रांची। झारखंड के प्रसिद्ध पतरातू डैम लेक रिसॉर्ट को पर्यटन के क्षेत्र में एक नई पहचान मिली है। राज्य के पर्यटन, कला, संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य मंत्री सुदिव्य कुमार ने गुरुवार को यहां फ्लोटिंग रेस्टोरेंट और म्यूजिकल फाउंटेन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर रामगढ़ के उपायुक्त ऋतुराज, विधायक ममता देवी, विधायक रोशनलाल चौधरी, पूर्व विधायक अंबा प्रसाद समेत कई जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। पर्यटकों के लिए नया आकर्षण प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे पतरातू लेक रिसॉर्ट में झील के बीच विकसित फ्लोटिंग रेस्टोरेंट और शाम के समय संगीत की धुनों पर रंग-बिरंगी रोशनी के साथ प्रस्तुत होने वाला म्यूजिकल फाउंटेन पर्यटकों के आकर्षण का नया केंद्र बन गया है। उद्घाटन के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने दोनों सुविधाओं का अवलोकन किया और उनकी सराहना की। पर्यटन और रोजगार को मिलेगा बढ़ावा मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि झारखंड में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और सरकार राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने के लिए लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि फ्लोटिंग रेस्टोरेंट और म्यूजिकल फाउंटेन जैसी परियोजनाओं से पतरातू में पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। पर्यटन विभाग के अनुसार पर्यटन विभाग के अनुसार, फ्लोटिंग रेस्टोरेंट के दो हिस्सों का नाम ‘मयूराक्षी’ और ‘कोयल’ रखा गया है। यहां पारिवारिक समारोह, कॉर्पोरेट बैठकें, सामाजिक कार्यक्रम और विशेष आयोजनों का आयोजन किया जा सकेगा। वहीं म्यूजिकल फाउंटेन हर शाम संगीत, रंगीन रोशनी और पानी की मनमोहक प्रस्तुति से पर्यटकों को यादगार अनुभव देगा। उद्घाटन के बाद मंत्री ने फ्लोटिंग रेस्टोरेंट का निरीक्षण किया और म्यूजिकल फाउंटेन शो का आनंद लिया। राज्य सरकार का उद्देश्य ऐसी आधुनिक सुविधाओं का विस्तार अन्य प्रमुख पर्यटन स्थलों तक भी करना है, ताकि झारखंड की पर्यटन पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत हो सके।
रांची। झारखंड में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कई अहम फैसले लिए हैं। सोमवार को प्रोजेक्ट भवन में आयोजित उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालयों में रिक्त पदों को भरने, झारखंड विश्वविद्यालय सेवा आयोग को 15 दिनों के भीतर प्रभावी बनाने और शैक्षणिक वर्ष 2026-27 से लाइव ऑनलाइन क्लास शुरू करने के निर्देश दिए। बैठक में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार समेत विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। ऑनलाइन शिक्षा और छात्रावासों पर विशेष जोर मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य को माइनिंग आधारित पहचान से आगे बढ़ाकर ज्ञान आधारित राज्य बनाना होगा। इसके लिए विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और कर्मचारियों की रिक्तियां शीघ्र भरने के निर्देश दिए गए। साथ ही छात्रावासों की स्थिति की समीक्षा कर उन्हें पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर संचालित करने की पहल करने को कहा गया। पायलट प्रोजेक्ट के तहत झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय और बीबीएमके, धनबाद से लाइव ऑनलाइन क्लास की शुरुआत की जाएगी। बीआईटी सिंदरी को मिलेगा विश्वविद्यालय का दर्जा बैठक में मुख्यमंत्री ने बीआईटी सिंदरी को यूनिटरी विश्वविद्यालय के रूप में अपग्रेड करने पर सहमति दी। इसके लिए राज्य सरकार जल्द ही संबंधित विधेयक लाएगी। साथ ही कोचिंग रेगुलेटरी अथॉरिटी को अगले 15 दिनों में पूरी तरह कार्यरत करने और राज्य में रोबोटिक्स फेस्टिवल शुरू करने की भी घोषणा की गई। तकनीकी शिक्षा क्लस्टर और नए पाठ्यक्रम होंगे शुरू मुख्यमंत्री ने पलामू, गिरिडीह, रामगढ़, गुमला, रांची, जमशेदपुर, बोकारो, गोड्डा और साहिबगंज सहित नौ जिलों में तकनीकी शिक्षा क्लस्टर विकसित करने के निर्देश दिए। उन्होंने सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों को बीआईटी सिंदरी की तर्ज पर उन्नत बनाने तथा इमर्जिंग टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स एंड शिपिंग और टेक्सटाइल डिजाइन जैसे आधुनिक विषय शुरू करने पर जोर दिया। इसके अलावा गुरुजी स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना का लाभ अधिक से अधिक पात्र विद्यार्थियों तक पहुंचाने और दुमका फ्लाइंग इंस्टीट्यूट के छात्रों को भी इस योजना से जोड़ने के निर्देश दिए गए।
रांची। युवाओं को नशे की लत से दूर रखने और समाज में नशामुक्ति के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से गुरुवार को राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान स्थित बापू वाटिका से एक भव्य जागरूकता मैराथन का आयोजन किया गया। पर्यटन, कला-संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा, खिलाड़ी, छात्र-छात्राएं और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ विभागीय मंत्री सुद्विया कुमार ने हरी झंडी दिखाकर किया। मैराथन के दौरान प्रतिभागियों ने “नशा छोड़ो, स्वस्थ जीवन अपनाओ”, “युवा शक्ति देश की ताकत है” और “नशामुक्त झारखंड हमारा संकल्प है” जैसे नारों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया। आयोजन का उद्देश्य युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों से अवगत कराना और उन्हें सकारात्मक एवं रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना था। नशा समाज के लिए बड़ी चुनौती: मंत्री इस अवसर पर मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री Hemant Soren की पहल पर पूरे राज्य में नशामुक्ति को लेकर व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नशा आज युवाओं के सामने एक गंभीर चुनौती बन चुका है, जिससे व्यक्ति, परिवार और समाज सभी प्रभावित होते हैं। इसलिए सरकार लगातार विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि यह मैराथन केवल एक खेल आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संदेश देने का माध्यम है। युवाओं से नशे से दूर रहने, खेलकूद और रचनात्मक कार्यों में भाग लेने तथा दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने की अपील की गई। नशामुक्त झारखंड के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी कार्यक्रम में विभागीय अधिकारियों ने कहा कि खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए युवाओं को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया जा रहा है। मैराथन के समापन पर सभी प्रतिभागियों ने नशामुक्त झारखंड के निर्माण का संकल्प लिया। आयोजन में युवाओं का उत्साह देखने लायक था और इसे नशे के खिलाफ जनआंदोलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।