ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबफ ने अमेरिका पर आर्थिक दबाव और मीडिया प्रचार के जरिए देश को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि ईरान अपने अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा. गालिबफ ने दावा किया कि तेहरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने की अमेरिकी रणनीति कभी सफल नहीं होगी. आर्थिक दबाव और प्रचार के जरिए फूट डालने का आरोप रविवार को संसद के नए सत्र को संबोधित करते हुए गालिबफ ने कहा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य मोर्चे पर मिली असफलताओं की भरपाई आर्थिक प्रतिबंधों और मीडिया अभियान के जरिए करना चाहते हैं. उनका उद्देश्य ईरान की राष्ट्रीय एकता को कमजोर करना और देश के भीतर विभाजन पैदा करना है. उन्होंने कहा कि युद्ध के नए दौर में विरोधी ताकतें आर्थिक दबाव और प्रचार तंत्र के सहारे ईरान को झुकाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन यह उनका भ्रम है और यह रणनीति सफल नहीं होगी. 'ईरान और इस्लाम को कमजोर करने की कोशिश' गालिबफ ने कहा कि देश एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर से गुजर रहा है. उन्होंने दावा किया कि ईरानी जनता उन ताकतों का मजबूती से सामना कर रही है, जो ईरान और इस्लाम को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं. उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियां इस दौर को देश की संप्रभुता और अधिकारों की रक्षा के संघर्ष के रूप में याद रखेंगी. उनके अनुसार, यह समय राष्ट्रीय एकता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनकर इतिहास में दर्ज होगा. संघर्ष के चार मोर्चों का किया जिक्र ईरानी संसद अध्यक्ष ने मौजूदा हालात को व्यापक संघर्ष बताते हुए चार प्रमुख मोर्चों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि सैन्य, कूटनीतिक, जनसहभागिता और जनसेवा के क्षेत्र में समन्वित प्रयासों से ही देश अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है. गालिबफ ने दावा किया कि मिसाइल कार्यक्रम समेत ईरान की सैन्य उपलब्धियां जनता के समर्थन और सहयोग का परिणाम हैं. उन्होंने कहा कि अब इन उपलब्धियों को राजनीतिक और कूटनीतिक सफलता में बदलने की जिम्मेदारी नीति निर्माताओं की है. समझौते पर रखा स्पष्ट रुख विदेशी शक्तियों के साथ संभावित समझौतों पर गालिबफ ने कहा कि ईरान केवल उन्हीं प्रस्तावों को स्वीकार करेगा, जिनसे देश के अधिकार और जनता के हित सुरक्षित रहें. उन्होंने कहा कि केवल आश्वासनों या बयानों के आधार पर कोई फैसला नहीं लिया जाएगा. ईरान ठोस और व्यावहारिक परिणामों को प्राथमिकता देता है और ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जिससे राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचे. संसद के नए सत्र में दिया संबोधन गालिबफ ने ये टिप्पणियां ईरान की 12वीं संसद के तीसरे वर्ष के पहले सत्र के दौरान कीं. यह बैठक वर्चुअल माध्यम से आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों ने भाग लिया. उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों तथा रणनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद कायम हैं.
अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए इराक के उप तेल मंत्री अली मारिज अल-बहादली और ईरान समर्थक मिलिशिया नेताओं पर नए प्रतिबंध (सैंक्शन) लगा दिए हैं. अमेरिकी वित्त मंत्रालय का आरोप है कि ये लोग अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन कर ईरान को तेल बेचने और अवैध नेटवर्क चलाने में मदद कर रहे थे. अमेरिकी ट्रेजरी सचिव Scott Bessent ने कहा कि ईरानी शासन इराक के संसाधनों का इस्तेमाल अपने हितों और आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए कर रहा है. हालांकि, इस पूरे मामले पर अब तक न तो इराक और न ही ईरान की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है. किन लोगों पर लगे प्रतिबंध? प्रतिबंधों की सूची में इराक के उप तेल मंत्री अली मारिज अल-बहादली सबसे बड़ा नाम हैं. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, उन्होंने इराकी तेल प्रशासन में लंबे समय तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और कथित तौर पर ईरानी तेल नेटवर्क से जुड़े रहे. इसके अलावा अमेरिका ने ईरान समर्थक संगठनों से जुड़े कई अन्य लोगों पर भी कार्रवाई की है, जिनमें: मुस्तफा हाशिम लाजिम अल-बेहादिली अहमद खुदेर मकसूस मोहम्मद ईसा काज़िम अल-शुवैली शामिल हैं. अमेरिका का आरोप है कि ये लोग ईरान समर्थित मिलिशिया नेटवर्क और हथियार खरीद गतिविधियों में शामिल थे. ईरान पर क्या है आरोप? अमेरिका का दावा है कि ईरान इराक के जरिए तेल तस्करी का नेटवर्क चला रहा था. आरोप है कि ईरानी तेल को इराकी तेल बताकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा जाता था, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों से बचा जा सके. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान इस नेटवर्क से हर साल अरबों डॉलर की कमाई करता है. अमेरिकी एजेंसियों का मानना है कि इसी पैसे का इस्तेमाल ईरान अपने क्षेत्रीय प्रभाव और सहयोगी मिलिशिया संगठनों को मजबूत करने में करता है. क्यों अहम है यह कार्रवाई? यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब United States और Iran के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है. खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य और तेल व्यापार को लेकर दोनों देशों के रिश्ते बेहद संवेदनशील बने हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पहले ही ईरान के खिलाफ “मैक्सिमम प्रेशर” नीति अपना चुके हैं. ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर किए बिना उसके परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों पर रोक लगाना मुश्किल होगा. इराक के लिए बढ़ सकती है मुश्किल विशेषज्ञों का कहना है कि इस कार्रवाई से इराक पर भी दबाव बढ़ सकता है. एक तरफ इराक के ईरान के साथ करीबी संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर उसे अमेरिका से सैन्य और आर्थिक सहयोग भी मिलता है. ऐसे में बगदाद सरकार के सामने संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है.
अमेरिका ने ईरान के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को समर्थन देने के आरोप में चीन और हांगकांग की कई कंपनियों समेत 10 संस्थाओं और व्यक्तियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की इस कार्रवाई को ईरान के सैन्य नेटवर्क पर बढ़ते दबाव के रूप में देखा जा रहा है. यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है और अमेरिका-ईरान संबंधों में किसी समाधान के संकेत फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं. दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संभावित चीन दौरे से पहले इस कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है. ड्रोन और मिसाइल निर्माण में मदद का आरोप अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अनुसार, प्रतिबंधित कंपनियों और व्यक्तियों पर आरोप है कि वे ईरान को शहेद ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल बनाने के लिए जरूरी इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मशीनरी और कच्चा माल उपलब्ध करा रहे थे. अमेरिका का कहना है कि यह नेटवर्क ईरान की सैन्य क्षमता को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा था. ट्रेजरी विभाग ने साफ किया कि वह भविष्य में भी ईरान के सैन्य और रक्षा ढांचे को कमजोर करने के लिए आर्थिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल जारी रखेगा. चीन और हांगकांग की कंपनियां निशाने पर प्रतिबंधों की सूची में चीन की Yushita Shanghai International Trade Company का नाम प्रमुख रूप से शामिल है. अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि यह कंपनी ईरान के हथियार कार्यक्रम के लिए सामग्री जुटाने में मदद कर रही थी. इसके अलावा दुबई स्थित Elite Energy FZCO पर भी कार्रवाई की गई है. आरोप है कि इस कंपनी ने हांगकांग की एक फर्म को करोड़ों डॉलर ट्रांसफर किए, जिनका इस्तेमाल ईरानी नेटवर्क के लिए किया गया. हांगकांग की HK Hesin Industry और बेलारूस की Armory Alliance पर भी ईरान के लिए बिचौलिये की भूमिका निभाने का आरोप लगाया गया है. Mustad Ltd पर गंभीर आरोप अमेरिकी अधिकारियों ने हांगकांग की Mustad Ltd पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं. ट्रेजरी विभाग के मुताबिक, कंपनी ने ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के लिए हथियारों और रक्षा उपकरणों की खरीद में मदद की. अमेरिका ने कहा कि ऐसे नेटवर्क वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा हैं और इनके खिलाफ लगातार कार्रवाई जारी रहेगी. विदेशी बैंकों और रिफाइनरियों पर भी नजर ट्रेजरी विभाग ने संकेत दिया है कि भविष्य में उन विदेशी बैंकों, एयरलाइंस और कंपनियों पर भी कार्रवाई की जा सकती है जो ईरान के प्रतिबंधित व्यापार को सहयोग दे रहे हैं. इसमें चीन की तथाकथित “टीपॉट” ऑयल रिफाइनरियां भी शामिल हैं, जिन पर ईरानी तेल खरीदने के आरोप लगते रहे हैं. अमेरिका का कहना है कि उसका उद्देश्य ईरान को दोबारा सैन्य ताकत बढ़ाने से रोकना और उसके वैश्विक सप्लाई नेटवर्क को कमजोर करना है.
अमेरिकी नाकेबंदी से ईरान की मुश्किलें बढ़ीं अमेरिका और इजरायल के साथ जारी तनाव के बीच ईरान गंभीर तेल संकट की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरानी तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। ऐसे में ईरान के पास तेल भंडारण की क्षमता तेजी से खत्म होती जा रही है। केवल 12 से 22 दिन का स्टोरेज बचा रिसर्च फर्म Kpler की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के पास अब केवल 12 से 22 दिनों का ही अतिरिक्त तेल भंडारण बचा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो ईरान को मजबूरन अपने तेल उत्पादन में भारी कटौती करनी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्टोरेज पूरी तरह भरने से पहले ही उत्पादन कम करना जरूरी होगा, ताकि तकनीकी और सुरक्षा संबंधी समस्याओं से बचा जा सके। निर्यात में भारी गिरावट अमेरिकी प्रतिबंधों और नौसैनिक घेराबंदी के बाद ईरान के तेल निर्यात में जबरदस्त गिरावट आई है। अप्रैल की शुरुआत में जहां ईरान प्रतिदिन करीब 21 लाख बैरल तेल निर्यात कर रहा था, वहीं 14 अप्रैल के बाद यह आंकड़ा घटकर लगभग 5.67 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह गिरावट ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल सकती है। उत्पादन आधे से भी कम हो सकता है रिपोर्ट के अनुसार, यदि नाकेबंदी जारी रहती है, तो मई के मध्य तक ईरान का कच्चे तेल का उत्पादन घटकर 12 से 13 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। यह मौजूदा स्तर से आधे से भी कम होगा। पेट्रोल संकट की चेतावनी अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने दावा किया है कि ईरान में जल्द ही पेट्रोल की कमी देखने को मिल सकती है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी के कारण ईरान का तेल उद्योग धीरे-धीरे ठप होने की ओर बढ़ रहा है। चीन को रेल मार्ग से तेल भेजने की कोशिश समुद्री रास्ते बाधित होने के बाद ईरान अब चीन को रेल मार्ग से तेल भेजने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, यह तरीका काफी महंगा और धीमा है, इसलिए इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा रहा। वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है असर यदि ईरान का उत्पादन और निर्यात लंबे समय तक बाधित रहता है, तो वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति का दबाव बढ़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिसका असर भारत समेत कई देशों पर पड़ सकता है।
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीदने पर दी गई अस्थायी छूट को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद भारत जैसे बड़े आयातकों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। US वित्त मंत्री का साफ ऐलान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा: रूस और ईरान के तेल के लिए दिया गया जनरल लाइसेंस रिन्यू नहीं होगा 11 मार्च से पहले जहाजों पर लदा तेल ही बेचने की अनुमति थी वह पुराना स्टॉक अब खत्म हो चुका है उनका साफ संदेश था—“अब और नहीं।” 30 दिन की राहत भी खत्म अमेरिका ने पहले वैश्विक बाजार को स्थिर रखने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दी थी। भारतीय रिफाइनर को पहले से लदे तेल खरीदने की अनुमति सप्लाई चेन को बनाए रखने की कोशिश तेल कीमतों को काबू में रखने का प्रयास अब स्थिति यह है: रूसी तेल पर छूट 11 अप्रैल को खत्म ईरानी तेल पर छूट 19 अप्रैल को समाप्त भारत पर क्या होगा असर? भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहा था। इस फैसले के बाद: सस्ते तेल की उपलब्धता घट सकती है आयात लागत बढ़ने की आशंका नए सप्लायर की तलाश तेज करनी होगी हालांकि, सरकार का दावा है कि देश के पास पर्याप्त स्टॉक और विकल्प मौजूद हैं। क्यों लिया गया फैसला? डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन अब फिर से “मैक्सिमम प्रेशर” रणनीति पर लौट आया है। ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना रूस की तेल आय को सीमित करना वैश्विक रणनीतिक संतुलन बनाना तेल बाजार में बढ़ेगी हलचल मिडिल ईस्ट तनाव के चलते पहले ही कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखा जा चुका है। फरवरी में कीमतें 100 डॉलर/बैरल के पार सप्लाई घटने से फिर बढ़ोतरी संभव वैश्विक बाजार में अस्थिरता आगे क्या? अमेरिका के इस फैसले से वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति दोनों पर असर पड़ना तय है। अब नजर इस पर होगी कि: भारत अपनी ऊर्जा रणनीति कैसे बदलता है तेल कीमतें किस दिशा में जाती हैं और क्या भविष्य में कोई नई कूटनीतिक राह निकलती है यह फैसला भारत के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीदने पर दी गई अस्थायी छूट को आगे न बढ़ाने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद दोनों देशों के तेल पर पाबंदियां फिर से कड़ी हो जाएंगी, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल और भारत जैसे बड़े आयातकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जनरल लाइसेंस खत्म, सख्त हुए नियम अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया है कि 11 मार्च से पहले समुद्र में मौजूद तेल को निकालने के लिए दिया गया जनरल लाइसेंस अब समाप्त हो चुका है। इसका मतलब है कि अब: रूस और ईरान के तेल पर सख्त प्रतिबंध लागू होंगे इन देशों से तेल खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी सैंक्शंस लग सकते हैं बैंकों और कंपनियों पर भी कार्रवाई का खतरा बढ़ेगा ट्रंप प्रशासन की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने एक बार फिर ईरान के खिलाफ “मैक्सिमम प्रेशर” रणनीति अपनाई है। ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश तेल तस्करी नेटवर्क पर कार्रवाई कई कंपनियों, जहाजों और व्यक्तियों पर नए प्रतिबंध अमेरिका का उद्देश्य ईरान की आय के प्रमुख स्रोतों को सीमित करना है। भारत पर संभावित असर भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। इस फैसले का असर: सस्ते तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है वैकल्पिक सप्लायर की तलाश करनी पड़ सकती है हालांकि सरकार का कहना है कि देश के पास पर्याप्त स्टॉक है और सप्लाई के कई विकल्प मौजूद हैं। ईरान पर बढ़ी आर्थिक मार रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी एजेंसी OFAC ने ईरान के तेल तस्करी नेटवर्क पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। इसमें कई कंपनियां, जहाज और व्यक्तियों को निशाना बनाया गया है। अमेरिका का मकसद है कि ईरान के अवैध तेल कारोबार को पूरी तरह खत्म किया जाए। ओमान में वार्ता पर टिकी नजर इस बीच ओमान में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत होने वाली है। समझौते की उम्मीद में तेल कीमतों में हल्की नरमी असफल वार्ता की स्थिति में कीमतों में तेजी संभव व्हाइट हाउस ने संकेत दिए हैं कि वह विवाद का समाधान चाहता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर आर्थिक दबाव और बढ़ाया जाएगा। आगे क्या? अमेरिका के इस फैसले से वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ना तय माना जा रहा है। अगर प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो: तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है भारत जैसे देशों की आयात लागत बढ़ सकती है भू-राजनीतिक तनाव और गहरा सकता है दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान वार्ता और उसके नतीजों पर टिकी है, जो आगे के हालात तय करेंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।