। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य जनता के बीच यह संदेश पहुंचाना है कि विपक्ष ने महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के ऐतिहासिक मौके को रोक दिया। महिला मोर्चा संभालेगा मोर्चा इस आंदोलन में BJP महिला मोर्चा की भूमिका सबसे अहम रहने वाली है। पार्टी की महिला नेता और कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर अभियान चलाकर महिलाओं के बीच जागरूकता फैलाएंगी। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक, हर माध्यम से इस मुद्दे को उठाने की रणनीति बनाई गई है। चुनावी राज्यों में बनेगा बड़ा मुद्दा भाजपा इस मुद्दे को आगामी चुनावों में भी जोर-शोर से उठाने की तैयारी में है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया जाएगा। पार्टी इसे महिलाओं के सशक्तिकरण से जोड़ते हुए विपक्ष के खिलाफ माहौल बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। वोटिंग में क्या हुआ था? लोकसभा में हुए मतदान में बिल के पक्ष में 298 सांसदों ने वोट दिया, जबकि 230 सांसद इसके खिलाफ रहे। संवैधानिक संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण यह विधेयक पास नहीं हो सका। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्पष्ट किया कि आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण बिल पारित नहीं हुआ। सरकार का दावा बनाम विपक्ष का रुख BJP और NDA का कहना है कि यह बिल महिलाओं को राजनीति में अधिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम था। वहीं, विपक्ष इसे विवादित मुद्दों से जोड़कर पेश करने का आरोप लगा रहा है। अब यह मुद्दा संसद से निकलकर सड़कों तक पहुंच चुका है, जिससे आने वाले दिनों में राजनीतिक माहौल और गरमा सकते हैं।
संसद के मौजूदा सत्र में आज का दिन अहम रहने वाला है। सोमवार को हुई सर्वदलीय बैठक के बाद संकेत मिल रहे हैं कि सदन की कार्यवाही अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रह सकती है। ओम बिरला की अध्यक्षता में हुई बैठक में आठ निलंबित सांसदों का निलंबन वापस लेने पर सहमति बन गई है, जिसे आज सदन में प्रस्ताव के जरिए लागू किया जा सकता है। निलंबित सांसदों की वापसी पर सहमति सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष की ओर से प्रस्ताव लाकर आठ सांसदों का निलंबन रद्द किया जाएगा। इससे बीते दिनों से जारी गतिरोध खत्म होने और संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने की उम्मीद है। LPG किल्लत पर सरकार को घेरने की तैयारी हालांकि, शांति के संकेतों के बीच विपक्ष आज भी LPG की किल्लत के मुद्दे पर सरकार को घेरने की रणनीति में है। आम जनता से जुड़े इस मुद्दे को लेकर सदन में तीखी बहस होने के आसार हैं। देवेगौड़ा ने जताई चिंता इसी बीच, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर संसद के भीतर हो रहे ‘व्यवधान’ और बाहर विपक्षी प्रदर्शनों पर चिंता जताई है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक बताया। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा की मांग संजय सिंह ने राज्यसभा में मिडिल ईस्ट संकट के भारत की ऊर्जा सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, व्यापार और प्रवासी भारतीयों पर प्रभाव को लेकर चर्चा की मांग उठाई है। इस मुद्दे पर विपक्ष की अन्य पार्टियां भी समर्थन में हैं। कुल मिलाकर, संसद का आज का दिन राजनीतिक बहस, सहमति और टकराव - तीनों का मिश्रण साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: संसद में सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष Om Birla के खिलाफ प्रस्ताव की चर्चा के बाद अब विपक्ष ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar को भी निशाने पर ले लिया है। जानकारी के अनुसार विपक्षी दल उन्हें हटाने के प्रस्ताव की तैयारी में जुट गए हैं और इसके लिए सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस सप्ताह ही लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालयों में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने से संबंधित नोटिस जमा कराया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह भारतीय संसदीय इतिहास में पहली बार होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए औपचारिक नोटिस दिया जाएगा। TMC की अगुवाई में तैयार हो रहा प्रस्ताव मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस पहल की अगुवाई All India Trinamool Congress कर रही है। प्रस्ताव पर विपक्षी गठबंधन INDIA Alliance से जुड़े दलों के अलावा Aam Aadmi Party के सांसदों ने भी हस्ताक्षर किए हैं। सूत्रों के अनुसार नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर करीब आधा दर्जन आरोप लगाए गए हैं। इनमें कथित पक्षपातपूर्ण रवैया और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे गंभीर आरोप शामिल बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि गुरुवार तक यह नोटिस संसद सचिवालय में जमा किया जा सकता है। आवश्यक संख्या से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर बुधवार रात तक लोकसभा के लिए करीब 120 सांसदों और राज्यसभा के लिए लगभग 60 सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा चुके थे। नियमों के अनुसार लोकसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar को लेकर विपक्षी दलों की नाराजगी पिछले कुछ महीनों से बढ़ती रही है। तृणमूल कांग्रेस पहले से ही उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही थी। इसी बीच कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने भी ‘वोट चोरी’ अभियान के जरिए चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव के बाद नया राजनीतिक मोर्चा हाल ही में विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष Om Birla को हटाने के प्रस्ताव का भी समर्थन किया था। हालांकि बजट सत्र के दौरान यह प्रस्ताव वॉइस वोट से खारिज हो गया। इसके बाद विपक्ष ने दोनों सदनों के सांसदों के हस्ताक्षर जुटाकर अपनी राजनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल और सख्त है। यह प्रक्रिया लगभग उसी तरह होती है जैसे Supreme Court of India के न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है। कानून के अनुसार यह कार्रवाई केवल ‘कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर ही संभव है। 1968 के जजेस (इंक्वायरी) एक्ट के तहत यदि नोटिस स्वीकार हो जाता है, तो लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करते हैं। यह समिति आरोपों की जांच कर रिपोर्ट तैयार करती है। इसके बाद दोनों सदनों में इस पर चर्चा होती है। प्रस्ताव पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है-जिसमें सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत शामिल होता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
संसद के मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को लोकसभा में तीखी राजनीतिक हलचल देखने को मिली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच जारी संघर्ष को लेकर विपक्ष ने सदन में तत्काल चर्चा की मांग की, जिससे सदन का माहौल गरमा गया। इसी बीच लोकसभा अध्यक्ष Om Birla के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को लेकर भी सियासी टकराव तेज हो गया। सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने मिडिल ईस्ट संकट पर विस्तृत चर्चा कराने की मांग रखी। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय हालात का असर भारत की सुरक्षा, कूटनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, इसलिए इस मुद्दे पर संसद में गंभीर चर्चा जरूरी है। अविश्वास प्रस्ताव को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लोकसभा की कार्यसूची के अनुसार बिहार के किशनगंज से सांसद Mohammad Jawed ने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव को सदन में रखने के लिए आवश्यक 50 सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे स्वीकार कर लिया गया और उस पर चर्चा कराने की प्रक्रिया शुरू की गई। इस प्रस्ताव में आरोप लगाया गया है कि लोकसभा अध्यक्ष ने सदन के संचालन में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है और विपक्ष को पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्ष तरीके से चलनी चाहिए और सभी दलों को अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए। ‘दुखी हैं, लेकिन मजबूर’ – गौरव गोगोई बहस के दौरान कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना किसी भी विपक्षी दल के लिए आसान निर्णय नहीं होता। उन्होंने कहा कि यह कदम “दुख के साथ” उठाया गया है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में विपक्ष खुद को मजबूर महसूस कर रहा है। गोगोई ने आरोप लगाया कि सदन के संचालन में संतुलन बनाए रखना अध्यक्ष की जिम्मेदारी होती है, लेकिन हाल के दिनों में विपक्ष को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है। हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित इससे पहले सोमवार को भी लोकसभा में पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा की मांग को लेकर विपक्षी दलों ने जोरदार हंगामा किया था। लगातार शोर-शराबे के कारण सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी और अंततः दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई। जब दोपहर तीन बजे सदन की कार्यवाही फिर से शुरू हुई तो पीठासीन सभापति Jagadambika Pal ने कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद को स्पीकर के खिलाफ अपना प्रस्ताव रखने के लिए कहा। हालांकि उस दौरान भी विपक्षी सदस्य पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा की मांग करते हुए नारेबाजी करते रहे और कई सांसद आसन के समीप पहुंच गए। संसद में बढ़ा सियासी तापमान इस पूरे घटनाक्रम के चलते लोकसभा का माहौल काफी गरमाया हुआ नजर आया। एक ओर विपक्ष अंतरराष्ट्रीय संकट जैसे गंभीर मुद्दे पर तत्काल चर्चा की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ने राजनीतिक टकराव को और तीखा कर दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि सदन में इस प्रस्ताव पर बहस और मतदान की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है और सरकार तथा विपक्ष के बीच जारी टकराव का क्या परिणाम निकलता है।
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण सोमवार, 9 मार्च से शुरू हो रहा है और इसके पहले ही दिन लोकसभा में हंगामे के आसार बन गए हैं। विपक्षी दलों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने से संबंधित प्रस्ताव पर आज सदन में विचार किया जा सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी किया है। लोकसभा के नियमों के अनुसार, पीठासीन अधिकारी द्वारा बुलाए जाने पर कम से कम 50 सांसदों को इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा होना होगा। यदि 50 सदस्य समर्थन में खड़े होते हैं, तो प्रस्ताव को सदन के विचार के लिए स्वीकार कर लिया जाएगा। इसके बाद इस पर चर्चा और मतदान कराया जाएगा। हालांकि यदि 50 सांसद समर्थन में खड़े नहीं होते हैं, तो प्रस्ताव पेश ही नहीं किया जा सकेगा। कांग्रेस के सांसद देंगे प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए कांग्रेस के तीन सांसद-मोहम्मद जावेद, के. सुरेश और मल्लू रवि-सदन की अनुमति मांगेंगे। इन सांसदों को प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जुटाना होगा। यदि आवश्यक समर्थन मिल जाता है तो प्रस्ताव पर चर्चा होगी और इसके बाद मतदान कराया जाएगा। सदन में मौजूद रह सकते हैं ओम बिरला संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला नोटिस पर विचार के दौरान सदन में उपस्थित रह सकते हैं। वे प्रस्ताव पर अपना पक्ष भी रख सकते हैं और मतदान में हिस्सा भी ले सकते हैं। हालांकि जब इस विषय पर चर्चा होगी, उस दौरान वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे। भाजपा और कांग्रेस ने जारी किया व्हिप इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया है। लोकसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए माना जा रहा है कि सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है, इसलिए यह संभावना कम मानी जा रही है कि प्रस्ताव आगे बढ़ पाएगा। तृणमूल कांग्रेस (TMC) का समर्थन तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करने का संकेत दिया है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस लोकसभा के कई विपक्षी सदस्यों द्वारा लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़ी है। कहां बैठ सकते हैं ओम बिरला? बताया जा रहा है कि यदि प्रस्ताव पर चर्चा होती है तो ओम बिरला सदन में सत्तापक्ष की प्रमुख पंक्तियों में बैठ सकते हैं। हालांकि इस स्थिति को लेकर नियम पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब विपक्ष सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। ऐसे में पहले ही दिन लोकसभा में तीखी बहस और हंगामे की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।