कोलकाता, एजेंसियां। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक घमासान के बीच मंगलवार को एक नया मोड़ सामने आया। फर्जी हस्ताक्षर विवाद की जांच के सिलसिले में CID की टीम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पहुंची। हालांकि, पार्टी नेताओं ने अभिषेक बनर्जी की गैरमौजूदगी का हवाला देते हुए जांच टीम को परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। CID अधिकारियों के साथ कालीघाट थाना पुलिस और बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मी भी मौजूद थीं। जांच एजेंसी उन आरोपों की पड़ताल कर रही है, जिनमें दावा किया गया है कि TMC विधायक दल से जुड़े एक प्रस्ताव पर फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। क्या है पूरा विवाद? बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि नेता विपक्ष बनाए जाने से संबंधित प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से किए गए। आरोप सीधे अभिषेक बनर्जी के लेटरहेड से जुड़े दस्तावेजों पर लगाए गए हैं। इसी मामले की जांच के तहत CID लगातार सबूत जुटा रही है। पार्टी में बढ़ी अंदरूनी खींचतान इस विवाद ने TMC के भीतर चल रही गुटबाजी को भी उजागर कर दिया है। शिकायत करने वाले विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है। वहीं, ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाए जाने के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसकी सुनवाई जल्द होने वाली है। राजनीतिक असर पर नजर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल फर्जी हस्ताक्षर तक सीमित नहीं है, बल्कि TMC के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर चल रही खींचतान का संकेत भी देता है। अब सबकी नजर CID जांच और अदालत की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई है, जो इस मामले की दिशा तय कर सकती है।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में कथित अंदरूनी असंतोष और कुछ सांसदों के रुख को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा ने पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों पर तीखा हमला बोलते हुए उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रति समर्थन जताने संबंधी चर्चाओं और राजनीतिक अटकलों के बीच महुआ मोइत्रा खुलकर पार्टी नेतृत्व के पक्ष में सामने आई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सांसद जनता के जनादेश के विपरीत राजनीतिक रुख अपना रहे हैं। यूसुफ पठान पर सीधे सवाल महुआ मोइत्रा ने पूर्व भारतीय क्रिकेटर और बहरमपुर से टीएमसी सांसद यूसुफ पठान का नाम लेते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि यदि राजनीतिक दबाव या किसी केंद्रीय नेता के बुलावे पर सांसद अपना रुख बदलते हैं, तो यह मतदाताओं के विश्वास के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यूसुफ पठान को जनता ने भारी समर्थन देकर संसद भेजा है और उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के भरोसे का सम्मान करना चाहिए। बागी सांसदों को दी खुली चुनौती महुआ मोइत्रा ने कथित रूप से पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने वाले सांसदों को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे वास्तव में अपने नए राजनीतिक निर्णय को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव मैदान में उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसदों को यह साबित करना चाहिए कि उन्हें व्यक्तिगत लोकप्रियता के आधार पर समर्थन प्राप्त है या फिर वे केवल पार्टी और ममता बनर्जी की राजनीतिक छवि के कारण चुनाव जीतकर आए थे। NDA समर्थन को लेकर बढ़ी सियासी हलचल राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों ने NDA के प्रति नरम रुख अपनाया है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि जनता ने टीएमसी उम्मीदवारों को भाजपा या NDA के समर्थन के लिए नहीं चुना था और जनादेश का सम्मान किया जाना चाहिए। चीफ व्हिप पद को लेकर भी विवाद इस राजनीतिक विवाद के बीच लोकसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) पद को लेकर भी नया विवाद सामने आया है। काकोली घोष दस्तीदार ने खुद को पार्टी का चीफ व्हिप बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। दूसरी ओर टीएमसी नेता कीर्ति आजाद का दावा है कि पार्टी नेतृत्व पहले ही काकोली घोष दस्तीदार को इस पद से हटाकर कल्याण बनर्जी को नई जिम्मेदारी सौंप चुका है। पार्टी के भीतर चल रही इस खींचतान ने टीएमसी की आंतरिक स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजर बनी हुई है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने अपने पद के साथ-साथ पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। उनके इस कदम को टीएमसी नेतृत्व, खासकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान माना जा रहा है। राज्यसभा सभापति को सौंपा इस्तीफा सुखेंदु शेखर राय ने राज्यसभा के सभापति एवं उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आवाज उठाने के कारण उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया और संगठन में अलग-थलग कर दिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने की मिली सजा राय ने कहा कि उन्होंने कई बार सार्वजनिक और संगठनात्मक मंचों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी राय रखी, लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें किनारे कर दिया गया। उनका कहना है कि सिद्धांतों से समझौता न करने के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला लिया। इंडिया गठबंधन पर भी उठाए सवाल टीएमसी से अलग होने के बाद सुखेंदु शेखर राय ने विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में इस गठबंधन का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता और विपक्षी दलों के बीच समन्वय की कमी साफ नजर आती है। कोयल मल्लिक को लेकर भी अटकलें राय के इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में टीएमसी की एक अन्य राज्यसभा सांसद कोयल मल्लिक को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि वह भी पार्टी से दूरी बना सकती हैं। हालांकि अभी तक उनके इस्तीफे या पार्टी छोड़ने को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। राजनीतिक हलकों में बढ़ी हलचल सुखेंदु शेखर राय के इस्तीफे ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिससे पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक स्थिति पर असर पड़ सकता है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को मिले झटके और पार्टी के भीतर बढ़ती असंतोष की चर्चाओं के बीच मुख्यमंत्री एवं पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने बड़ा संगठनात्मक फेरबदल किया है। पार्टी के नए ढांचे में कई वरिष्ठ नेताओं की भूमिका बढ़ाई गई है, जबकि संगठन के संचालन और रणनीतिक फैसलों को लेकर नई व्यवस्था बनाई गई है। वरिष्ठ नेताओं को मिली अहम भूमिका पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय और वरिष्ठ नेता सौगत रॉय को संगठनात्मक और राजनीतिक समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व दिए गए हैं। वहीं सांसद महुआ मोइत्रा को राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की राजनीतिक और मीडिया रणनीति में अधिक सक्रिय भूमिका सौंपी गई है। अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर चर्चा नए संगठनात्मक बदलावों के बाद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है, लेकिन पार्टी के अंदर लिए गए नए फैसलों को नेतृत्व की जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण के रूप में देखा जा रहा है। दिल्ली और बंगाल दोनों पर फोकस पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रणनीति पर अधिक ध्यान देने के लिए राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन को फिर से प्रमुख जिम्मेदारी दी है। उन्हें दिल्ली में पार्टी की राजनीतिक रणनीति और संवाद को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कई जिलों में संगठनात्मक बदलाव सूत्रों के मुताबिक, उत्तर 24 परगना, नदिया और मालदा समेत कई महत्वपूर्ण जिलों में संगठनात्मक स्तर पर बदलाव किए गए हैं। विधानसभा चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं होने के बाद पार्टी नेतृत्व ने जिला इकाइयों में नई नियुक्तियों का फैसला किया है। बागी सुरों के बीच संगठन को मजबूत करने की कोशिश हाल के दिनों में पार्टी के कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों की नाराजगी की खबरें सामने आई थीं। ऐसे में ममता बनर्जी का यह कदम संगठन को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं में नया संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है और वरिष्ठ नेताओं को आगे लाकर संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। संसदीय अनुशासन पर भी जोर पार्टी ने संसदीय गतिविधियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सांसदों के समन्वय और अनुशासन पर भी विशेष ध्यान देने का फैसला किया है। इसके तहत संसदीय दल के भीतर जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया गया है। तृणमूल कांग्रेस के इस संगठनात्मक पुनर्गठन को पार्टी के लिए आने वाले राजनीतिक दौर की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इन बदलावों का पार्टी की आंतरिक राजनीति और विपक्षी राजनीति में उसकी भूमिका पर क्या असर पड़ता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक हलचल अब राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचती दिखाई दे रही है. पार्टी के भीतर संभावित बगावत और सांसदों के अलग गुट बनाने की अटकलों के बीच दलबदल-रोधी कानून (Anti-Defection Law) एक बड़ी कानूनी बाधा बनकर सामने आया है. पार्टी नेतृत्व और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि संसद में अलग समूह बनाने की चर्चा जितनी आसान दिखाई दे रही है, व्यवहार में उतनी ही जटिल और कानूनी चुनौतियों से भरी हुई है. ऐसे किसी भी कदम के लिए सांसदों को कड़े संवैधानिक प्रावधानों का सामना करना पड़ेगा. सांसदों के बीच बढ़ी हलचल टीएमसी के पूर्व नेता रीतब्रत बनर्जी के दावों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के कुछ सांसद अलग राजनीतिक रास्ता तलाश सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, असंतुष्ट सांसदों के बीच समर्थन जुटाने को लेकर बातचीत भी चल रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि संसद में अलग गुट बनाने का कोई सीधा संवैधानिक प्रावधान मौजूद नहीं है और ऐसे प्रयासों को कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है. दो-तिहाई समर्थन के बिना संभव नहीं टूट दलबदल-रोधी कानून के तहत किसी भी संसदीय दल में वैध विभाजन या विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है. वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं. ऐसे में यदि कोई समूह पार्टी से अलग होना चाहता है, तो उसे कम से कम 19 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. इसके बिना अलग होने वाले सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है. अलग गुट नहीं, केवल विलय का विकल्प कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, दो-तिहाई सांसदों का समर्थन मिलने के बाद भी अलग संसदीय समूह बनाना आसान नहीं होगा. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत ऐसे सांसदों को किसी अन्य मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विलय करना होगा. केवल अलग गुट बनाकर स्वतंत्र रूप से काम करने का विकल्प कानून में उपलब्ध नहीं है. संसदीय नेता बदलने का अधिकार किसके पास? राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि असंतुष्ट सांसद लोकसभा अध्यक्ष के माध्यम से संसदीय दल के नेतृत्व में बदलाव की कोशिश कर सकते हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि संसदीय दल का नेता चुनने का अधिकार मूल राजनीतिक दल के पास होता है. इसलिए टीएमसी संसदीय दल के नेतृत्व में किसी भी बदलाव का अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष के स्तर पर ही संभव है. INDIA गठबंधन की बैठक से पहले बढ़ी सियासी चर्चा टीएमसी नेताओं का आरोप है कि संभावित टूट की खबरों को ऐसे समय में हवा दी जा रही है, जब विपक्षी गठबंधन INDIA की महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है. पार्टी का मानना है कि इन अटकलों का उद्देश्य विपक्षी एकजुटता से ध्यान हटाना और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाना है. दो मॉडल पर हो रही चर्चा राजनीतिक विश्लेषकों के बीच फिलहाल दो संभावित परिदृश्यों पर चर्चा हो रही है. पहला, पश्चिम बंगाल विधानसभा में हाल में हुई राजनीतिक टूट जैसा मॉडल, जहां विधायकों के एक वर्ग ने नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोला था. दूसरा, आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा अपनाया गया मॉडल, जिसमें संवैधानिक प्रावधानों का पालन करते हुए राजनीतिक पुनर्संरेखण किया गया था. कानूनी और राजनीतिक तैयारी में जुटी टीएमसी पार्टी नेतृत्व का कहना है कि संसद के आगामी सत्र से पहले किसी भी संभावित बगावत को रोकने के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर रणनीति तैयार की जा रही है. टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि दलबदल-रोधी कानून के कारण किसी भी असंतुष्ट समूह के लिए पार्टी से अलग होकर स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना आसान नहीं होगा. ऐसे में आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर की राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी.
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस में फूट के बाद अब लोकसभा में बागी गुट अपना नेता चुनने की तैयारी में जुट गया है। पार्टी में कभी दूसरे नंबर के नेता रहे अभिषेक बनर्जी आज पार्टी के भीतर अलग-थलग पड़ गए हैं। लोकसभा में पार्टी नेता के रूप में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी चल रही है। तृणमूल कांग्रेस के अंदरखाने यह बात चल रही है कि तृणमूल की संसदीय दल की बैठक बुलायी जा सकती है। कहा जा रहा है कि कई सांसद बागी गुट के के संपर्क में हैं। दिल्ली की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का भविष्य क्या होगा, यह देखना बाकी है। पार्टी में अलग-थलग पड़े अभिषेक विधानसभा में 58 विधायकों के समर्थन से ऋतब्रता बनर्जी विपक्ष के नेता का पदभार ग्रहण कर चुके हैं। पद पर बैठते ही उन्होंने डायमंड हार्बर सांसद अभिषेक पर जमकर हमले किए हैं। इस माहौल में लोकसभा में पार्टी विभाजन का नेतृत्व कौन कर रहा है। कहा जा रहा है कि बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार जांच के दायरे में हैं। सुखेन्दुशेखर रॉय पहले ही राज्यसभा में हैं। ममता बनर्जी के धरने में सिर्फ छह लोग शामिल हुए हैं। अभिषेक के अलावा अनुपस्थित लोगों को लेकर भी जमकर चर्चाएं चल रही हैं। सांसदों की बढ़ रही है ममता से दूरी पिछले कुछ दिनों में देखा जा रहा है कि पार्टी के मशहूर सांसद ममता से दूरी बढ़ा रहे हैं। कल्याण-काकली विवाद पर दबाव कम नहीं हुआ है। काकली ने खुद कल्याण के खिलाफ सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। उन्होंने ये आरोप लोकसभा अध्यक्ष के सामने रखे हैं। अब क्या अन्य सांसद भी मुख्य सचेतक कल्याण बनर्जी के खिलाफ काकली के आरोपों से सहमत होंगे, यह सवाल और भी गंभीर होता जा रहा है। फिर से परिसीमन बिल संसद में लाने की चर्चा इस बीच, सरकार संसद में तृणमूल कांग्रेस को भंग करने के लिए परिसीमन विधेयक को फिर से लाने की तैयारी कर रही है। जेपीसी के विचाराधीन ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ विधेयक को भी जल्द पारित कराने के लिए सरकार प्रयास में है। कानूनी सलाह लेंगे ममता समर्थक दूसरी ओर, विधानसभा में पार्टी के विभाजन और लोगो के अधिकारों को लेकर अनिश्चितता के संदर्भ में, ममता बनर्जी समर्थक तृणमूल ने कानूनी सलाह लेना शुरू कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, स्पीकर की भूमिका को ध्यान में रखा जा रहा है। ममता की नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस उचित समय पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख करेगी। तृणमूल नेता ममता बनर्जी के 8 तारीख को दिल्ली में होने वाली इंडिया ब्लॉक की बैठक में शामिल होंने की उम्मीद है। उस दौरान वे शीर्ष वकीलों से अलग से बात करेंगी। इस संबंध में महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के बीच लोगो का मामला और नेतृत्व विवाद निर्णायक भूमिका निभाएगा।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रहा असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के 58 विधायकों ने अलग रुख अपनाते हुए रीतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुन लिया है। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। बागी विधायकों ने पेश किया समर्थन का दावा रीतब्रत बनर्जी और उनके समर्थक विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अपने समर्थन से जुड़े दस्तावेज जमा किए। बागी खेमे का दावा है कि उनके पास पर्याप्त संख्या बल है और वे विधायक दल के भीतर अपनी वैध स्थिति स्थापित करने में सफल रहे हैं। उनका कहना है कि अधिकांश विधायक उनके साथ हैं और वे विधानसभा में अपनी अलग पहचान के साथ काम करेंगे। नई नेतृत्व टीम की घोषणा बागी गुट ने केवल नेता का चयन ही नहीं किया, बल्कि विधायक दल के लिए नई जिम्मेदारियों का भी ऐलान किया। रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की भूमिका दी गई, जबकि अन्य वरिष्ठ नेताओं को उपनेता और मुख्य सचेतक जैसी जिम्मेदारियां सौंपी गईं। इस कदम को संगठन के भीतर समानांतर नेतृत्व खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। कई वरिष्ठ नेता भी आए साथ इस पूरे घटनाक्रम में पार्टी के कई अनुभवी और वरिष्ठ विधायकों के नाम भी सामने आए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़े नेताओं की मौजूदगी ने इस बगावत को और अधिक गंभीर बना दिया है। यही वजह है कि इसे केवल सामान्य गुटबाजी नहीं बल्कि संगठन के भीतर बड़े राजनीतिक पुनर्संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। ममता के नेतृत्व पर भरोसा, अभिषेक पर सवाल बागी विधायकों ने अपने रुख में स्पष्ट किया है कि वे ममता बनर्जी को पार्टी का सर्वोच्च नेता मानते हैं। विधायक दल के कामकाज में अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर उन्होंने असहमति जताई है। उनका कहना है कि संगठनात्मक फैसलों और विधायक दल की गतिविधियों को लेकर नई व्यवस्था की जरूरत है। पार्टी नेतृत्व ने उठाए कड़े कदम घटनाक्रम के बाद पार्टी नेतृत्व ने पूरे राज्य में संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा शुरू कर दी है। विभिन्न समितियों और इकाइयों के पुनर्गठन की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। पार्टी का मानना है कि मौजूदा हालात से निपटने के लिए संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है। वैधता को लेकर शुरू हुई बहस बागी गुट और आधिकारिक नेतृत्व के बीच सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि विधायक दल से जुड़े फैसले लेने का अधिकार किसके पास है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों को सही ठहरा रहे हैं। इसी वजह से यह मामला केवल राजनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संगठनात्मक अधिकार और नेतृत्व की वैधता का सवाल भी बन गया है। पुराने विवादों से जुड़ रहे हैं तार जानकारों का मानना है कि यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। पिछले कुछ समय से विधायक दल के नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर असंतोष की खबरें सामने आ रही थीं। अब यह असंतोष खुली राजनीतिक चुनौती में बदलता दिखाई दे रहा है, जिससे पार्टी के भविष्य और नेतृत्व संरचना को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि संगठनात्मक स्तर पर कौन-सा पक्ष अधिक समर्थन जुटा पाता है और पार्टी के भीतर चल रहा यह संघर्ष किस दिशा में आगे बढ़ता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ते टकराव के बीच तृणमूल कांग्रेस ने राज्यव्यापी आंदोलन का एलान किया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए कथित हमलों के विरोध में टीएमसी अब सीधे सड़क पर उतरने जा रही है। इस अभियान की अगुवाई खुद पार्टी सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी करेंगी। तृणमूल कांग्रेस के कार्यक्रम के तहत 2 जून को ममता बनर्जी कोलकाता के एस्प्लेनेड स्थित रानी रासमणि रोड पर एक दिवसीय धरने पर बैठेंगी। सत्ता परिवर्तन के बाद इसे उनका पहला बड़ा जनआंदोलन और शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है। राज्यभर में विरोध मार्च का आयोजन धरने से पहले पार्टी ने पूरे राज्य में विरोध कार्यक्रम शुरू कर दिए हैं। सोमवार को विभिन्न नगर पालिका क्षेत्रों और ग्रामीण ब्लॉकों में टीएमसी कार्यकर्ताओं ने विरोध मार्च निकाला। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने काले झंडे लेकर प्रदर्शन किया और राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। टीएमसी का आरोप है कि विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने की कोशिश की जा रही है। हॉकर्स पर कार्रवाई को भी बनाएगी मुद्दा पार्टी केवल अपने नेताओं पर हुए कथित हमलों तक ही आंदोलन को सीमित नहीं रखना चाहती। हाल में दमदम स्टेशन और कोलकाता के कुछ अन्य इलाकों में अतिक्रमण हटाने के लिए चलाए गए अभियान को भी टीएमसी ने बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया है। पार्टी का आरोप है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए छोटे दुकानदारों और फुटपाथ कारोबारियों को हटाया जा रहा है, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित हो रही है। ममता बनर्जी अपने धरने के दौरान इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा सकती हैं। नेताओं की मौजूदगी पर रहेगी नजर यह धरना ऐसे समय हो रहा है जब हाल के दिनों में टीएमसी के भीतर राजनीतिक हलचल और कई नेताओं के पार्टी से दूरी बनाने की चर्चाएं तेज रही हैं। पार्टी नेतृत्व ने सभी विधायकों, सांसदों और जिला स्तर के नेताओं को कार्यक्रम में शामिल होने का निर्देश दिया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह धरना केवल सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि संगठन की एकजुटता दिखाने का भी अवसर होगा। कार्यक्रम में नेताओं की मौजूदगी को पार्टी की अंदरूनी ताकत के पैमाने के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा ने आरोपों को किया खारिज भारतीय जनता पार्टी ने टीएमसी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी के खिलाफ जो विरोध देखने को मिला, वह किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा नहीं था। भाजपा का दावा है कि यह स्थानीय लोगों की नाराजगी का परिणाम था। राज्य में बढ़ते राजनीतिक तनाव के बीच अब सभी की नजरें 2 जून के धरने पर टिकी हैं, जहां ममता बनर्जी भाजपा सरकार के खिलाफ अपने अगले राजनीतिक अभियान का संदेश दे सकती हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उठापटक के बीच तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को फेसबुक लाइव के जरिए भाजपा और राज्य प्रशासन पर तीखा हमला बोला। पार्टी के कुछ विधायकों के दल बदलने और संगठन में बढ़ती हलचल के बीच ममता ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं होगा। अपने संबोधन में ममता बनर्जी ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों, धनबल और प्रशासनिक दबाव के सहारे उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर कोई यह खेल खेल रहा है तो उसे बता दूं कि मैं भी बड़ी खिलाड़ी हूं। समय आने पर इसका जवाब जरूर दूंगी।" विधायकों को धमकाने का आरोप ममता बनर्जी ने दावा किया कि उनकी पार्टी के चार विधायकों ने उनसे शिकायत की है कि कुछ पुलिस अधिकारी उन्हें पार्टी की बैठकों में शामिल न होने की चेतावनी दे रहे हैं। उनके अनुसार, विधायकों को कहा गया है कि यदि वे कालीघाट या तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक बैठकों में हिस्सा लेते हैं तो उनके खिलाफ आर्म्स एक्ट या मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी विधायकों को भाजपा नेताओं के संपर्क में आने की सलाह भी दे रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर सरकार या पुलिस की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी छोड़ने वालों पर साधा निशाना हाल में पार्टी से निष्कासित नेताओं का नाम लिए बिना ममता बनर्जी ने कहा कि कुछ लोगों की कोई विचारधारा नहीं होती और वे केवल अपने स्वार्थ के लिए राजनीति करते हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाने पर खेद जताया और जनता से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि राजनीति में अवसर देने के बावजूद कुछ लोगों ने पार्टी के साथ विश्वासघात किया, जिसका उन्हें अफसोस रहेगा। कार्यकर्ताओं के भरोसे संगठन मजबूत करने का दावा ममता बनर्जी ने कहा कि कुछ नेता दबाव या लालच में आकर पार्टी छोड़ सकते हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने दावा किया कि पार्टी का संगठन कार्यकर्ताओं की बदौलत मजबूत बना रहेगा। उन्होंने बताया कि वह स्वयं संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी कर रही हैं और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को सीधे सुन रही हैं। जरूरत पड़ने पर पार्टी की ओर से कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। धरने से पहले बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय आया है जब तृणमूल कांग्रेस 2 जून को कोलकाता में बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फेसबुक लाइव के जरिए ममता ने अपने समर्थकों को संदेश देने के साथ-साथ भाजपा सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इन आरोपों पर राज्य सरकार और भाजपा की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2026 के बाद सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ते असंतोष और इस्तीफों के बीच मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अब कविता के जरिए अपने विरोधियों और बागी नेताओं को संदेश दिया है। ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर ‘गिरगिटी’ शीर्षक से एक कविता साझा की, जिसे राजनीतिक गलियारों में पार्टी के भीतर ‘रंग बदलने वाले’ नेताओं पर सीधा हमला माना जा रहा है। दूसरी ओर बीजेपी सांसद सौमित्र खान के उस दावे ने बंगाल की राजनीति का तापमान और बढ़ा दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि टीएमसी के कई सांसद और विधायक बीजेपी के संपर्क में हैं। फेसबुक पर साझा की गयी ‘गिरगिटी’ कविता, पार्टी के भीतर मचा सियासी हलचल ममता बनर्जी द्वारा साझा की गई कविता को लेकर बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। कविता में ‘गिरगिट’ का प्रतीक इस्तेमाल करते हुए उन्होंने ऐसे लोगों पर निशाना साधा है, जो परिस्थिति के अनुसार अपना रंग और रुख बदल लेते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कविता सीधे तौर पर उन नेताओं के लिए संदेश है, जो हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं या टीएमसी छोड़ने के संकेत दे रहे हैं। ममता बनर्जी ने कविता में लिखा कि गिरगिट तो केवल अपनी आजीविका बचाने के लिए रंग बदलता है, लेकिन कुछ लोग निजी स्वार्थ और राजनीतिक फायदे के लिए पल भर में अपना चरित्र बदल लेते हैं। मुश्किल समय में पार्टी छोड़ने वालों पर ममता का तीखा हमला कविता में ममता बनर्जी ने उन नेताओं पर भी नाराजगी जतायी, जिन पर पार्टी के कठिन दौर में कार्यकर्ताओं को अकेला छोड़ने का आरोप लग रहा है। उन्होंने संकेतों में कहा कि कुछ नेताओं ने सत्ता और व्यक्तिगत सुविधाओं के लिए अपने आत्मसम्मान और राजनीतिक प्रतिबद्धता से समझौता कर लिया। कविता के अंतिम हिस्से में उन्होंने ‘समय के पहिये’ का जिक्र करते हुए चेतावनी भरे अंदाज में लिखा कि हर व्यक्ति को अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है और गद्दारों को एक दिन अपनी असली कीमत समझ में आ जाती है। बीजेपी सांसद सौमित्र खान का बड़ा दावा, कहा- टीएमसी के कई नेता संपर्क में ममता बनर्जी की कविता के बीच बीजेपी सांसद सौमित्र खान के बयान ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। सौमित्र खान ने दावा किया कि टीएमसी के 20 सांसद और करीब 50 विधायक पार्टी से नाराज हैं और वे बीजेपी के संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि अगर बीजेपी आलाकमान की ओर से संकेत मिल जाये, तो बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव हो सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि टीएमसी का संगठन अंदर से कमजोर हो चुका है और पार्टी में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। टीएमसी में बढ़ते इस्तीफों और नाराजगी ने बढ़ायी नेतृत्व की चिंता हाल के दिनों में टीएमसी के भीतर कई नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आयी है। सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी के सभी सांगठनिक पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके अलावा सुशांत घोष, अरूप चक्रवर्ती और इंद्रनील सेन जैसे नेताओं ने भी पार्टी के कामकाज और कथित ‘वीवीआईपी कल्चर’ पर सवाल उठाये हैं। बागी नेताओं का आरोप है कि राशन घोटाला, शिक्षक भर्ती विवाद और आरजी कर अस्पताल मामले जैसे मुद्दों ने जनता के बीच पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना है कि पार्टी नेतृत्व इन मामलों से प्रभावी तरीके से निपटने में विफल रहा है। टीएमसी ने बीजेपी के दावों को बताया अफवाह और राजनीतिक माइंडगेम टीएमसी नेतृत्व ने बीजेपी सांसद सौमित्र खान के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि बीजेपी केवल भ्रम फैलाने और राजनीतिक माइंडगेम खेलने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि टीएमसी पूरी तरह एकजुट है और पार्टी के बड़े नेताओं या विधायकों के बीजेपी में जाने की बात निराधार है। सौगत रॉय ने दावा किया कि विपक्ष जानबूझकर पार्टी के भीतर असंतोष का माहौल दिखाने की कोशिश कर रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर टीएमसी मजबूत स्थिति में है। 2026 चुनाव के बाद बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में जिस तरह से बयानबाजी, इस्तीफे और दल-बदल की चर्चाएं तेज हुई हैं, उसने राज्य की सियासत को नया मोड़ दे दिया है। एक तरफ ममता बनर्जी कविता और राजनीतिक संदेशों के जरिए पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर बीजेपी लगातार टीएमसी में टूट का दावा कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अंदरूनी संकट की चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि पार्टी के कई सांसद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संपर्क में हैं और आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। सूत्रों के अनुसार, लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 29 सांसदों में से करीब 12 सांसद भाजपा में शामिल होने या समर्थन देने की तैयारी में हैं। इसके अलावा पांच से छह अन्य सांसदों से भी बातचीत चलने की चर्चा है। हालांकि इन दावों की अभी तक किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। दल-बदल कानून से बचने की रणनीति राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए कम से कम 19 से 20 सांसदों को एक साथ लाने की रणनीति बनाई जा रही है। माना जा रहा है कि तृणमूल नेतृत्व को भी संभावित टूट की जानकारी मिल चुकी है और पार्टी को एकजुट रखने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। चर्चा यह भी है कि इस संभावित बदलाव में ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के करीबी माने जाने वाले कुछ सांसदों के नाम भी शामिल हो सकते हैं। भाजपा की नजर राज्यसभा सांसदों पर भी लोकसभा में भाजपा के पास फिलहाल 240 सांसद हैं और केंद्र सरकार सहयोगी दलों के समर्थन से चल रही है। ऐसे में यदि तृणमूल के सांसद बड़ी संख्या में भाजपा के साथ आते हैं, तो भाजपा की ताकत और बढ़ सकती है तथा सहयोगी दलों पर निर्भरता कम हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा की नजर अब राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों पर भी है। पार्टी के भीतर संगठनात्मक व्यवस्था और आइपैक की भूमिका को लेकर असंतोष की भी चर्चा हो रही है। हालांकि अभी तक पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
All India Trinamool Congress में अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद Kakoli Ghosh Dastidar ने बारासात संगठनात्मक जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने क्षेत्र में पार्टी के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ा, लेकिन साथ ही पार्टी की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक ढांचे पर भी सवाल उठाए। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन के बाद टीएमसी के भीतर लगातार असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। काकोली घोष का इस्तीफा इसी कड़ी में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। I-PAC और नई रणनीति पर सवाल काकोली घोष दस्तिदार ने राज्य टीएमसी अध्यक्ष Subrata Bakshi को भेजे अपने इस्तीफे में कहा कि पार्टी को फिर से पुराने तरीके की “सड़क की राजनीति” में लौटना चाहिए। उन्होंने इशारों में Indian Political Action Committee (I-PAC) और पार्टी में उभरे नए राजनीतिक ढांचे पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि ईमानदार और पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं के साथ पहले की तरह काम करने से पार्टी की छवि दोबारा मजबूत हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी सीधे तौर पर I-PAC की भूमिका पर सवाल है, जिसे टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee के करीबी रणनीतिक ढांचे से जोड़ा जाता है। “पुराने कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार ठीक नहीं था” पत्रकारों से बातचीत में काकोली घोष ने कहा कि I-PAC से जुड़े कुछ युवा कार्यकर्ताओं का रवैया पुराने पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मानजनक नहीं था। उन्होंने कहा, “मैंने I-PAC को नियुक्त नहीं किया था, लेकिन मैंने देखा कि वे हम जैसे पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार करते थे।” पार्टी में बढ़ते भ्रष्टाचार पर भी जताई चिंता काकोली घोष दस्तिदार ने पार्टी में बढ़ते अपराधीकरण और भ्रष्टाचार को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हाल की घटनाओं से लोगों में डर और असंतोष बढ़ा है और राजनीति में पारदर्शिता तथा जवाबदेही को प्राथमिकता देने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि टीएमसी की सीटें घटकर 80 तक पहुंच जाना उनके लिए स्वीकार करना कठिन है। उन्होंने साफ किया कि वह पार्टी नहीं छोड़ रही हैं और एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में काम करती रहेंगी। ममता बनर्जी की करीबी मानी जाती हैं काकोली घोष Mamata Banerjee की करीबी मानी जाने वाली काकोली घोष दस्तिदार बारासात से चार बार सांसद रह चुकी हैं। वह पार्टी के महिला संगठन में भी अहम जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। हाल ही में उन्हें लोकसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक पद से हटाया गया था और उनकी जगह Kalyan Banerjee को नियुक्त किया गया।
कोलकाता, एजेंसियां। बंगाल की 293 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है। एक सीट (फालता) पर 21 मई को फिर से चुनाव होगा। शुरुआती रुझान में भाजपा 105 और टीएमसी 125 सीटों पर आगे चल रही है। झाड़ग्राम में भाजपा चारों सीटों पर आगे चल रही है। झाड़ग्राम इस चुनाव में काफी चर्चा में रहा। पीएम मोदी ने यहां एक दुकान पर रुककर झालमुड़ी खाई थी। भवानीपुर में ममता आगे भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी आगे हैं। नंदीग्राम से सुवेंदु बनर्जी को बढ़त है। राज्य में ममता बनर्जी 15 साल से सत्ता में हैं। वहीं आरजी कर रेप विक्टिम की मां रत्ना देबनाथ को बढ़त है।
Narendra Modi 14 अप्रैल को West Bengal के भाजपा कार्यकर्ताओं से ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ अभियान के तहत सीधा संवाद करेंगे। यह वर्चुअल कार्यक्रम दोपहर 4:30 बजे आयोजित होगा, जिसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर संगठन को और मजबूत करना है। नमो ऐप से जुड़ने का मौका इस कार्यक्रम में जुड़ने के लिए NaMo App को मुख्य प्लेटफॉर्म बनाया गया है। कार्यकर्ता इस ऐप के जरिए: अपने सुझाव और विचार साझा कर सकते हैं भविष्य की रणनीति पर फीडबैक दे सकते हैं चुने गए प्रतिभागियों को PM से सीधे बात करने का मौका मिलेगा क्या है अभियान का मकसद? Bharatiya Janata Party (BJP) का मानना है कि बूथ स्तर का कार्यकर्ता ही चुनाव जीत का सबसे अहम कड़ी होता है। इस कार्यक्रम के जरिए: कार्यकर्ताओं में जोश भरना घर-घर जनसंपर्क की रणनीति समझाना केंद्र सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाना TMC के खिलाफ रणनीति बंगाल में Trinamool Congress (TMC) के खिलाफ बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। पीएम मोदी कार्यकर्ताओं को बताएंगे: कैसे हर बूथ को मजबूत बनाया जाए चुनावी चुनौतियों और हिंसा के आरोपों के बीच संगठन को कैसे सक्रिय रखा जाए क्यों अहम है यह कार्यक्रम? पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच यह कार्यक्रम बीजेपी के लिए ग्राउंड लेवल स्ट्रेटजी को मजबूत करने का बड़ा प्रयास माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं से बड़ी संख्या में इस डिजिटल संवाद से जुड़ने की अपील की है।
Subhas Chandra Bose के पोते Chandra Kumar Bose ने Trinamool Congress (TMC) का दामन थाम लिया है। यह कदम West Bengal में आगामी चुनाव से पहले राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। TMC में शामिल होने पर क्या बोले? TMC जॉइन करने के बाद चंद्र कुमार बोस ने Bharatiya Janata Party (BJP) पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी “बांटने वाली राजनीति” करती है और समाज में सांप्रदायिक नफरत फैलाती है। उन्होंने कहा कि देश को बचाने के लिए ऐसी राजनीति का विरोध जरूरी है। किन नेताओं की मौजूदगी में जॉइन की पार्टी? उन्होंने राज्य मंत्री Bratya Basu और TMC सांसद Kirti Azad की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली। BJP से TMC तक का सफर 2016 में BJP में शामिल हुए Bhabanipur से Mamata Banerjee के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए 2019 में Kolkata South से लोकसभा चुनाव लड़ा, फिर हार का सामना 2023 में BJP से इस्तीफा दे दिया चंद्र कुमार बोस का TMC में शामिल होना बंगाल की राजनीति में नया मोड़ माना जा रहा है, खासकर तब जब चुनावी माहौल तेजी से गरम हो रहा है।
चेन्नई, एजेंसियां। Dacoit Ek Prem Katha एक एक्शन-रोमांटिक फिल्म के तौर पर बड़े दावों के साथ सिनेमाघरों में रिलीज हुई, लेकिन यह दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाती। निर्देशक Shenil Dev की यह फिल्म एक दिलचस्प कॉन्सेप्ट के बावजूद कमजोर कहानी और ढीले स्क्रीनप्ले की वजह से प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है। कहानी: प्यार, बदले और रहस्यों का मिश्रण फिल्म की कहानी हरि (Adivi Sesh) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो हत्या और रेप के आरोप में 10 साल से जेल में है। वह अपनी प्रेमिका जूलिएट (Mrunal Thakur) की गवाही के कारण सजा काट रहा है। जेल से भागने के बाद उसका मकसद जूलिएट से बदला लेना होता है, लेकिन मुलाकात के बाद उसकी नफरत फिर से प्यार में बदलने लगती है। कहानी में कुछ ट्विस्ट आते हैं, जो इसे एक इमोशनल मोड़ देने की कोशिश करते हैं। स्क्रीनप्ले और लॉजिक की बड़ी कमी फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका स्क्रीनप्ले है। कोविड काल की पृष्ठभूमि पर बनी यह कहानी अस्पतालों में भ्रष्टाचार दिखाने की कोशिश करती है, लेकिन दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ नहीं पाती। लव स्टोरी में भी गहराई की कमी है और मुख्य किरदारों के बीच मजबूत बॉन्डिंग नहीं बन पाती। डकैती के सीन अवास्तविक लगते हैं, जहां बिना ठोस योजना के किरदार आसानी से सुरक्षा और पुलिस को चकमा देते दिखते हैं। अभिनय और तकनीकी पक्ष अदिवि शेष ने प्रयास तो अच्छा किया है, लेकिन कई जगह उनका अभिनय ओवर लगता है। मृणाल ठाकुर खासकर सेकेंड हाफ में प्रभाव छोड़ती हैं। Anurag Kashyap और Prakash Raj जैसे कलाकार भी कमजोर लेखन के कारण सीमित रह जाते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक और तकनीकी पहलू ठीक-ठाक हैं, जबकि अंतिम 20 मिनट थोड़े दिलचस्प बन पड़ते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।