Vladimir Putin ने बुधवार को China की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले Donald Trump चीन दौरे पर गए थे। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा बीजिंग में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इनमें प्रमुख रूप से: ईरान संकट यूक्रेन युद्ध वैश्विक व्यापार पश्चिम एशिया की स्थिति ऊर्जा सुरक्षा रणनीतिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने तथा बदलते वैश्विक हालात में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में हुआ स्वागत बीजिंग स्थित Great Hall of the People में शी जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच विस्तृत वार्ता हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन मंगलवार रात बीजिंग पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ने किया। पुतिन बोले- रिश्ते अभूतपूर्व स्तर पर चीन यात्रा से पहले जारी अपने वीडियो संदेश में पुतिन ने कहा कि रूस और चीन के संबंध “अभूतपूर्व स्तर” तक पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे उच्चस्तरीय संपर्क रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बना रहे हैं और सहयोग की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। चीन ने क्या कहा? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने कहा कि शी जिनपिंग और पुतिन के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुतिन की 25वीं चीन यात्रा है, जो दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाती है। ट्रंप की यात्रा के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। 14 और 15 मई को ट्रंप ने चीन का दौरा किया था, जहां उनकी और शी जिनपिंग की बातचीत में भी ईरान, यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद पुतिन का बीजिंग पहुंचना चीन-रूस संबंधों की रणनीतिक गहराई को दिखाता है। ईरान और होर्मुज संकट पर भी फोकस पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर Iran द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े कदमों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ गई है। रूस, चीन और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से आयात करता रहा है। वैश्विक राजनीति में बढ़ती रूस-चीन साझेदारी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।
Pakistan की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री Imran Khan की सत्ता से विदाई और सेना प्रमुख Asim Munir के तेजी से उभार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जिसमें United States की भूमिका भी चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन की पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी और घटनाएं धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ती गईं। ‘साइफर केस’ से शुरू हुआ विवाद अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म Drop Site News की रिपोर्ट में दावा किया गया कि पूरा विवाद एक गोपनीय राजनयिक संदेश यानी “साइफर” से शुरू हुआ। मार्च 2022 में पाकिस्तान के तत्कालीन अमेरिका स्थित राजदूत Asad Majeed Khan ने इस्लामाबाद को एक संदेश भेजा था। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें अमेरिकी अधिकारी Donald Lu का कथित बयान शामिल था कि यदि इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सफल हो जाता है, तो “वॉशिंगटन सब कुछ माफ कर देगा।” इमरान खान ने इसे विदेशी साजिश का प्रमाण बताया था और कई रैलियों में इसे “लंदन प्लान” कहा। अमेरिका से क्यों बिगड़े इमरान के रिश्ते? प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान खान ने धीरे-धीरे अमेरिका से दूरी बनाने वाली विदेश नीति अपनाई। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद उन्होंने अमेरिका को सैन्य ठिकाने देने से साफ इनकार कर दिया था। अमेरिकी मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था — “Absolutely Not।” सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब 24 फरवरी 2022 को, रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के दिन, इमरान खान ने Vladimir Putin से मॉस्को में मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मुलाकात से वॉशिंगटन बेहद नाराज हुआ। सेना और इमरान खान के बीच बढ़ा टकराव रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान की सेना को लगने लगा था कि इमरान खान की नीतियां देश को अमेरिका से दूर कर सकती हैं, जिससे रणनीतिक नुकसान हो सकता है। यहीं से सेना और इमरान खान के बीच तनाव बढ़ने लगा। आसिम मुनीर का उभार कैसे हुआ? रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में इमरान खान के ईरान दौरे के दौरान आसिम मुनीर, जो उस समय ISI प्रमुख थे, ने ईरानी अधिकारियों के साथ बेहद सख्त रुख अपनाया था। रिपोर्ट में इसे अमेरिकी रणनीतिक सोच के करीब माना गया, क्योंकि उस समय अमेरिका पाकिस्तान-ईरान संबंधों को मजबूत होते नहीं देखना चाहता था। कुछ समय बाद इमरान खान ने खुद आसिम मुनीर को ISI प्रमुख पद से हटा दिया था। CIA प्रमुख से मिलने से इनकार रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इमरान खान ने 2021 में William J. Burns से मिलने से इनकार कर दिया था। वह सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति Joe Biden से बात करना चाहते थे। हालांकि बाइडेन प्रशासन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से संपर्क नहीं किया। अविश्वास प्रस्ताव और सत्ता से बाहर होना अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इमरान खान की सरकार गिर गई। तकनीकी रूप से यह संवैधानिक प्रक्रिया थी, लेकिन उनके समर्थकों ने इसे सेना और अमेरिका के बीच समझौते का परिणाम बताया। सरकार गिरने के बाद Pakistan Tehreek-e-Insaf (PTI) पर कार्रवाई शुरू हुई। इमरान खान और उनकी पत्नी Bushra Bibi को जेल भेज दिया गया। यूक्रेन युद्ध के बाद बदला पाकिस्तान का रुख रिपोर्ट में दावा किया गया कि इमरान खान के हटने के बाद पाकिस्तान धीरे-धीरे अमेरिका के करीब आने लगा। इस दौरान पाकिस्तान ने अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन को हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराए। साथ ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को International Monetary Fund से राहत पैकेज भी मिला। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद और मजबूत हुए मुनीर आसिम मुनीर नवंबर 2022 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने। बाद में उनका कार्यकाल 2027 तक बढ़ा दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 में भारत के कथित “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद पाकिस्तान में उनकी स्थिति और मजबूत हो गई। इसके बाद उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया और नए बनाए गए चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) पद की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान की नई रणनीति? रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान अब Saudi Arabia के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है और आसिम मुनीर विभिन्न संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के दौरों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की संभावनाओं में भी चर्चा में है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पाकिस्तान की राजनीति, सेना और वैश्विक शक्तियों के संबंधों पर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
BRICS Summit 2026 को लेकर बड़ी कूटनीतिक हलचल शुरू हो गई है। सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में Vladimir Putin के साथ-साथ Xi Jinping के भी शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, Russia और China दोनों ने भारत को संकेत दिए हैं कि उनके शीर्ष नेता 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में भाग ले सकते हैं। इस बार India BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। 2019 के बाद पहली भारत यात्रा हो सकती है यदि शी जिनपिंग का दौरा तय होता है, तो यह अक्टूबर 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। आखिरी बार वह तमिलनाडु के मामल्लापुरम में भारत-चीन अनौपचारिक शिखर वार्ता में शामिल होने आए थे। 2020 के बाद बिगड़े थे रिश्ते भारत और चीन के संबंध अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुए गलवान सैन्य गतिरोध के बाद काफी तनावपूर्ण हो गए थे। हालांकि अक्टूबर 2024 में Kazan में आयोजित BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। उसी दौरान दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में सैनिकों की वापसी को लेकर सहमति जताई थी। पिछले डेढ़ साल में रिश्तों में आई नरमी पिछले कुछ समय में भारत और चीन के संबंधों में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें दोबारा शुरू हुईं वीजा सेवाएं बहाल की गईं कुछ चीनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी गई कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हुई हालांकि सीमा पर अब भी बड़ी संख्या में सैनिक तैनात हैं और तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विदेश मंत्रियों की बैठक में तय हुआ एजेंडा हाल ही में नई दिल्ली में BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, जिसमें शिखर सम्मेलन के एजेंडे पर चर्चा की गई। Sergey Lavrov इस बैठक में शामिल हुए थे, जबकि Wang Yi बीजिंग में व्यस्तता के कारण नहीं आ सके। उनकी जगह भारत में चीन के राजदूत Xu Feihong ने भाग लिया। सूत्रों के मुताबिक, अगर कोई अप्रत्याशित परिस्थिति नहीं बनी तो BRICS देशों की ओर से शीर्ष स्तर पर भागीदारी की जानकारी जल्द आधिकारिक रूप से दी जा सकती है। पुतिन की यात्रा लगभग तय रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूस ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के BRICS सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि कर दी है। यह एक साल के भीतर उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में वह भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने भारत आए थे। पश्चिम एशिया युद्ध पर साझा रुख बनाने की कोशिश BRICS संगठन की स्थापना 2006 में हुई थी। शुरुआत में इसमें Brazil, Russia, India, China और South Africa शामिल थे। बाद में Egypt, Ethiopia, Iran, United Arab Emirates और Indonesia भी इस समूह में शामिल हुए। BRICS अब दुनिया की लगभग 49 प्रतिशत आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया युद्ध पर नजर भारत चाहता है कि BRICS देश पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और Iran संकट पर साझा कूटनीतिक रुख अपनाएं। हालांकि इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। विशेष रूप से ईरान और United Arab Emirates के अलग-अलग रुख के कारण साझा बयान तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। पिछले सप्ताह हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में भी इस मुद्दे पर पूरी सहमति नहीं बन सकी थी।
रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin सितंबर में भारत दौरे पर आने वाले हैं। वह 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। दक्षिण अफ्रीका में रूसी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी पुष्टि की है। यह एक साल के भीतर पुतिन की दूसरी भारत यात्रा होगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए उन्होंने भारत का दौरा किया था। अब वह फिर से भारत में आयोजित होने वाले BRICS Summit में भाग लेने आ रहे हैं। भारत कर रहा है BRICS सम्मेलन की मेजबानी इस वर्ष BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी India कर रहा है। भारत चौथी बार इस संगठन की अध्यक्षता संभाल रहा है। इससे पहले भारत 2012, 2016 और 2021 में BRICS की मेजबानी कर चुका है। नई दिल्ली में होने वाला यह सम्मेलन वैश्विक राजनीति, व्यापार, आर्थिक सहयोग और विकासशील देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। BRICS देशों के बीच तेजी से बढ़ा व्यापार हाल ही में गुजरात के गांधीनगर में आयोजित BRICS व्यापार एवं आर्थिक मामलों की बैठक में वाणिज्य सचिव Rajesh Agrawal ने बताया कि BRICS देशों के बीच वस्तु व्यापार में पिछले 21 वर्षों में 13 गुना वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि साल 2003 में BRICS देशों के बीच व्यापार 84 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2024 में 1.17 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि, यह अभी भी वैश्विक व्यापार का लगभग 5 प्रतिशत ही है। BRICS में शामिल हुए कई नए देश BRICS संगठन की शुरुआत Brazil, Russia, India, China और South Africa के साथ हुई थी। इसके बाद 2024 में संगठन का विस्तार करते हुए Egypt, Ethiopia, Iran और United Arab Emirates को सदस्य बनाया गया। वहीं, 2025 में Indonesia भी BRICS का सदस्य बन गया। वैश्विक अर्थव्यवस्था में BRICS की बड़ी भूमिका BRICS अब दुनिया की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह बन चुका है। यह समूह वैश्विक आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत, वैश्विक GDP का करीब 40 प्रतिशत और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है। नई दिल्ली में होने वाला BRICS Summit वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को मजबूत करने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की हाई-प्रोफाइल चीन यात्रा खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin का बीजिंग दौरा वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या China खुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में नए वैश्विक शक्ति केंद्र के तौर पर स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक पुतिन दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर मंगलवार को चीन पहुंचेंगे। यह दौरा चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के निमंत्रण पर हो रहा है। क्रेमलिन ने भी इस यात्रा की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों नेता रणनीतिक साझेदारी, ऊर्जा सहयोग, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक चर्चा करेंगे। ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद क्यों अहम है पुतिन का दौरा? ट्रंप ने 13 से 15 मई तक चीन का दौरा किया था। करीब एक दशक में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पहली चीन यात्रा थी। इस दौरान ट्रंप के साथ अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों के कई सीईओ भी मौजूद थे। हालांकि यात्रा के बाद कोई बड़ा व्यापारिक समझौता सामने नहीं आया। इसी के कुछ दिनों बाद पुतिन का चीन जाना कई रणनीतिक संकेत दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग अब खुद को ऐसी शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है जो अमेरिका और रूस दोनों के साथ अलग-अलग स्तर पर संवाद बनाए रख सके। चीन-रूस साझेदारी लगातार मजबूत रूस और चीन के संबंध पिछले कुछ वर्षों में तेजी से गहरे हुए हैं। दोनों देशों ने फरवरी 2022 में “असीमित रणनीतिक साझेदारी” (No Limits Partnership) की घोषणा की थी। यह समझौता रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के ठीक पहले हुआ था। युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, लेकिन चीन ने न तो रूस की खुलकर आलोचना की और न ही पश्चिमी प्रतिबंधों का समर्थन किया। इसके उलट दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा और रक्षा सहयोग बढ़ता गया। रॉयटर्स के अनुसार, पुतिन और शी जिनपिंग पिछले कुछ वर्षों में 40 से अधिक बार मुलाकात कर चुके हैं। पिछले साल दोनों देशों ने “पावर ऑफ साइबेरिया 2” गैस पाइपलाइन परियोजना को आगे बढ़ाने पर भी समझौता किया था, जिससे रूस की ऊर्जा आपूर्ति चीन की ओर और बढ़ेगी। क्या बदल रहा है वैश्विक शक्ति संतुलन? विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया धीरे-धीरे “मल्टीपोलर वर्ल्ड” यानी बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। अब केवल अमेरिका ही वैश्विक राजनीति का केंद्र नहीं रह गया है। चीन, रूस, भारत और खाड़ी देशों जैसी शक्तियां भी अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को प्रभावित कर रही हैं। चीन की रणनीति केवल सैन्य या आर्थिक ताकत तक सीमित नहीं है। बीजिंग: BRICS और SCO जैसे मंचों के जरिए प्रभाव बढ़ा रहा है डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बड़े निवेश कर रहा है AI, चिप्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना चाहता है चीन के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हालांकि चीन की बढ़ती ताकत से अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता बढ़ी है, लेकिन बीजिंग के सामने कई मुश्किलें भी हैं। ताइवान मुद्दा, पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी टकराव, आर्थिक सुस्ती और सप्लाई चेन शिफ्ट जैसी चुनौतियां चीन के लिए बड़ी परीक्षा बनी हुई हैं। इसके अलावा रूस के साथ अत्यधिक नजदीकी भी चीन के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, क्योंकि इससे पश्चिमी देशों के साथ उसका तनाव और बढ़ सकता है। नया वर्ल्ड ऑर्डर या नई शक्ति प्रतिस्पर्धा? पुतिन की चीन यात्रा और ट्रंप के हालिया दौरे ने यह साफ कर दिया है कि दुनिया अब तेजी से बदलते भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर चुकी है। चीन खुद को केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि नए वैश्विक संतुलन की धुरी के रूप में स्थापित करना चाहता है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि दुनिया पूरी तरह चीन केंद्रित हो गई है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति अधिक प्रतिस्पर्धी, बहुध्रुवीय और रणनीतिक गठबंधनों पर आधारित होने वाली है।
भारत की अध्यक्षता में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत नई दिल्ली में हो चुकी है। सम्मेलन के तहत ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों और प्रतिनिधिमंडलों की उच्चस्तरीय बैठक जारी है। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। बैठक की अध्यक्षता विदेश मंत्री S. Jaishankar कर रहे हैं। इस दौरान ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों और प्रतिनिधिमंडल प्रमुखों ने प्रधानमंत्री Narendra Modi से संयुक्त रूप से मुलाकात की। पीएम मोदी और लाव्रोव की विशेष मुलाकात सम्मेलन के दौरान रूस के विदेश मंत्री Sergey Lavrov को प्रधानमंत्री मोदी से अलग से विशेष मुलाकात का अवसर मिला। जानकारी के मुताबिक, लावरोव एकमात्र ऐसे मंत्री थे जिनसे पीएम मोदी ने निजी तौर पर बातचीत की। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin के लिए अपना अभिवादन भी भेजा। ईरानी विदेश मंत्री से मिले NSA डोभाल वहीं दूसरी ओर ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval से अलग से मुलाकात की। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात, क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक प्रयासों पर चर्चा हुई। भारत ने एक बार फिर संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान निकालने पर जोर दिया। ‘ग्लोबल साउथ की आवाज बन रहा BRICS’ बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि BRICS उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग को बढ़ाने और ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को आवाज देने का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। उन्होंने कहा, “भारत की अध्यक्षता में हम बहुपक्षवाद को मजबूत करने, सतत विकास को बढ़ावा देने, आर्थिक लचीलेपन को बढ़ाने और अधिक समावेशी विश्व व्यवस्था बनाने के लिए मिलकर काम करेंगे।” वैश्विक तनाव के बीच अहम बैठक नई दिल्ली में हो रही यह बैठक ऐसे समय में आयोजित की जा रही है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में BRICS मंच पर ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक स्थिरता, व्यापार और कूटनीतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है।
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच तीन दिन के युद्धविराम का ऐलान किया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनकी पहल और मध्यस्थता के बाद दोनों देशों ने अस्थायी सीजफायर पर सहमति जताई है. ट्रंप के मुताबिक, यह युद्धविराम 9, 10 और 11 मई तक लागू रहेगा. इस दौरान दोनों देशों के बीच सभी सैन्य गतिविधियां रोकी जाएंगी और युद्धबंदियों की अदला-बदली भी की जाएगी. ट्रंप ने किया सीजफायर का ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट कर कहा, “मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में तीन दिन का सीजफायर होगा.” उन्होंने कहा कि रूस में यह अवधि “विक्ट्री डे” समारोह के कारण महत्वपूर्ण है, जबकि यूक्रेन भी द्वितीय विश्व युद्ध का अहम हिस्सा रहा है. ट्रंप ने दावा किया कि युद्धविराम के लिए अनुरोध उन्होंने सीधे किया था और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तथा यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की दोनों ने इस पर सहमति जताई. 1,000-1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली सीजफायर के तहत दोनों देशों के बीच 1,000-1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली भी होगी. ट्रंप ने कहा कि इस दौरान सभी “काइनेटिक एक्टिविटी” यानी सैन्य हमलों और लड़ाई को पूरी तरह रोका जाएगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता लंबे और विनाशकारी युद्ध को समाप्त करने की दिशा में पहला बड़ा कदम साबित हो सकता है. जेलेंस्की ने भी की पुष्टि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने भी इस अस्थायी युद्धविराम की पुष्टि की है. उन्होंने टेलीग्राम पर लिखा कि अमेरिकी मध्यस्थता में चल रही बातचीत के तहत रूस ने युद्धबंदियों की अदला-बदली पर सहमति दी है. जेलेंस्की ने कहा, “हमें 1,000 के बदले 1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली के लिए रूस की मंजूरी मिल गई है.” उन्होंने इसे शांति वार्ता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया. युद्ध खत्म करने की कोशिशें तेज ट्रंप ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह सबसे बड़ा सैन्य संघर्ष है और इसे खत्म करने के लिए लगातार बातचीत चल रही है. उन्होंने लिखा, “हम हर दिन युद्ध खत्म होने के और करीब पहुंच रहे हैं.” हालांकि यह सीजफायर फिलहाल केवल तीन दिनों के लिए है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे संभावित व्यापक शांति समझौते की शुरुआत के रूप में देख रहा है.
रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin को लेकर एक बड़ी रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि यूक्रेन युद्ध, ड्रोन हमलों और तख्तापलट की आशंकाओं के बीच उनकी सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा कड़ी कर दी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, हालात ऐसे बन चुके हैं कि पुतिन अब लंबे समय तक जमीन के नीचे बने हाई-सिक्योरिटी बंकरों में रहकर काम कर रहे हैं. फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में बड़ा दावा ब्रिटिश अखबार Financial Times की रिपोर्ट के अनुसार, रूस की फेडरल प्रोटेक्टिव सर्विस (FSO) ने पिछले कुछ महीनों में पुतिन की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया है. यूरोपीय खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि पुतिन अब पहले की तुलना में ज्यादा अलग-थलग हो गए हैं और सार्वजनिक गतिविधियों में भी उनकी भागीदारी कम हो गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के बाद से ही पुतिन का दायरा सीमित होने लगा था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद सुरक्षा चिंताएं कई गुना बढ़ गईं. ड्रोन हमलों ने बढ़ाई चिंता रिपोर्ट में यूक्रेन के कथित ड्रोन ऑपरेशन “स्पाइडरवेब” का भी जिक्र किया गया है. दावा है कि पिछले साल यूक्रेनी ड्रोन ने आर्कटिक सर्कल के पास रूसी एयरफील्ड्स को निशाना बनाया था, जिससे क्रेमलिन की सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड में आ गईं. सूत्रों के मुताबिक, मार्च तक रूस को तख्तापलट और ड्रोन हमलों का खतरा और ज्यादा गंभीर लगने लगा था. इसके बाद पुतिन की यात्राएं सीमित कर दी गईं और उनसे मिलने वालों की जांच बेहद सख्त कर दी गई. बंकर में बिताते हैं लंबा समय? रिपोर्ट के अनुसार, पुतिन दक्षिणी रूस के क्रास्नोदार क्षेत्र में बने एक सुरक्षित बंकर में कई-कई हफ्तों तक रहते हैं और वहीं से सरकारी कामकाज और युद्ध से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी करते हैं. यह भी दावा किया गया है कि रूसी सरकारी मीडिया कई बार पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो प्रसारित कर सामान्य माहौल दिखाने की कोशिश करता है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सब कुछ सामान्य है. करीबी लोगों पर भी कड़ी निगरानी रिपोर्ट में कहा गया है कि पुतिन के बेहद करीबी लोगों के लिए भी सख्त सुरक्षा नियम लागू किए गए हैं. उनके रसोइयों, फोटोग्राफरों और बॉडीगार्ड्स तक को सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है. इसके अलावा: इंटरनेट वाले मोबाइल फोन रखने पर रोक है उनके घरों में CCTV निगरानी बढ़ाई गई है व्यक्तिगत संपर्क और आवाजाही सीमित कर दी गई है रूस की ओर से नहीं आई आधिकारिक पुष्टि हालांकि, इन दावों पर रूस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. क्रेमलिन ने पहले भी पुतिन की सेहत और सुरक्षा से जुड़ी कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों को खारिज किया है. लेकिन यूक्रेन युद्ध लंबा खिंचने, रूस के भीतर बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों और लगातार ड्रोन हमलों के बीच यह साफ है कि मॉस्को अब किसी भी तरह के खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहता.
Russia ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर Iran का खुलकर समर्थन किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस ने पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, पर तीखा हमला बोला और ईरान के होर्मुज जलडमरूमध्य में कदमों को जायज़ ठहराया। रूस ने क्या कहा? संयुक्त राष्ट्र में रूस के स्थायी प्रतिनिधि Vasily Nebenzya ने कहा कि युद्ध की स्थिति में किसी भी तटीय देश को अपनी सुरक्षा के लिए समुद्री क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही सीमित करने का अधिकार है। उनका कहना था कि ईरान पर पूरा दोष मढ़ना गलत है, जबकि वह खुद बाहरी दबाव और हमलों का सामना कर रहा है। पश्चिमी देशों पर 'समुद्री डाकू' वाला हमला नेबेंज्या ने पश्चिमी देशों की तुलना समुद्री डाकुओं से करते हुए कहा कि वे अपने "गैरकानूनी" कदमों को एकतरफा प्रतिबंधों और दबाव की आड़ में छिपाते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोपीय देश खुलेआम समुद्र में लूटपाट जैसी कार्रवाइयों का समर्थन कर रहे हैं। पहले भी रूस-चीन ने किया था वीटो इस महीने की शुरुआत में China और रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया था, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना था। पुतिन ने भी जताया समर्थन इसी दिन रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात की और ईरान के प्रति अपना समर्थन दोहराया। क्यों अहम है होर्मुज? Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने ईरान को कड़ा संदेश दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ चेतावनी दी है कि अगर तेहरान ने जल्द समझौता नहीं किया, तो उसकी तेल आपूर्ति व्यवस्था गंभीर संकट में पड़ सकती है। “तीन दिन का समय, नहीं तो बड़ा नुकसान” फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में Donald Trump ने कहा कि ईरान के पास समझौते के लिए केवल तीन दिन हैं। उनका दावा है कि अगर ईरान तेल निर्यात जारी नहीं रख पाया, तो उसकी पाइपलाइनें तकनीकी और प्राकृतिक कारणों से खराब होकर फट सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एक बार नुकसान होने के बाद ईरान अपनी पाइपलाइन क्षमता को पूरी तरह बहाल नहीं कर पाएगा और उत्पादन करीब 50% तक सीमित हो सकता है। बातचीत के लिए अमेरिका की शर्त Donald Trump ने दोहराया कि अगर ईरान बातचीत करना चाहता है, तो उसे खुद पहल करनी होगी। उन्होंने कहा कि तेहरान सीधे वॉशिंगटन से संपर्क कर सकता है—“फोन मौजूद हैं और सुरक्षित लाइनें भी।” पाकिस्तान में बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बीच अब्बास अराघची एक बार फिर पाकिस्तान पहुंचे हैं। तीन दिनों में यह उनका दूसरा दौरा है, जहां उन्होंने आर्मी चीफ असीम मुनीर और अन्य अधिकारियों से मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को कुछ अहम मुद्दों पर लिखित संदेश भी भेजा है, जिससे संकेत मिलता है कि बैक-चैनल डिप्लोमेसी जारी है। रूस भी बना अहम खिलाड़ी कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए अब्बास अराघची अब रूस के दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति Vladimir Putin से होने वाली है। क्या बढ़ेगा टकराव या बनेगी डील? एक तरफ Donald Trump का सख्त अल्टीमेटम है, तो दूसरी ओर ईरान लगातार कूटनीतिक रास्ते तलाश रहा है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या दोनों देशों के बीच समझौता होगा या तनाव और गहराएगा।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका को एक नया शांति प्रस्ताव भेजा है, जिसने वैश्विक कूटनीति में हलचल मचा दी है। यह प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए वॉशिंगटन तक पहुंचाया गया है और इसमें दो चरणों में तनाव कम करने की रणनीति सामने रखी गई है। क्या है ईरान का नया प्रस्ताव? रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने सबसे पहले दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को खोलने की बात कही है। इसके बाद दूसरे चरण में परमाणु मुद्दे पर बातचीत करने का प्रस्ताव रखा गया है। ईरान का मानना है कि पहले समुद्री व्यापार सामान्य होना चाहिए और क्षेत्र में सैन्य तनाव कम होना जरूरी है, तभी परमाणु वार्ता सार्थक हो सकती है। ट्रंप का सख्त रुख दूसरी ओर Donald Trump ने साफ कर दिया है कि अगर तेहरान बातचीत करना चाहता है, तो उसे सीधे वॉशिंगटन से संपर्क करना होगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान को किसी भी हाल में परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 10 साल तक यूरेनियम संवर्धन बंद करे और अपने मौजूदा स्टॉक को देश से बाहर भेजे। पाकिस्तान की भूमिका और कूटनीतिक हलचल इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची हाल ही में इस्लामाबाद के कई दौरों पर रहे हैं, जहां उन्होंने पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत की। इसके साथ ही वे जल्द ही रूस के दौरे पर भी जाएंगे और राष्ट्रपति Vladimir Putin से मुलाकात करेंगे, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरान इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। क्या बन सकती है डील? कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि एक संभावित फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है, जिसमें न सिर्फ अमेरिका और ईरान, बल्कि खाड़ी देश भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि, परमाणु मुद्दे पर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। Strait of Hormuz से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है, ऐसे में इसका खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है। यही वजह है कि इस प्रस्ताव पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
वैश्विक राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ तब देखने को मिला जब Vladimir Putin द्वारा भेजा गया तेल टैंकर Cuba पहुंच गया-और हैरानी की बात यह रही कि United States ने इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और रूस के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है-क्या अमेरिका अपनी नीति बदल रहा है या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति है? क्यूबा क्यों झेल रहा है संकट? क्यूबा इस समय गंभीर ऊर्जा संकट से गुजर रहा है। लगातार बिजली कटौती, ईंधन की कमी और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पर असर ने हालात को बदतर बना दिया है। इस संकट की बड़ी वजह Nicolás Maduro से जुड़े घटनाक्रम और तेल आपूर्ति में आई बाधा मानी जा रही है, जिससे क्यूबा की निर्भरता और बढ़ गई। रूस ने क्यों भेजा तेल? रूस ने क्यूबा को तेल भेजकर साफ संदेश दिया है कि वह अपने सहयोगियों के साथ खड़ा है। क्रेमलिन के प्रवक्ता Dmitry Peskov ने कहा कि क्यूबा की मुश्किल परिस्थितियों को देखते हुए यह मदद “जिम्मेदारी” के तहत की गई है। इस कदम के जरिए रूस ने न केवल मानवीय सहायता दी, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक मौजूदगी भी दिखाई। ट्रंप ने टैंकर क्यों नहीं रोका? सबसे बड़ा सवाल यही है कि Donald Trump ने इस टैंकर को रोकने का आदेश क्यों नहीं दिया। इसके पीछे कई अहम वजहें मानी जा रही हैं: 1. मानवीय संकट क्यूबा में हालात बेहद खराब हैं-अस्पतालों तक में ईंधन की कमी है। ऐसे में टैंकर रोकना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का कारण बन सकता था। 2. टकराव से बचने की रणनीति अगर अमेरिका टैंकर को रोकता, तो यह सीधे रूस से टकराव का कारण बन सकता था-यहां तक कि नौसैनिक संघर्ष भी हो सकता था। 3. सीमित प्रभाव का आकलन ट्रंप ने खुद कहा कि इससे रूस को कोई बड़ा फायदा नहीं होगा। यानी अमेरिका इसे “लो-इम्पैक्ट” घटना मान रहा है। 4. वैश्विक तनाव पहले ही चरम पर ईरान, मध्य-पूर्व और अन्य क्षेत्रों में तनाव पहले से बढ़ा हुआ है। ऐसे में अमेरिका कोई नया मोर्चा खोलने से बचना चाहता है। क्या बदल रही है अमेरिका की नीति? विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की नीति में स्थायी बदलाव नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार लिया गया एक व्यावहारिक फैसला है। यह कदम दिखाता है कि जहां एक तरफ अमेरिका अपनी सख्त विदेश नीति जारी रखता है, वहीं दूसरी ओर मानवीय संकट और रणनीतिक संतुलन को भी ध्यान में रखता है। रूस को क्या मिला फायदा? क्यूबा में प्रभाव मजबूत हुआ वैश्विक स्तर पर “सहयोगी देश” की छवि बनी अमेरिका को बिना टकराव संदेश दिया
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।