Parliament special session

Anurag Thakur addressing media on women’s reservation bill ahead of Parliament special session
महिला आरक्षण पर सियासी घमासान: अनुराग ठाकुर का विपक्ष पर हमला, TMC पर भी साधा निशाना

  नई दिल्ली: महिला आरक्षण को लेकर संसद के विशेष सत्र से पहले राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। अनुराग ठाकुर ने विपक्षी दलों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि “महिला-विरोधी सोच” रखने वाली पार्टियां ही इस बिल का विरोध कर रही हैं। ‘महिला-विरोधी मानसिकता वाले कर रहे विरोध’ आईएएनएस से बातचीत में अनुराग ठाकुर ने कहा कि जो दल महिला आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, उनकी विचारधारा महिलाओं के खिलाफ है। उन्होंने दावा किया कि महिलाओं को 33% आरक्षण देने का रास्ता साफ किया जा चुका है और अब इसे लागू करने की दिशा में काम हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि 1971 के आधार पर सीटों का निर्धारण पहले ही हो चुका है और दक्षिण भारतीय राज्यों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। विपक्षी नेताओं पर सीधा निशाना भाजपा सांसद ने कई बड़े नेताओं पर सीधे आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी ममता बनर्जी डीएमके और अन्य विपक्षी दल महिला आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनकी सोच महिलाओं के हित में नहीं है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि अपने शासनकाल में वह इस बिल को पारित नहीं करा पाई। संसद सत्र में होगी अहम चर्चा संसद के विस्तारित सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 में संशोधन और परिसीमन विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है। इसका उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करना है। बंगाल चुनाव पर भी दिया बड़ा बयान अनुराग ठाकुर ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस की हार तय है 4 मई को सत्ता परिवर्तन होगा ममता बनर्जी अपनी उपलब्धियां गिनाने में असफल रही हैं उन्होंने ममता सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद राज्य को “भ्रष्टाचार, कमीशन और अवैध घुसपैठ” से मुक्त किया जाएगा। सियासी टकराव तेज महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। संसद के आगामी सत्र में इस मुद्दे पर तीखी बहस और राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिल सकती है।  

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
Indian Parliament discussing Women’s Reservation Bill and delimitation during special session in New Delhi
महिला आरक्षण पर मंथन: 16–18 अप्रैल के विशेष सत्र में क्या होगा, और क्यों नाराज़ हैं दक्षिण के राज्य?

  नई दिल्ली: संसद के 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाले विशेष सत्र में महिला आरक्षण को लागू करने के तरीकों पर गहन चर्चा होने जा रही है। केंद्र सरकार 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को जल्द लागू करना चाहती है, लेकिन इसे लेकर अब सियासी टकराव तेज हो गया है। खासकर परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के राज्यों में नाराज़गी बढ़ती दिख रही है। क्या है महिला आरक्षण कानून? सरकार ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया था। हालांकि, उस समय यह तय किया गया था कि आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा। अब सरकार इसे जल्द लागू करने के लिए संशोधन प्रस्ताव लाई है। जनगणना और परिसीमन से क्या है कनेक्शन? महिला आरक्षण को लागू करने का पूरा ढांचा दो प्रक्रियाओं पर निर्भर है: जनगणना (Census): हर 10 साल में होती है, जिससे आबादी का सटीक आंकड़ा मिलता है परिसीमन (Delimitation): जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या और सीमाएं तय होती हैं 2021 में कोविड के कारण जनगणना नहीं हो पाई और अभी तक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। ऐसे में परिसीमन भी अटका हुआ है। सरकार का लक्ष्य है कि 2029 के चुनाव से पहले जनगणना और परिसीमन पूरा कर लिया जाए, ताकि उसी आधार पर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जा सकें। सरकार का नया प्लान क्या है? सरकार चाहती है कि 2029 के आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो जाए। इसके लिए प्रस्तावित संशोधनों में: नई जनगणना के आधार पर परिसीमन एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग का गठन कुल सीटों में से 33% महिलाओं के लिए आरक्षित आरक्षित सीटों का रोटेशन सिस्टम (सीटें समय-समय पर बदलेंगी) विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?   विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसके लागू करने के तरीके पर सवाल उठा रहा है। मुख्य आपत्तियां: जनगणना के बिना जल्दबाजी में फैसला परिसीमन से दक्षिण भारत की सीटें घटने का डर महिला आरक्षण में OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा की मांग कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार राजनीतिक फायदे के लिए नियम बदल रही है। दक्षिण के राज्य क्यों हैं नाराज़? तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा है कि यह कदम दक्षिण भारत के साथ अन्याय होगा। उनकी चिंता का मुख्य कारण: दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया अगर सीटें आबादी के आधार पर बढ़ेंगी, तो उत्तर भारत के राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार) को ज्यादा सीटें मिलेंगी इससे दक्षिण भारत का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट सकता है स्टालिन ने चेतावनी दी है कि सरकार “आग से खेल रही है” और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। सरकार का पक्ष सरकार का कहना है कि उसका मकसद सिर्फ महिलाओं को उनका अधिकार देना है। किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं की जाएंगी सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाएगा सरकार का दावा है कि यह ऐतिहासिक कदम देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को नई दिशा देगा। तीन दिन के इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण के स्वरूप और लागू करने के तरीके पर गहन बहस होगी। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनती है या यह मुद्दा और ज्यादा सियासी टकराव पैदा करता है।

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
Indian Parliament session in progress discussing women’s reservation and delimitation bills
संसद का विशेष सत्र शुरू: महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर घमासान आसार

  नई दिल्ली: आज से संसद का विशेष सत्र शुरू हो गया है, जिसमें केंद्र सरकार बड़े संवैधानिक बदलावों से जुड़े अहम विधेयक पेश करने जा रही है। इस सत्र के दौरान महिला आरक्षण को लागू करने और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों पर तीखी बहस और हंगामे की संभावना जताई जा रही है। संसद के बुलेटिन के अनुसार, सरकार गुरुवार को लोकसभा में तीन प्रमुख विधेयक पेश करेगी— संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 परिसीमन विधेयक, 2026 केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 इनमें से पहले दो विधेयक कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल पेश करेंगे, जबकि तीसरा विधेयक गृह मंत्री अमित शाह द्वारा सदन में रखा जाएगा। इन विधेयकों पर चर्चा के लिए लोकसभा में कुल 18 घंटे का समय निर्धारित किया गया है, जो शुक्रवार तक जारी रह सकती है। महिला आरक्षण पर सरकार का नया कदम केंद्र सरकार ने पहले 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के जरिए संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का फैसला किया था। हालांकि, उस समय इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू करने की बात कही गई थी। अब सरकार इस प्रक्रिया को पहले लागू करने के लिए नया संशोधन प्रस्ताव लेकर आई है। परिसीमन विधेयक पर बढ़ा विवाद परिसीमन विधेयक को लेकर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया है। कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने इस विधेयक के खिलाफ लोकसभा में नोटिस दिया है। वहीं, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस विधेयक की प्रति विरोध दर्ज कराया है। उनका आरोप है कि यह कानून दक्षिण भारतीय राज्यों, खासकर तमिलनाडु के हितों के खिलाफ है। विपक्ष की रणनीति बैठक संसद के विशेष सत्र के दौरान विपक्षी दल भी सक्रिय हो गए हैं। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यालय में विपक्षी दलों के फ्लोर लीडर्स की बैठक होगी, जिसमें सरकार के प्रस्तावों के खिलाफ रणनीति तैयार की जाएगी। 16 से 18 अप्रैल तक चलेगा सत्र यह विशेष सत्र 16 से 18 अप्रैल तक चलेगा। सरकार का उद्देश्य इस दौरान महिला आरक्षण कानून में संशोधन को मंजूरी दिलाना है, जबकि विपक्ष इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बता रहा है।  

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
Women Reservation Bill Amendment India Politics
महिला आरक्षण बिल में बड़ा संशोधन: किसे मिलेगा फायदा? सरकार vs विपक्ष में बढ़ी सियासी टकराहट

केंद्र सरकार ने 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाकर एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक कदम उठाने की तैयारी की है। इस सत्र में नारी वंदन अधिनियम, 2023 यानी महिला आरक्षण कानून में संशोधन प्रस्ताव लाया जा सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है और सरकार व विपक्ष आमने-सामने हैं। क्या है सरकार का प्रस्ताव? सूत्रों के मुताबिक, सरकार महिला आरक्षण कानून में दो बड़े बदलाव करने पर विचार कर रही है: परिसीमन (Delimitation) के लिए नई जनगणना की बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाना लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या में लगभग 50% तक बढ़ोतरी अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो: उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120 हो सकती हैं बिहार में 40 से 60 तमिलनाडु में 39 से 58 इस तरह कुल लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर करीब 816 तक पहुंच सकती हैं, जिनमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। सरकार का क्या कहना है? केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य महिला प्रतिनिधित्व को तेजी से लागू करना और प्रक्रिया को सरल बनाना है, ताकि 2029 तक इसे लागू किया जा सके। विपक्ष क्यों कर रहा विरोध? विपक्ष इस कदम को चुनावी रणनीति बता रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार महिला वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है राजीव शुक्ला ने इसे चुनावी लाभ के लिए उठाया गया कदम बताया कांग्रेस का दावा है कि महिला आरक्षण की पहल पहले उसी ने की थी OBC महिलाओं के आरक्षण की मांग समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इस मुद्दे को और आगे बढ़ाते हुए OBC महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग उठाई है। उनका कहना है कि: केवल सामान्य महिला आरक्षण पर्याप्त नहीं है पिछड़ी जातियों की महिलाओं को अलग से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए क्या है असली सियासी गणित? विशेषज्ञों के अनुसार, यह संशोधन कई स्तरों पर असर डाल सकता है: महिला वोट बैंक को प्रभावित करेगा राज्यों में सीटों के पुनर्वितरण से राजनीतिक समीकरण बदलेंगे 2029 चुनाव से पहले बड़ा प्रभाव देखने को मिल सकता है पास होने में क्या है चुनौती? चूंकि यह एक संवैधानिक संशोधन है, इसलिए इसे संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। हालांकि कोई भी पार्टी खुले तौर पर महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रही, लेकिन: परिसीमन के आधार OBC आरक्षण समय और मंशा इन मुद्दों पर तीखी बहस तय मानी जा रही है। निष्कर्ष महिला आरक्षण बिल में प्रस्तावित संशोधन सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक बदलाव साबित हो सकता है। जहां सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति करार दे रहा है।  

surbhi अप्रैल 3, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Indian delegation at international cyber security meeting after India assumed CCDB chairmanship role
राष्ट्रीय

भारत को मिली बड़ी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी, संभाला CCDB के अध्यक्ष का पद

surbhi मई 15, 2026 0