US Student Visa News: अमेरिका में पढ़ाई करने के बाद नौकरी करने का सपना देखने वाले लाखों विदेशी छात्रों के लिए आने वाले समय में नियम काफी सख्त और महंगे हो सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रहा है, जिसके तहत पढ़ाई पूरी करने के बाद ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) के जरिए अमेरिका में नौकरी करने वाले विदेशी छात्रों से 1 लाख डॉलर (करीब 87 लाख रुपये) तक का शुल्क लिया जा सकता है। हालांकि इस प्रस्ताव पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। विदेशी छात्रों की बढ़ सकती है चिंता अमेरिका दुनिया भर के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का सबसे लोकप्रिय केंद्र माना जाता है। बेहतर विश्वविद्यालय, रिसर्च के अवसर और पढ़ाई के बाद नौकरी की संभावनाएं हर साल लाखों अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करती हैं। खासकर भारत जैसे देशों के छात्र बड़ी संख्या में अमेरिकी विश्वविद्यालयों का रुख करते हैं। लेकिन द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन अब पढ़ाई के बाद अमेरिका में काम करने की प्रक्रिया को महंगा और अधिक नियंत्रित बनाने की तैयारी कर रहा है। प्रस्तावित बदलाव लागू होने पर विदेशी छात्रों के लिए अमेरिका में करियर शुरू करना पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। क्या है 1 लाख डॉलर वाला प्रस्ताव? रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव Optional Practical Training (OPT) कार्यक्रम से जुड़ा है। OPT एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत F-1 स्टूडेंट वीजा पर पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में अपने विषय से संबंधित क्षेत्र में काम कर सकते हैं। फिलहाल नियमों के मुताबिक: सामान्य कोर्स करने वाले छात्रों को 12 महीने तक काम करने की अनुमति मिलती है। STEM (Science, Technology, Engineering and Mathematics) विषयों के छात्रों को यह अवधि बढ़ाकर 36 महीने तक मिल सकती है। इसी कार्यक्रम के तहत नौकरी करने की अनुमति के लिए 1 लाख डॉलर तक का शुल्क लगाने पर विचार किया जा रहा है। H-1B वीजा का भी बनता है रास्ता OPT कार्यक्रम विदेशी छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे उन्हें अमेरिकी कंपनियों में कार्य अनुभव मिलता है। यही अनुभव आगे चलकर H-1B वर्क वीजा हासिल करने की संभावनाओं को भी मजबूत करता है। यदि प्रस्तावित शुल्क लागू होता है, तो अमेरिका में पढ़ाई के बाद नौकरी की लागत काफी बढ़ सकती है। किसे देना होगा शुल्क? रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित 1 लाख डॉलर का शुल्क विदेशी छात्रों को स्वयं देना होगा या उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियां इसका भुगतान करेंगी। इस मुद्दे पर अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग में चल रही चर्चा बताया गया है कि यह प्रस्ताव फिलहाल अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (Department of Homeland Security - DHS) के स्तर पर विचाराधीन है। अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक नियम या अधिसूचना जारी नहीं हुई है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो इसका सबसे अधिक असर भारत सहित उन देशों के छात्रों पर पड़ सकता है, जहां से बड़ी संख्या में छात्र हर साल उच्च शिक्षा और करियर के लिए अमेरिका जाते हैं। फिलहाल छात्र और विश्वविद्यालय प्रशासन सरकार के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान ने अमेरिका के ट्रंप प्रशासन से 10 अरब डॉलर की एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सपोर्ट फैसिलिटी (Exchange Stabilisation Support Facility) का अनुरोध किया है। यह प्रस्ताव पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब ने अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के साथ बातचीत के दौरान रखा। यदि इसे मंजूरी मिलती है तो इससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी और रुपये पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है. विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने पर जोर पाकिस्तान सरकार का उद्देश्य इस सुविधा के जरिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में निवेशकों का भरोसा बढ़ाना है। सरकार का मानना है कि इससे अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने और आईएमएफ कार्यक्रम के साथ सुधारों को आगे बढ़ाने में सहायता मिलेगी। अमेरिका की ओर से अभी कोई आधिकारिक मंजूरी नहीं अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय ने इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। फिलहाल यह अनुरोध विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय अमेरिकी प्रशासन द्वारा लिया जाएगा। आईएमएफ पर निर्भरता घटाने की कोशिश विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस व्यवस्था के जरिए आईएमएफ और अन्य बहुपक्षीय संस्थानों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। यदि यह सुविधा मिलती है तो इसे पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय सुरक्षा कवच माना जाएगा।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई। प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया। ट्रंप ने जताई खुशी, बोले- ईरान के लिए चेतावनी सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।" ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था। राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई। दो रिपब्लिकन सांसदों ने बदला फैसला इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया। सीनेटर रैंड पॉल ने इस बार 'प्रेजेंट' वोट किया, यानी उन्होंने पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया। सीनेटर बिल कैसिडी ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा। रैंड पॉल बोले- शांति वार्ता के लिए दिया राष्ट्रपति को मौका मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है। उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है। बिल कैसिडी ने पहले उठाए सवाल, फिर बदला रुख सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। कुछ रिपब्लिकन ने किया समर्थन, डेमोक्रेट में भी दिखी अलग राय रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रपति की शक्तियों पर बहस जारी अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए। ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के प्रशासन ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ अपने अभियान को नया रूप देते हुए एक अनोखी वेबसाइट लॉन्च की है। 'Aliens.gov' नाम की इस वेबसाइट को अंतरिक्ष और एलियन थीम पर तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य अमेरिका में बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे प्रवासियों से जुड़ी कार्रवाई और गिरफ्तारियों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना है। साइंस-फिक्शन जैसी थीम ने खींचा ध्यान गुरुवार को शुरू की गई इस वेबसाइट का डिज़ाइन किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा दिखाई देता है। वेबसाइट पर तारों और आकाशगंगाओं की पृष्ठभूमि के साथ नियॉन-हरे रंग के अक्षरों का इस्तेमाल किया गया है। साइट खोलते ही एक संदेश दिखाई देता है— "They are among us" (वे हमारे बीच घूम रहे हैं)। यह संदेश उन अवैध प्रवासियों की ओर संकेत करता है, जिन्हें ट्रंप प्रशासन लंबे समय से कानूनी शब्दावली में "एलियंस" कहकर संबोधित करता रहा है। गिरफ्तारियों को दिखाने के लिए बनाया गया प्लेटफॉर्म 'Aliens.gov' को अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन एजेंसी (ICE) की कार्रवाई को प्रदर्शित करने के लिए विकसित किया गया है। वेबसाइट पर दावा किया गया है कि वर्षों से ऐसे लोग अमेरिका में रह रहे थे जिनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं थी और अब प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। साइट पर एक लाइव काउंटर भी लगाया गया है, जिसमें प्रवासियों की गिरफ्तारी और कार्रवाई से जुड़े आंकड़े प्रदर्शित किए जा रहे हैं। इंटरैक्टिव मैप से देखी जा सकती है गिरफ्तारी की जानकारी वेबसाइट की सबसे प्रमुख विशेषताओं में एक इंटरैक्टिव डिजिटल मैप शामिल है। इसके जरिए उपयोगकर्ता अमेरिका के किसी भी राज्य या शहर में हुई आव्रजन कार्रवाई की जानकारी देख सकते हैं। मैप पर उपलब्ध जानकारी में गिरफ्तार व्यक्ति का मूल देश, उस पर लगे आरोप और कथित आपराधिक रिकॉर्ड जैसी जानकारियां भी शामिल की गई हैं। इसके अलावा वेबसाइट पर एक रिपोर्टिंग फॉर्म भी दिया गया है, जहां नागरिक संदिग्ध अवैध प्रवासियों की जानकारी साझा कर सकते हैं। पहले UFO से जुड़ी अटकलें लगी थीं इस वेबसाइट के लॉन्च से पहले व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक टीजर वीडियो साझा किया था। वीडियो में खेतों में बने रहस्यमयी निशानों और सर्चलाइट का इस्तेमाल किया गया था, जिससे लोगों ने अनुमान लगाया कि सरकार UFO या दूसरे ग्रहों के जीवों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने वाली है। बाद में स्पष्ट हो गया कि यह अभियान अवैध प्रवासियों पर केंद्रित था और वेबसाइट का एलियंस से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। मानवाधिकार संगठनों ने जताई आपत्ति वेबसाइट लॉन्च होने के बाद कई मानवाधिकार और प्रवासी अधिकार संगठनों ने इसकी आलोचना की है। उनका कहना है कि वेबसाइट पर इस्तेमाल की गई भाषा प्रवासियों को इंसानों की बजाय "एलियन" के रूप में पेश करती है, जिससे समाज में उनके प्रति नकारात्मक धारणा और भेदभाव बढ़ सकता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि इस तरह की प्रस्तुति प्रवासियों को अमानवीय रूप में दिखाती है और सामाजिक तनाव को बढ़ावा दे सकती है। ट्रंप प्रशासन अपने फैसले पर कायम विवादों के बावजूद ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वेबसाइट का उद्देश्य आव्रजन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना और नागरिकों को जानकारी उपलब्ध कराना है। प्रशासन का दावा है कि सीमाओं की सुरक्षा और अवैध प्रवास पर नियंत्रण उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। इस बीच, अमेरिका के कई शहरों में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों और निर्वासन अभियानों को लेकर विरोध प्रदर्शन भी जारी हैं, लेकिन प्रशासन फिलहाल अपने सख्त आव्रजन रुख पर कायम नजर आ रहा है।
Donald Trump प्रशासन एक बार फिर ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य कदम की तैयारी में जुटा दिखाई दे रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाइट हाउस, पेंटागन और खुफिया एजेंसियों में हाई अलर्ट जैसी स्थिति बना दी गई है। इसी बीच ट्रंप ने अपने निजी कार्यक्रम और छुट्टियां भी रद्द कर दी हैं, जिससे अटकलें और तेज हो गई हैं। बेटे की शादी में भी नहीं जाएंगे ट्रंप अमेरिका में 25 मई को मेमोरियल डे के चलते लंबा वीकेंड है। ट्रंप पहले न्यू जर्सी स्थित अपने गोल्फ क्लब में समय बिताने वाले थे, लेकिन उन्होंने अचानक कार्यक्रम बदल दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और बेटिना एंडरसन की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने इसकी वजह “सरकारी परिस्थितियां” बताई। इसके बाद उनका काफिला वॉशिंगटन डीसी में तेजी से व्हाइट हाउस लौटता देखा गया। अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियां अलर्ट पर रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सेना और इंटेलिजेंस एजेंसियों के कई अधिकारियों ने भी अपनी छुट्टियां रद्द कर दी हैं। विदेशों में तैनात अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए “रिकॉल रोस्टर” अपडेट किए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार मध्य पूर्व में मौजूद कुछ अमेरिकी सैनिकों को संवेदनशील इलाकों से हटाया भी जा रहा है। माना जा रहा है कि अमेरिका संभावित जवाबी हमले की आशंका को देखते हुए अपनी तैयारियां मजबूत कर रहा है। ईरान के IRGC की बड़ी चेतावनी Islamic Revolutionary Guard Corps यानी IRGC ने अमेरिका और इजरायल को खुली चेतावनी दी है। IRGC ने कहा कि अगर ईरान पर फिर हमला हुआ तो जवाब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान ने अपने पश्चिमी हवाई क्षेत्र में NOTAM जारी कर सोमवार तक उड़ानों पर रोक लगा दी है। इसे संभावित सैन्य गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिका ने दिया “फाइनल ऑफर” रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने ईरान को एक “अंतिम प्रस्ताव” दिया है। कहा जा रहा है कि अगर तेहरान इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता, तो अगले 24 घंटे में सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू हो सकती है। ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया कि “ईरान समझौता करना चाहता है” और अमेरिका हालात पर नजर बनाए हुए है। असली विवाद क्या है? अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा विवाद परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट पूरी तरह बंद करे ईरान इस मांग को मानने को तैयार नहीं है तेहरान अपने विदेशी फ्रीज एसेट्स जारी करने और युद्ध नुकसान की भरपाई की मांग कर रहा है ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर टोल व्यवस्था की भी बात कर रहा है विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव की जड़ यही मुद्दे हैं। पाकिस्तान और कतर निभा रहे मध्यस्थ की भूमिका रिपोर्ट्स के अनुसार Asim Munir इस समय तेहरान में मौजूद हैं। वहीं कतर का प्रतिनिधिमंडल भी ईरान पहुंचा हुआ है। दोनों देश अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल बातचीत कराने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान सेना प्रमुख की मुलाकात IRGC के वरिष्ठ अधिकारियों से हो सकती है। फरवरी में शुरू हुआ था संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले किए थे। इसके बाद दोनों पक्षों में जवाबी कार्रवाई का दौर शुरू हुआ। 8 अप्रैल को सीजफायर पर सहमति बनी, लेकिन उसके बाद भी धमकियों, प्रतिबंधों और सैन्य तैयारियों का सिलसिला जारी है। अब ट्रंप प्रशासन की गतिविधियों से यह आशंका बढ़ गई है कि हालात फिर से बड़े टकराव की ओर बढ़ सकते हैं।
Donald Trump ने एक बार फिर Cameron Hamilton पर भरोसा जताते हुए उन्हें Federal Emergency Management Agency (FEMA) का नेतृत्व करने के लिए नामित किया है। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने ही हैमिल्टन को FEMA के अस्थायी प्रमुख पद से हटा दिया था। क्यों हटाए गए थे हैमिल्टन? रिपोर्ट्स के मुताबिक, हैमिल्टन को उस समय हटाया गया था जब उन्होंने FEMA के अस्तित्व और उसकी जरूरत का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। उस दौरान ट्रंप प्रशासन लगातार संकेत दे रहा था कि FEMA को खत्म या कमजोर किया जा सकता है। ट्रंप पहले भी एजेंसी की कार्यप्रणाली की आलोचना करते रहे हैं और कई बार इसे “अप्रभावी” बता चुके हैं। अब क्यों हुई वापसी? अगर सीनेट उनके नामांकन को मंजूरी देती है, तो हैमिल्टन: आपदा प्रबंधन मामलों में ट्रंप के मुख्य सलाहकार होंगे Markwayne Mullin के साथ मिलकर काम करेंगे प्राकृतिक आपदाओं और आपात स्थितियों के लिए FEMA की तैयारी संभालेंगे विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियुक्ति ट्रंप प्रशासन की रणनीति में बदलाव का संकेत हो सकती है, क्योंकि अमेरिका में गर्मियों के दौरान तूफान, बाढ़ और जंगल की आग जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है। चुनौतीपूर्ण होगी जिम्मेदारी हैमिल्टन ऐसे समय FEMA की कमान संभालने जा रहे हैं जब एजेंसी के भीतर लगातार अस्थिरता बनी हुई है। जनवरी 2025 से अब तक एजेंसी तीन अस्थायी प्रमुख देख चुकी है। इसके चलते: प्रशासनिक असमंजस नीतिगत बदलाव आपदा तैयारी को लेकर चिंता जैसे मुद्दे सामने आए हैं। FEMA क्यों अहम है? Federal Emergency Management Agency अमेरिका में: तूफान बाढ़ भूकंप जंगल की आग अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सबसे अहम संघीय एजेंसी मानी जाती है। यह एजेंसी राज्यों को राहत, बचाव और पुनर्वास में मदद करती है। क्या है ट्रंप प्रशासन की रणनीति? ट्रंप प्रशासन के भीतर लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि: FEMA की भूमिका सीमित की जाए राज्यों को ज्यादा जिम्मेदारी दी जाए संघीय खर्च कम किया जाए हालांकि लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के खतरे के बीच FEMA को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं माना जा रहा। अब कैमरन हैमिल्टन की वापसी को इस रूप में देखा जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन फिलहाल एजेंसी को खत्म करने के बजाय उसे अपने तरीके से पुनर्गठित करना चाहता है।
अमेरिका में Donald Trump प्रशासन ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाने का फैसला किया है. अब उन अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट रद्द किए जाएंगे, जिन पर बच्चों की देखभाल के लिए दिए जाने वाले “चाइल्ड सपोर्ट” का भारी बकाया है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि यह कार्रवाई उन लोगों पर केंद्रित होगी जो लंबे समय से भुगतान नहीं कर रहे हैं. क्या है नया नियम? अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार, जिन माता-पिता पर 2,500 डॉलर (करीब 2.36 लाख रुपये) से ज्यादा का चाइल्ड सपोर्ट बकाया है, उनका पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है. यह कार्रवाई अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग (HHS) के साथ मिलकर की जाएगी. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है और हजारों लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं. क्या होता है चाइल्ड सपोर्ट? अमेरिका में तलाक या अलग रहने की स्थिति में अदालत यह तय करती है कि बच्चे की पढ़ाई, इलाज, खाना, कपड़े और दूसरी जरूरतों के लिए माता-पिता में से किसे कितनी आर्थिक सहायता देनी होगी. इसी भुगतान को “चाइल्ड सपोर्ट” कहा जाता है. अगर कोई अभिभावक लंबे समय तक यह राशि नहीं देता, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी कानून के तहत पासपोर्ट पाने या बनाए रखने के लिए चाइल्ड सपोर्ट से जुड़े दायित्वों का पालन करना जरूरी है. मंत्रालय के मुताबिक: 2,500 डॉलर से ज्यादा बकाया होने पर पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है बकाया चुकाए बिना नया पासपोर्ट जारी नहीं होगा रद्द पासपोर्ट यात्रा के लिए मान्य नहीं रहेगा सरकार का कहना है कि यह कदम माता-पिता को बच्चों के प्रति अपनी “कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी” निभाने के लिए प्रेरित करेगा. विदेश में फंसे लोगों के साथ क्या होगा? अगर किसी व्यक्ति का पासपोर्ट उस समय रद्द किया जाता है जब वह अमेरिका से बाहर हो, तो उसे अमेरिकी दूतावास या वाणिज्य दूतावास से संपर्क करना होगा. वहां से उसे केवल अमेरिका लौटने के लिए एक इमरजेंसी ट्रैवल डॉक्युमेंट दिया जाएगा. पहले क्या नियम था? अब तक आमतौर पर यह कार्रवाई केवल तब होती थी जब कोई व्यक्ति अपना पासपोर्ट रिन्यू कराने की कोशिश करता था. लेकिन नए फैसले के बाद सरकार सीधे सक्रिय होकर ऐसे लोगों के पासपोर्ट रद्द कर सकती है, जिन पर बड़ा बकाया है. लोगों को क्या सलाह दी गई? अमेरिकी अधिकारियों ने प्रभावित लोगों को सलाह दी है कि वे संबंधित एजेंसियों से संपर्क कर जल्द भुगतान व्यवस्था तय करें, ताकि पासपोर्ट रद्द होने जैसी कार्रवाई से बचा जा सके. विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम बच्चों के आर्थिक अधिकारों को मजबूत करने और बकाया भुगतान वसूलने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
बंद कमरे की बैठकों में उठाए गंभीर सवाल अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप प्रशासन के भीतर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेंस को आशंका है कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध की वास्तविक स्थिति से अलग तस्वीर दिखा रहे हैं। बताया जा रहा है कि निजी बैठकों में वेंस ने सवाल उठाया कि क्या पेंटागन ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान की वास्तविक स्थिति बता रहा है या केवल सकारात्मक तस्वीर पेश की जा रही है। मिसाइल भंडार को लेकर बढ़ी चिंता वेंस की सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी मिसाइल भंडार को लेकर है। उनका मानना है कि ईरान युद्ध में बड़ी मात्रा में हथियार खर्च हो रहे हैं, जिससे भविष्य में चीन, रूस या उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ संभावित संघर्ष की स्थिति में अमेरिका कमजोर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, वेंस ने यह चिंता सीधे राष्ट्रपति ट्रंप के सामने भी रखी है। हेगसेथ पर सीधे आरोप से बच रहे वेंस हालांकि, जेडी वेंस ने अब तक सार्वजनिक रूप से पीट हेगसेथ की आलोचना नहीं की है। उन्होंने कई मौकों पर रक्षा मंत्री की तारीफ भी की है। सूत्रों का कहना है कि वेंस इस मुद्दे को व्यक्तिगत टकराव में बदलने से बचना चाहते हैं। लेकिन उनके करीबी मानते हैं कि पेंटागन की तरफ से पेश की जा रही तस्वीर जरूरत से ज्यादा आशावादी है। खुफिया रिपोर्ट और दावों में अंतर पीट हेगसेथ लगातार दावा कर रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान की वायुसेना, नौसेना और रक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। लेकिन आंतरिक खुफिया आकलनों में तस्वीर कुछ अलग बताई जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान अब भी अपनी वायुसेना और मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा बचाने में सफल रहा है। 2028 की राजनीति पर भी असर विश्लेषकों का मानना है कि जेडी वेंस का राजनीतिक भविष्य भी इस युद्ध के नतीजों से जुड़ा हुआ है। यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचता है या अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ता है, तो इसका असर 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में वेंस की संभावनाओं पर पड़ सकता है। ट्रंप प्रशासन में बढ़ सकती है खींचतान ईरान युद्ध को लेकर व्हाइट हाउस के भीतर मतभेद सामने आने से साफ है कि ट्रंप प्रशासन के शीर्ष स्तर पर रणनीति को लेकर एकराय नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप अपने उपराष्ट्रपति की चिंताओं को कितना महत्व देते हैं और पेंटागन की रणनीति में कोई बदलाव करते हैं या नहीं।
ट्रंप प्रशासन ने बदली मृत्युदंड नीति United States में संघीय स्तर पर मृत्युदंड को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है। अमेरिकी न्याय विभाग ने अब फायरिंग स्क्वॉड, गैस एस्फिक्सिएशन और इलेक्ट्रोक्यूशन को भी फेडरल एक्जीक्यूशन के वैकल्पिक तरीकों में शामिल करने का निर्देश दिया है। न्याय विभाग ने जारी किया नया मेमो 48 पन्नों के आधिकारिक मेमो में कहा गया है कि इस कदम से मृत्युदंड प्रणाली और मजबूत होगी। सरकार का मानना है कि इससे जघन्य अपराधों पर अंकुश लगेगा, पीड़ितों को न्याय मिलेगा और उनके परिवारों को लंबे समय से प्रतीक्षित संतोष प्राप्त होगा। United States Department of Justice ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव भविष्य में किसी एक विशेष दवा की अनुपलब्धता की स्थिति से निपटने के लिए भी जरूरी है। बाइडेन ने लगाई थी रोक पूर्व राष्ट्रपति Joe Biden ने अपने कार्यकाल में अधिकांश संघीय फांसियों पर रोक लगा दी थी। पद छोड़ने से पहले उन्होंने 40 में से 37 संघीय मौत की सजा पाए कैदियों की सजा को कम कर दिया था। ट्रंप ने लौटते ही बदला फैसला राष्ट्रपति Donald Trump लंबे समय से मृत्युदंड के समर्थक रहे हैं। जनवरी 2025 में सत्ता में वापसी के पहले ही दिन उन्होंने न्याय विभाग को फिर से संघीय स्तर पर मृत्युदंड लागू करने का निर्देश दिया था। उनका आदेश विशेष रूप से आतंकवादियों, बच्चों के हत्यारों और पुलिसकर्मियों की हत्या करने वालों पर केंद्रित है। लीथल इंजेक्शन रहेगा मुख्य तरीका हालांकि, पेंटोबार्बिटल के जरिए लीथल इंजेक्शन अब भी प्राथमिक तरीका बना रहेगा। न्याय विभाग ने इसे "गोल्ड स्टैंडर्ड" बताया है। लेकिन दवा की उपलब्धता और इसकी मानवीयता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। डेमोक्रेटिक सीनेटर Dick Durbin ने इस फैसले को क्रूर, अनैतिक और भेदभावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यह अमेरिका के इतिहास पर एक काला धब्बा साबित होगा। कई राज्यों में पहले से लागू अमेरिका के कई राज्यों में पहले से वैकल्पिक मृत्युदंड के तरीके अपनाए जा रहे हैं। 2024 में Alabama नाइट्रोजन गैस से फांसी देने वाला पहला राज्य बना था। वहीं, पांच राज्यों में फायरिंग स्क्वॉड की व्यवस्था पहले से मौजूद है। यह फैसला अमेरिका में मृत्युदंड पर जारी बहस को और तेज कर सकता है।
अमेरिका ने फिर बढ़ाई रूस से तेल खरीद की अनुमति वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक अहम और चर्चित फैसला लिया है। ट्रंप प्रशासन ने रूस से प्रतिबंधित कच्चे तेल की खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को एक बार फिर बढ़ा दिया है। इस निर्णय के तहत कई देश, जिनमें भारत भी शामिल है, सीमित समय के लिए रूस से तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीद सकेंगे। यह छूट अब 16 मई तक प्रभावी रहेगी और इसे ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। किन शर्तों के साथ मिली छूट अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अनुसार, यह अनुमति केवल उन्हीं तेल शिपमेंट्स पर लागू होगी जो शुक्रवार तक जहाजों में लोड किए जा चुके हैं। इसके अलावा, इस छूट से ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया से जुड़े किसी भी प्रकार के व्यापार को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका रूस से तेल व्यापार पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय उसे सीमित और नियंत्रित तरीके से जारी रखना चाहता है। ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने की कोशिश यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव और मध्य पूर्व में युद्ध जैसे हालात के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हो गया है। हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस कदम के जरिए वैश्विक तेल आपूर्ति को अचानक झटके से बचाना चाहता है, ताकि कीमतें बहुत अधिक न बढ़ें। एशियाई देशों की मांग का असर रिपोर्ट्स के अनुसार, एशिया के कई देशों ने अमेरिका पर दबाव बनाया था कि उन्हें वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तक पहुंच दी जाए। भारत जैसे बड़े आयातक देशों ने रूस से सस्ती तेल आपूर्ति को जारी रखने की मांग की थी, ताकि घरेलू ऊर्जा कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके। इसी दबाव और वैश्विक आपूर्ति संकट को देखते हुए अमेरिका ने यह अस्थायी राहत दी है। पहले के रुख से बदलाव दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ दो दिन पहले अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने संकेत दिया था कि यह छूट आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। लेकिन अचानक लिए गए इस फैसले ने अमेरिकी नीति में बदलाव को दर्शाया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। तेल कीमतों में भारी गिरावट इसी बीच, ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को आंशिक रूप से खोलने के बाद वैश्विक तेल बाजार में लगभग 9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिरता अस्थायी हो सकती है, क्योंकि क्षेत्र में तनाव अभी भी बना हुआ है। राजनीतिक विवाद भी तेज अमेरिकी संसद के कई सदस्यों ने इस फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि इससे रूस को आर्थिक रूप से फायदा मिलेगा, जबकि वह यूक्रेन युद्ध में शामिल है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने भी प्रतिबंधों में ढील देने का विरोध जताया है। ईरान युद्ध, हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच अमेरिका का यह कदम वैश्विक ऊर्जा नीति को नई दिशा दे सकता है। हालांकि यह फैसला अस्थायी राहत देता है, लेकिन इसके राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव आने वाले समय में और अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।