Rawalakot (PoK): पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की, जिसमें कम से कम 9 लोगों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बातचीत विफल होने के बाद बढ़ा तनाव रिपोर्ट्स के मुताबिक, जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) और प्रशासन के बीच कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही। इसके बाद हजारों प्रदर्शनकारी मुजफ्फराबाद की ओर मार्च की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, जिसके बाद गोलीबारी की खबर सामने आई। 52 दिनों से जारी है आंदोलन बताया जा रहा है कि रावलकोट और आसपास के क्षेत्रों में पिछले 52 दिनों से विरोध प्रदर्शन जारी है। प्रदर्शनकारी विभिन्न स्थानीय मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ताजा घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। वीडियो में कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि गोलीबारी में कई लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। हालांकि, इन वीडियो और मौतों के दावों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। एक वायरल वीडियो में एक व्यक्ति रावलकोट के हालात बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मीडिया से हस्तक्षेप की अपील करता दिखाई दे रहा है। वह दावा करता है कि फायरिंग के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। प्रशासन की ओर से आधिकारिक बयान का इंतजार घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। फिलहाल पाकिस्तानी प्रशासन की ओर से हताहतों की संख्या या कार्रवाई को लेकर विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। वहीं, हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है।
इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। चुनाव ऐसे समय कराए जा रहे हैं जब क्षेत्र में सरकार और सेना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, आर्थिक संकट और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। स्थानीय राजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार तेज कर दिया है, जबकि प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। तीन चरणों में कराए जाएंगे चुनाव पाकिस्तान के चुनाव अधिकारियों के अनुसार, विधानसभा चुनाव अब तीन चरणों में कराए जाएंगे। चुनाव प्रक्रिया जुलाई के अंत से शुरू होकर अगस्त के पहले सप्ताह तक चलेगी। चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों के सैकड़ों उम्मीदवार मैदान में हैं और लाखों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। विरोध प्रदर्शनों के बीच बढ़ी चुनौती चुनाव से पहले PoK के कई इलाकों में महंगाई, बिजली संकट और प्रशासनिक नीतियों के विरोध में प्रदर्शन हुए हैं। हाल के दिनों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की घटनाएं भी सामने आई हैं। इन हालातों को देखते हुए चुनाव के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की जा रही है। सरकार और विपक्ष आमने-सामने पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N), पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) और अन्य दल चुनाव में अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कराए जाने चाहिए, जबकि सरकार का कहना है कि सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर PoK की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर बनी हुई है। हालिया विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की घटनाओं के बाद संयुक्त राष्ट्र ने क्षेत्र में मानवाधिकारों की स्थिति पर चिंता जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव परिणाम क्षेत्र की राजनीतिक दिशा और पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति दोनों पर असर डाल सकते हैं।
PoK Protests: पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) में सरकार विरोधी आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने बुधवार को मुजफ्फराबाद तक 'लॉन्ग मार्च' का आह्वान किया है। संभावित प्रदर्शन को देखते हुए पूरे क्षेत्र में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। सरकार के खिलाफ जारी है आंदोलन JAAC लंबे समय से अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई, सुरक्षा बलों की कार्रवाई रोकने, इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बहाल करने तथा बिजली और आवश्यक वस्तुओं की बेहतर उपलब्धता जैसी मांगों को लेकर आंदोलन चला रही है। संगठन का कहना है कि सरकार को पहले ही अल्टीमेटम दिया गया था, लेकिन मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कई जिलों से मुजफ्फराबाद पहुंचेंगे प्रदर्शनकारी सूत्रों के मुताबिक रावलकोट, मीरपुर, कोटली, बाग समेत कई जिलों से बड़ी संख्या में लोग मुजफ्फराबाद पहुंच सकते हैं। प्रदर्शन के दौरान बाजार बंद रहने और कई प्रमुख सड़कों पर यातायात प्रभावित होने की भी संभावना जताई गई है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी संभावित विरोध प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की है। प्रमुख मार्गों और सरकारी प्रतिष्ठानों की निगरानी बढ़ा दी गई है। स्थानीय प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट पर है। JAAC की प्रमुख मांगें गिरफ्तार नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर रोक इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं की बहाली बिजली और आवश्यक वस्तुओं की बेहतर उपलब्धता शासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में सुधार आंदोलन और तेज होने की चेतावनी JAAC ने कहा है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। संगठन का दावा है कि मौजूदा आंदोलन केवल बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक सुधारों की मांग भी प्रमुख मुद्दा बनेगी। राजनीतिक असर पर नजर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर प्रदर्शन होता है, तो इससे पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक स्थिति और तनावपूर्ण हो सकती है। वहीं, प्रदर्शन के दौरान किसी भी प्रकार की सख्ती या बल प्रयोग की स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी.
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस ने 16 जुलाई को अपने शीर्ष नेताओं और सांसदों की अहम रणनीतिक बैठक बुलाई है, जिसमें सत्र के दौरान सरकार को किन मुद्दों पर घेरा जाएगा, इस पर चर्चा होगी। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने 19 जुलाई को सभी राजनीतिक दलों की सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला किया है। सरकार और विपक्ष दोनों कर रहे तैयारी कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य प्रमुख मुद्दों को संसद में उठाने की तैयारी कर रही है। वहीं सरकार भी मॉनसून सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने की रणनीति बना रही है। संविधान संशोधन विधेयक पर हो सकता है हंगामा सूत्रों के अनुसार, इस सत्र में प्रस्तावित 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस होने की संभावना है। विपक्ष पहले से ही इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी में जुटा है। 20 जुलाई से शुरू होगा मॉनसून सत्र संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने वाला है। इससे पहले होने वाली कांग्रेस की रणनीति बैठक और सर्वदलीय बैठक को सत्र की दिशा तय करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं।
मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में पिछले कई सप्ताह से जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच हालात को लेकर नए दावे सामने आए हैं। आंदोलन से जुड़े जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेता सरदार अमन खान ने कथित तौर पर भारत से मानवीय सहायता की अपील की है। भारत से मानवीय सहायता की मांग सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में सरदार अमन खान कथित रूप से कहते दिखाई दे रहे हैं कि क्षेत्र में राशन और आवश्यक वस्तुओं की कमी हो गई है तथा लोगों को मदद की जरूरत है। उन्होंने भारत से मानवीय सहायता भेजने और नियंत्रण रेखा (LoC) पर राहत के लिए व्यवस्था करने की अपील की। उनका यह भी दावा है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो लोगों को भारत आने का विकल्प मिलना चाहिए। आर्थिक नाकेबंदी का आरोप अमन खान का आरोप है कि विरोध प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान प्रशासन ने पूरे क्षेत्र की आर्थिक नाकेबंदी कर दी है, जिससे खाद्य सामग्री, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि इससे आम नागरिकों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ईदगाह मैदान में हुई सभा रावलाकोट के ईदगाह मैदान में आयोजित एक सभा के दौरान अमन खान ने कथित तौर पर लोगों से पूछा कि क्या उन्हें नियंत्रण रेखा (LoC) की ओर बढ़ना चाहिए। वायरल वीडियो में भीड़ की ओर से समर्थन में नारे सुनाई देने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, वीडियो की प्रामाणिकता और उसमें किए गए सभी दावों का स्वतंत्र सत्यापन उपलब्ध नहीं है। कई सप्ताह से जारी हैं प्रदर्शन PoK में पिछले महीने से विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारी स्थानीय प्रशासन पर नागरिक अधिकारों के हनन, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और आर्थिक समस्याओं को लेकर आरोप लगा रहे हैं। स्थानीय संगठनों का कहना है कि आंदोलन तब और तेज हुआ जब प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सुरक्षा कार्रवाई की गई। वहीं, पाकिस्तान प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही जाती रही है। दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और भारत से मदद की अपील संबंधी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें सत्यापित तथ्य के बजाय संबंधित पक्ष के दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस्लामाबाद/रावलकोट: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। मंगलवार को रावलकोट के ईदगाह ग्राउंड में हजारों लोग एकत्र हुए और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि PoK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है और स्थानीय लोगों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, JAAC के प्रमुख शौकत नवाज मीर को उनके दो सहयोगियों के साथ धीरकोट के सांगर फत्तारे इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके अलावा JAAC के 600 से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया है। शौकत नवाज पर था एक करोड़ रुपये का इनाम रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार ने शौकत नवाज मीर और अन्य JAAC नेताओं की सूचना देने वालों के लिए एक करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा की थी। गिरफ्तारी के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। 'हमें नहीं, पाकिस्तान को हमारी जरूरत' प्रदर्शन को संबोधित करते हुए JAAC नेता सरदार अमन खान ने पाकिस्तान सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार आंदोलन को दबाने के लिए जानबूझकर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोक रही है। उन्होंने कहा, "हमें आपके राशन की जरूरत नहीं है, बल्कि आपको हमारी जरूरत है। यदि जरूरी सामान की सप्लाई नहीं हुई तो लोग जिंदा रहने के लिए दूसरा रास्ता चुनने को मजबूर होंगे।" महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन, अब बना राजनीतिक विरोध बताया जा रहा है कि यह आंदोलन शुरुआत में महंगाई, खाद्य संकट, बढ़ती कीमतों और स्थानीय प्रशासन की नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ था। अब यह पाकिस्तान सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक विरोध में बदल गया है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा रावलकोट और मीरपुर के लोगों को "असल कश्मीरी नहीं" बताए जाने के बाद लोगों में नाराजगी और बढ़ गई। JAAC पर प्रतिबंध, आतंकवाद विरोधी कानून के तहत कार्रवाई रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान सरकार ने 5 जून को JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद संगठन के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद निरोधक कानून के तहत मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इंटरनेट सेवाएं प्रभावित, 22 लोगों की मौत का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जून की शुरुआत से PoK के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं सीमित कर दी गई हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो बाहर जाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया। दावा किया जा रहा है कि पिछले दो सप्ताह के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में 22 लोगों की मौत हुई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। 27 जुलाई को होंगे विधानसभा चुनाव पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 27 जुलाई को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें 45 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनावहोंगे, जबकि 8 सीटें महिलाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित हैं। चुनाव से पहले बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक तनाव ने क्षेत्र की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
नई दिल्ली: पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में 7 जून को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। इसी बीच भारत ने चुनाव कराने की पाकिस्तान की योजना पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए कहा है कि यह क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहां की स्थिति बदलने की कोई भी कोशिश स्वीकार्य नहीं है। भारत ने चुनावों को बताया अवैध विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्र शासित प्रदेश, जिनमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल है, भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। मंत्रालय के अनुसार पाकिस्तान द्वारा इस क्षेत्र में कराए जाने वाले चुनाव उसकी ओर से किए जा रहे अवैध कब्जे को वैध नहीं बना सकते। भारत ने कहा कि पाकिस्तान को ऐसे क्षेत्रों पर अपना अवैध कब्जा समाप्त करना चाहिए और वहां की वास्तविक स्थिति बदलने के प्रयासों से बचना चाहिए। अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती का दावा चुनाव से पहले क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ाने की खबरें भी सामने आई हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता अमजद अयूब मिर्जा ने दावा किया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में लगभग 14,000 अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जा रही है। मिर्जा के अनुसार, यह कदम चुनावी प्रक्रिया और कानून-व्यवस्था के नाम पर उठाया जा रहा है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। मानवाधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता पर उठे सवाल भारत ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन, राजनीतिक दमन और आर्थिक शोषण जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। भारत का कहना है कि चुनावी गतिविधियां इन मुद्दों से ध्यान नहीं हटा सकतीं। वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अमजद अयूब मिर्जा ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अधिकारों की मांग करने वाले समूहों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि कई राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी से हस्तक्षेप की अपील मिर्जा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि वे पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के अधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाएं। उन्होंने कहा कि गिलगित-बाल्टिस्तान में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर लंबे समय से असंतोष बना हुआ है। क्षेत्रीय राजनीति पर रहेगी नजर गिलगित-बाल्टिस्तान में होने वाले चुनाव और उससे पहले बढ़ी सुरक्षा व्यवस्था पर भारत और पाकिस्तान दोनों की नजरें टिकी हुई हैं। चुनावी प्रक्रिया, सुरक्षा हालात और दोनों देशों के बयानों के चलते यह मुद्दा एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीति के केंद्र में आ गया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।