केंद्र सरकार ने इंटरनेट पर अश्लील और गैर-कानूनी कंटेंट के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए पिछले दो वर्षों में 50 OTT प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक कर दिया है। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स पर सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम और अन्य लागू भारतीय कानूनों का उल्लंघन करने का आरोप था। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य इंटरनेट को सभी नागरिकों, विशेषकर बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में लिखित जवाब के माध्यम से बताया कि सरकार डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लगातार सख्त कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता ऐसा डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करना है, जहां बच्चों सहित सभी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को सुरक्षित और जिम्मेदार ऑनलाइन वातावरण मिल सके। अश्लील कंटेंट पर सरकार की सख्ती इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अनुसार, जिन 50 OTT प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक किया गया, वे अश्लील सामग्री उपलब्ध कराने और आईटी कानूनों के उल्लंघन में शामिल पाए गए थे। इन प्लेटफॉर्म्स पर सार्वजनिक पहुंच पूरी तरह रोक दी गई है ताकि आम लोग अब इन्हें एक्सेस न कर सकें। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा महिलाओं के अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 के तहत की गई है। किन कानूनों के तहत हुई कार्रवाई? MeitY के मुताबिक, इन OTT प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुख्य रूप से: IT Act की धारा 67 और 67A भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 294 अन्य लागू कानूनी प्रावधान के तहत कार्रवाई की गई। सरकार का कहना है कि इंटरनेट पर अवैध और अश्लील सामग्री के प्रसार को रोकना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। नए IT Rules 2021 में क्या है प्रावधान? सरकार ने यह भी बताया कि आईटी नियम, 2021 के तहत यदि किसी अदालत या सरकार द्वारा किसी गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने का आदेश जारी किया जाता है, तो संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या डिजिटल सेवा प्रदाता को 3 घंटे के भीतर उस सामग्री को हटाना अनिवार्य होगा। इस नियम का उद्देश्य ऑनलाइन अवैध कंटेंट पर तेजी से कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर विशेष जोर सरकार ने कहा कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है। इसी उद्देश्य से डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 लागू किया गया है। इस कानून के तहत: बच्चों का डेटा प्रोसेस करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है। बच्चों की ऑनलाइन ट्रैकिंग पर रोक लगाई गई है। उनके व्यवहार की निगरानी और टारगेटेड विज्ञापन दिखाने जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। सरकार का मानना है कि इससे बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता और सुरक्षा मजबूत होगी। डिजिटल लत और आर्थिक नुकसान पर भी सरकार की नजर सरकार ने यह भी कहा कि ऑनलाइन गेमिंग को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए नए नियामक ढांचे का उद्देश्य युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत और ऑनलाइन गेमिंग से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करना भी है। सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। सरकार का क्या है उद्देश्य? सरकार के अनुसार, इन सभी कदमों का मुख्य उद्देश्य ऐसा डिजिटल वातावरण तैयार करना है जहां: इंटरनेट सुरक्षित हो। अवैध और अश्लील सामग्री पर प्रभावी रोक लगे। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित हो। नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा की रक्षा की जा सके। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स कानूनों के प्रति जवाबदेह बने रहें।
आज के डिजिटल दौर में WhatsApp हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। बैंकिंग अलर्ट से लेकर निजी बातचीत तक, लगभग हर जरूरी जानकारी इसी प्लेटफॉर्म पर मौजूद रहती है। ऐसे में अगर आपका WhatsApp अकाउंट हैक हो जाए, तो यह बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है। इसी को देखते हुए दिल्ली पुलिस की IFSO (Intelligence Fusion and Strategic Operations) यूनिट के जॉइंट सीपी रजनीश गुप्ता ने एक वीडियो के जरिए हैक हुए WhatsApp अकाउंट को वापस पाने का तरीका बताया है। क्यों जरूरी है ##21# कोड? दिल्ली पुलिस के अनुसार, अगर किसी हैकर ने कॉल या मैसेज फॉरवर्डिंग के जरिए आपके OTP अपने डिवाइस पर प्राप्त करने की व्यवस्था कर रखी है, तो सबसे पहले उस फॉरवर्डिंग को बंद करना जरूरी है। इसके लिए अपने फोन में: ##21# डायल करने की सलाह दी गई है। यह USSD कोड कई मामलों में सक्रिय कॉल फॉरवर्डिंग सेटिंग्स को बंद करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि अलग-अलग ऑपरेटर और डिवाइस के अनुसार इसका प्रभाव अलग हो सकता है। इसलिए इसे सुरक्षा के अतिरिक्त कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। WhatsApp अकाउंट वापस पाने के लिए अपनाएं ये स्टेप्स 1. सबसे पहले ##21# डायल करें इससे संभावित कॉल या मैसेज फॉरवर्डिंग बंद हो सकती है और OTP गलत व्यक्ति तक पहुंचने का खतरा कम हो सकता है। 2. Meta के शिकायत फॉर्म पर जाएं WhatsApp सपोर्ट फॉर्म खोलें। 3. "Are you a law enforcement officer?" पर "No" चुनें 4. अपना मोबाइल नंबर दर्ज करें देश के कोड के साथ अपना WhatsApp नंबर दो बार भरें। 5. "My account has been hacked" विकल्प चुनें 6. समस्या का विवरण लिखें बताएं कि आपका अकाउंट हैक हो गया है और आप लॉगिन नहीं कर पा रहे हैं। 7. अपना नाम और ईमेल आईडी भरें 8. Electronic Signature में अपना नाम दर्ज कर फॉर्म सबमिट करें इसके बाद क्या होगा? फॉर्म सबमिट करने के बाद Meta आपकी शिकायत की समीक्षा करेगा। सत्यापन पूरा होने पर हैकर के डिवाइस से आपका WhatsApp अकाउंट लॉगआउट किया जा सकता है। इसके बाद आप OTP की मदद से दोबारा अपने अकाउंट में लॉगिन कर सकेंगे। Facebook और Instagram के लिए भी उपलब्ध है सुविधा अगर आपका Facebook या Instagram अकाउंट हैक हो गया है, तो Meta इन प्लेटफॉर्म्स के लिए भी अलग रिकवरी फॉर्म उपलब्ध कराता है। सुरक्षा के लिए इन बातों का रखें ध्यान WhatsApp में टू-स्टेप वेरिफिकेशन जरूर ऑन करें। किसी के साथ OTP साझा न करें। अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचें। संदिग्ध कॉल या मैसेज मिलने पर तुरंत सतर्क हो जाएं। अपने ईमेल अकाउंट की सुरक्षा भी मजबूत रखें।
डिजिटल दुनिया में तेजी से फैलती भ्रामक और आपत्तिजनक जानकारी को रोकने के लिए भारत सरकार बड़े बदलाव की तैयारी में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट हटाने की समयसीमा को 2-3 घंटे से घटाकर सिर्फ 1 घंटा करने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। IT Rules में फिर बदलाव की तैयारी यह प्रस्ताव Information Technology Rules 2021 के तहत हाल ही में किए गए बदलावों के बाद सामने आया है। पहले: 24–36 घंटे में कंटेंट हटाना जरूरी फिर: समयसीमा घटाकर 2–3 घंटे अब प्रस्ताव: सिर्फ 1 घंटे में कार्रवाई सरकार का मानना है कि तेज कार्रवाई से फेक न्यूज और भ्रामक कंटेंट के वायरल होने पर तुरंत रोक लगाई जा सकती है। किन प्लेटफॉर्म्स पर पड़ेगा असर? यह नियम लागू होने पर बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे: Facebook Instagram X को बहुत कम समय में कंटेंट की समीक्षा और कार्रवाई करनी होगी। टेक कंपनियों की चिंता Meta जैसी कंपनियों ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि: इतने कम समय में हर कंटेंट की जांच करना मुश्किल होगा गलत फैसले की संभावना बढ़ सकती है ऑटोमेशन पर ज्यादा निर्भरता बढ़ेगी सरकार और सख्ती बढ़ा सकती है सरकार केवल समयसीमा ही नहीं, बल्कि: गृह, रक्षा और विदेश मंत्रालय को भी कंटेंट ब्लॉक करने का अधिकार देने पर विचार ‘आपत्तिजनक कंटेंट’ की परिभाषा को विस्तारित करने की योजना इससे डिजिटल निगरानी और सख्त हो सकती है। यूजर्स में बढ़ी चिंता जहां सरकार इसे फेक न्यूज रोकने का कदम बता रही है, वहीं कुछ यूजर्स को डर है कि: आलोचनात्मक या व्यंग्यात्मक पोस्ट भी हट सकती हैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है
हैदराबाद,एजेंसियां। YouTube ने अपनी सुरक्षा तकनीक को और मजबूत करते हुए Likeness Detection टूल को अब पत्रकारों, सरकारी अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं तक बढ़ाने की घोषणा की है। पहले यह फीचर केवल YouTube Partner Program के क्रिएटर्स तक सीमित था, लेकिन अब इसका उद्देश्य डीपफेक और एआई से बन फर्ज़ी वीडियो की पहचान करना और उन्हें हटाने में मदद करना है। क्या है इस टूल में ? इस टूल की मदद से कोई भी व्यक्ति अपने चेहरे या आवाज की नकली एआई कॉपी वाले वीडियो की पहचान कर सकता है और प्लेटफ़ॉर्म से हटाने की मांग कर सकता है। कंपनी का कहना है कि डीपफेक टेक्नोलॉजी तेजी से बढ़ रही है और इसका गलत इस्तेमाल गलत जानकारी फैलाने या किसी की छवि खराब करने में किया जा सकता है। कैसे काम करता है Likeness Detection ? Likeness Detection टूल कुछ हद तक Content ID की तरह काम करता है। फर्क यह है कि Content ID कॉपीराइट वाले कंटेंट को पहचानता है, जबकि Likeness Detection किसी व्यक्ति की शक्ल या आवाज से मिलते-जुलते एआई कंटेंट की पहचान करता है। अगर कोई वीडियो प्लेटफ़ॉर्म की प्राइवेसी गाइडलाइंस का उल्लंघन करता है, तो संबंधित व्यक्ति उसे हटाने का अनुरोध कर सकता है।हालांकि, पैरोडी, व्यंग्य या सार्वजनिक हित से जुड़े वीडियो को हटाने से पहले अलग से रिव्यू किया जाएगा। टूल का उपयोग करने के लिए पात्र लोगों को वेरिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिसमें फोटो आईडी और चेहरे का वीडियो जमा करना आवश्यक है। डेटा का उपयोग इस डेटा का उपयोग केवल पहचान की पुष्टि और सुरक्षा फीचर के संचालन के लिए किया जाएगा और इसे गूगल के एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।YouTube का कहना है कि तकनीक के साथ-साथ मजबूत कानून भी जरूरी हैं ताकि लोगों की पहचान और क्रिएटिविटी को एआई टेक्नोलॉजी से होने वाले दुरुपयोग से सुरक्षित रखा जा सके। इस पहल से पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन में भरोसेमंद जानकारी की रक्षा में मदद मिलने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।