मुंबई: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (UCC) का मसौदा तैयार करने के लिए राज्य सरकार द्वारा सात सदस्यीय समिति गठित किए जाने के बाद कांग्रेस ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी सरकार जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए नए राजनीतिक एजेंडे ला रही है। UCC को बताया ध्यान भटकाने की कोशिश कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि महाराष्ट्र में पुल गिरने, खराब सड़कों, बाढ़ और महंगाई जैसे गंभीर मुद्दे लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन सरकार इन समस्याओं का समाधान करने के बजाय UCC जैसे विषयों को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता के असली सवालों से बचने की कोशिश कर रही है। विधानसभा में भाषा को लेकर भी साधा निशाना सुप्रिया श्रीनेत ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर विधानसभा में विपक्ष के नेताओं के प्रति कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सवालों का जवाब तथ्यों और तर्कों से दिया जाना चाहिए, न कि अपमानजनक टिप्पणियों से। कांग्रेस ने मांग की कि यदि मुख्यमंत्री ने अनुचित भाषा का प्रयोग किया है तो उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। पुल और सड़कों की स्थिति पर उठाए सवाल कांग्रेस ने राज्य में लगातार सामने आ रहे पुल गिरने और खराब सड़कों से जुड़े मामलों का भी मुद्दा उठाया। पार्टी का कहना है कि सरकार को बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर प्राथमिकता देनी चाहिए। रायगढ़ में बाढ़ और सिलेंडर बहने का मामला भी उठाया कांग्रेस ने रायगढ़ जिले में बाढ़ के दौरान रसोई गैस सिलेंडरों के बह जाने की घटना का भी उल्लेख किया। पार्टी ने इसे प्रशासनिक लापरवाही बताते हुए कहा कि सरकार आपदा प्रबंधन और राहत व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रही है। सरकार पर लगाया जनता को गुमराह करने का आरोप कांग्रेस का कहना है कि राज्य सरकार विकास, महंगाई, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर जवाब देने के बजाय नए राजनीतिक विवाद खड़े कर रही है। पार्टी ने कहा कि जनता अब राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि अपनी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान चाहती है। हालांकि, महाराष्ट्र सरकार की ओर से कांग्रेस के इन आरोपों पर फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
चेन्नई, एजेंसियां। ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित बिग बैश लीग (BBL) के इतिहास में पहली बार उद्घाटन मुकाबला ऑस्ट्रेलिया से बाहर आयोजित किया जाएगा। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने घोषणा की है कि दिसंबर 2026 में बीबीएल के नए सीजन का पहला मैच चेन्नई के एम. ए. चिदंबरम स्टेडियम (चेपॉक) में खेला जाएगा। इस फैसले को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते क्रिकेट सहयोग की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। पहली बार ऑस्ट्रेलिया से बाहर होगा BBL का उद्घाटन मैच अब तक बिग बैश लीग के सभी मुकाबले ऑस्ट्रेलिया में ही खेले जाते रहे हैं। लेकिन इस बार क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने लीग के वैश्विक विस्तार की रणनीति के तहत उद्घाटन मैच भारत में कराने का फैसला लिया है। इससे भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को पहली बार अपने देश में BBL का रोमांच देखने का अवसर मिलेगा। चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम में होगा मुकाबला उद्घाटन मैच के लिए चेन्नई के एम. ए. चिदंबरम स्टेडियम को चुना गया है। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के अनुसार, भारत में बिग बैश की लोकप्रियता और चेन्नई के समृद्ध क्रिकेट इतिहास को देखते हुए इस शहर का चयन किया गया है। मैच के लिए बीसीसीआई और स्थानीय क्रिकेट संघ के साथ तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। भारत-ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट संबंधों को मिलेगा नया आयाम क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि यह आयोजन दोनों देशों के क्रिकेट संबंधों को और मजबूत करेगा। भारतीय दर्शकों के बीच बिग बैश लीग की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और भारत में मैच आयोजित होने से लीग को नया वैश्विक दर्शक वर्ग मिलने की उम्मीद है। दुनिया भर के स्टार खिलाड़ी आएंगे नजर उद्घाटन मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ कई अंतरराष्ट्रीय स्टार खिलाड़ी मैदान पर उतर सकते हैं। भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को विश्व स्तरीय टी20 खिलाड़ियों का खेल करीब से देखने का मौका मिलेगा, जिससे इस मैच को लेकर उत्साह काफी बढ़ गया है। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की वैश्विक रणनीति का हिस्सा क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि लीग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है। यदि भारत में यह आयोजन सफल रहता है, तो भविष्य में अन्य देशों में भी बिग बैश लीग के मुकाबले आयोजित किए जा सकते हैं।
कोलकाता: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने कहा कि राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की दिशा में एक विशेष समिति का गठन किया गया है। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत पात्र लोगों को नागरिकता देने की प्रक्रिया को तेज करने का भी आश्वासन दिया। अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान जो वादे किए थे, उन्हें चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि राज्य में "सोनार बांग्ला" के निर्माण की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। UCC लागू करने के लिए बनेगी विशेष समिति गृह मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल में समान नागरिक संहिता लागू करने के उद्देश्य से एक विशेष समिति का गठन किया गया है। उनके अनुसार यह समिति राज्य में UCC लागू करने से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करेगी और आगे की प्रक्रिया तय करेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा अपने संकल्प पत्र में किए गए वादों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसी दिशा में यह कदम उठाया गया है। CAA के तहत नागरिकता प्रक्रिया होगी तेज अमित शाह ने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून के तहत पात्र शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने की प्रक्रिया को और तेज किया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जिन लोगों को कानून के तहत नागरिकता मिलने का अधिकार है, उन्हें जल्द इसका लाभ मिलेगा। अवैध घुसपैठ पर सख्त रुख अपने संबोधन में गृह मंत्री ने अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि सरकार हर अवैध घुसपैठिए की पहचान करेगी और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करेगी। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ अवैध घुसपैठ रोकने के लिए केंद्र सरकार लगातार कदम उठा रही है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा की रखी आधारशिला कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125 फीट ऊंची प्रस्तावित प्रतिमा की आधारशिला भी रखी। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी का राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत को लेकर दिया गया योगदान देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। राजनीतिक संदेश भी दिया अपने संबोधन में अमित शाह ने राष्ट्रीय एकता, नागरिकता, कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अपने सभी चुनावी संकल्पों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और पश्चिम बंगाल में भी विकास तथा सुशासन को प्राथमिकता दी जाएगी।
आर्लिंग्टन (टेक्सास), एजेंसियां। फीफा वर्ल्ड कप 2026 के राउंड ऑफ-16 में स्पेन ने पुर्तगाल को 1-0 से हराकर क्वार्टर फाइनल में जगह बना ली। इस हार के साथ स्टार फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो की टीम टूर्नामेंट से बाहर हो गई। 41 वर्षीय रोनाल्डो के लिए यह उनके करियर का आखिरी फीफा वर्ल्ड कप भी साबित हुआ। मैच खत्म होने के बाद रोनाल्डो भावुक नजर आए और मैदान छोड़ते समय स्टेडियम में मौजूद हजारों दर्शकों ने खड़े होकर तालियां बजाकर उनका सम्मान किया। स्पेन की मजबूत रक्षा बनी जीत की सबसे बड़ी वजह पूरे मुकाबले में स्पेन का डिफेंस बेहद मजबूत नजर आया। पुर्तगाल ने कई बार गोल करने की कोशिश की, लेकिन स्पेनिश गोलकीपर उनाई सिमोन और डिफेंस ने हर प्रयास को नाकाम कर दिया। रोनाल्डो ने पहले हाफ में दो बेहतरीन मौके बनाए, लेकिन सिमोन ने शानदार बचाव करते हुए उन्हें गोल में बदलने नहीं दिया। उनकी एक डाइविंग सेव मैच के सबसे यादगार पलों में शामिल रही। सिमोन ने बनाया नया विश्व रिकॉर्ड 29 वर्षीय गोलकीपर उनाई सिमोन ने लगातार छठे वर्ल्ड कप मैच में क्लीन शीट रखते हुए नया इतिहास रच दिया। स्पेन अब वर्ल्ड कप इतिहास में लगातार सबसे अधिक मैचों तक गोल नहीं खाने वाली पहली टीम बन गई है। इससे पहले यह रिकॉर्ड इटली (1990) और स्विट्जरलैंड (2006-10) के नाम था, जिन्होंने लगातार पांच-पांच मैचों में विपक्षी टीम को गोल नहीं करने दिया था। सिमोन ने व्यक्तिगत उपलब्धि भी हासिल की। उन्होंने लगातार 609 मिनट तक गोल नहीं खाकर इटली के महान गोलकीपर वाल्टर जेंगा का 35 साल पुराना 517 मिनट का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मौजूदा टूर्नामेंट में स्पेन की मजबूत रक्षा ने उसे खिताब के सबसे बड़े दावेदारों में शामिल कर दिया है। रोनाल्डो के शानदार करियर का वर्ल्ड कप अध्याय समाप्त क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने 2006 में अपना पहला फीफा वर्ल्ड कप खेला था। उसी टूर्नामेंट में उन्होंने पुर्तगाल को सेमीफाइनल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी, जो उनके वर्ल्ड कप करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। 2018 वर्ल्ड कप में स्पेन के खिलाफ उनकी हैट्रिक आज भी यादगार मुकाबलों में गिनी जाती है। हालांकि इस बार रोनाल्डो अपने वर्ल्ड कप सफर का अंत जीत के साथ नहीं कर सके। मैच समाप्त होने के बाद उनकी आंखों में निराशा साफ दिखाई दी। मैदान से बाहर निकलते समय उन्होंने दर्शकों का अभिवादन किया, जबकि पूरे स्टेडियम ने तालियां बजाकर इस महान खिलाड़ी को सम्मानजनक विदाई दी। स्पेन की नजर अब खिताब पर क्वार्टर फाइनल में पहुंच चुकी स्पेनिश टीम अब अपने मजबूत डिफेंस और शानदार फॉर्म के दम पर विश्व कप जीतने की प्रबल दावेदार मानी जा रही है। लगातार क्लीन शीट और संतुलित प्रदर्शन ने स्पेन को इस टूर्नामेंट की सबसे मजबूत टीमों में शामिल कर दिया है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में घोषणा की कि सरकार यूसीसी का मसौदा तैयार करने के लिए एक हाई-लेवल कमेटी का गठन करेगी। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई करेंगी। सरकार का कहना है कि समिति चार सप्ताह के भीतर अपनी सिफारिशें सौंपेगी, जिसके बाद प्रस्तावित विधेयक को अगस्त में विधानसभा के विस्तारित बजट सत्र में पेश किया जा सकता है। कौन हैं जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई? जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई भारत के सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश हैं। न्यायपालिका में लंबे अनुभव के साथ उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की है। यूसीसी के क्षेत्र में भी उनका अनुभव अहम माना जाता है। इससे पहले वह उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने वाली विशेषज्ञ समिति की अध्यक्ष रह चुकी हैं। उत्तराखंड में यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया था। इसी अनुभव को देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें राज्य की यूसीसी ड्राफ्टिंग कमेटी की जिम्मेदारी सौंपी है। क्या होगी समिति की जिम्मेदारी? मुख्यमंत्री के अनुसार, जस्टिस देसाई की अध्यक्षता वाली समिति राज्य में लागू विभिन्न व्यक्तिगत (Personal) और पारिवारिक (Family) कानूनों की व्यापक समीक्षा करेगी। समिति का मुख्य कार्य होगा— समान नागरिक संहिता का कानूनी मसौदा तैयार करना। विभिन्न समुदायों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित करना। सभी पहलुओं का अध्ययन कर सरकार को अंतिम रिपोर्ट सौंपना। ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करना जो संविधान के अनुरूप हो। सरकार ने समिति को चार सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देने का लक्ष्य दिया है। समिति में कौन-कौन होंगे शामिल? हाई-लेवल कमेटी में जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के अलावा कई विशेषज्ञ शामिल होंगे। इनमें— सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी विधि विशेषज्ञ शिक्षाविद समाजसेवी राज्य प्रशासन के एक अतिरिक्त सचिव (सदस्य सचिव) शामिल रहेंगे। अतिरिक्त सचिव समिति के प्रशासनिक कार्यों का संचालन भी करेंगे। किन राज्यों के मॉडल पर बनेगा कानून? मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि प्रस्तावित यूसीसी का मसौदा तैयार करते समय उत्तराखंड समान नागरिक संहिता अधिनियम 2024, गुजरात यूसीसी विधेयक 2026 और असम के मॉडल का अध्ययन किया जाएगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड और गुजरात की तरह राज्य के आदिवासी, मूल निवासी, कुड़मी और अन्य मान्यता प्राप्त जनजातीय समुदायों को प्रस्तावित कानून में छूट देने पर भी विचार किया जाएगा। 2 जुलाई को कैबिनेट में प्रस्ताव सरकार के अनुसार, 2 जुलाई को यूसीसी प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद इसे अगस्त में विधानसभा में विधेयक के रूप में पेश किया जा सकता है। विपक्ष ने किया विरोध विधानसभा में इस घोषणा के बाद तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए नारेबाजी की। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन लोगों को प्रस्तावित कानून पर कोई सुझाव या आपत्ति है, वे उसे सीधे हाई-लेवल कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। यूसीसी ड्राफ्टिंग में अहम होगी जस्टिस देसाई की भूमिका उत्तराखंड में यूसीसी मसौदा तैयार करने के अनुभव और सुप्रीम कोर्ट में लंबे न्यायिक कार्यकाल के कारण जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की भूमिका पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित समान नागरिक संहिता कानून को कानूनी रूप से मजबूत और व्यावहारिक बनाने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा का सोमवार का सत्र राजनीतिक रूप से बेहद अहम रहने वाला है। राज्य की भाजपा सरकार अपना बहुप्रतीक्षित और विवादास्पद समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक सदन में पेश करने जा रही है। विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद यह भाजपा सरकार का सबसे बड़ा वैचारिक विधेयक माना जा रहा है। इस विधेयक पर मुकाबला सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच नहीं होगा। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान भी विधानसभा में खुलकर सामने आने की संभावना है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुट यूसीसी के विरोध को लेकर अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। UCC पर टीएमसी के दोनों गुट आमने-सामने विधानसभा में यूसीसी विधेयक पर बहस के दौरान टीएमसी के दोनों गुट सरकार को घेरने की तैयारी कर चुके हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने अपने विधायकों को विधेयक का कड़ा विरोध करने के निर्देश दिए हैं। ममता बनर्जी का कहना है कि समान नागरिक संहिता देश की सामाजिक विविधता, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। उनका आरोप है कि इस तरह के कानून से भारत की बहुलतावादी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। वहीं विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी का गुट भी सरकार पर निशाना साधने की रणनीति बना चुका है। उनका कहना है कि सरकार बिना व्यापक चर्चा और सामाजिक सहमति के इतना महत्वपूर्ण कानून लाने की जल्दबाजी कर रही है। भाजपा के पास बहुमत, विधेयक पारित होने की संभावना विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण विधेयक के पारित होने में किसी बड़ी बाधा की संभावना नहीं है। इसके बावजूद सदन में होने वाली बहस राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह राज्य की नई राजनीतिक दिशा और विपक्ष की रणनीति दोनों को स्पष्ट करेगी। क्या है समान नागरिक संहिता (UCC)? समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए धर्म से अलग एक समान नागरिक कानून लागू करना है। इसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार, गोद लेने और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। भाजपा लंबे समय से इसे अपने प्रमुख चुनावी और वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है। पार्टी का तर्क है कि इससे सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे और कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित होगी। सदन में होगी विस्तृत चर्चा विधानसभा की कार्यवाही सोमवार सुबह 11 बजे शुरू होगी। सरकार पहले अन्य विधेयक पेश करेगी, जिसके बाद दूसरे चरण में यूसीसी विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है। इस दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी और विभिन्न दलों के वरिष्ठ विधायक अपनी-अपनी बात रखेंगे। बहस के बाद सरकार विधेयक को सदन से पारित कराने का प्रयास करेगी। राजनीतिक नजरें विधानसभा पर यूसीसी विधेयक पर होने वाली चर्चा को केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति का अहम पड़ाव माना जा रहा है। एक ओर भाजपा इसे अपने वैचारिक एजेंडे की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करना चाहती है, वहीं टीएमसी के दोनों गुट इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता साबित करने की कोशिश करेंगे। ऐसे में सोमवार का विधानसभा सत्र राज्य की राजनीति के लिए काफी अहम रहने वाला है।
कोलकाता: उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) लागू करने की तैयारी तेज होती दिखाई दे रही है। विधानसभा और राज्य प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार अगले सप्ताह विधानसभा के विशेष सत्र में यूसीसी से संबंधित विधेयक पेश कर सकती है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो पश्चिम बंगाल समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का चौथा भाजपा शासित राज्य बन जाएगा। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है। साथ ही महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार ने बताई यूसीसी की जरूरत विधानसभा और प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, सरकार का मानना है कि अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान नागरिक कानून लागू होने से न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनेगी। सरकार का दावा है कि इससे कानूनी विवादों में एकरूपता आएगी और सभी नागरिकों को समान अधिकार सुनिश्चित किए जा सकेंगे। असम मॉडल पर आगे बढ़ सकती है सरकार सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार यूसीसी लागू करने के लिए असम मॉडल का अध्ययन कर रही है। हाल ही में असम विधानसभा ने लंबी बहस के बाद समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया था। उस कानून में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन संबंधों के पंजीकरण और बहुविवाह पर रोक जैसे कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। असम सरकार ने इसे संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुरूप बताया था और कहा था कि इसका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है। जनजातीय समुदायों को मिल सकती है छूट सूत्रों के मुताबिक, असम की तरह पश्चिम बंगाल में भी कुछ जनजातीय समुदायों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने पर विचार किया जा रहा है। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र और जंगलमहल के कुछ आदिवासी समुदायों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं। इस संबंध में अंतिम फैसला विधेयक पेश होने के बाद ही स्पष्ट होगा। राजनीतिक मुद्दा बनने की संभावना राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम बंगाल विधानसभा में यूसीसी विधेयक पेश होता है तो यह राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। भाजपा इसे महिलाओं के अधिकार, समान कानून और सुशासन से जोड़कर पेश कर सकती है, जबकि विपक्ष धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के आधार पर इसका विरोध कर सकता है। सरकार का कहना है कि समान नागरिक संहिता किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करने का संवैधानिक प्रयास है। वहीं विपक्षी दल पहले ही इस प्रस्तावित कानून को लेकर विरोध के संकेत दे चुके हैं। विधेयक पर रहेगी सबकी नजर अब सभी की नजर विधानसभा के आगामी विशेष सत्र पर टिकी है, जहां सरकार यूसीसी विधेयक पेश कर सकती है। विधेयक के अंतिम स्वरूप, उसमें शामिल प्रावधानों और संभावित छूटों को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राज्य सरकार आगामी सोमवार को विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश कर सकती है। सूत्रों के अनुसार, विधानसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक के बाद विधेयक का मसौदा सभी विधायकों को भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। विधानसभा में होगी अहम चर्चा सूत्रों का कहना है कि सरकार विधेयक पेश करने के बाद इस पर विस्तृत चर्चा कराना चाहती है। इसे मौजूदा विधानसभा सत्र का सबसे महत्वपूर्ण विधायी प्रस्ताव माना जा रहा है। विपक्ष ने जताई आपत्ति विपक्षी दलों ने प्रस्तावित विधेयक को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि इतने महत्वपूर्ण कानून पर सभी पक्षों से व्यापक चर्चा और परामर्श होना चाहिए। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि यह कदम समान कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठाया जा रहा है। राजनीतिक हलकों में बढ़ी हलचल UCC विधेयक की संभावित पेशी को लेकर राज्य की राजनीति गर्मा गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा में इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है। साथ ही इसका असर राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। पूरे देश की नजर बंगाल विधानसभा पर यदि यह विधेयक विधानसभा में पेश होता है, तो पश्चिम बंगाल उन राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां समान नागरिक संहिता को लेकर विधायी पहल की जा रही है। अब सभी की नजर सोमवार को होने वाली बंगाल विधानसभा की कार्यवाही पर टिकी है।
Assam की Bharatiya Janata Party सरकार ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश कर दिया है। मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की अगुवाई वाली सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले विशेष सत्र में इस बहुप्रतीक्षित कानून को सदन के पटल पर रखा। इस कदम के साथ असम, Uttarakhand और Gujarat के बाद UCC की दिशा में आगे बढ़ने वाला तीसरा भाजपा शासित राज्य बन गया है। हालांकि, विधेयक पेश होते ही विधानसभा में विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया और सरकार पर बिना व्यापक चर्चा के कानून लाने का आरोप लगाया। आदिवासी समुदाय को रखा गया बाहर सरकार ने महिलाओं को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देने और सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने जैसे बड़े दावे किए हैं, लेकिन आदिवासी समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। इसे सरकार का राजनीतिक और सामाजिक संतुलन साधने वाला कदम माना जा रहा है। राज्य सरकार का कहना है कि विधेयक का मसौदा असम की सामाजिक और जनसांख्यिकीय विविधता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। UCC विधेयक के 5 बड़े प्रावधान सरकार के मुताबिक, नया कानून नागरिक जीवन से जुड़े पांच प्रमुख मुद्दों को नियंत्रित करेगा: 1. बहुविवाह पर रोक राज्य में बहुविवाह की प्रथा को पूरी तरह अवैध घोषित किया जाएगा। 2. शादी की समान न्यूनतम उम्र सभी समुदायों के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र एक समान तय की जाएगी। 3. शादी और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण हर विवाह और तलाक का सरकारी रिकॉर्ड में पंजीकरण जरूरी होगा। 4. महिलाओं को संपत्ति में बराबरी पैतृक संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में बेटियों को पुरुषों के समान अधिकार दिए जाएंगे। 5. लिव-इन रिलेशनशिप के लिए नियम लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी दायरे में लाने के लिए पंजीकरण और अन्य नियम अनिवार्य किए जाएंगे। विपक्ष ने उठाए सवाल विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इतने बड़े सामाजिक और कानूनी बदलाव वाले विधेयक को पेश करने से पहले सभी हितधारकों से व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी। विपक्ष का कहना है कि सरकार जल्दबाजी में कानून लागू करना चाहती है। अब पूरे देश की नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा में यह विधेयक किस रूप में पारित होता है और इसके अंतिम प्रावधान क्या होंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।