वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच हालिया शांति वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने अमेरिका की लगभग सभी प्रमुख शर्तें स्वीकार कर ली हैं और हाल के सैन्य अभियानों के बाद उसकी सैन्य क्षमता और अर्थव्यवस्था दोनों गंभीर रूप से कमजोर हो चुकी हैं। अमेरिकी मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि क्षेत्रीय तनाव और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान अब पहले जैसी स्थिति में नहीं है। उनके मुताबिक, अमेरिका ने लगातार कई दिनों तक सैन्य अभियान चलाकर ईरान की रक्षा क्षमताओं को भारी नुकसान पहुंचाया। 'बार-बार नष्ट किए गए ईरान के रडार' CNBC को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के रडार सिस्टम को कई बार निशाना बनाया। उन्होंने कहा, "जब-जब ईरान ने नया रडार लगाने की कोशिश की, हमने उसे फिर से नष्ट कर दिया। पिछले सप्ताह भी हमने उनका रडार सिस्टम खत्म किया। अब उन्हें तीसरी बार पूरी व्यवस्था फिर से तैयार करनी होगी।" ट्रंप ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में जरूरत पड़ी तो अमेरिका के पास आगे की कार्रवाई के लिए सभी आवश्यक संसाधन मौजूद हैं। 'ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह टूट चुकी है' ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य दबाव का ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि देश में महंगाई करीब 300 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं। ट्रंप के अनुसार, "वे कुछ भी नहीं कमा रहे हैं। उनके शीर्ष नेता जा चुके हैं, दूसरे और तीसरे स्तर के कई नेता भी बाहर हो चुके हैं। उनकी सेना के अधिकांश वरिष्ठ जनरल अब नहीं रहे।" होर्मुज स्ट्रेट क्यों नहीं किया बंद? ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका ने रणनीतिक रूप से होर्मुज स्ट्रेट को बंद नहीं किया, क्योंकि इससे पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर गंभीर असर पड़ सकता था। उन्होंने कहा, "अगर मैं सख्त फैसला लेकर अगले कुछ वर्षों के लिए होर्मुज स्ट्रेट बंद कर देता, जहां से दुनिया का करीब 20 से 21 प्रतिशत तेल गुजरता है, तो कच्चे तेल की कीमत 350 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती और वैश्विक मंदी आ सकती थी।" 'अमेरिकी नौसेना ने सुरक्षित निकाले तेल टैंकर' ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी नौसेना ने तनावपूर्ण हालात के बावजूद तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की। उन्होंने कहा, "हर रात हमारी नौसेना दक्षिणी मार्ग से जहाजों को सुरक्षित निकाल रही थी। एक रात हमने 22 तेल टैंकरों को सुरक्षित बाहर निकाला। यह बहुत बड़ी मात्रा में तेल था और पूरी कार्रवाई बेहद सफल रही।" शांति वार्ता के बीच बढ़ी कूटनीतिक हलचल ट्रंप के ये बयान ऐसे समय आए हैं जब अमेरिका और ईरान के बीच हालिया शांति समझौते को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं। हालांकि, ट्रंप के सैन्य और आर्थिक दावों पर ईरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, उनके कई दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हो सकी है।
नई दिल्ली/वॉशिंगटन: अमेरिका ने भारत की चार कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए रूस से जुड़े प्रतिबंधों की सूची से उनके नाम हटा दिए हैं। अमेरिकी वित्त विभाग (यूएस ट्रेजरी) के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने अपनी ताजा समीक्षा के बाद यह फैसला लिया। इन कंपनियों के नाम स्पेशली डिज़िग्नेटेड नेशनल्स एंड ब्लॉक्ड पर्सन्स (SDN) सूची से हटाए गए हैं। इस कदम के बाद इन कंपनियों पर लागू कई वित्तीय और व्यापारिक प्रतिबंध समाप्त हो सकते हैं, जिससे उनके अंतरराष्ट्रीय कारोबार को गति मिलने की उम्मीद है। किन भारतीय कंपनियों को मिली राहत? प्रतिबंध सूची से हटाई गई कंपनियां हैं— RRG Engineering Technologies Pvt. Ltd. (हैदराबाद) Lokesh Machines Ltd. (हैदराबाद) Galaxy Bearings Ltd. (अहमदाबाद) Shaurya Aeronautics Pvt. Ltd. (नई दिल्ली) ये कंपनियां पहले रूस से जुड़े व्यापारिक मामलों के कारण अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ गई थीं। क्या होगा इसका असर? प्रतिबंध हटने के बाद इन कंपनियों के लिए— अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच आसान होगी। वैश्विक वित्तीय लेन-देन पर लगी बाधाएं कम होंगी। विदेशी निवेश प्राप्त करने की संभावनाएं बढ़ेंगी। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में व्यापार करना पहले की तुलना में अधिक सरल होगा। भारत-अमेरिका संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों के लिहाज से सकारात्मक संकेत है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग और निवेश को बढ़ावा मिल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस से जुड़े लेन-देन पर अमेरिका की व्यापक प्रतिबंध नीति अभी भी प्रभावी है और अन्य संस्थाओं या कंपनियों पर लागू नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। OFAC क्या है? ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की वह एजेंसी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के तहत विभिन्न देशों, संगठनों और व्यक्तियों पर आर्थिक प्रतिबंध लागू करती है। समय-समय पर यह एजेंसी प्रतिबंध सूची की समीक्षा कर उसमें संशोधन भी करती है। भारत की चार कंपनियों को SDN सूची से हटाने का फैसला इसी नियमित समीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। जून 2026 में भारत का वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह मजबूत बढ़त के साथ ₹1.94 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गया। वित्त मंत्रालय के अनुसार, जून में सकल जीएसटी संग्रह ₹1,94,812 करोड़ रहा, जो पिछले वर्ष जून 2025 के ₹1,71,105 करोड़ की तुलना में 13.9 प्रतिशत अधिक है। इस वृद्धि की सबसे बड़ी वजह आयातित वस्तुओं पर मिलने वाले कर संग्रह में रिकॉर्ड बढ़ोतरी रही। आयात कर ने बढ़ाई रफ्तार जून के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी सामानों के आयात पर मिलने वाला टैक्स 34.6 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि के साथ ₹60,038 करोड़ तक पहुंच गया। इसके मुकाबले घरेलू कारोबार से मिलने वाला जीएसटी संग्रह 6.5 प्रतिशत बढ़कर ₹1,34,774 करोड़ रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि आयात में तेजी से सरकारी राजस्व को मजबूती मिली है, हालांकि घरेलू मांग में अपेक्षाकृत धीमी बढ़त चिंता का विषय बनी हुई है। रिफंड के बाद भी बढ़ा शुद्ध राजस्व सरकार ने जून के दौरान करदाताओं को ₹32,436 करोड़ का जीएसटी रिफंड जारी किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 29.1 प्रतिशत अधिक है। इसके बावजूद सरकार का शुद्ध जीएसटी राजस्व ₹1,62,377 करोड़ रहा, जो सालाना आधार पर 11.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। पहली तिमाही में 6.31 लाख करोड़ से अधिक संग्रह चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में कुल ₹6,31,699 करोड़ का जीएसटी संग्रह दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 8.4 प्रतिशत अधिक है। इस दौरान आयात कर संग्रह में 26.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि घरेलू कर संग्रह में 2.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। राज्यों का प्रदर्शन रहा मिला-जुला राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो महाराष्ट्र सबसे अधिक ₹30,714 करोड़ के संग्रह के साथ शीर्ष पर रहा। उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वहीं सिक्किम, पुडुचेरी, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और तमिलनाडु में जीएसटी संग्रह में गिरावट देखने को मिली। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत आयात गतिविधियां अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन दीर्घकालिक संतुलित विकास के लिए घरेलू उपभोग और बाजार मांग को भी गति देना आवश्यक होगा।
तेहरान। अमेरिका और इजराइल के साथ बढ़ते सैन्य तनाव का सबसे बड़ा असर अब आम ईरानी नागरिकों की जिंदगी पर दिखाई देने लगा है। लगातार बढ़ती महंगाई, जरूरी वस्तुओं की कमी और आर्थिक अनिश्चितता ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि लोग अब रोटी और राशन तक किस्तों (EMI) पर खरीदने को मजबूर हैं। राजधानी तेहरान के 52 वर्षीय सरकारी कर्मचारी मेहदी बताते हैं कि उन्होंने मोहल्ले की दुकान से उधार राशन लिया था, लेकिन अगले दिन भुगतान करने पहुंचे तो सामान का बिल लगभग दोगुना हो चुका था। उनका कहना है कि बढ़ती कीमतों के कारण वेतन महीने के बीच में ही खत्म हो जाता है। युद्ध के बाद आसमान छूती कीमतें हालिया संघर्ष के बाद ईरान में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार— कुकिंग ऑयल की कीमतों में 430% तक बढ़ोतरी अंडों के दाम 345% तक बढ़े चावल 287% महंगा हुआ दूध की कीमतों में 139% की वृद्धि आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध, प्रतिबंधों और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़े असर ने महंगाई को और अधिक गंभीर बना दिया है। EMI पर राशन और सुपरमार्केट खरीदारी देश के कई हिस्सों में लोग अब खाद्य सामग्री और घरेलू जरूरत का सामान उधार या किस्तों में खरीद रहे हैं। तेहरान, इस्फहान, मशहद और अहवाज जैसे शहरों में परिवारों की सबसे बड़ी चिंता अब सुरक्षा नहीं बल्कि रोजमर्रा का खर्च बन गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि घर का बजट संभालना लगातार मुश्किल होता जा रहा है और बचत लगभग समाप्त हो चुकी है। सरकार विरोधियों का भी बदला रुख युद्ध शुरू होने के बाद कुछ लोगों को उम्मीद थी कि राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब सरकार के समर्थक और विरोधी दोनों ही आर्थिक संकट और युद्ध की कीमत चुका रहे हैं। तेहरान की पर्यावरण विशेषज्ञ लीदा कहती हैं कि बातचीत और कूटनीति ही देश को बचाने का रास्ता है। उनके अनुसार युद्ध ने जान-माल का भारी नुकसान पहुंचाया है और इसका लाभ किसी को नहीं मिला। विश्लेषकों का मानना है कि सरकार विरोधी समूह भी अब सैन्य टकराव की जगह राजनीतिक समाधान की वकालत करने लगे हैं। इंटरनेट बंदी के बाद सामने आईं त्रासदी की कहानियां संघर्ष के दौरान लंबे समय तक इंटरनेट सेवाएं बाधित रहीं। संचार बहाल होने के बाद सोशल मीडिया पर युद्ध से प्रभावित परिवारों की दर्दनाक कहानियां सामने आने लगीं। इन्हीं में से एक हामेद मिर्जाई की कहानी ने लोगों को झकझोर दिया। उन्होंने बताया कि तेहरान के रेसालत स्क्वायर इलाके पर हुए हमले में उनकी पत्नी, माता-पिता समेत परिवार के 12 सदस्यों की मौत हो गई। इंटरनेट बंद होने के कारण उन्हें इस त्रासदी की जानकारी कई दिनों बाद मिल सकी। दवाओं का संकट, फार्मेसियों में राशन जैसी व्यवस्था युद्ध का असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। कई क्षेत्रों में दवाओं की भारी कमी की खबरें हैं। डॉक्टरों को केवल अत्यंत आवश्यक दवाएं लिखने की सलाह दी गई है। इस्फहान के एक चिकित्सक के अनुसार कई फार्मेसियां सीमित मात्रा में दवाएं उपलब्ध करा रही हैं। वहीं हीमोफीलिया मरीजों के लिए जीवनरक्षक दवाओं का भंडार लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गया है। उद्योगों पर भी पड़ा असर मशहद के पास स्थित कई औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन प्रभावित हुआ है। कच्चे माल की कमी और आपूर्ति बाधित होने के कारण कई कर्मचारियों को अस्थायी अवकाश पर भेजा गया है। विशेष रूप से पेट्रोकेमिकल उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे रोजगार और उत्पादन दोनों प्रभावित हुए हैं। युद्ध से पहले भी आर्थिक संकट में था ईरान विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संकट केवल युद्ध का परिणाम नहीं है। ईरान पहले से ही आर्थिक दबाव, मुद्रा अवमूल्यन और बढ़ती महंगाई से जूझ रहा था। दिसंबर 2025 में महंगाई और मुद्रा संकट के खिलाफ देशभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। उस समय ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार उस अवधि में महंगाई दर 42 प्रतिशत से अधिक थी, जबकि खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 70 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई थी। अनिश्चित भविष्य के बीच राहत की तलाश लगातार बढ़ती महंगाई, रोजगार संकट, दवाओं की कमी और युद्ध की आशंकाओं के बीच आम ईरानी नागरिक राहत और स्थिरता की उम्मीद कर रहे हैं। हालात में जल्द सुधार के संकेत फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव कम नहीं हुआ और आर्थिक प्रतिबंध जारी रहे, तो आने वाले महीनों में ईरान की आर्थिक चुनौतियां और गहरी हो सकती हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।