Tata Trusts

अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ा, सैन्य कार्रवाई के बाद पश्चिम एशिया में बढ़ी चिंता; वैश्विक तेल बाजार पर भी असर

वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हाल के सैन्य घटनाक्रम और दोनों देशों के तीखे बयानों के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंता गहरा गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।   सैन्य गतिविधियों से बढ़ी क्षेत्रीय चिंता   हाल के घटनाक्रम के बाद अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत किया है, जबकि ईरान ने भी अपनी सैन्य क्षमता और जवाबी कार्रवाई की तैयारी पर जोर दिया है। दोनों देशों के बीच बढ़ती तल्खी ने पूरे पश्चिम एशिया में तनाव का माहौल बना दिया है।   तेल बाजार पर निवेशकों की नजर   पश्चिम एशिया वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। निवेशक विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली तेल आपूर्ति पर नजर बनाए हुए हैं।   भारत समेत कई देशों की बढ़ी चिंता   भारत सहित कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर हैं। इसलिए क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर तेल आयात, परिवहन लागत और घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और कूटनीतिक प्रयास जारी हैं।

anjali kumari जुलाई 10, 2026 0
Doctors conduct cancer screening in Assam as the state expands early detection and treatment services to improve survival rates.
असम में सबसे ज्यादा कैंसर सर्वाइवल रेट का दावा, जानिए कैसे बदली शुरुआती जांच और इलाज की तस्वीर

असम सरकार ने दावा किया है कि राज्य में कैंसर के मरीजों की सर्वाइवल रेट (जीवित रहने की दर) देश में सबसे अधिक है। सरकार के अनुसार, बड़े पैमाने पर कैंसर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और राज्यभर में इलाज की बेहतर व्यवस्था के कारण यह उपलब्धि हासिल हुई है। बजट सत्र के दौरान असम के स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने बताया कि अब तक करीब 47 लाख लोगों की कैंसर स्क्रीनिंग की जा चुकी है। इस अभियान के दौरान 900 से अधिक मरीजों में शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान हुई, जिससे समय पर इलाज संभव हो सका। 62% सर्वाइवल रेट का दावा असम सरकार का कहना है कि राज्य में कैंसर मरीजों की सर्वाइवल रेट 62 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो राष्ट्रीय औसत करीब 40 प्रतिशत से काफी अधिक बताई जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने से इलाज की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है और मरीजों के स्वस्थ होने की उम्मीद भी बेहतर होती है। 1.24 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य सरकार ने कैंसर स्क्रीनिंग अभियान को और तेज करने का फैसला किया है। स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार, राज्य में 1.24 करोड़ लोगों की जांच करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह लक्ष्य पूरा होता है, तो यह देश का सबसे बड़ा कैंसर स्क्रीनिंग अभियान माना जा सकता है। गुवाहाटी तक सीमित नहीं रहा इलाज पहले गंभीर कैंसर मरीजों को इलाज के लिए गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ या पूर्वोत्तर से बाहर बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था। अब राज्य सरकार ने कैंसर उपचार सेवाओं का विस्तार कई जिलों तक कर दिया है। असम कैंसर केयर फाउंडेशन, जिसे असम सरकार और टाटा ट्रस्ट्स ने मिलकर शुरू किया है, राज्य में विशेष कैंसर अस्पतालों और उपचार केंद्रों का नेटवर्क विकसित कर रहा है। कई जिलों में मिल रही इलाज की सुविधा राज्य में बारपेटा, डिब्रूगढ़, दीफू और सिलचर में कैंसर अस्पताल संचालित किए जा रहे हैं। वहीं गोलाघाट, जोरहाट, कोकराझार, लखीमपुर, मंगलदई, तेजपुर और तिनसुकिया में जांच और डे-केयर सेंटर भी स्थापित किए गए हैं। इससे मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करने की जरूरत कम हुई है। शुरुआती चरण में हो रही पहचान स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पहले अधिकांश मरीजों में कैंसर का पता बीमारी के अंतिम चरण में चलता था। लेकिन अब बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान के कारण कई मामलों की पहचान स्टेज-1 और स्टेज-2 में ही हो रही है। इससे इलाज जल्दी शुरू हो रहा है और मरीजों के स्वस्थ होने की संभावना भी बढ़ रही है। सस्ता इलाज उपलब्ध कराने का दावा स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने कहा कि कैंसर का इलाज आमतौर पर काफी महंगा होता है। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के साथ साझेदारी के बाद राज्य सरकार मरीजों को अपेक्षाकृत कम खर्च में इलाज उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। प्रोटॉन बीम थेरेपी की तैयारी असम सरकार ने यह भी जानकारी दी कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जल्द ही प्रोटॉन बीम थेरेपी मशीन शुरू करने की तैयारी चल रही है। यह आधुनिक रेडिएशन थेरेपी तकनीक मानी जाती है, जिसमें प्रोटॉन किरणों की मदद से कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाया जाता है। इसकी खासियत यह है कि आसपास के स्वस्थ ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है, जिससे इलाज अधिक सटीक और प्रभावी माना जाता है। कैंसर से लड़ाई में स्क्रीनिंग बनी सबसे बड़ा हथियार विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सबसे अहम भूमिका समय पर जांच और शुरुआती पहचान की होती है। असम सरकार का कहना है कि स्क्रीनिंग, इलाज, पेलिएटिव केयर, रिसर्च और मरीजों के पुनर्वास को एक साथ जोड़कर राज्य में कैंसर देखभाल की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। यदि यह मॉडल लगातार प्रभावी रहता है, तो अन्य राज्यों के लिए भी यह एक उदाहरण बन सकता है।  

surbhi जुलाई 10, 2026 0
Tata Trusts issues legal notice over a 37-year-old share transfer dispute and seeks ₹1000 crore damages.
Tata Trusts Row: 37 साल पुराने शेयर विवाद पर टाटा ट्रस्ट्स का सख्त रुख, आरोप वापस लेने या ₹1000 करोड़ हर्जाना देने की मांग

टाटा समूह से जुड़ा एक नया विवाद सामने आया है, जो करीब 37 साल पुराने शेयर ट्रांसफर से संबंधित है। इस मामले में टाटा ट्रस्ट्स ने याचिकाकर्ता सुरेश तुलसीराम पाटिलखेड़े और उनकी वकील कात्यायनी अग्रवाल के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए कानूनी नोटिस भेजा है। ट्रस्ट्स ने दोनों से लगाए गए आरोप वापस लेने को कहा है, अन्यथा 1000 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की जाएगी। क्या है पूरा मामला? विवाद जनवरी 1989 में नवजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) से दिवंगत नवल एच. टाटा को ट्रांसफर किए गए 833 शेयरों से जुड़ा है। वर्तमान में ये शेयर रतन टाटा, जिमी टाटा और नोएल टाटा के परिवार से जुड़े हैं। याचिकाकर्ता सुरेश पाटिलखेड़े ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष शिकायत दर्ज कर इस शेयर ट्रांसफर की जांच की मांग की थी। शिकायत में लगाए गए प्रमुख आरोप शेयर एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट से निजी व्यक्ति को ट्रांसफर किए गए। ट्रांसफर के लिए कोई वैध प्रस्ताव या ट्रांसफर डीड नहीं थी। यह सौदा बिना किसी भुगतान (Nil Consideration) के किया गया। टाटा ट्रस्ट्स ने आरोपों को बताया बेबुनियाद टाटा ट्रस्ट्स ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नवल टाटा ने ट्रांसफर से लगभग एक वर्ष पहले ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया था। ट्रस्ट्स के मुताबिक— इस लेन-देन को दोनों संस्थाओं के बोर्ड की मंजूरी प्राप्त थी। शेयरों के बदले उचित भुगतान किया गया था। पूरी प्रक्रिया की कानूनी समीक्षा देश के प्रसिद्ध न्यायविद नानी पालखीवाला ने की थी। पहले भी लगा था बैठकों पर प्रतिबंध इसी याचिका के आधार पर महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने 15 मई को टाटा ट्रस्ट्स की बैठकों और महत्वपूर्ण फैसलों पर अस्थायी रोक लगाई थी। जांच पूरी होने तक ट्रस्ट्स की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। अब ट्रस्टियों की अगली बैठक 8 जून को प्रस्तावित है। 'सीरियल लिटिगेटर' बताया टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में सुरेश पाटिलखेड़े को "सीरियल लिटिगेटर" यानी आदतन मुकदमेबाज बताया है। ट्रस्ट का आरोप है कि इन दावों का उद्देश्य टाटा परिवार और ट्रस्ट्स की 130 वर्ष पुरानी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है। क्यों अहम है यह विवाद? टाटा ट्रस्ट्स देश के सबसे बड़े परोपकारी संगठनों में से एक हैं और टाटा समूह की कई कंपनियों में उनकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। ऐसे में इस तरह के कानूनी विवाद कॉरपोरेट गवर्नेंस और ट्रस्ट प्रबंधन के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।  

surbhi जून 6, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0