मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समीक्षा और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच शुक्रवार को घरेलू शेयर बाजार मामूली गिरावट के साथ बंद हुए। कारोबार के दौरान बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिला, लेकिन दिन के अंत तक प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। निवेशकों ने आरबीआई की नीतिगत घोषणाओं का आकलन करते हुए सतर्क रुख अपनाया। सेंसेक्स और निफ्टी में आई गिरावट नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी-50 सूचकांक 49.85 अंक यानी 0.21 प्रतिशत गिरकर 23,366.70 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स 116.67 अंक या 0.16 प्रतिशत फिसलकर 74,243.34 अंक पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में दोनों सूचकांकों ने बढ़त बनाई थी, लेकिन बाद में बिकवाली का दबाव बढ़ने से बाजार नीचे आ गया। रेपो रेट यथावत, RBI का रुख रहा तटस्थ आरबीआई की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला किया। केंद्रीय बैंक ने आर्थिक विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अपना "तटस्थ" रुख कायम रखा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई फिलहाल ब्याज दरों में किसी बड़े बदलाव के बजाय आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है। तकनीकी स्तरों पर निफ्टी की नजर विश्लेषकों के अनुसार निफ्टी के लिए 23,450 से 23,550 का दायरा मजबूत प्रतिरोध क्षेत्र बना हुआ है। यदि सूचकांक इस स्तर को पार कर स्थिरता बनाए रखता है, तो 23,750 से 23,800 तक की तेजी संभव है। वहीं गिरावट की स्थिति में 23,250 का स्तर महत्वपूर्ण समर्थन माना जा रहा है। आईटी और मेटल शेयरों में बिकवाली सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो आईटी और मेटल शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.35 प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स 0.06 प्रतिशत कमजोर रहा। दूसरी ओर मीडिया सेक्टर ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए बढ़त दर्ज की। प्रमुख गिरावट वाले शेयरों में हिंदाल्को, विप्रो और ट्रेंट शामिल रहे। रुपये में शानदार मजबूती शेयर बाजार की सुस्ती के बीच विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने मजबूत प्रदर्शन किया। डॉलर के मुकाबले रुपया 81 पैसे की तेजी के साथ 94.93 के स्तर पर बंद हुआ। यह मजबूती आरबीआई द्वारा विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने और फॉरेक्स लिक्विडिटी मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों के बाद देखने को मिली। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की पहल आरबीआई ने अनिवासी भारतीयों (NRI) और प्रवासी भारतीय नागरिकों (OCI) के लिए इक्विटी निवेश सीमा बढ़ाने के साथ-साथ फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों का दायरा भी विस्तारित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कदमों से विदेशी निवेश आकर्षित होगा और रुपये को आगे भी समर्थन मिल सकता है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय शेयर बाजार आज शुक्रवार को मजबूत शुरुआत की। निवेशकों की खरीदारी और सकारात्मक वैश्विक संकेतों के बीच बीएसई सेंसेक्स तथा एनएसई निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ खुले। हालांकि बाजार की दिशा अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसले पर टिकी हुई है, जिसकी घोषणा सुबह 10 बजे होनी है। सेंसेक्स और निफ्टी की मजबूत शुरुआत सुबह 9:32 बजे तक सेंसेक्स 197.90 अंक यानी 0.26 प्रतिशत की बढ़त के साथ 74,557.91 पर कारोबार कर रहा था। वहीं निफ्टी 51.41 अंक या 0.22 प्रतिशत चढ़कर 23,467.95 के स्तर पर पहुंच गया। निफ्टी का 23,400 के ऊपर बने रहना बाजार की मजबूती का संकेत माना जा रहा है। इन्फोसिस और अदाणी पोर्ट्स बने बाजार के हीरो शुरुआती कारोबार में आईटी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली। विशेष रूप से इन्फोसिस और अदाणी पोर्ट्स के शेयर लगभग 2-2 प्रतिशत तक उछले। इन बड़े शेयरों की तेजी ने बाजार को ऊपर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और निवेशकों का भरोसा मजबूत किया। निवेशकों की नजर RBI के फैसले पर विश्लेषकों का मानना है कि बाजार फिलहाल सीमित दायरे में कारोबार कर सकता है क्योंकि निवेशक RBI के नीति निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। ब्याज दरों, महंगाई, आर्थिक वृद्धि और तरलता से जुड़े संकेत बाजार की आगे की दिशा तय करेंगे। यदि RBI की नीति बाजार की उम्मीदों के अनुरूप रहती है तो शेयर बाजार में और तेजी देखने को मिल सकती है। आगे क्या? आज का सबसे बड़ा ट्रिगर RBI की मौद्रिक नीति घोषणा है। निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों को उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक की टिप्पणी से आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था और ब्याज दरों की दिशा को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिलेंगे। ऐसे में दिनभर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
मुंबई, एजेंसियां। गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार में दिनभर भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला, लेकिन कारोबार के अंत में प्रमुख सूचकांक लगभग सपाट स्तर पर बंद हुए। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली और आरबीआई की आगामी मौद्रिक नीति बैठक को लेकर निवेशकों में सतर्कता का माहौल बना रहा। कारोबार के दौरान बीएसई सेंसेक्स ने 74,544.24 अंक का उच्चतम और 73,807.30 अंक का न्यूनतम स्तर छुआ। दिनभर के उतार-चढ़ाव के बाद सेंसेक्स 13.84 अंक यानी 0.02 प्रतिशत की मामूली बढ़त के साथ 74,360.01 अंक पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी भी 10.95 अंक या 0.05 प्रतिशत चढ़कर 23,416.55 अंक पर बंद होने में सफल रहा। इन शेयरों ने संभाला बाजार सेंसेक्स के प्रमुख शेयरों में टाइटन, आईटीसी, टेक महिंद्रा, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), आईसीआईसीआई बैंक और इटरनल के शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली। इन शेयरों ने बाजार को गिरावट से उबारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर, इन्फोसिस, बजाज फिनसर्व, अल्ट्राटेक सीमेंट, एचसीएल टेक और अदाणी पोर्ट्स जैसे शेयर दबाव में रहे और नुकसान के साथ बंद हुए। एफआईआई की बिकवाली बनी चिंता बाजार पर विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव लगातार बना हुआ है। एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक, बुधवार को एफआईआई ने 5,616.56 करोड़ रुपये मूल्य की इक्विटी की बिक्री की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। आरबीआई के फैसले पर टिकी निगाहें विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार ने निचले स्तरों से अच्छी रिकवरी दिखाई है, लेकिन निवेशकों की नजर अब शुक्रवार को आने वाले आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के फैसले पर है। यही फैसला आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय कर सकता है। फिलहाल निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं और किसी बड़े संकेत का इंतजार कर रहे हैं।
हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि Reserve Bank of India (आरबीआई) ने चुपचाप 12 अरब डॉलर यानी लगभग 1.14 लाख करोड़ रुपये मूल्य का सोना बेच दिया है। रिपोर्ट में कहा गया था कि 22 मई 2026 को समाप्त हुए दो सप्ताह के दौरान यह बिक्री की गई। इस दावे के बाद आर्थिक और वित्तीय हलकों में चर्चा तेज हो गई, लेकिन अब सरकार ने इस पर स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। सरकार ने बताया दावा पूरी तरह गलत सरकार ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि आरबीआई द्वारा बड़े पैमाने पर सोना बेचने की खबर पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन है। सरकार के अनुसार, उपलब्ध आंकड़े इस दावे का समर्थन नहीं करते हैं। सरकार ने बताया कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। सितंबर 2025 के अंत में यह हिस्सा 13.92 प्रतिशत था, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 16.70 प्रतिशत और 22 मई 2026 तक 16.85 प्रतिशत हो गया। यदि आरबीआई ने बड़ी मात्रा में सोना बेचा होता, तो सोने की हिस्सेदारी बढ़ने के बजाय घटती दिखाई देती। आरबीआई के पास कितना सोना है? आरबीआई के मासिक बुलेटिन के अनुसार, केंद्रीय बैंक के पास कुल 880.52 टन सोने का भंडार मौजूद है। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह भंडार अब भी बरकरार है और इसमें किसी बड़ी बिक्री का कोई संकेत नहीं मिलता। रिपोर्ट में क्या दावा किया गया था? रिपोर्ट में कहा गया था कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए आरबीआई ने अपने स्वर्ण भंडार का एक हिस्सा बेचा है। हालांकि सरकार और आरबीआई के उपलब्ध आंकड़ों ने इस दावे को खारिज कर दिया है। भारत का सोना कहां रखा जाता है? मार्च 2026 तक आरबीआई के पास मौजूद कुल 880.52 टन सोने में से लगभग 77 प्रतिशत सोना भारत में ही सुरक्षित रखा गया है। छह महीने पहले यह आंकड़ा करीब 66 प्रतिशत था। विदेशों में रखा गया भारतीय सोना मुख्य रूप से Bank of England और Bank for International Settlements जैसी संस्थाओं के पास सुरक्षित है।
भारतीय रुपये में आई कमजोरी और विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ी अस्थिरता ने आम लोगों और आयातकों की चिंता बढ़ाई, लेकिन यही स्थिति Reserve Bank of India (RBI) के लिए बड़ी कमाई का जरिया बन गई। वित्त वर्ष 2025-26 में आरबीआई ने विदेशी मुद्रा लेनदेन से रिकॉर्ड 1.69 लाख करोड़ रुपये का विनिमय लाभ अर्जित किया, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में करीब 52 प्रतिशत अधिक है। केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में यह लाभ 1.11 लाख करोड़ रुपये था, जबकि एक साल बाद यह बढ़कर 1.69 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। रुपये को बचाने के लिए RBI ने बेचे रिकॉर्ड डॉलर पिछले वित्त वर्ष में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में करीब 9.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। रुपये पर बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने और बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए RBI ने बड़े पैमाने पर डॉलर बेचे। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने स्पॉट मार्केट में रिकॉर्ड 53.13 अरब डॉलर की बिक्री की। यह डॉलर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से निकाले गए थे। डॉलर की इस बिक्री से RBI को विनिमय दरों के अंतर के कारण बड़ा लाभ हुआ, जिसने उसकी आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की। कैसे हुई RBI की कमाई? जब केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचता है और डॉलर की कीमत रुपये के मुकाबले अधिक होती है, तो उसे विनिमय लाभ (Exchange Gain) प्राप्त होता है। सरल शब्दों में समझें तो: डॉलर महंगा हुआ। RBI ने अपने रिजर्व से डॉलर बेचे। बिक्री से अधिक रुपये प्राप्त हुए। इस अंतर ने RBI की आय बढ़ा दी। इसी वजह से विदेशी मुद्रा लेनदेन से RBI की आय बढ़कर ₹1.69 लाख करोड़ तक पहुंच गई। विदेशी स्रोतों से कुल आय 3.28 लाख करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों, निवेश और अन्य विदेशी स्रोतों से RBI की कुल आय वित्त वर्ष 2025-26 में 27 प्रतिशत बढ़कर 3.28 लाख करोड़ रुपये हो गई। यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि वैश्विक वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव के बीच RBI की विदेशी संपत्तियों ने मजबूत प्रदर्शन किया। सरकार को मिलेगा रिकॉर्ड सरप्लस RBI ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर करने का फैसला किया है। यह राशि सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे राजकोषीय प्रबंधन, विकास योजनाओं और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिलेगा। RBI की बैलेंस शीट भी हुई मजबूत 31 मार्च 2026 तक RBI की कुल बैलेंस शीट का आकार बढ़कर 91.97 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 15.72 लाख करोड़ रुपये अधिक है। परिसंपत्तियों में वृद्धि के प्रमुख कारण: घरेलू निवेश में 44.9% की बढ़ोतरी स्वर्ण भंडार में 63.8% की वृद्धि विदेशी निवेश में 7.9% की बढ़ोतरी RBI की कुल परिसंपत्तियों में: 29.1% घरेलू परिसंपत्तियां 70.9% विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां, सोना और विदेशी वित्तीय संस्थानों को दिए गए ऋण शामिल हैं कुल आय में भी बड़ी छलांग वित्त वर्ष 2025-26 में RBI की कुल आय बढ़कर 4.3 लाख करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 26 प्रतिशत अधिक है। वहीं केंद्रीय बैंक का कुल अधिशेष (Surplus) बढ़कर 2,86,588 करोड़ रुपये हो गया, जो एक वर्ष पहले 2,68,590 करोड़ रुपये था। क्या है इसका अर्थ? रुपये की कमजोरी आम तौर पर अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती मानी जाती है क्योंकि इससे आयात महंगे हो जाते हैं। लेकिन जब केंद्रीय बैंक के पास विशाल विदेशी मुद्रा भंडार होता है, तो वह बाजार में हस्तक्षेप कर मुद्रा को स्थिर रखने के साथ-साथ विनिमय लाभ भी अर्जित कर सकता है। इस बार RBI ने रुपये को संभालने के लिए जो डॉलर बेचे, वही उसके लिए रिकॉर्ड कमाई का कारण बन गए।
Reserve Bank of India की ताजा वार्षिक रिपोर्ट में भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक अहम संकेत दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार देश की आर्थिक स्थिति फिलहाल मजबूत बनी हुई है, लेकिन आने वाले समय में सबसे बड़ा खतरा घरेलू नहीं बल्कि वैश्विक परिस्थितियों से पैदा हो सकता है। रिजर्व बैंक ने साफ कहा है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, बढ़ती तेल कीमतें, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और सप्लाई चेन में बाधाएं भारत की विकास रफ्तार पर असर डाल सकती हैं। मजबूत अर्थव्यवस्था के बावजूद बढ़ी चिंता आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी मजबूत उपभोक्ता मांग, सरकारी निवेश और स्वस्थ बैंकिंग सिस्टम के सहारे आगे बढ़ रही है। कॉरपोरेट और बैंकों की बैलेंस शीट पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। इसके बावजूद केंद्रीय बैंक का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात तेजी से बदल रहे हैं और उनका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया का तनाव बना सबसे बड़ा जोखिम रिपोर्ट में पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है। आरबीआई के मुताबिक इस तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने वैश्विक विकास दर के अनुमान घटा दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि यह संघर्ष और बढ़ता है या लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता और अधिक गंभीर है क्योंकि देश कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है। महंगा तेल बढ़ा सकता है महंगाई आरबीआई ने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भारत में महंगाई को फिर से बढ़ा सकती है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ, लॉजिस्टिक्स और रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर भी पड़ता है। यानी पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाल सकता है। शिपिंग संकट से उद्योगों पर दबाव केंद्रीय बैंक ने वैश्विक शिपिंग रूट्स में आ रही बाधाओं को भी बड़ी चिंता बताया है। रिपोर्ट के अनुसार यदि समुद्री व्यापार प्रभावित होता है तो भारत में कच्चे माल और जरूरी उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, केमिकल और कई औद्योगिक उत्पाद विदेशों से आने वाले कच्चे माल पर निर्भर करते हैं। ऐसे में शिपिंग लागत बढ़ने का असर उत्पादन और कीमतों दोनों पर पड़ सकता है। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता का असर आरबीआई ने यह भी कहा कि दुनिया में बढ़ता संरक्षणवाद और बदलती व्यापार नीतियां भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए चुनौती बन सकती हैं। भारत इस समय खुद को एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि वैश्विक व्यापार धीमा पड़ता है तो इंजीनियरिंग, फार्मा और आईटी सेवाओं जैसे सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं। शेयर बाजार में बढ़ सकती है हलचल रिपोर्ट में शेयर बाजार को लेकर भी सावधानी जताई गई है। आरबीआई का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक जोखिम लेने से बचते हैं, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। खासतौर पर टेक्नोलॉजी सेक्टर के ऊंचे वैल्यूएशन में सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि आरबीआई ने किसी बड़े बाजार संकट की भविष्यवाणी नहीं की है, लेकिन निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह जरूर दी है। फिर भी भारत की ग्रोथ पर भरोसा कायम इन सभी चुनौतियों के बावजूद आरबीआई ने भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत बताया है। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च, निजी निवेश और नए व्यापार समझौते आने वाले वर्षों में विकास को समर्थन देंगे। केंद्रीय बैंक का मानना है कि भारत पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन अब देश की अर्थव्यवस्था वैश्विक घटनाओं से पहले से अधिक जुड़ चुकी है।
भारतीय रुपये में हाल के महीनों में आई कमजोरी को लेकर चल रही बहस के बीच वरिष्ठ अर्थशास्त्री और पूर्व योजना आयोग उपाध्यक्ष Montek Singh Ahluwalia ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के रुख का समर्थन किया है। उनका कहना है कि रुपये की विनिमय दर को बाजार की वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार चलने देना चाहिए और हर हाल में उसे एक निश्चित स्तर पर बनाए रखने की कोशिश उचित नहीं होती। रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव? पिछले कुछ महीनों में भारतीय रुपये पर कई वैश्विक और घरेलू कारणों से दबाव बढ़ा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई, जिससे भारत के आयात बिल और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितता ने भी रुपये को कमजोर किया। ‘रुपये का कमजोर होना लगभग तय था’ मोंटेक सिंह अहलूवालिया का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में रुपये पर दबाव आना स्वाभाविक था। उनके अनुसार, जब बाजार की परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाएं तो विनिमय दर में कुछ गिरावट आने देना आर्थिक रूप से गलत नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक भारत चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को विदेशी पूंजी निवेश के जरिए आसानी से संभालता रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पूंजी प्रवाह की गति धीमी पड़ने से स्थिति बदल गई है। ऐसे में केवल विदेशी मुद्रा भंडार खर्च कर रुपये को बचाने की रणनीति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती। कमजोर रुपया निर्यात के लिए फायदेमंद अहलूवालिया ने यह भी कहा कि रुपये में नियंत्रित गिरावट का एक सकारात्मक पहलू भी है। इससे भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है। जब घरेलू मुद्रा कमजोर होती है तो विदेशों में भारतीय उत्पाद अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं, जिससे निर्यात बढ़ने की संभावना रहती है। उनका मानना है कि मध्यम अवधि में यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी साबित हो सकता है। RBI की रणनीति पर जारी है बहस हाल के समय में कई अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा तेज हुई है कि क्या RBI को रुपये की रक्षा के लिए आक्रामक हस्तक्षेप करना चाहिए या फिर बाजार को अपनी दिशा तय करने देनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े वैश्विक झटकों के दौरान किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखने की कोशिश आर्थिक रूप से महंगी और अस्थिर साबित हो सकती है। भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी चुनौतियां रुपये के मुद्दे पर बात करते हुए मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ संरचनात्मक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि निजी निवेश और निर्यात की धीमी रफ्तार कई वर्षों से चिंता का विषय रही है। उनके मुताबिक भारत को निवेश आकर्षित करने और आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए और अधिक सुधारों की जरूरत है। साथ ही वैश्विक निवेशकों को स्पष्ट और भरोसेमंद नीति संकेत देने होंगे। व्यापार समझौतों पर जोर अहलूवालिया ने सुझाव दिया कि भारत को एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करना चाहिए। उनका मानना है कि वैश्विक व्यापार वृद्धि में एशिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है और भारत को इसका लाभ उठाने के लिए नए व्यापार समझौतों और आर्थिक साझेदारियों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए निवेश संरक्षण से जुड़े ढांचों को मजबूत करना आवश्यक है। आगे क्या रहेगा रुपये की दिशा? हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी आने और भू-राजनीतिक तनाव कम होने की उम्मीदों के बीच रुपये में हल्की रिकवरी देखने को मिली है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रुपये की चाल मुख्य रूप से इन कारकों पर निर्भर करेगी - कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें विदेशी निवेश प्रवाह अमेरिकी ब्याज दरें पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति भारत की आर्थिक वृद्धि और निर्यात प्रदर्शन फिलहाल, मोंटेक सिंह अहलूवालिया का मानना है कि बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप रुपये को समायोजित होने देना एक व्यावहारिक और संतुलित आर्थिक नीति का हिस्सा है।
Reserve Bank of India ने बैंकों को बड़ी राहत देते हुए पूंजी गणना से जुड़े नियमों को आसान बना दिया है। अब बैंक बिना किसी जटिल शर्त के अपनी तिमाही कमाई को मुख्य पूंजी यानी CET1 (Common Equity Tier 1) में शामिल कर सकेंगे। आरबीआई के इस फैसले से बैंकों के लिए अपनी पूंजीगत स्थिति मजबूत दिखाना और कैपिटल मैनेजमेंट करना पहले के मुकाबले काफी आसान हो जाएगा। क्या था पुराना नियम? अब तक बैंकों को अपनी तिमाही कमाई को CET1 पूंजी में शामिल करने के लिए एक अहम शर्त पूरी करनी होती थी। नियम के अनुसार, एनपीए (Non-Performing Assets) यानी फंसे हुए कर्ज के लिए की गई प्रोविजनिंग में पिछले चार तिमाहियों के औसत के मुकाबले 25 प्रतिशत से ज्यादा का बदलाव नहीं होना चाहिए था। अगर यह सीमा पार हो जाती थी, तो बैंक अपनी तिमाही कमाई को पूंजी में शामिल नहीं कर पाते थे। अब Reserve Bank of India ने इस 25% वाली शर्त को पूरी तरह खत्म कर दिया है। बैंकों को क्या होगा फायदा? इस बदलाव से बैंकों के लिए अपना Capital to Risk Weighted Assets Ratio (CRAR) बनाए रखना आसान होगा। CRAR यह बताता है कि किसी बैंक के पास संभावित नुकसान झेलने के लिए कितनी मजबूत पूंजी मौजूद है। अब बैंक हर तिमाही के मुनाफे को बिना किसी NPA-लिंक्ड बाधा के अपनी कोर कैपिटल में जोड़ सकेंगे। इससे उनकी बैलेंस शीट मजबूत दिखेगी और फंड मैनेजमेंट में भी आसानी होगी। किन बैंकों पर लागू होंगे नए नियम? Reserve Bank of India ने इस संबंध में तीन अलग-अलग निर्देश जारी किए हैं। ये नए नियम कमर्शियल बैंकों, स्मॉल फाइनेंस बैंकों और पेमेंट बैंकों पर लागू होंगे। आरबीआई ने बताया कि यह फैसला 8 अप्रैल 2026 को जारी ड्राफ्ट प्रस्तावों और उस पर मिले सुझावों के बाद लिया गया है। आम लोगों और बैंकिंग सेक्टर पर क्या पड़ेगा असर? विशेषज्ञों के मुताबिक इस कदम से बैंकिंग सिस्टम ज्यादा व्यवस्थित और पारदर्शी बनेगा। जब बैंकों के लिए पूंजी की गणना आसान होती है, तो उन्हें लोन देने, बिजनेस विस्तार और जोखिम प्रबंधन में बेहतर स्पष्टता मिलती है। इससे बैंकिंग सेक्टर की स्थिरता मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।
भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को लेकर एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाया है। Reserve Bank of India (RBI) ने पिछले छह महीनों में करीब 104 टन सोना विदेशों से वापस देश में मंगाया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ रही है। कितना सोना भारत में, कितना विदेश में? RBI की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कुल 880.52 टन सोने में से अब लगभग 77% यानी करीब 680 टन सोना देश के भीतर सुरक्षित रखा गया है। वहीं, करीब 197.67 टन सोना अभी भी Bank of England और Bank for International Settlements (BIS) के पास रखा हुआ है। क्यों बदली रणनीति? पहले भारत सहित कई देश अपने सोने को लंदन और न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक वित्तीय केंद्रों में रखते थे। इसके पीछे मुख्य कारण थे: अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की खरीद-फरोख्त में आसानी वैश्विक लेनदेन में सुविधा विदेशी संस्थानों पर भरोसा लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। Russia-Ukraine War और अफगानिस्तान के विदेशी भंडार फ्रीज होने जैसी घटनाओं ने देशों को सतर्क कर दिया है। अब सोने को सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा (Strategic Asset) के रूप में देखा जा रहा है। क्या हैं प्रमुख जोखिम? विदेशों में रखी संपत्ति राजनीतिक कारणों से फ्रीज हो सकती है संकट के समय तुरंत उपयोग में लाना मुश्किल वैश्विक तनाव के कारण भरोसे में कमी विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ी हिस्सेदारी सोने की कीमतों में तेजी के चलते भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में इसकी अहमियत भी बढ़ी है: सितंबर 2025: 97.4 अरब डॉलर मार्च 2026: 115.4 अरब डॉलर हिस्सेदारी: 13.9% से बढ़कर 16.7% दुनिया में भी बढ़ रहा ट्रेंड भारत अकेला नहीं है, कई देश इसी राह पर चल रहे हैं: फ्रांस ने 129 टन सोना वापस मंगाया सर्बिया ने पूरा स्वर्ण भंडार देश में शिफ्ट किया जर्मनी भी अपने विदेशी भंडार की समीक्षा कर रहा है World Gold Council के अनुसार, 2025 तक 59% केंद्रीय बैंक अपना सोना अपने देश में रखना पसंद कर रहे हैं, जो 2020 में 50% था। क्या संकेत देता है यह कदम? भारत का यह कदम साफ तौर पर दर्शाता है कि बदलते वैश्विक माहौल में आर्थिक सुरक्षा और स्वायत्तता को प्राथमिकता दी जा रही है। यह सिर्फ एक वित्तीय निर्णय नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक सोच का हिस्सा है।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर में एक बड़ा और सख्त कदम उठाते हुए Reserve Bank of India (RBI) ने Paytm Payments Bank Limited (PPBL) का बैंकिंग लाइसेंस रद्द कर दिया है। यह फैसला 24 अप्रैल 2026 की शाम से प्रभावी हो गया, जिसके बाद बैंक की सभी बैंकिंग गतिविधियों पर पूर्ण रोक लग गई है। यह कार्रवाई लंबे समय से चल रही नियामकीय जांच और बार-बार चेतावनियों के बावजूद सुधार न होने के चलते की गई है। RBI ने क्यों उठाया इतना बड़ा कदम? RBI के अनुसार, Paytm Payments Bank का संचालन जमाकर्ताओं के हित में नहीं पाया गया। बैंक निर्धारित नियमों और शर्तों का पालन करने में विफल रहा मैनेजमेंट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे बार-बार चेतावनी के बावजूद सुधार नहीं हुआ इसी आधार पर बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की धारा 22(4) के तहत लाइसेंस रद्द करने का निर्णय लिया गया। अब बैंक का क्या होगा? लाइसेंस रद्द होने के बाद: बैंक किसी भी प्रकार की नई बैंकिंग सेवा नहीं दे सकेगा नए ग्राहक जोड़ना और ट्रांजैक्शन पूरी तरह बंद RBI अब बैंक को बंद (Winding Up) करने की प्रक्रिया शुरू करेगा इसके लिए हाईकोर्ट में आवेदन किया जाएगा सरल शब्दों में, बैंक अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। क्या ग्राहकों का पैसा सुरक्षित है? RBI ने ग्राहकों को राहत देते हुए कहा है कि: बैंक के पास पर्याप्त लिक्विडिटी मौजूद है सभी जमाकर्ताओं को उनका पैसा वापस किया जाएगा रिफंड प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जाएगी हालांकि, ग्राहकों को सलाह दी गई है कि वे आधिकारिक अपडेट्स पर नजर बनाए रखें और निर्देशों का पालन करें। क्या यह फैसला अचानक लिया गया? यह कार्रवाई अचानक नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है: मार्च 2022: नए ग्राहक जोड़ने पर रोक जनवरी–फरवरी 2024: डिपॉजिट, वॉलेट टॉप-अप और क्रेडिट ट्रांजैक्शन पर प्रतिबंध लगातार चेतावनियों के बावजूद सुधार न होने पर अंतिम कार्रवाई ग्राहकों के लिए क्या करें? अपने खाते और बैलेंस की जानकारी नियमित रूप से जांचें RBI और बैंक की आधिकारिक घोषणाओं को फॉलो करें किसी भी अफवाह से बचें रिफंड प्रक्रिया शुरू होते ही आवश्यक कार्रवाई करें
देश की अर्थव्यवस्था में तरलता बनाए रखने और बाजार से कर्ज जुटाने के लिए Reserve Bank of India ने 24 अप्रैल 2026 को सरकारी प्रतिभूतियों (G-Sec) की बड़ी नीलामी का ऐलान किया है। इस मेगा ऑक्शन के जरिए सरकार कुल 32,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना पर काम कर रही है। यह नीलामी वित्तीय बाजारों के लिए अहम मानी जा रही है, क्योंकि इससे सरकार की उधारी रणनीति और निवेशकों की रुचि दोनों का संकेत मिलेगा। चार हिस्सों में होगी बॉन्ड्स की नीलामी RBI द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, इस ऑक्शन को चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है: 6.03% GS 2029 – 11,000 करोड़ रुपये 6.68% GS 2033 – 11,000 करोड़ रुपये 7.24% GS 2055 – 5,000 करोड़ रुपये New GOI SGrB 2056 (ग्रीन बॉन्ड्स) – 5,000 करोड़ रुपये इन सभी को मिलाकर कुल 32,000 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाई जाएगी। इसमें नए बॉन्ड्स के साथ कुछ मौजूदा सिक्योरिटीज को दोबारा जारी (re-issue) भी किया जाएगा। प्राइमरी डीलर्स की अहम भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में ‘प्राइमरी डीलर्स’ (PDs) की जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। RBI ने इनके लिए न्यूनतम अंडरराइटिंग कमिटमेंट (MUC) तय किया है। 2029 और 2033 बॉन्ड्स के लिए: प्रति डीलर 262 करोड़ रुपये 2055 और 2056 बॉन्ड्स के लिए: प्रति डीलर 120 करोड़ रुपये सरल भाषा में, ये डीलर्स यह सुनिश्चित करते हैं कि नीलामी सफलतापूर्वक पूरी हो और पर्याप्त मांग बनी रहे। डिजिटल प्लेटफॉर्म से होगी नीलामी यह पूरी प्रक्रिया RBI के e-Kuber सिस्टम के जरिए डिजिटल रूप में संपन्न होगी। बोली लगाने का समय सुबह 09:00 बजे से 09:30 बजे तक तय किया गया है। इस दौरान सभी प्रतिभागियों को अपनी बिड सबमिट करनी होगी। यह ‘मल्टीपल प्राइस-बेस्ड मेथड’ पर आधारित होगी, जिसमें अलग-अलग निवेशक अलग-अलग कीमतों पर बोली लगा सकते हैं। डीलर्स को मिलेगा कमीशन नीलामी में भाग लेने वाले प्राइमरी डीलर्स को ‘अंडरराइटिंग कमीशन’ दिया जाएगा। RBI के अनुसार, यह राशि सीधे उनके चालू खाते में उसी दिन ट्रांसफर कर दी जाएगी, जिस दिन सिक्योरिटीज जारी की जाएंगी। इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहती है और बाजार में नकदी का प्रवाह भी सुचारू रहता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।