कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की राजनीति में गुरुवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट में शामिल होने का ऐलान किया। इस फैसले को TMC के भीतर बढ़ती अंदरूनी खींचतान का बड़ा संकेत माना जा रहा है। नेतृत्व से नाराजगी बनी वजह मदन मित्रा ने अपने इस्तीफे के पीछे पार्टी नेतृत्व से मतभेद को प्रमुख कारण बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन के भीतर उनकी बातों को महत्व नहीं दिया जा रहा था और पार्टी में फैसले लेने की प्रक्रिया बदल गई है। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल मदन मित्रा के इस कदम के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के बाद TMC के भीतर उभर रहे मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। TMC के लिए बड़ा झटका मदन मित्रा लंबे समय से ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में गिने जाते रहे हैं। ऐसे में उनका पार्टी छोड़ना TMC के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। हाल ही में उन्हें संगठन में अहम जिम्मेदारी भी दी गई थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। आगे की रणनीति पर नजर मदन मित्रा के बागी गुट में शामिल होने के बाद अब सभी की नजर पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और TMC नेतृत्व की अगली रणनीति पर टिकी है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर और भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) की नियुक्ति को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दायर अपील पर आज हाईकोर्ट की खंडपीठ सुनवाई करेगी। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी गुट के विधायक रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। रीतब्रत बनर्जी की ओर से संविधान का हवाला मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान रीतब्रत बनर्जी की ओर से पेश अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति शम्पा सरकार और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ के सामने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि रीतब्रत बनर्जी की नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्ति संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून)के प्रावधानों के अनुरूप की गई है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई बुधवार तक जारी रखने का निर्णय लिया। एकल पीठ ने अंतरिम राहत देने से किया था इनकार इससे पहले 18 जून को कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत ने मुख्य मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की थी। शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ का किया रुख एकल पीठ के फैसले के बाद टीएमसी विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ में अपील दायर की। उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया कि नेता प्रतिपक्ष पद के लिए उनके नाम की अनदेखी की गई और रीतब्रत बनर्जी की नियुक्ति कानून के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इस नियुक्ति को पूरी तरह गैर-कानूनी बताते हुए निरस्त करने की मांग की है। आज की सुनवाई पर टिकी राजनीतिक नजरें बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहे इस विवाद पर अब सभी की नजरें कलकत्ता हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के फैसले का असर राज्य की राजनीतिक स्थिति और विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका पर पड़ सकता है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी सत्ता संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। कोलकाता स्थित पार्टी के राज्य मुख्यालय पर बागी गुट के नियंत्रण के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया है। नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने शुक्रवार को पार्टी कार्यालय पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद परिसर में तनाव बढ़ गया। स्थिति को देखते हुए मौके पर CRPF और कोलकाता पुलिस के जवान तैनात किए गए। बागी गुट ने जताया मुख्यालय पर दावा बताया जा रहा है कि बागी गुट ने नई दिल्ली में चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी के नाम, फंड और चुनाव चिह्न पर दावा पेश करने के एक दिन बाद यह कदम उठाया। ऋतब्रत बनर्जी अपने समर्थक नेताओं के साथ पार्टी कार्यालय पहुंचे और वहां लगे पुराने साइनबोर्ड हटाकर नया बैनर लगा दिया। बागी गुट ने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया चेयरमैन घोषित करने का भी दावा किया। बागी नेताओं का कहना है कि कार्यालय का पुराना किराया समझौता समाप्त हो चुका था और नई वर्किंग कमेटी के तहत नया समझौता किया गया है। उनका दावा है कि कार्यालय पर उनका वैध अधिकार है, हालांकि उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करने से इनकार किया। ममता गुट ने लगाया अवैध कब्जे का आरोप मुख्यालय पर कब्जे की खबर के बाद ममता बनर्जी समर्थक नेताओं ने इसे अवैध कार्रवाई बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने आरोप लगाया कि बागी गुट को केंद्रीय सुरक्षा बलों का संरक्षण मिल रहा है। वहीं टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने बागी नेताओं पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी इस कार्रवाई को अदालत और जनता दोनों के सामने चुनौती देगी। अब चुनाव आयोग के फैसले पर निगाहें कोलकाता पुलिस ने स्पष्ट किया है कि कार्यालय के स्वामित्व और लीज से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद ही वहां नियमित राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति दी जाएगी। इस बीच चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से 6 जुलाई की शाम 5:30 बजे तक पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिह्न पर अपने-अपने दावे और जवाब दाखिल करने को कहा है। अब इस विवाद का अगला बड़ा फैसला चुनाव आयोग के रुख पर निर्भर करेगा।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेतृत्व गुट को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने विधानसभा स्पीकर के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसके तहत टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया गया था। इसके साथ ही फिलहाल स्पीकर का निर्णय प्रभावी रहेगा। यह याचिका टीएमसी नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय की ओर से दायर की गई थी। उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति को चुनौती देते हुए इसे निरस्त करने की मांग की थी। दरअसल, नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए टीएमसी के दोनों गुटों ने अलग-अलग नाम भेजे थे। ममता बनर्जी समर्थक गुट ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय का नाम प्रस्तावित किया, जबकि बागी विधायकों के गुट ने ऋतब्रत बनर्जी का नाम आगे बढ़ाया। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने ऋतब्रत बनर्जी के नाम को मंजूरी देते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर दिया। जस्टिस कृष्णा राव ने कहा मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि फिलहाल कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया जाएगा। अदालत ने दोनों पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपने-अपने हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी। तब तक ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर बने रहेंगे। यह खबर अपडेट की जा रही है ........
पश्चिम बंगाल विधानसभा के 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आंतरिक कलह और गहरा गई है। विधानसभा की सर्वदलीय और कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार एवं ममता बनर्जी के करीबी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर बैठक में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया। इस घटनाक्रम को विधानसभा के भीतर बदलते सियासी समीकरणों और बागी गुट की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है। रीतब्रत को मिली मान्यता, शोभनदेव रहे बाहर विधानसभा सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक के लिए जारी सूची में शोभनदेव चट्टोपाध्याय और बेलेघाटा से विधायक कुणाल घोष का नाम शामिल नहीं था। इसके विपरीत, हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र नाथ बसु द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त रीतब्रत बनर्जी को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संकेत देता है कि विधानसभा प्रशासन सदन के भीतर उभरी नई संख्या-स्थिति को स्वीकार करने लगा है। बागी गुट के साथ 65 विधायक तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई बगावत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। कुछ दिन पहले पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले को खारिज करते हुए विपक्ष के नेता पद के लिए रीतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था। अब बागी गुट का दावा है कि उसके समर्थन में 65 विधायक हैं, जिससे विधानसभा में रीतब्रत की स्थिति और मजबूत हुई है। सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए अन्य विपक्षी नेता सर्वदलीय बैठक में विभिन्न विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इनमें शामिल थे: नौशाद सिद्दीकी हुमायूं कबीर मुस्तफिजुर रहमान संसद से विधानसभा तक टीएमसी में संकट विधानसभा में बढ़ते संकट के बीच तृणमूल कांग्रेस को संसद में भी बड़ा झटका लग चुका है। हाल ही में पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का फैसला किया और भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की। बजट सत्र से पहले बढ़ा सियासी तापमान बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू हो रहा है। उससे पहले विपक्ष के नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा के भीतर बदलते संख्या बल और टीएमसी की आंतरिक टूट का असर आगामी सत्र की कार्यवाही और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर किस रूप में पड़ता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी खींचतान अब अदालत तक पहुंच गई है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें बागी नेता रीतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में होगी। कोर्ट ने इस याचिका को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करते हुए 11 जून को विस्तृत सुनवाई की तारीख तय की है। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कानूनी आपत्ति टीएमसी की ओर से दायर याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी गई है। पार्टी का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़ा फैसला पार्टी की आधिकारिक स्थिति और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप नहीं है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष के फैसले के कारण विधानसभा के भीतर संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। बागी गुट के समर्थन से बढ़ा विवाद विवाद की जड़ टीएमसी विधायकों के भीतर उभरा मतभेद है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद विपक्ष की भूमिका में पहुंची टीएमसी के 80 विधायकों में से बड़ी संख्या ने कथित तौर पर रीतब्रत बनर्जी के समर्थन में रुख अपनाया। इसी समर्थन के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पार्टी नेतृत्व इस फैसले को चुनौती दे रहा है और आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी दलील रख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी के संगठनात्मक निर्णयों की अनदेखी कर नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं बागी गुट का तर्क है कि उन्हें पर्याप्त विधायकों का समर्थन प्राप्त है और इसी आधार पर उन्हें मान्यता मिली है। इस विवाद ने विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और टीएमसी के आंतरिक नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर उभरे मतभेदों ने उसके सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सभी की निगाहें 11 जून को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष के पद की वैधता तय करेगा, बल्कि राज्य की विपक्षी राजनीति और टीएमसी के आंतरिक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी राजनीतिक संकट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात उन राजनीतिक घटनाओं की याद दिलाते हैं, जिनका सामना कांग्रेस ने पहले किया था। अधीर रंजन ने कहा कि राजनीति में किए गए फैसलों का असर समय के साथ सामने आता है और आज वही स्थिति तृणमूल कांग्रेस के सामने दिखाई दे रही है। ‘इतिहास खुद को दोहरा रहा है’ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि बंगाल की राजनीति में इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता नजर आ रहा है। उन्होंने दावा किया कि जिस तरह अतीत में विपक्षी दलों को कमजोर करने की कोशिशें हुई थीं, उसी प्रकार की परिस्थितियां अब तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ी हो गई हैं। रीतब्रत खेमे को मिला 58 विधायकों का समर्थन टीएमसी के भीतर राजनीतिक संकट उस समय और गहरा गया जब 58 विधायकों ने रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व का समर्थन किया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी खेमे को मान्यता मिलने से पार्टी के भीतर चल रहा विवाद और अधिक चर्चा का विषय बन गया। 2016 के घटनाक्रम का किया जिक्र अधीर रंजन चौधरी ने 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि बाद के वर्षों में कांग्रेस के कई नेता और विधायक पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए, जिससे कांग्रेस की विधानसभा में ताकत कम होती गई। ‘राजनीतिक दलबदल का दौर जारी है’ कांग्रेस नेता ने कहा कि बंगाल की राजनीति में दलबदल की संस्कृति नई नहीं है। उनके अनुसार, पहले जो दल इस प्रक्रिया से लाभ उठाते थे, आज वे स्वयं इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन दलबदल की राजनीति का सिलसिला जारी रहता है। कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को दिया संदेश अधीर रंजन चौधरी ने इस अवसर पर उन कार्यकर्ताओं और नेताओं का भी जिक्र किया, जिन्होंने वर्षों तक विभिन्न राजनीतिक संघर्षों का सामना किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस संगठन अपने पुराने कार्यकर्ताओं और समर्थकों का स्वागत करने के लिए तैयार है और पार्टी को मजबूत बनाने की दिशा में काम जारी रहेगा। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल टीएमसी में जारी घटनाक्रम और विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाओं ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर और बाहर होने वाले फैसले राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।