नई दिल्ली: भारतीय स्टार्टअप जगत के चर्चित उद्यमी कुणाल शाह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। फिनटेक कंपनी CRED को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के बाद अब वह दुनिया के सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp की कमान संभालने जा रहे हैं। Meta ने उन्हें WhatsApp का नया ग्लोबल CEO नियुक्त किया है। इस नियुक्ति के साथ भारतीय उद्यमिता को वैश्विक स्तर पर एक बड़ी पहचान मिली है। हाल ही में कुणाल शाह ने CRED के CEO पद से हटने की घोषणा की थी। कंपनी की दैनिक जिम्मेदारियां अब मितेन संपत संभालेंगे, जबकि कुणाल शाह शेयरधारक और रणनीतिक भूमिका में जुड़े रहेंगे। कौन हैं कुणाल शाह? मुंबई में जन्मे कुणाल शाह एक गुजराती कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता फार्मास्युटिकल व्यवसाय से जुड़े थे। इंजीनियरिंग के बजाय उन्होंने मुंबई के विल्सन कॉलेज से फिलॉसफी में स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने NMIMS से MBA शुरू किया, लेकिन बीच में ही पढ़ाई छोड़कर उद्यमिता की राह चुन ली। उनका पहला बड़ा वेंचर PaisaBack था। इसके बाद वर्ष 2010 में उन्होंने FreeCharge की सह-स्थापना की। यह कंपनी इतनी सफल रही कि 2015 में Snapdeal ने इसे लगभग 2,800 करोड़ रुपये में खरीद लिया। कैसे बना CRED भारत का बड़ा फिनटेक ब्रांड? FreeCharge की सफलता के बाद कुणाल शाह ने 2018 में CRED की शुरुआत की। कंपनी का उद्देश्य समय पर क्रेडिट कार्ड बिल भुगतान करने वाले ग्राहकों को रिवॉर्ड देना था। धीरे-धीरे CRED ने भुगतान, लोन, बीमा, वेल्थ मैनेजमेंट और क्रेडिट कार्ड सेवाओं तक अपना विस्तार किया। CRED से जुड़े प्रमुख आंकड़े विवरण आंकड़े स्थापना वर्ष 2018 यूजर्स 1.7 करोड़ से अधिक FY25 राजस्व ₹2,735 करोड़ वैल्यूएशन 4.5 अरब डॉलर Meta की हिस्सेदारी लगभग 20% Meta ने हाल ही में CRED में 90 करोड़ डॉलर (करीब 8,550 करोड़ रुपये) का निवेश भी किया है। WhatsApp में क्या होगी नई भूमिका? रिपोर्ट्स के अनुसार, कुणाल शाह WhatsApp के बिजनेस मॉडल को और मजबूत बनाने पर काम करेंगे। उनकी प्राथमिकता विज्ञापन, सब्सक्रिप्शन आधारित सेवाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फीचर्स के विस्तार पर होगी। वह मौजूदा प्रमुख विल कैथकार्ट की जगह लेंगे, जिन्होंने पिछले सात वर्षों में WhatsApp के यूजर बेस को दोगुने से भी अधिक बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी। कुणाल शाह का मानना है कि WhatsApp ने अब तक शानदार सफर तय किया है, लेकिन इसकी वास्तविक क्षमता अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है। कितनी है कुणाल शाह की नेटवर्थ? विभिन्न रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 में कुणाल शाह की अनुमानित कुल संपत्ति करीब 15,000 करोड़ रुपये है। उनकी संपत्ति के प्रमुख स्रोत हैं: CRED में हिस्सेदारी FreeCharge की बिक्री से मिली पूंजी 200 से अधिक स्टार्टअप्स में एंजेल निवेश विभिन्न टेक कंपनियों में निवेश दिलचस्प बात यह है कि कुणाल शाह लंबे समय तक CRED से बेहद कम प्रतीकात्मक वेतन लेने के कारण भी चर्चा में रहे हैं। WhatsApp में उनकी नई भूमिका भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
भारत में इंजीनियरिंग की पढ़ाई को लंबे समय से बेहतर करियर और स्थिर भविष्य का रास्ता माना जाता रहा है। हर साल लाखों छात्र IIT-JEE जैसी कठिन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला पाने का सपना देखते हैं। लेकिन हाल ही में प्रसिद्ध उद्यमी और प्राइवेट इक्विटी निवेशक श्रीनि राजू के एक बयान ने डिग्री बनाम स्किल्स की बहस को फिर से तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में चार साल की इंजीनियरिंग डिग्री छात्रों को नौकरी के लिए उतना तैयार नहीं करती, जितना व्यावहारिक कौशल और लगातार सीखने की क्षमता करती है। कौन हैं श्रीनि राजू? चिंतलपति श्रीनिवास राजू भारतीय आईटी उद्योग, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्राइवेट इक्विटी निवेश के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। उन्होंने NIT कुरुक्षेत्र से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में अमेरिका की Utah State University से सिविल और एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की। इंजीनियरिंग डिग्री पर क्या बोले श्रीनि राजू? 'रॉ टॉक्स विद वीके' पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान श्रीनि राजू ने कहा कि आज के समय में कई छात्र वर्षों तक डिग्री हासिल करने में समय लगाते हैं, लेकिन उनके पास वास्तविक नौकरी के लिए जरूरी प्रैक्टिकल स्किल्स की कमी होती है। उनका मानना है कि सिर्फ B.Tech की डिग्री किसी व्यक्ति के जॉब-रेडी होने का पैमाना नहीं हो सकती। 12वीं पास और B.Tech ग्रेजुएट्स पर कंपनी का प्रयोग श्रीनि राजू ने अपनी कंपनी के एक पुराने प्रयोग का जिक्र करते हुए बताया कि एक समूह में 30 इंटरमीडिएट (12वीं पास) छात्रों को और दूसरे समूह में 30 B.Tech ग्रेजुएट्स को रखा गया। दोनों समूहों को एक जैसी ट्रेनिंग एक साल तक दी गई। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद दोनों की उत्पादकता का मूल्यांकन किया गया। उनके अनुसार, परिणामों में कोई बड़ा अंतर नहीं दिखा। इसी अनुभव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या चार साल की डिग्री हमेशा व्यावहारिक दुनिया में अतिरिक्त लाभ देती है। शिक्षा व्यवस्था में क्या कमी है? श्रीनि राजू का मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा अभी भी किताबी ज्ञान पर आधारित है। कई संस्थानों में छात्रों को वह सिखाया जाता है जो पाठ्यक्रम में लिखा है, जबकि उद्योग की बदलती जरूरतें और वास्तविक कार्य अनुभव उससे अलग हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह शिक्षा को बेकार नहीं मानते, बल्कि शिक्षा और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर देते हैं। आज के जॉब मार्केट में क्या सबसे ज्यादा जरूरी है? श्रीनि राजू के अनुसार, बदलते रोजगार बाजार में सिर्फ डिग्री या सर्टिफिकेट काफी नहीं हैं। छात्रों को इन क्षमताओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए: प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स लगातार सीखने की क्षमता स्वयं से नई चीजें सीखने की आदत प्रैक्टिकल नॉलेज और इंडस्ट्री एक्सपोजर बदलती तकनीकों के साथ खुद को अपडेट रखना IIT-JEE में असफल होने वालों को क्या सलाह दी? उन्होंने छात्रों से कहा कि अगर वे IIT-JEE जैसी परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाते हैं, तो इसे जीवन का अंत न समझें। मेहनत और सही कौशल के जरिए कोई भी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है। डिग्री बनाम स्किल्स: क्या है सच्चाई? विशेषज्ञों का मानना है कि डिग्री और स्किल्स दोनों का अपना महत्व है। डिग्री बुनियादी ज्ञान और अवसरों के दरवाजे खोलती है, जबकि व्यावहारिक कौशल किसी व्यक्ति को वास्तविक कार्यक्षेत्र में सफल बनाते हैं। ऐसे में दोनों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बेहतर रास्ता माना जाता है।
नई दिल्ली/सैन फ्रांसिस्को: अमेरिकी रियल एस्टेट टेक्नोलॉजी कंपनी Opendoor ने भारत में अपना परिचालन बंद करने का फैसला किया है। इस निर्णय से कंपनी के लगभग 250 कर्मचारी प्रभावित होंगे। कंपनी का कहना है कि यह कदम उसकी नई कारोबारी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत परिचालन संबंधी कार्यों को अमेरिकी बाजार के करीब लाया जा रहा है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित प्रक्रियाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। 'Opendoor 2.0' रणनीति के तहत लिया गया फैसला कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी काज नेजातियान ने कर्मचारियों को भेजे गए संदेश में बताया कि भारत में संचालन बंद करने का निर्णय प्रदर्शन से जुड़ा नहीं है। उन्होंने कहा कि कंपनी अपने परिचालन मॉडल को पुनर्गठित कर रही है, ताकि ग्राहकों को अधिक प्रभावी और तेज सेवाएं प्रदान की जा सकें। नेजातियान के अनुसार, Opendoor 2.0 रणनीति के तहत कई भूमिकाओं को अमेरिका स्थानांतरित किया जा रहा है, जहां ग्राहक आधार मौजूद है। इससे टीमों और ग्राहकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। AI के बढ़ते इस्तेमाल से बदला परिचालन मॉडल कंपनी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में तकनीकी क्षमताओं में तेजी से वृद्धि हुई है। AI-सक्षम टीमों और स्वचालित प्रणालियों के इस्तेमाल से कई ऐसे कार्य अब कम मानव संसाधन में पूरे किए जा सकते हैं, जिनके लिए पहले बड़ी परिचालन टीमों की आवश्यकता होती थी। Opendoor का कहना है कि मैन्युअल प्रक्रियाओं पर निर्भरता कम करने और परिचालन को अधिक कुशल बनाने के लिए AI तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाया जा रहा है। भारतीय कर्मचारियों के योगदान की सराहना सीईओ काज नेजातियान ने भारत में कार्यरत कर्मचारियों के योगदान की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारतीय टीम ने कंपनी की वृद्धि और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय कर्मचारियों की क्षमता या प्रदर्शन को लेकर नहीं है, बल्कि बदलती व्यावसायिक जरूरतों और परिचालन संरचना का परिणाम है। उन्होंने प्रभावित कर्मचारियों को प्रतिभाशाली पेशेवर बताते हुए उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। प्रभावित कर्मचारियों को मिलेगा सहायता पैकेज कंपनी ने आश्वासन दिया है कि प्रभावित कर्मचारियों को सेवरेंस पैकेज (Severance Package), करियर ट्रांजिशन सपोर्ट और अन्य आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा, कुछ कर्मचारियों को महत्वपूर्ण परियोजनाओं और कार्यभार के सुचारू हस्तांतरण तक अस्थायी रूप से कंपनी में बनाए रखा जाएगा। परिचालन में बदलाव, लेकिन रणनीति बरकरार Opendoor ने स्पष्ट किया है कि भारत में परिचालन बंद करने के बावजूद उसकी समग्र कारोबारी रणनीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। कंपनी का फोकस परिचालन को सरल बनाना, तकनीकी प्लेटफॉर्म को मजबूत करना और AI आधारित समाधानों के माध्यम से दक्षता बढ़ाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वैश्विक टेक उद्योग में बढ़ते AI उपयोग और लागत अनुकूलन की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसके तहत कंपनियां पारंपरिक परिचालन मॉडल को तेजी से बदल रही हैं।
Claude AI से चला टूल बना मुसीबत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ताकत जहां कंपनियों के लिए नई संभावनाएं खोल रही है, वहीं एक छोटी सी चूक भारी नुकसान भी पहुंचा सकती है। अमेरिका की कार रेंटल सॉफ्टवेयर कंपनी PocketOS के साथ ऐसा ही हुआ, जब Claude AI पर आधारित एक AI एजेंट ने महज 9 सेकंड में कंपनी का पूरा प्रोडक्शन डेटा डिलीट कर दिया। एक API कॉल और सब कुछ खत्म PocketOS के संस्थापक जेरेमी क्रेन के मुताबिक, AI एजेंट को केवल स्टेजिंग एनवायरनमेंट में एक सामान्य तकनीकी समस्या ठीक करनी थी। लेकिन क्रेडेंशियल एरर आने के बाद एजेंट ने गलत फैसला लेते हुए क्लाउड स्टोरेज वॉल्यूम ही हटा दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि एजेंट ने एक अलग फाइल में मौजूद API टोकन का इस्तेमाल किया, जिसके पास अनजाने में प्रोडक्शन डेटा हटाने की भी अनुमति थी। ग्राहकों पर पड़ा सीधा असर PocketOS अमेरिका में कार रेंटल कंपनियों को रिजर्वेशन, पेमेंट, व्हीकल ट्रैकिंग और ग्राहक प्रबंधन सेवाएं देता है। डेटा डिलीट होते ही कई ग्राहकों के रिजर्वेशन गायब हो गए। रेंटल लोकेशन पर पहुंचे ग्राहकों का रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं था। पिछले तीन महीनों की बुकिंग और नए ग्राहक साइनअप पूरी तरह मिट गए। AI ने खुद स्वीकार की गलती जब जेरेमी क्रेन ने AI एजेंट से पूछा कि आखिर क्या हुआ, तो AI ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। उसने माना कि उसने अनुमान लगाया कि डिलीट किया जा रहा वॉल्यूम केवल स्टेजिंग से जुड़ा है, जबकि वह प्रोडक्शन डेटा था। एजेंट ने यह भी स्वीकार किया कि उसने स्पष्ट निर्देशों का उल्लंघन किया। Railway और Anthropic पर उठे सवाल PocketOS का डेटा Railway क्लाउड प्लेटफॉर्म पर होस्ट किया गया था। क्रेन ने आरोप लगाया कि Railway ने API टोकन की शक्तियों को स्पष्ट रूप से नहीं बताया। Railway के CEO जेक कूपर ने माना कि ऐसी घटना "कभी नहीं होनी चाहिए थी" और कंपनी अब सुरक्षा सुधारों पर काम कर रही है। AI सुरक्षा पर बड़ी चेतावनी यह घटना टेक इंडस्ट्री के लिए गंभीर सबक है। केवल AI निर्देश पर्याप्त नहीं हैं; असली सुरक्षा API, एक्सेस कंट्रोल और मल्टी-लेयर अप्रूवल सिस्टम में होनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि विनाशकारी कार्रवाइयों के लिए मानव पुष्टि अनिवार्य होनी चाहिए। पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं PocketOS अकेला मामला नहीं है। हाल के महीनों में कई अन्य AI एजेंट भी गलत फैसलों के कारण प्रोडक्शन डेटा और सिस्टम को नुकसान पहुंचा चुके हैं। AI की क्षमता बनाम विश्वसनीयता प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि AI मॉडल पहले से अधिक सक्षम जरूर हुए हैं, लेकिन उनकी विश्वसनीयता में उतना सुधार नहीं आया है। यही कारण है कि AI को पूरी तरह स्वायत्त बनाना अभी भी बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।