आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज शिक्षा और सीखने के तरीके को तेजी से बदल रहा है। छात्र असाइनमेंट तैयार करने, कोडिंग सीखने, प्रोजेक्ट पूरा करने और परीक्षाओं की तैयारी के लिए ChatGPT, Gemini और Claude जैसे AI टूल्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इसी बढ़ती निर्भरता को लेकर Sridhar Vembu ने छात्रों को गंभीर चेतावनी दी है। Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बु का कहना है कि AI जहां लोगों को तेज़ी से सीखने और समस्याएं हल करने में मदद कर सकता है, वहीं इसका अत्यधिक उपयोग छात्रों की बुनियादी समझ और सोचने की क्षमता को भी कमजोर कर सकता है। "AI आपको तेजी से स्मार्ट बना सकता है, लेकिन मूर्ख भी" सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए वेम्बु ने कहा कि AI एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल नुकसानदायक साबित हो सकता है। उनका मानना है कि अगर छात्र हर सवाल का जवाब AI से लेने लगेंगे, तो वे खुद समस्या को समझने, विश्लेषण करने और समाधान खोजने की क्षमता खो सकते हैं। यही कौशल किसी भी क्षेत्र में सफलता की असली नींव होते हैं। पहले मजबूत करें बुनियाद वेम्बु का कहना है कि छात्रों को AI का उपयोग करने से पहले अपने विषय की बुनियादी समझ विकसित करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक स्कूल और कॉलेज के छात्र मूलभूत अवधारणाओं को अच्छी तरह नहीं सीख लेते, तब तक उन्हें AI पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार AI सीखने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है, लेकिन सीखने की जगह नहीं ले सकता। UC Berkeley की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता यह बयान उस समय आया है जब University of California, Berkeley में कंप्यूटर साइंस कोर्सेज में असामान्य रूप से अधिक छात्रों के फेल होने की खबरें सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार: CS 10 कोर्स में लगभग 35.3% छात्र फेल हुए। CS 61A कोर्स में 10.6% छात्रों को सफलता नहीं मिली। ये आंकड़े पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक बताए जा रहे हैं, जहां फेल होने की दर आमतौर पर 10 प्रतिशत से कम रहती थी। हालांकि रिपोर्ट ने सीधे तौर पर AI को इसका कारण नहीं बताया, लेकिन वेम्बु का मानना है कि AI पर अत्यधिक निर्भरता छात्रों की वास्तविक समझ को प्रभावित कर सकती है। पहले भी जता चुके हैं चिंता यह पहली बार नहीं है जब श्रीधर वेम्बु ने AI को लेकर चेतावनी दी हो। इससे पहले भी उन्होंने कई शोधों का हवाला देते हुए कहा था कि AI अल्पकालिक प्रदर्शन (Short-Term Performance) को बेहतर बना सकता है, लेकिन लंबे समय में सीखने और कौशल विकास (Long-Term Learning) पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। उनका मानना है कि छात्रों को AI का इस्तेमाल सहायक उपकरण (Assistant Tool) की तरह करना चाहिए, न कि अपने दिमाग की जगह लेने वाले विकल्प के रूप में। AI का सही उपयोग क्या है? विशेषज्ञों के अनुसार AI का उपयोग इन कार्यों में फायदेमंद हो सकता है: किसी विषय को समझने के लिए अतिरिक्त जानकारी लेना कोडिंग या प्रोजेक्ट में सहायता प्राप्त करना रिसर्च और डेटा विश्लेषण करना भाषा और लेखन कौशल में सुधार करना लेकिन यदि छात्र बिना समझे सीधे AI के उत्तरों पर निर्भर हो जाते हैं, तो उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता और समस्या समाधान कौशल कमजोर पड़ सकते हैं। AI भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन वेम्बु की चेतावनी यही बताती है कि तकनीक का लाभ तभी मिलता है जब उसके साथ मानवीय समझ और सीखने की इच्छा भी बनी रहे।
भारत में ऑनलाइन विज्ञापन और ट्रेडमार्क अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले के बाद टेक जगत में नई बहस छिड़ गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने सैनिटरीवेयर ब्रांड Hindware से जुड़े मामले में Google को ट्रेडमार्क उल्लंघन का दोषी माना है। इस फैसले के बाद Sridhar Vembu ने खुलकर प्रतिक्रिया दी और Nikhil Kamath के पुराने रुख का समर्थन किया। “मैं निखिल के साथ हूं” – श्रीधर वेम्बु Sridhar Vembu ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि गूगल का विज्ञापन मॉडल नैतिक रूप से गलत था। उन्होंने लिखा कि इस मामले में वह निखिल कामथ के पक्ष में हैं और गूगल जिस तरीके से दूसरे ब्रांडों के नामों का इस्तेमाल अपने विज्ञापन कारोबार में कर रहा था, वह पूरी तरह अनैतिक था। वेम्बु ने कहा कि ऐसे व्यावसायिक व्यवहार के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। क्या था पूरा विवाद? मामला गूगल के उस विज्ञापन सिस्टम से जुड़ा है, जिसमें कंपनियां किसी अन्य ब्रांड या ट्रेडमार्क वाले नाम को विज्ञापन कीवर्ड के रूप में खरीद सकती थीं। आरोप था कि जब कोई यूजर “HINDWARE” सर्च करता था, तो उसे प्रतिस्पर्धी कंपनियों के विज्ञापन भी दिखाए जा सकते थे, क्योंकि उन्होंने उस ट्रेडमार्क शब्द पर विज्ञापन बोली (bidding) लगाई हुई थी। Hindware ने इसे अपने ट्रेडमार्क अधिकारों का उल्लंघन बताया और अदालत का दरवाजा खटखटाया। दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा? दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि “HINDWARE” कोई सामान्य शब्द नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट और विशिष्ट पहचान वाला पंजीकृत ट्रेडमार्क है। अदालत ने कहा कि: इस ट्रेडमार्क को विज्ञापन कीवर्ड के रूप में उपयोग करने की अनुमति देना गलत था। गूगल इस ट्रेडमार्क की व्यावसायिक पहचान से अप्रत्यक्ष रूप से लाभ कमा रहा था। इससे उपभोक्ताओं के भ्रमित होने की संभावना बढ़ती है। कोर्ट ने गूगल को “HINDWARE” और उससे मिलते-जुलते शब्दों को विज्ञापन कीवर्ड के रूप में इस्तेमाल करने से स्थायी रूप से रोक दिया। इसके अलावा अदालत ने गूगल को 30 लाख रुपये का हर्जाना देने का भी निर्देश दिया। क्यों अहम है यह फैसला? यह फैसला सिर्फ एक कंपनी और गूगल के बीच का विवाद नहीं माना जा रहा, बल्कि डिजिटल विज्ञापन उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। यदि भविष्य में अन्य ब्रांड भी इसी तरह के मामलों में अदालत का रुख करते हैं, तो सर्च इंजन विज्ञापन मॉडल में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ट्रेडमार्क अधिकारों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अधिक मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। टेक इंडस्ट्री में बढ़ सकती है बहस Sridhar Vembu की टिप्पणी ने इस मामले को और अधिक चर्चा में ला दिया है। लंबे समय से कुछ भारतीय उद्यमी बड़े टेक प्लेटफॉर्म्स की विज्ञापन और डेटा नीतियों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। अब अदालत के फैसले के बाद यह बहस और तेज हो सकती है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को ब्रांड नामों और ट्रेडमार्क के उपयोग को लेकर कितनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।