अयोध्या, एजेंसियां। अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में जांच लगातार तेज होती जा रही है। एक ओर जहां विशेष जांच दल (SIT) मामले की गहन पड़ताल में जुटा है, वहीं दूसरी ओर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भीतर भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। ट्रस्ट के ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास महाराज ने पहली बार सार्वजनिक रूप से पूर्व पदाधिकारी गोपाल राव पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की जिम्मेदारी गोपाल राव की है और वे राम परंपरा का पालन नहीं करते तथा अनावश्यक विवाद खड़े करते हैं। सूत्रों के अनुसार सूत्रों के अनुसार, सरकार अब आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की तैयारी में है। अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) ने उन मकानों की जांच शुरू कर दी है, जिन्हें आरोपियों ने मंदिर में नौकरी के दौरान बनवाया और जिनमें निर्माण नियमों के उल्लंघन की आशंका है। बताया जा रहा है कि लवकुश मिश्रा के शहादतगंज स्थित निर्माणाधीन मकान और अनुकल्प मिश्रा के कौशलपुरी स्थित मकान पर कार्रवाई हो सकती है। इन मामलों में नोटिस जारी करने की तैयारी भी चल रही है। जांच एजेंसियां आर्थिक लेनदेन और संपत्तियों की भी पड़ताल कर रही हैं। आरोपी अविनाश शुक्ला के भाई अमित शुक्ला का नोटों की गड्डियों के साथ एक वीडियो भी सामने आया है, जिसकी सत्यता की पुलिस जांच कर रही है। वहीं, ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा से भी पूछताछ की संभावना जताई जा रही है। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि आरोपियों की नियुक्ति और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उनकी क्या भूमिका रही। अब तक आठ आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है इस मामले में अब तक आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। जांच के दौरान करीब 79.85 लाख रुपये नकद, विदेशी मुद्रा और सोने-चांदी के आभूषण बरामद किए गए हैं। पुलिस बैंक खातों, संपत्तियों और वित्तीय लेनदेन की भी जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कथित गबन की राशि कहां-कहां पहुंची। इस बीच फैजाबाद बार एसोसिएशन ने ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने SIT को जांच पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय देते हुए 15 जुलाई तक रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। आगामी 6 जुलाई को राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है, जिसमें जांच रिपोर्ट और ट्रस्ट की कार्यप्रणाली को लेकर कई अहम फैसले लिए जा सकते हैं।
लखनऊ: राजधानी लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की मौत के बाद अब इमारत से जुड़े पुराने दस्तावेज और प्रशासनिक कार्रवाई गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस इमारत में यह दर्दनाक हादसा हुआ, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के आरोप में ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) का आदेश जारी किया गया था। दो महीने से भी कम समय के भीतर यह आदेश वापस ले लिया गया, जिसके बाद प्रस्तावित कार्रवाई रोक दी गई। 1980 में हुआ था भवन का आवंटन अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी मूल रूप से 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के तहत रामेश्वर सहाय के पुत्र विजय कुमार को किराया-क्रय पद्धति पर आवंटित किया गया था। 4 नवंबर 1980 को अनुबंध निष्पादित होने के बाद भवन का कब्जा उन्हें सौंप दिया गया। बाद में वर्ष 2005 में विक्रय विलेख के माध्यम से यह भवन विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को दोनों ने यह संपत्ति वीरेंद्र प्रताप शुक्ला और सुरेंद्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दी। 7 अगस्त 2014 को लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने दोनों खरीदारों के पक्ष में नामांतरण की प्रक्रिया पूरी की। लगभग 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाली इस इमारत का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को स्वतः मानचित्र योजना के तहत आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था। अवैध निर्माण पर दर्ज हुआ था मुकदमा दस्तावेजों के अनुसार, बाद में भवन में अनधिकृत निर्माण की शिकायत सामने आई। इसके बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने वीरेंद्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद विहित प्राधिकारी ने 10 मई 2016 को अवैध निर्माण के विरुद्ध ध्वस्तीकरण का आदेश पारित कर दिया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि महज दो महीने के भीतर, 5 जुलाई 2016 को यह आदेश निरस्त कर दिया गया और इमारत के खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई रोक दी गई। अब उठ रहे बड़े सवाल अलीगंज अग्निकांड के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि 2016 में अवैध निर्माण को लेकर ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया गया था, तो आखिर किन परिस्थितियों में उसे वापस लिया गया? क्या उस समय नियमों की अनदेखी हुई? क्या प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही बरती गई? इन सवालों के जवाब अब जांच एजेंसियों और प्रशासनिक रिपोर्ट पर निर्भर करेंगे। इस बीच, हादसे में 15 लोगों की मौत ने भवन सुरक्षा, अवैध निर्माण और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है।
वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मांस और मछली की दुकानों को शहर की सीमा से बाहर स्थानांतरित करने की तैयारी शुरू हो गई है। नगर निगम ने शहर को अधिक व्यवस्थित, स्वच्छ और सुगम बनाने के उद्देश्य से यह फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत शहर के भीतर संचालित सभी मीट और फिश मार्केट को चरणबद्ध तरीके से बाहरी क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाएगा। नगर निगम की बैठक में लिया गया फैसला वाराणसी नगर निगम की बैठक शनिवार को मैदागिन स्थित टाउन हॉल में महापौर अशोक कुमार तिवारी की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में शहर के विकास और शहरी प्रबंधन से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई, जिसमें मांस और मछली बाजारों को शहर के बाहर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव प्रमुख रहा। नगर निगम के जनसंपर्क अधिकारी संदीप श्रीवास्तव ने बताया कि इस योजना को लागू करने के लिए प्रशासन ने प्रारंभिक स्तर पर पांच स्थानों की पहचान कर ली है। इन क्षेत्रों में बनेंगे नए मीट मार्केट नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल के अनुसार, पहले चरण में जिन स्थानों को चिन्हित किया गया है, उनमें शामिल हैं— रामनगर शुजाबाद गणेशपुर अवलेशपुर शिवपुर प्रशासन का कहना है कि ये सभी क्षेत्र शहर की बाहरी सीमा के निकट हैं, जिससे आम नागरिकों को खरीदारी में अधिक परेशानी नहीं होगी। शहर में हैं करीब 400 दुकानें नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार, वाराणसी शहर में वर्तमान में लगभग 350 से 400 मांस और मछली की दुकानें संचालित हो रही हैं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन दुकानों को निर्धारित स्थानों पर स्थानांतरित किया जाएगा। एक साल पहले उठा था प्रस्ताव नगर निगम के पार्षद गुलशन अली ने बैठक के दौरान कहा कि मांस और मछली की दुकानों को शहर के बाहर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव लगभग एक वर्ष पहले भी लाया गया था, लेकिन अब तक उस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी थी। उन्होंने यह भी कहा कि श्रावण माह के दौरान मांस की दुकानों के बंद रहने से इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आय प्रभावित होती है, इसलिए प्रशासन को व्यापारियों के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रशासन ने जल्द कार्रवाई का दिया भरोसा नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने सदन को आश्वस्त किया कि नई मीट मार्केट के लिए भूमि चिन्हित की जा चुकी है और प्रस्ताव को जल्द लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि यह कदम शहर के बेहतर प्रबंधन और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है। फैसले से नाराज हैं दुकानदार नगर निगम के इस निर्णय का कई व्यापारियों ने विरोध किया है। दुकानदारों का कहना है कि शहर से बाहर दुकानें स्थानांतरित होने पर उनके कारोबार पर असर पड़ सकता है। व्यापारियों का तर्क है कि ग्राहकों को मांस और मछली खरीदने के लिए शहर से बाहर जाना पड़ेगा, जिससे समय और परिवहन खर्च दोनों बढ़ेंगे। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि कोई ऐसा व्यावहारिक समाधान निकाला जाए, जिससे व्यापार और उपभोक्ताओं दोनों की सुविधा बनी रहे। शहर के विकास और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन की चुनौती नगर निगम का मानना है कि यह कदम शहर की स्वच्छता, यातायात व्यवस्था और शहरी सौंदर्यीकरण के लिए आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर व्यापारियों और स्थानीय निवासियों की चिंताओं को देखते हुए प्रशासन के सामने विकास और आजीविका के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी होगी।
रांची। झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्यपाल सचिवालय ने सरकार द्वारा भेजे गए नामों पर आपत्ति जताते हुए पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कर नए सिरे से प्रस्ताव भेजने को कहा है। प्रस्तावित नामों पर आपत्ति, FIR का मामला सामने आया जांच में सामने आया है कि जिन चार नामों को नियुक्ति के लिए भेजा गया था, उनमें से दो व्यक्तियों के खिलाफ पहले से प्राथमिकी दर्ज है। अमूल्य नीरज खलखो पर छह और तनुज खत्री पर एक प्राथमिकी दर्ज होने की बात सामने आई है। नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा का निर्देश इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाते हुए राज्यपाल सचिवालय ने सरकार को पूरी चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने और पारदर्शी तरीके से नए नाम भेजने का अनुरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला सचिवालय ने फाइल लौटाते समय सुप्रीम कोर्ट के ‘नमित शर्मा बनाम केंद्र सरकार’ मामले का भी उल्लेख किया है। इस फैसले में कहा गया है कि सूचना आयुक्त का कार्य अर्द्ध-न्यायिक प्रकृति का होता है, इसलिए नियुक्ति में योग्य और समझ रखने वाले व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, पत्रकारिता और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी इस पद के लिए चुना जा सकता है। कानूनी प्रावधानों की समीक्षा की भी मांग राज्यपाल सचिवालय ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 15(6) की समीक्षा करने का सुझाव भी दिया है, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप और अधिक स्पष्ट बनाया जा सके।
उत्तर प्रदेश के Mathura में यमुना नदी में हुए दर्दनाक बोट हादसे ने कई परिवारों की खुशियां पल भर में छीन लीं। श्रद्धालुओं से भरी मोटरबोट के पलटने से अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 5 लोग अब भी लापता हैं। हादसे के बाद दूसरे दिन भी राहत और बचाव अभियान जारी है, लेकिन हर गुजरते घंटे के साथ परिजनों की उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं। हादसे से पहले खुशी, फिर अचानक मातम हादसे में शामिल अधिकतर लोग Ludhiana समेत पंजाब के अलग-अलग इलाकों से तीर्थ यात्रा पर आए थे। परिवार वालों के मुताबिक, गुरुवार शाम को सभी खुशी-खुशी Vrindavan के लिए रवाना हुए थे। रास्ते में वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए अपनों से बात हो रही थी। लेकिन कुछ ही घंटों बाद अचानक एक फोन आया - “बोट पलट गई है… सबके फोन डूब गए…” “कल तक सब ठीक थे…” - परिजनों की आपबीती पीड़ित परिवारों की बातें दिल को झकझोर देने वाली हैं। एक महिला ने बताया, “सुबह 9 बजे बात हुई थी, सब खुश थे, वीडियो भेज रहे थे… आधे घंटे बाद खबर आई कि नाव पलट गई।” वहीं एक अन्य रिश्तेदार ने रोते हुए कहा, “कल तक बच्चे हंसते-खेलते गए थे, अब पता नहीं कौन कहां है… बस लापता होने की खबर आ रही है।” कैसे हुआ हादसा? अधिकारियों के मुताबिक, हादसे के वक्त नाव में करीब 37 लोग सवार थे। तेज हवाओं के कारण नाव असंतुलित हो गई और गहरे पानी में एक तैरते पोंटून से टकरा गई, जिससे वह पलट गई। बताया जा रहा है कि हाल ही में नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण पीपा पुल हटाया गया था, लेकिन उसके कुछ हिस्से पानी में ही रह गए थे जो इस हादसे की बड़ी वजह बने। राहत-बचाव अभियान जारी घटना के बाद से State Disaster Response Force, फायर ब्रिगेड और सेना की टीमें मौके पर लगातार राहत कार्य में जुटी हैं। करीब 50 स्थानीय गोताखोर भी सर्च ऑपरेशन में शामिल हैं। अब तक 22 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है, लेकिन लापता लोगों की तलाश जारी है। सुरक्षा इंतजामों पर उठे सवाल इस हादसे ने सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामने आए वीडियो में देखा गया कि नाव में सवार किसी भी यात्री ने लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी। हादसे से ठीक पहले सभी श्रद्धालु ‘राधे-राधे’ का जाप करते हुए खुश नजर आ रहे थे, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही पल में सब कुछ बदल जाएगा। सरकार ने जताया दुख Yogi Adityanath ने इस हादसे पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताई है और अधिकारियों को राहत कार्य तेज करने के निर्देश दिए हैं।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री Keshav Prasad Maurya शनिवार को एक बड़े हादसे से बाल-बाल बच गए। लखनऊ से कौशांबी के लिए उड़ान भरने के कुछ ही मिनटों बाद उनके हेलिकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ गई, जिसके बाद अमौसी एयरपोर्ट (चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा) पर इसकी इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई। जानकारी के अनुसार, उपमुख्यमंत्री लखनऊ के ला मार्ट्स मैदान से कौशांबी के लिए रवाना हुए थे। उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद हेलिकॉप्टर के केबिन में अचानक धुआं भरने लगा और डिस्प्ले सिस्टम भी बंद हो गया। इससे हेलिकॉप्टर में सवार लोगों के बीच कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पायलट ने तुरंत लखनऊ एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) से संपर्क किया और अमौसी एयरपोर्ट पर आपातकालीन लैंडिंग की अनुमति मांगी। अनुमति मिलने के बाद हेलिकॉप्टर को सुरक्षित तरीके से एयरपोर्ट पर उतारा गया। इमरजेंसी लैंडिंग के दौरान एयरपोर्ट पर सुरक्षा और बचाव के कड़े इंतजाम किए गए थे। हेलिकॉप्टर के जमीन पर उतरते ही सुरक्षा और तकनीकी टीमों ने उसे घेर लिया और उपमुख्यमंत्री को सुरक्षित बाहर निकाला गया। प्राथमिक जांच में इसे तकनीकी खराबी का मामला बताया जा रहा है। फिलहाल विशेषज्ञों की टीम पूरे मामले की विस्तृत जांच कर रही है कि आखिर उड़ान के दौरान केबिन में धुआं भरने की वजह क्या थी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।