Religious Freedom

A student wearing a Tulsi mala and tilak outside a school in Purulia amid a dispute over religious symbols and transfer certificate allegations.
तुलसी की माला और तिलक को लेकर विवाद: छात्रा को टीसी देने का आरोप, स्कूल ने किया इनकार

पुरुलिया: पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के एक स्कूल में धार्मिक प्रतीकों को लेकर विवाद सामने आया है। आरोप है कि 11वीं की एक छात्रा के तुलसी की माला पहनने और माथे पर तिलक लगाने पर स्कूल प्रबंधन ने आपत्ति जताई और बाद में उसे ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) भेज दिया। हालांकि, स्कूल प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज किया है। परिवार ने लगाए गंभीर आरोप छात्रा के परिवार का कहना है कि वह नियमित रूप से तुलसी की माला पहनकर और माथे पर तिलक लगाकर स्कूल जाती थी। इसी बात पर स्कूल अधिकारियों ने आपत्ति जताई और परिवार को स्कूल बुलाया गया। परिजनों का आरोप है कि बातचीत के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला और अगले ही दिन छात्रा का ट्रांसफर सर्टिफिकेट व्हाट्सऐप के जरिए भेज दिया गया। परिवार ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। शिक्षिका पर भी लगाए आरोप छात्रा की मां का आरोप है कि एक शिक्षिका बार-बार उनकी बेटी की तुलसी की माला और तिलक पर आपत्ति जताती थीं तथा माला नहीं पहनने की सलाह देती थीं। स्कूल प्रबंधन ने आरोपों से किया इनकार स्कूल प्रशासन ने कहा कि छात्रा को अब तक आधिकारिक रूप से ट्रांसफर सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया है। प्रबंधन का दावा है कि तुलसी की माला पहनने पर कोई प्रतिबंध नहीं है और किसी छात्र को धार्मिक प्रतीकों के कारण निशाना नहीं बनाया गया। स्कूल का कहना है कि मामला केवल विद्यालय के अनुशासन और नियमों के पालन से जुड़ा है तथा सभी छात्रों पर समान नियम लागू होते हैं। पुलिस कर रही है जांच छात्रा के परिवार की शिकायत के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि विवाद धार्मिक प्रतीकों को लेकर था या स्कूल के अनुशासन से जुड़े किसी अन्य मुद्दे के कारण उत्पन्न हुआ। जांच के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।  

Deepshikha जुलाई 8, 2026 0
Priests at Haridwar's Mansa Devi Temple wearing pocketless kurtas as part of new measures to ensure transparency in temple donations.
राम मंदिर चढ़ावा विवाद के बाद बड़ा फैसला: मनसा देवी मंदिर में पुजारी अब बिना जेब वाले कुर्ते पहनेंगे

हरिद्वार: अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और एसआईटी जांच के बाद सामने आए खुलासों के बीच अब देश के अन्य प्रमुख मंदिरों ने भी सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी क्रम में हरिद्वार के प्रसिद्ध मां मनसा देवी मंदिर प्रबंधन ने पुजारियों के लिए बिना जेब वाले कुर्ते पहनना अनिवार्य कर दिया है। चढ़ावे में पारदर्शिता के लिए नई व्यवस्था मंदिर प्रबंधन का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य चढ़ावे के प्रबंधन में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करना और किसी भी तरह की अनियमितता की आशंका को खत्म करना है। अब ड्यूटी के दौरान कोई भी पुजारी जेब वाला कुर्ता नहीं पहन सकेगा। महंत रवींद्र पुरी ने बताई वजह मंदिर के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने कहा, "आजकल मंदिरों को बदनाम करने की कोशिशें हो रही हैं। इसलिए हमने एक विशेष समिति बनाई है। कोई भी पुजारी चढ़ावा अपनी जेब में नहीं रखेगा। मंदिर में आने वाला हर दान जनकल्याण के कार्यों में उपयोग होगा। इसी उद्देश्य से पुजारियों के लिए बिना जेब वाले कुर्ते अनिवार्य किए गए हैं।" चढ़ावे की निगरानी करेगी 7 सदस्यीय समिति मंदिर ट्रस्ट ने चढ़ावे की निगरानी के लिए सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। यह समिति दान और चढ़ावे की नियमित निगरानी करेगी तथा पूरे सिस्टम की समीक्षा करेगी। गड़बड़ी मिलने पर होगी सख्त कार्रवाई मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि जांच के दौरान किसी भी स्तर पर चढ़ावे में हेरफेर, गबन या अन्य अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित पुजारी या कर्मचारी के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। राम मंदिर चढ़ावा विवाद के बाद यह फैसला देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में दान प्रबंधन को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।  

Deepshikha जुलाई 8, 2026 0
Denmark government plans nationwide ban on loudspeaker Azaan from mosques
इस्लामाबाद बनने का डर... डेनमार्क में मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर अजान रोकने की तैयारी, मंत्री बोले- बिल्कुल आवाज नहीं आनी चाहिए

  Denmark Azaan Ban: डेनमार्क सरकार देशभर में मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए अजान के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि यह कदम सामाजिक एकीकरण को मजबूत करने और सार्वजनिक जीवन में बढ़ते 'इस्लामीकरण' को लेकर उठाई जा रही चिंताओं के मद्देनजर प्रस्तावित किया जा रहा है। इमिग्रेशन एवं इंटीग्रेशन मंत्री मोर्टेन बॉडस्कोव ने कहा कि डेनमार्क की पहचान स्पष्ट रहनी चाहिए और लोगों को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि वे किसी दूसरे देश के माहौल में रह रहे हैं। देशभर में लागू हो सकता है नया कानून डेनमार्क सरकार मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए होने वाली अजान पर रोक लगाने के लिए कानूनी ढांचे की समीक्षा फिर से शुरू करने जा रही है। फिलहाल इस तरह के प्रसारण स्थानीय शोर नियंत्रण नियमों के दायरे में आते हैं, लेकिन सरकार अब पूरे देश के लिए एक समान कानून लाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि प्रस्ताव का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में समान नियम लागू करना और सामाजिक एकीकरण को मजबूत करना है। मंत्री बोले- डेनमार्क की पहचान बनी रहनी चाहिए इमिग्रेशन एवं इंटीग्रेशन मंत्री मोर्टेन बॉडस्कोव ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के जरिए होने वाली धार्मिक घोषणाएं डेनमार्क के सामाजिक वातावरण के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि देश के कुछ इलाकों को लेकर लोगों में ऐसी भावना नहीं बननी चाहिए कि वे डेनमार्क में नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के माहौल में रह रहे हैं। मंत्री ने यह भी कहा कि डेनमार्क की छतों पर नमाज की आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए। संसद में पेश होगा प्रस्ताव सरकार संसद में ऐसा प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के जरिए अजान या अन्य धार्मिक घोषणाओं के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान होगा। सरकार के मुताबिक यह धार्मिक अभिव्यक्ति पर रोक लगाने का प्रयास नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक एकीकरण से जुड़ी व्यापक नीति का हिस्सा है। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे प्रस्ताव करीब 60 लाख आबादी वाले डेनमार्क में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत है। देश में लगभग 100 मस्जिदें हैं। इससे पहले वर्ष 2020 और 2025 में भी इसी तरह के प्रस्ताव सामने आए थे, लेकिन वे संसद से पारित नहीं हो सके। अब सरकार तीसरी बार इस दिशा में पहल कर रही है। कोपेनहेगन में पहले से लागू हैं नियम राजधानी कोपेनहेगन में शोर नियंत्रण संबंधी नियमों के कारण मस्जिदों को खुले लाउडस्पीकर से अजान प्रसारित करने की अनुमति नहीं है। इसी वजह से शहर की प्रमुख मस्जिदों में बाहरी लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जाता। आव्रजन और धार्मिक नियमों पर पहले भी रही सख्ती प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन के नेतृत्व वाली सरकार यूरोप की सबसे सख्त आव्रजन नीतियों में गिनी जाती है। डेनमार्क ने वर्ष 2018 में सार्वजनिक स्थानों पर पूरे चेहरे को ढकने वाले कपड़ों, जैसे बुर्का और नकाब, पर प्रतिबंध लगाया था। अब सरकार इस प्रतिबंध को स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। कुरान जलाने की घटनाओं के बाद बदला था कानून वर्ष 2023 में सार्वजनिक रूप से कुरान की प्रतियां जलाने की घटनाओं के बाद कई मुस्लिम देशों ने डेनमार्क की आलोचना की थी। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सरकार ने धार्मिक ग्रंथों का अपमान करने और उन्हें जलाने पर रोक लगाने वाला कानून लागू किया था। अभी प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं फिलहाल लाउडस्पीकर से अजान पर प्रतिबंध का प्रस्ताव विचाराधीन है। सरकार कानूनी समीक्षा कर रही है और किसी भी नए कानून को लागू करने से पहले उसे संसद की मंजूरी लेनी होगी।  

Deepshikha जून 27, 2026 0
Owaisi Statement
सड़क पर नमाज को लेकर ओवैसी का हमला, कहा- अगर नमाज गलत है तो धार्मिक जुलूसों पर भी हो रोक

नई दिल्ली, एजेंसियां। सार्वजनिक स्थानों पर नमाज और धार्मिक आयोजनों को लेकर चल रही बहस के बीच AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र और राज्य सरकारों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि यदि सड़कों पर नमाज पढ़ना गलत माना जाता है, तो सभी धर्मों के त्योहारों, जुलूसों और सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों पर भी समान नियम लागू किए जाने चाहिए।   'अनुच्छेद 25 सभी को धार्मिक स्वतंत्रता देता है' एक 'ईद मिलाप' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ओवैसी ने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला दिया, जो नागरिकों को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। उन्होंने कहा कि नमाज को लेकर आपत्ति जताने वाले लोग अन्य धर्मों के सार्वजनिक आयोजनों पर चुप्पी साध लेते हैं, जो स्पष्ट रूप से दोहरे मानदंड को दर्शाता है। ओवैसी ने कहा, "अगर सड़क पर नमाज गलत है, तो हर धर्म के त्योहारों के दौरान सड़क पर निकलने वाले जुलूस भी गलत होने चाहिए। नियम सभी के लिए समान होने चाहिए।"   मांस और शराब की दुकानों को लेकर भी उठाए सवाल AIMIM प्रमुख ने कुछ राज्यों में धार्मिक त्योहारों के दौरान मांस और चिकन की दुकानों को बंद करने के फैसलों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि किसी समुदाय के त्योहार पर मांस की दुकानों को बंद किया जाता है, तो रमजान के दौरान 30 दिनों के लिए शराब की दुकानें भी बंद की जानी चाहिए।   अजान और नमाज पर आपत्ति को बताया पक्षपात ओवैसी ने आरोप लगाया कि रमजान और बकरीद जैसे मुस्लिम त्योहारों के दौरान जानबूझकर अजान और नमाज के मुद्दे उठाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक यात्राओं और जुलूसों के दौरान भी सड़कें घेर ली जाती हैं, लेकिन उन पर वैसी आपत्ति नहीं की जाती जैसी नमाज को लेकर की जाती है।   हालिया विवादों के बीच आया बयान ओवैसी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक सभाओं को लेकर कई राज्यों में प्रशासनिक निर्देश जारी किए गए हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने कहा था कि नमाज निर्धारित स्थानों पर और व्यवस्थित तरीके से पढ़ी जानी चाहिए। वहीं पश्चिम बंगाल में ईद की एक बड़ी नमाज को सार्वजनिक सड़क की बजाय दूसरे स्थल पर आयोजित करने का निर्णय लिया गया था।

Unknown मई 30, 2026 0
AIMIM leader Waris Pathan reacts to Kolkata road namaz controversy during media interaction
कोलकाता नमाज विवाद पर AIMIM के वारिस पठान का बयान, बोले- ‘हिंदू करें तो ठीक, मुसलमान पढ़े तो दिक्कत क्यों?’

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के राजाबाजार इलाके में सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर हुए विवाद पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। अब Waris Pathan ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अगर कोई मुसलमान कुछ मिनटों के लिए सड़क पर नमाज पढ़ता है, तो इससे लोगों को परेशानी क्यों होती है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा कि मुसलमान मजबूरी में सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करते हैं, शौक से नहीं। ‘5-10 मिनट की नमाज से किसे दिक्कत?’ न्यूज एजेंसी IANS से बातचीत में वारिस पठान ने कहा, “अगर कोई मुसलमान शुक्रवार के दिन 5-10 मिनट के लिए सड़क पर खड़े होकर नमाज पढ़ता है, तो इससे किसके पेट में दर्द होता है? मस्जिदों में जगह नहीं होती, इसलिए लोग बाहर आकर नमाज पढ़ लेते हैं।” उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति धूप, बारिश या सड़क पर खड़े होकर नमाज पढ़ना पसंद नहीं करता, लेकिन कई बार जगह की कमी के कारण ऐसा करना पड़ता है। ‘हिंदू धार्मिक कार्यक्रमों पर सवाल नहीं उठते’ वारिस पठान ने दावा किया कि सार्वजनिक स्थानों पर अन्य धर्मों के आयोजन भी होते हैं, लेकिन उन पर वैसी आपत्ति नहीं उठाई जाती। उन्होंने कहा, “हमने कई बार देखा है कि ट्रेनों में पूजा-पाठ होता है, गरबा होता है, एयरपोर्ट पर धार्मिक आयोजन होते हैं, लेकिन मुसलमान नमाज पढ़ लें तो FIR दर्ज हो जाती है, लोगों को जेल भेज दिया जाता है। यह संविधान की बराबरी की भावना के खिलाफ है।” क्या है पूरा मामला? दरअसल, शुक्रवार को कोलकाता के राजाबाजार इलाके में कुछ लोगों ने सड़क पर नमाज अदा करने की कोशिश की थी। इसके बाद इलाके में तनाव की स्थिति बन गई और यातायात भी प्रभावित हुआ। राज्य में नई सरकार बनने के बाद सार्वजनिक सड़कों पर धार्मिक आयोजन और सड़क जाम को लेकर सख्त रुख अपनाया गया है। प्रशासन का कहना है कि बिना अनुमति सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी धार्मिक गतिविधि की इजाजत नहीं दी जाएगी। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव घटना के बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच बहस और धक्का-मुक्की की खबरें भी सामने आईं। हालांकि, अतिरिक्त पुलिस और केंद्रीय बलों की तैनाती के बाद स्थिति को नियंत्रण में कर लिया गया। राजनीतिक बयानबाजी तेज इस मुद्दे पर अब राजनीतिक दल आमने-सामने आ गए हैं। AIMIM ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों का मुद्दा बताया है, जबकि प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। मामले को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बहस लगातार तेज हो रही है।  

surbhi मई 16, 2026 0
Supreme Court hearing on Sabarimala Temple case discussing women’s entry and religious freedom issues
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, बोला- मासिक धर्म को कैसे देखते हैं, यह नजरिए की बात

Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले में Supreme Court of India की नौ सदस्यीय संविधान पीठ में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मासिक धर्म, धार्मिक आस्था और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मासिक धर्म को “वर्जना” या “कलंक” मानना इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति उसे किस नजरिए से देखता है। जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी बनी चर्चा का केंद्र मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Vijay Hansaria ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार उनकी मासिक धर्म वाली उम्र है। उन्होंने कहा कि समाज में अक्सर मासिक धर्म को कलंक और वर्जना की तरह देखा जाता है। इस पर संविधान पीठ में शामिल जस्टिस B. V. Nagarathna ने टिप्पणी करते हुए कहा: “यह वर्जना तब है अगर आप इसे उसी नजरिए से देखते हैं। सवाल यह है कि एक भक्त इसे किस नजरिए से देखता है, न कि कोई गैर-भक्त।” उनकी यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान चर्चा का प्रमुख विषय बन गई। कोर्ट बोला- सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Jaideep Gupta ने दलील दी कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल पहलुओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में पवित्र स्थलों पर पूजा का अधिकार एक महत्वपूर्ण धार्मिक पहलू है और यदि उस व्यवस्था को बदला जाता है, तो यह श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। “अगर जनता चाहती है तो सामाजिक सुधार संभव” सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि यदि देश के लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किसी सामाजिक सुधार की मांग करते हैं, तो अदालत उस पर विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि लोगों की इच्छा और सहमति के खिलाफ कुछ थोपा जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। नौ जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर रही है। इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रशांत बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। दाऊदी बोहरा समेत कई धार्मिक मामलों पर भी सुनवाई संविधान पीठ सिर्फ सबरीमाला मामले ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सुनवाई कर रही है। इनमें Dawoodi Bohra community से जुड़े मामलों समेत विभिन्न धार्मिक परंपराओं और अधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।  

surbhi मई 13, 2026 0
Supreme Court of India hearing Sabarimala temple entry case amid debate on religious rights and traditions.
सबरीमाला केस पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस: ‘भक्त नहीं तो परंपरा को चुनौती क्यों?’

नई दिल्ली: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर सुनवाई के दौरान तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई अहम संवैधानिक सवाल उठाए, जिनका असर भविष्य में धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों की व्याख्या पर पड़ सकता है। कोर्ट का बड़ा सवाल जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने पूछा: “जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, क्या वे मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं?” सवाल यह भी उठा कि: क्या ऐसे मामलों में कोर्ट को सुनवाई करनी चाहिए? 9 जजों की संविधान पीठ कर रही विचार धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों से जुड़े 7 बड़े सवालों पर सुनवाई अहम मुद्दा: क्या कोई गैर-भक्त/गैर-सदस्य किसी धार्मिक प्रथा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है? 2018 के फैसले पर भी चर्चा 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति दी थी यह याचिका इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन ने दाखिल की थी कोर्ट ने अब पूछा: क्या यह संगठन वास्तव में अयप्पा भक्तों का प्रतिनिधित्व करता है? चीफ जस्टिस की अलग राय चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा: अगर मामला गंभीर संवैधानिक मुद्दे से जुड़ा हो, तो कोर्ट सुनवाई कर सकता है भले ही याचिकाकर्ता सीधे प्रभावित न हो हालांकि, उन्होंने यह भी माना: आर्टिकल 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यक्तिगत अधिकार हैं आमतौर पर वही व्यक्ति कोर्ट आता है, जिसका अधिकार प्रभावित हुआ हो सरकार vs याचिकाकर्ता सरकार का पक्ष (SG तुषार मेहता) PIL (जनहित याचिका) का दुरुपयोग हो रहा है कोर्ट तय नहीं कर सकता कि कौन-सी परंपरा अंधविश्वास है धार्मिक सुधार का काम विधायिका (सरकार) का है याचिकाकर्ताओं की दलील कई महिलाएं खुद कोर्ट नहीं आ पातीं ऐसे में संगठन उनकी आवाज बनते हैं जजों की अहम टिप्पणियां कोर्ट के पास अधिकार है कि धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा करे अगर कोई परंपरा: स्वास्थ्य सार्वजनिक व्यवस्था नैतिकता के खिलाफ हो, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है उदाहरण: सती प्रथा जैसी कुरीतियों में कोर्ट दखल दे सकता है परंपरा बनाम अधिकार सरकार का तर्क: अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है इसलिए महिलाओं के प्रवेश पर परंपरा बनी कोर्ट का सवाल: क्या परंपरा संविधान से ऊपर हो सकती है?

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0