रांची। झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में बदलाव की तैयारी चल रही है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, अब तक ASDD (Absent, Shifted, Dead, Duplicate) श्रेणी में आने वाले मतदाताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। मौजूदा रुझानों को देखते हुए अनुमान है कि अंतिम सूची से 25 से 30 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। संशोधित ड्राफ्ट मतदाता सूची 5 अगस्त को जारी की जाएगी। ASDD श्रेणी में तेजी से बढ़ रहे मतदाता मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के अनुसार, 22 जुलाई तक 4,15,364 मृत, 1,29,803 अनुपस्थित, 6,09,542 स्थायी रूप से स्थानांतरित और 1,61,926 पहले से निबंधित मतदाता ASDD श्रेणी में दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा 4,486 विदेशी नागरिक भी इस सूची में शामिल हैं। इन सभी को मिलाकर ASDD श्रेणी के मतदाताओं की संख्या 13 लाख से अधिक हो चुकी थी। 23 जुलाई तक आंकड़ा 14.18 लाख पहुंचा मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार ने बताया कि 23 जुलाई की सुबह तक ASDD श्रेणी में दर्ज मतदाताओं की संख्या बढ़कर 14.18 लाख हो गई है। उन्होंने कहा कि अंतिम स्थिति 5 अगस्त को ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने के बाद स्पष्ट होगी। ASDD श्रेणी में शामिल मतदाताओं के नाम प्रारंभिक ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं होंगे। 29 जुलाई तक चलेगा गणना प्रपत्र भरने का कार्य राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत गणना प्रपत्र भरने का काम अंतिम चरण में है। यह प्रक्रिया 29 जुलाई तक चलेगी। इसके बाद प्राप्त आंकड़ों का सत्यापन कर ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। पश्चिमी सिंहभूम में सबसे ज्यादा ASDD मतदाता चुनाव आयोग के अनुसार, पश्चिमी सिंहभूम जिले में अब तक सबसे अधिक ASDD श्रेणी के मतदाता मिले हैं। जिले में 50,775 मृत, 22,169 अनुपस्थित, 62,383 स्थानांतरित, 25,647 पहले से निबंधित और 310 विदेशी नागरिकों की पहचान की गई है। यह राज्य में सबसे अधिक संख्या है। रांची दूसरे स्थान पर ASDD श्रेणी के मामलों में रांची जिला दूसरे स्थान पर है। यहां अब तक 39,684 मृत, 11,085 अनुपस्थित, 32,120 स्थानांतरित, 13,425 पहले से निबंधित और 303 विदेशी नागरिकों की पहचान की गई है। चुनाव आयोग इन सभी मामलों का सत्यापन कर अंतिम सूची तैयार कर रहा है। 5 अगस्त को सामने आएगी वास्तविक तस्वीर चुनाव आयोग का कहना है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद दावे और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। अंतिम सत्यापन और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन किया जाएगा। ऐसे में 5 अगस्त को जारी होने वाला ड्राफ्ट रोल यह स्पष्ट करेगा कि कितने मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं।
रांची। झारखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के तहत मतदाता सूची को अपडेट करने का कार्य जारी है, लेकिन इस प्रक्रिया में कई मतदाताओं को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। रांची समेत कई क्षेत्रों से शिकायतें मिली हैं कि बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं को फॉर्म उपलब्ध कराने और उसे भरने की सही जानकारी देने में लापरवाही बरत रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि उन्हें या तो फॉर्म मिला ही नहीं, या केवल फॉर्म थमा दिया गया, लेकिन उसे भरने की प्रक्रिया नहीं समझाई गई। इस कारण बड़ी संख्या में मतदाता भ्रम की स्थिति में हैं। जानकारी के अभाव में बढ़ीं फॉर्म भरने की गलतियां बीएलओ से संपर्क नहीं हो पाने के कारण कई मतदाताओं ने अनुमान के आधार पर एन्यूमरेशन फॉर्म भर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में फॉर्म में त्रुटियां सामने आ रही हैं। कई लोग अपने नाम की जगह माता-पिता का विवरण दर्ज कर रहे हैं, जबकि कुछ ऐसे कॉलम भी भर रहे हैं जिन्हें उनकी स्थिति में खाली छोड़ना चाहिए था। बाद में इन गलतियों को सुधारने के लिए व्हाइटनर का इस्तेमाल करना पड़ रहा है या फिर ऑनलाइन डेटा एंट्री के दौरान बीएलओ को स्वयं सुधार करना पड़ रहा है। 150 से अधिक बीएलओ को नोटिस चुनाव प्रक्रिया में लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए रांची जिला प्रशासन ने 150 से अधिक बीएलओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इन अधिकारियों पर डोर-टू-डोर सत्यापन और मतदाताओं को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने में लापरवाही बरतने का आरोप है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासन ने मतदाताओं से की अपील प्रशासन ने मतदाताओं से अपील की है कि यदि फॉर्म भरने में किसी प्रकार की दिक्कत हो तो वे संबंधित बीएलओ, विशेष शिविर या निर्वाचन कार्यालय से संपर्क करें। अधिकारियों का कहना है कि सही जानकारी के साथ फॉर्म भरना बेहद जरूरी है, ताकि मतदाता सूची में किसी प्रकार की त्रुटि न रहे और भविष्य में मतदान के दौरान किसी भी नागरिक को परेशानी का सामना न करना पड़े।
बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक अपनी पहचान बना चुकीं अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा एक बार फिर अपने फैशन सेंस को लेकर सुर्खियों में हैं। विंबलडन 2026 के महिला सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान प्रियंका ने अपने एलिगेंट समर लुक से सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने ऑल इंग्लैंड लॉन टेनिस क्लब के रॉयल बॉक्स में बैठकर मैच का आनंद लिया और उनके स्टाइल की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। क्रीम मिडी ड्रेस में दिखीं बेहद एलिगेंट इस खास मौके पर प्रियंका ने क्रीम रंग की स्टाइलिश मिडी ड्रेस पहनी थी। ड्रेस में कॉलर नेक, बटन-डाउन फ्रंट, हाफ पफ स्लीव्स और कमर पर मैचिंग बेल्ट दी गई थी, जिसने उनके लुक को और आकर्षक बना दिया। सिंपल लेकिन क्लासी आउटफिट ने समर फैशन का बेहतरीन उदाहरण पेश किया। सिल्क बैंडाना और मिनिमल एक्सेसरीज ने बढ़ाई खूबसूरती प्रियंका ने अपने लुक को क्रीम रंग के फ्लोरल प्रिंट सिल्क बैंडाना, सिल्वर हूप ईयररिंग्स, सनग्लासेस और टोप (Taupe) रंग के शोल्डर बैग के साथ पूरा किया। खुले बालों और मिनिमल एक्सेसरीज ने उनके लुक में कॉटेज-कोर स्टाइल का खूबसूरत टच जोड़ दिया। सॉफ्ट मेकअप ने लुक को बनाया परफेक्ट मेकअप की बात करें तो प्रियंका ने ग्लॉसी चेरी लिपस्टिक, हल्का ब्राउन आईशैडो, मस्कारा, डिफाइंड आईब्रो और ड्यूई बेस के साथ नैचुरल लुक अपनाया। हल्के ब्लश ने उनके चेहरे की चमक को और निखार दिया। मैच के दौरान निक जोनस से की वीडियो कॉल विंबलडन के दौरान प्रियंका का एक खास पल भी कैमरे में कैद हुआ। मैच देखते समय उन्होंने अपने पति और सिंगर निक जोनस को फेसटाइम कॉल कर लाइव मैच दिखाया। इस रोमांटिक अंदाज ने फैंस का दिल जीत लिया और सोशल मीडिया पर इसकी भी खूब चर्चा हो रही है। पेरिस में भी दिखा था कपल का स्टाइलिश अंदाज विंबलडन से पहले प्रियंका और निक जोनस पेरिस में आयोजित डायर फॉल/विंटर 2026-27 कूट्योर शो में साथ नजर आए थे। इस फैशन इवेंट में प्रियंका ने डायर के क्रूज़ 2027 कलेक्शन की ऑरेंज फ्लोरल ड्रेस पहनी थी, जबकि निक ग्रे सूट और ग्रीन चेक शर्ट में स्टाइलिश दिखाई दिए। जल्द बड़े पर्दे पर लौटेंगी प्रियंका वर्कफ्रंट की बात करें तो प्रियंका चोपड़ा ने निर्देशक एस. एस. राजामौली की आगामी फिल्म की शूटिंग का बड़ा हिस्सा पूरा कर लिया है। फिल्म में उनके साथ महेश बाबू मुख्य भूमिका में नजर आएंगे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म की अधिकांश शूटिंग पूरी हो चुकी है, जबकि कुछ हिस्सों की शूटिंग अभी बाकी है। यह फिल्म रिलीज से पहले ही दर्शकों के बीच काफी चर्चा बटोर रही है।
रांची। झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के दौरान 47.35 लाख से अधिक मतदाता अभी भी 'अन-मैप्ड' पाए गए हैं। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (सीईओ) के. रवि कुमार ने बताया कि राज्य के कुल 2,17,27,827 मतदाताओं में से 47,35,409 यानी लगभग 17.89 प्रतिशत मतदाताओं की मैपिंग अभी पूरी नहीं हो सकी है। इन अन-मैप्ड मतदाताओं की सूची सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को उपलब्ध करा दी गई है और आम नागरिकों की सुविधा के लिए इसे सीईओ झारखंड की आधिकारिक वेबसाइट पर भी अपलोड किया गया है। मैप्ड मतदाताओं को दस्तावेज देने की जरूरत नहीं मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं की मैपिंग पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में हो चुकी है, उन्हें नए दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं है। केवल अन-मैप्ड मतदाताओं को ही नए इन्यूमरेशन फॉर्म में पिछले एसआईआर का विवरण भरना होगा। चुनाव आयोग ने पिछले एसआईआर की मतदाता सूची को 'सुपीरियर डॉक्यूमेंट' का दर्जा दिया है, जिससे मैपिंग प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके। तेजी से चल रहा है घर-घर सत्यापन अभियान सीईओ के अनुसार, पिछले 10 दिनों में बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) ने राज्य के 1.75 करोड़ से अधिक मतदाताओं, यानी लगभग 66.25 प्रतिशत मतदाताओं तक पहुंचकर इन्यूमरेशन फॉर्म वितरित कर दिए हैं। इस अभियान में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) भी सक्रिय सहयोग कर रहे हैं। ऐसे करें अपना स्टेटस चेक मतदाता अपना मैपिंग स्टेटस मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, झारखंड की आधिकारिक वेबसाइट, Voter Helpline App या चुनाव आयोग के टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1950 के माध्यम से जांच सकते हैं। यदि किसी मतदाता का नाम अन-मैप्ड सूची में है, तो बीएलओ द्वारा उपलब्ध कराए गए इन्यूमरेशन फॉर्म में पिछली मतदाता सूची का विवरण और आवश्यक जानकारी सही तरीके से भरनी होगी। इससे उनकी मैपिंग प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और मतदाता सूची में उनका नाम सुरक्षित रहेगा।
Asaduddin Owaisi ने हैदराबाद में पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक जनसभा के दौरान मतदाताओं से SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को गंभीरता से लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि 25 जून से शुरू होने वाली इस प्रक्रिया के तहत चुनाव अधिकारियों और बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) द्वारा घर-घर जाकर मतदाता सत्यापन और संबंधित फॉर्म वितरित किए जाएंगे। ओवैसी ने लोगों से आग्रह किया कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें और आवश्यक दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराएं। SIR को लेकर क्या कहा? ओवैसी के अनुसार: चुनाव आयोग ने प्रक्रिया के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की हैं। All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बूथ लेवल एजेंट के रूप में नियुक्त किया है। मतदाताओं को सत्यापन प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि मताधिकार और नागरिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने कहा कि वे लोगों को डराने या भावनाएं भड़काने के लिए नहीं बोल रहे हैं, बल्कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिसका सीधा संबंध नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से है। सड़क पर नमाज को लेकर भी दिया बयान अपने संबोधन में ओवैसी ने सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक आयोजनों को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि सड़कों पर नमाज अदा करने पर आपत्ति है, तो समान मानदंड सभी धर्मों के सार्वजनिक आयोजनों पर लागू होने चाहिए। उनका तर्क था कि नियम और कानून सभी समुदायों के लिए समान रूप से लागू होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आयोजनों और उनसे जुड़े प्रतिबंधों पर चर्चा करते समय समानता का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। SIR क्या है? SIR (Special Intensive Revision) चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है, जिसके तहत: मतदाता सूची का सत्यापन किया जाता है। नए मतदाताओं का पंजीकरण किया जाता है। मृत, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं। मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाया जाता है। ओवैसी ने लोगों से अपील की कि वे अपने मतदाता रिकॉर्ड की जांच करें और सत्यापन प्रक्रिया में पूरा सहयोग दें ताकि भविष्य में मतदान संबंधी किसी समस्या का सामना न करना पड़े।
रांची। Election Commission of India ने मतदाता सूची को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तीसरे चरण की घोषणा की है। इस अभियान के तहत Jharkhand समेत 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची का व्यापक सत्यापन किया जाएगा। चुनाव आयोग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र मतदाता सूची से बाहर न रहे और फर्जी या गलत नामों की पहचान कर उन्हें हटाया जा सके। घर-घर जाकर होगा सत्यापन स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के तहत बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी की जांच करेंगे। इसमें यह देखा जाएगा कि संबंधित व्यक्ति अब भी उसी पते पर रह रहा है या नहीं, नए मतदाता जुड़े हैं या नहीं और किन नामों को हटाने की जरूरत है। चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए राजनीतिक दलों की भागीदारी भी सुनिश्चित की है। 3.94 लाख BLO और 3.42 लाख एजेंट होंगे शामिल चुनाव आयोग के अनुसार इस चरण में करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं तक पहुंचने की तैयारी की गई है। इसके लिए 3.94 लाख से अधिक बूथ लेवल अधिकारियों को तैनात किया जाएगा। साथ ही राजनीतिक दलों की ओर से नियुक्त 3.42 लाख बूथ लेवल एजेंट भी इस अभियान में सहयोग करेंगे। आयोग का कहना है कि यह सिर्फ सरकारी प्रक्रिया नहीं बल्कि सभी पक्षों की भागीदारी वाला अभियान होगा। कुछ राज्यों में फिलहाल नहीं चलेगा अभियान हालांकि हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और Ladakh को फिलहाल इस अभियान से बाहर रखा गया है। चुनाव आयोग के मुताबिक इन इलाकों में मौसम और जनगणना कार्य को ध्यान में रखते हुए बाद में कार्यक्रम घोषित किया जाएगा। पहले दो चरणों में 59 करोड़ मतदाता आए थे दायरे में आयोग के अनुसार SIR के पहले दो चरणों में 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अभियान चलाया गया था। उस दौरान करीब 59 करोड़ मतदाताओं का सत्यापन किया गया और लाखों बूथ लेवल अधिकारियों तथा एजेंटों ने इसमें भाग लिया।
SIR Impact on Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में हार और जीत के कारणों को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गयी है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बड़ी हार के पीछे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को एक अहम फैक्टर माना जा रहा है. चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण में यह दावा किया जा रहा है कि जिन सीटों पर मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम हटाये गये, वहां भाजपा को भारी फायदा मिला. मतदाता सूची में बड़े बदलाव और बदला चुनावी गणित चुनाव आयोग की ओर से चलायी गयी SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और कथित फर्जी मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर पड़ा, जहां तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक मजबूत माना जाता था. बताया जा रहा है कि बंगाल की 177 ऐसी विधानसभा सीटें थीं, जहां हटाये गये मतदाताओं की संख्या 2021 में टीएमसी की जीत के अंतर से अधिक थी. इन सीटों में से 140 से ज्यादा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की. इससे यह चर्चा तेज हो गयी है कि मतदाता सूची में बदलाव ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया. 15 हजार से ज्यादा नाम हटे, कई मंत्री हारे विश्लेषण के मुताबिक, करीब 50 सीटों पर 15 हजार से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाये गये थे. इन्हीं सीटों पर टीएमसी के कई बड़े नेताओं और मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. भाजपा ने इन इलाकों में आक्रामक प्रचार और बूथ स्तर पर मजबूत रणनीति अपनायी, जिसका फायदा उसे चुनाव में मिला. SIR प्रक्रिया से कैसे बदला समीकरण? निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया में डिजिटल वेरिफिकेशन, आधार लिंकिंग और रिकॉर्ड मिलान के जरिए मतदाता सूची को अपडेट किया गया. इसके तहत मृत और पलायन कर चुके मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे कथित फर्जी मतदान की संभावना कम हुई और चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी. दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इसे टीएमसी के चुनावी नेटवर्क पर बड़ा झटका बताया. ममता बनर्जी ने पहले ही जतायी थी आशंका चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाये थे. पार्टी का आरोप था कि उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर मतदाता सूची से हटाये जा रहे हैं. हालांकि निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बताया था. अब चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गयी है. भाजपा का दावा है कि मतदाता सूची की सफाई से वास्तविक जनमत सामने आया, जबकि टीएमसी इसे अपने वोट बैंक को कमजोर करने की रणनीति बता रही है. भाजपा को मिला बड़ा फायदा राज्य में भाजपा ने 207 सीटों तक पहुंचकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR प्रक्रिया, सत्ताविरोधी माहौल और बूथ स्तर की मजबूत रणनीति ने भाजपा को बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. फिलहाल बंगाल की राजनीति में SIR प्रक्रिया सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है.
हैदराबाद, एजेंसियां। सनराइजर्स हैदराबाद ने पंजाब किंग्स को 33 रन से हराकर IPL 2026 पॉइंट्स टेबल में टॉप स्थान हासिल कर लिया। वहीं, पंजाब को इस सीजन में लगातार तीसरी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद टीम पहले स्थान से खिसककर दूसरे नंबर पर पहुंच गई। राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में पंजाब ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी चुनी। इसके बाद हैदराबाद ने 20 ओवर में 3 विकेट पर 235 रन बनाए। जवाब में 236 रन के टारगेट का पीछा करते हुए पंजाब की टीम 20 ओवर में 7 विकेट पर 202 रन ही बना सकी। हैदराबाद की ओर से 2 फिफ्टी लगी पहले बैटिंग करने उतरी हैदराबाद के लिए हेनरिक क्लासन और ईशान किशन ने अर्धशतक लगाए। क्लासन ने 43 बॉल पर 69 और ईशान ने 32 बॉल पर 55 रन बनाए। दोनों के बीच तीसरे विकेट के लिए 88 रन की साझेदारी हुई। क्लासन और नीतीश रेड्डी (29*) के बीच चौथे विकेट के लिए 63 रन की साझेदारी हुई। इसके अलावा अभिषेक शर्मा (35) और ट्रैविस हेड (38) ने 55 रन की ओपनिंग पार्टनरशिप की। पंजाब के लिए लॉकी फर्ग्यूसन, विजयकुमार वैशाख, युजवेंद्र चहल को 1-1 विकेट मिला। काम ना आया कोनोली का शतक पंजाब का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। टीम ने फील्डिंग के दौरान 3 कैच छोड़े, जबकि टारगेट का पीछा करते समय लगातार विकेट गंवाती रही। पंजाब के लिए कूपर कोनोली के अलावा कोई बल्लेबाज बड़ी पारी नहीं खेल सका। कोनोली ने 59 बॉल पर नाबाद 107 रन बनाए। उनके अलावा मार्कस स्टोयनिस ने 28 और सूर्यांश शेडगे ने 25 रन का योगदान दिया। हैदराबाद के लिए पैट कमिंस और शिवांग कुमार ने 2-2 विकेट लिए। नीतीश रेड्डी, ईशान मलिंगा और साकिब हुसैन को 1-1 विकेट मिला। पैट कमिंस प्लेयर ऑफ द् मैच चुने गये।
Supreme Court of India आज West Bengal में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। यह मामला विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बेहद अहम माना जा रहा है। किस पीठ के सामने होगी सुनवाई? सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ के सामने होगी। 13 अप्रैल की कार्यसूची में इस मामले को सूचीबद्ध किया गया है। चुनाव आयोग पहले ही दे चुका है अंतिम सूची Election Commission of India ने 9 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के लिए मतदाता सूची को अंतिम रूप दे दिया है। बंगाल में चुनाव: 23 और 29 अप्रैल मतगणना: 4 मई SIR और ‘स्थगन’ का मतलब क्या? मतदाता सूची के “स्थगन” का मतलब है कि अब इस चुनाव के लिए नई एंट्री नहीं की जा सकती। यानी जो नाम सूची में नहीं है, वह इस बार वोट नहीं डाल सकेगा। मालदा केस पर भी सुनवाई कोर्ट Malda में SIR प्रक्रिया के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों के ‘घेराव’ मामले पर भी सुनवाई करेगा। इस मामले में पहले ही National Investigation Agency (NIA) को जांच सौंपने का आदेश दिया जा चुका है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सतह पर भले ही Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress (TMC) की पकड़ मजबूत दिखती हो, लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद सामने आए आंकड़े चुनावी समीकरण में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ राजनीतिक माहौल तक सीमित नहीं, बल्कि वोटिंग पैटर्न और सीट-दर-सीट मुकाबले को भी प्रभावित कर सकता है। सबसे बड़ा झटका मतदाता सूची में हुए बदलाव से जुड़ा है। SIR प्रक्रिया के तहत करीब 91 लाख नाम हटाए गए हैं, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत हटाव छह जिलों-मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नदिया, और उत्तर-दक्षिण 24 परगना-से हुआ है। ये सभी क्षेत्र पारंपरिक रूप से TMC के मजबूत गढ़ माने जाते हैं। ऐसे में इस बड़े बदलाव ने चुनावी तस्वीर को पहले से ज्यादा अनिश्चित बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषण यह भी बताता है कि TMC का वोट शेयर भले ही अधिक हो, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा कुछ खास क्षेत्रों तक सीमित है, खासकर मुस्लिम बहुल सीटों में। इन सीटों पर भारी जीत का अंतर मिलता है, लेकिन यही “अतिरिक्त वोट” अन्य सीटों पर कोई खास फायदा नहीं दे पाते। इसके उलट Bharatiya Janata Party (BJP) का वोट राज्यभर में अपेक्षाकृत समान रूप से फैला हुआ है, जिससे उसे करीबी मुकाबलों में बढ़त मिल सकती है। आंकड़ों के अनुसार, TMC के पास 114 सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर 10 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि BJP के पास केवल 35 सीटें इस श्रेणी में आती हैं। 2024 के आंकड़ों के आधार पर TMC के लगभग 55.8 लाख वोट “वेस्टेड” माने जा रहे हैं, जबकि BJP के लिए यह संख्या काफी कम-करीब 11.9 लाख-है। इसका सीधा मतलब है कि BJP के वोट ज्यादा “इफेक्टिव” साबित हो सकते हैं। हालांकि BJP के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। मतुआ समुदाय से जुड़े शरणार्थी वोट बैंक में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से पार्टी को नुकसान हो सकता है, खासकर उन 55 सीटों पर जहां यह समुदाय प्रभावशाली है। लेकिन उत्तर बंगाल और जंगलमहल जैसे इलाकों में अपेक्षाकृत कम कटौती BJP के लिए राहत की बात हो सकती है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि करीब 58 करीबी सीटों पर सिर्फ 1.92 लाख वोटों का झुकाव चुनावी नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। यानी अब यह चुनाव कुल वोट प्रतिशत से ज्यादा, सीट-दर-सीट मार्जिन का खेल बन गया है। इसके अलावा, राज्य में महिला मतदाताओं के अनुपात में गिरावट (959 से घटकर 950 प्रति 1000 पुरुष) भी एक नया फैक्टर बनकर उभरा है, जो Mamata Banerjee के लिए चिंता का विषय हो सकता है। कुल मिलाकर, एंटी-इंकम्बेंसी, मतदाता सूची में बदलाव और वोटों का असमान वितरण-ये तीनों कारक मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनावी मुकाबला अब पहले से कहीं ज्यादा खुला और दिलचस्प हो गया है। अब देखना होगा कि यह आंकड़ों का गणित वास्तविक चुनावी नतीजों में कितना बदलता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।