रांची। झारखंड में 30 जून से चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बीच चुनाव आयोग ने मतदाताओं की कई महत्वपूर्ण शंकाओं का समाधान किया है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए नया रंगीन फोटो देना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, रिकॉर्ड को अद्यतन रखने और नए ईपीआईसी (मतदाता पहचान पत्र) पर नई तस्वीर प्राप्त करने के लिए हाल का पासपोर्ट साइज रंगीन फोटो देने की सलाह दी गई है। चुनाव आयोग के अनुसार चुनाव आयोग के अनुसार, गणना प्रपत्र (Enumeration Form) में फिलहाल वही तस्वीर छपी है, जो पहले से आयोग के रिकॉर्ड में उपलब्ध है। कई मतदाताओं की तस्वीरें काफी पुरानी होने के कारण उन्हें नई फोटो देने का अनुरोध किया जा रहा है। यदि कोई मतदाता घर पर मौजूद नहीं है या नौकरी, पढ़ाई अथवा अन्य कारणों से राज्य से बाहर है, तो उसके परिवार का कोई सदस्य हाल की रंगीन फोटो चिपकाकर फॉर्म जमा कर सकता है। बीमार या किसी अन्य कारण से लाइव फोटो नहीं दे पाने वाले मतदाताओं के लिए भी यही सुविधा उपलब्ध रहेगी। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाताओं को दो क्यूआर-कोड आधारित गणना प्रपत्र दिए जा रहे हैं, जो प्रत्येक मतदाता के लिए अलग-अलग और पूर्व-भरे हुए हैं। ऐसे में किसी अन्य व्यक्ति का फॉर्म इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यदि पहली प्रति भरते समय खराब हो जाए, तो दूसरी प्रति की फोटो कॉपी लेकर उसे पहली प्रति के रूप में दोबारा भरा जा सकता है। अगर दोनों प्रतियां गलती हो जाएं, तो मतदाता ईसीआईनेट (ECINet) ऐप के माध्यम से ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं। चुनाव आयोग ने मतदाताओं से अपील की जिन मतदाताओं को ऑनलाइन आवेदन करने में कठिनाई हो, वे अपने बीएलओ की मदद से संबंधित निर्वाचन निबंधन पदाधिकारी (ERO) से नई प्रति प्राप्त कर सकते हैं। चुनाव आयोग ने मतदाताओं से अपील की है कि वे फॉर्म भरते समय सावधानी बरतें और समय पर प्रक्रिया पूरी करें, ताकि मतदाता सूची अद्यतन करने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।
रांची। झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का अभियान 30 जून से शुरू हो रहा है। इस दौरान बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) 29 जुलाई तक घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करेंगे और उन्हें गणना प्रपत्र उपलब्ध कराएंगे। मतदाताओं को केवल इस प्रपत्र को सही ढंग से भरकर उस पर हस्ताक्षर कर बीएलओ को लौटाना होगा। इस चरण में किसी भी प्रकार का दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि हस्ताक्षरित गणना प्रपत्र समय पर जमा नहीं किया गया, तो संबंधित व्यक्ति का नाम प्रारूप मतदाता सूची में शामिल नहीं होगा। बीएलओ प्रपत्र लेने के लिए कम से कम तीन बार घर पहुंचेंगे। 1 अक्टूबर तक 18 वर्ष पूरे करने वाले बन सकेंगे मतदाता चुनाव आयोग ने इस पुनरीक्षण के लिए 1 अक्टूबर 2026 को अर्हता तिथि निर्धारित की है। यानी इस तिथि तक 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा नए मतदाता के रूप में पंजीकरण करा सकेंगे। नए मतदाताओं को गणना चरण या दावा-आपत्ति अवधि के दौरान फॉर्म-6 भरकर आवश्यक दस्तावेजों और घोषणा-पत्र के साथ जमा करना होगा। वहीं, दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में नाम स्थानांतरित कराने वाले मतदाताओं को निर्धारित प्रक्रिया के तहत फॉर्म-8 भरना होगा। 5 अगस्त को प्रारूप सूची, 7 अक्टूबर को अंतिम प्रकाशन विशेष पुनरीक्षण अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और अद्यतन बनाना है, ताकि कोई पात्र मतदाता छूटे नहीं और अपात्र व्यक्तियों के नाम सूची में शामिल न रहें। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार 5 अगस्त को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होगी, जिस पर 4 सितंबर तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी। इनके निस्तारण के बाद 7 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत अथवा विदेशी नागरिकता प्राप्त कर चुके लोगों के नाम भी जांच के बाद मतदाता सूची से हटाए जाएंगे, जिससे सूची अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित बन सके।
निर्वाचन आयोग ने ओडिशा, मिजोरम, सिक्किम और मणिपुर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) के तीसरे चरण के तहत घर-घर सत्यापन अभियान शुरू कर दिया है। इस अभियान के दौरान बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) मतदाताओं के घर जाकर गणना प्रपत्रों का वितरण, संग्रह और सत्यापन करेंगे। आयोग के अनुसार, इस चरण में 3.68 करोड़ से अधिक मतदाताओं का सत्यापन किया जाएगा। निर्वाचन आयोग ने बताया कि इस विशेष अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, पारदर्शी और अद्यतन बनाना है, ताकि सभी पात्र नागरिकों के नाम सूची में शामिल किए जा सकें और अपात्र व्यक्तियों के नाम हटाए जा सकें। ओडिशा में सबसे अधिक मतदाता चारों राज्यों में कुल 3.67 करोड़ से अधिक मतदाता हैं। इनमें ओडिशा में सबसे अधिक 3.34 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। राज्य में पुनरीक्षण कार्य के लिए 38,123 बूथ स्तरीय अधिकारियों (BLO) और 8,391 बूथ स्तरीय एजेंटों (BLA) की तैनाती की गई है। वहीं, मिजोरम में 8.75 लाख, सिक्किम में 4.71 लाख और मणिपुर में 20.92 लाख मतदाता इस प्रक्रिया के दायरे में आएंगे। 14 मई से शुरू हुआ था तीसरा चरण निर्वाचन आयोग ने 14 मई से 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चरणबद्ध तरीके से विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का तीसरा चरण शुरू किया था। वर्तमान चरण में मतदाताओं से आवश्यक जानकारी एकत्र की जाएगी। मतदाता अपने भरे हुए गणना प्रपत्र BLO के माध्यम से जमा कर सकते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन माध्यम से भी आवेदन जमा करने की सुविधा उपलब्ध है। आयोग के अनुसार, जिन मतदाताओं के गणना प्रपत्र 28 जून या उससे पहले निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) को प्राप्त हो जाएंगे, उनके नाम मसौदा मतदाता सूची में शामिल किए जाएंगे। समय सीमा चूकने वालों को भी मिलेगा अवसर निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि जो मतदाता निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने प्रपत्र जमा नहीं कर पाएंगे, वे दावा एवं आपत्ति अवधि के दौरान निर्धारित घोषणा-पत्र के साथ फॉर्म-6 भरकर नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकेंगे। मतदाताओं से सहयोग की अपील आयोग ने सभी पात्र नागरिकों से इस अभियान में सक्रिय भागीदारी और चुनाव अधिकारियों को सहयोग देने की अपील की है। आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाता सूचियां अधिक समावेशी, अद्यतन और विश्वसनीय बनेंगी। निर्वाचन आयोग ने दोहराया कि पात्रता तिथि पर 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक, जो
Asaduddin Owaisi ने हैदराबाद में पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक जनसभा के दौरान मतदाताओं से SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को गंभीरता से लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि 25 जून से शुरू होने वाली इस प्रक्रिया के तहत चुनाव अधिकारियों और बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) द्वारा घर-घर जाकर मतदाता सत्यापन और संबंधित फॉर्म वितरित किए जाएंगे। ओवैसी ने लोगों से आग्रह किया कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें और आवश्यक दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराएं। SIR को लेकर क्या कहा? ओवैसी के अनुसार: चुनाव आयोग ने प्रक्रिया के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की हैं। All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बूथ लेवल एजेंट के रूप में नियुक्त किया है। मतदाताओं को सत्यापन प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि मताधिकार और नागरिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने कहा कि वे लोगों को डराने या भावनाएं भड़काने के लिए नहीं बोल रहे हैं, बल्कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिसका सीधा संबंध नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से है। सड़क पर नमाज को लेकर भी दिया बयान अपने संबोधन में ओवैसी ने सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक आयोजनों को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि सड़कों पर नमाज अदा करने पर आपत्ति है, तो समान मानदंड सभी धर्मों के सार्वजनिक आयोजनों पर लागू होने चाहिए। उनका तर्क था कि नियम और कानून सभी समुदायों के लिए समान रूप से लागू होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आयोजनों और उनसे जुड़े प्रतिबंधों पर चर्चा करते समय समानता का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। SIR क्या है? SIR (Special Intensive Revision) चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है, जिसके तहत: मतदाता सूची का सत्यापन किया जाता है। नए मतदाताओं का पंजीकरण किया जाता है। मृत, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं। मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाया जाता है। ओवैसी ने लोगों से अपील की कि वे अपने मतदाता रिकॉर्ड की जांच करें और सत्यापन प्रक्रिया में पूरा सहयोग दें ताकि भविष्य में मतदान संबंधी किसी समस्या का सामना न करना पड़े।
West Bengal में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर Election Commission of India (ECI) ने पहचान सत्यापन के नियमों को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि मतदान के दौरान किसी भी मतदाता को पहचान छिपाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर किसी की पहचान पर जरा सा भी संदेह होता है, तो उसे अपना चेहरा दिखाना अनिवार्य होगा–चाहे वह घूंघट में हो या बुर्का में। यह फैसला चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है, क्योंकि पिछले चुनावों में फर्जी मतदान को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। क्या हैं नए नियम? चुनाव आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार: मतदान केंद्र पर आने वाले हर मतदाता की पहचान की पुष्टि की जाएगी अगर कोई मतदाता चेहरा ढककर आता है और पहचान को लेकर संदेह होता है, तो उसे चेहरा दिखाना होगा महिला मतदाताओं की पहचान केवल महिला अधिकारी द्वारा ही जांची जाएगी किसी भी परिस्थिति में पहचान सत्यापन से छूट नहीं दी जाएगी आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियम सभी मतदाताओं पर समान रूप से लागू होगा और इसका उद्देश्य किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना है। महिला कर्मियों की अहम भूमिका इस प्रक्रिया को संवेदनशील तरीके से लागू करने के लिए आयोग ने खास इंतजाम किए हैं: हर मतदान केंद्र पर कम से कम एक महिला कर्मचारी की तैनाती अनिवार्य की गई है जहां जरूरत होगी, महिला अधिकारी अलग से जाकर पहचान सत्यापन करेंगी इससे महिला मतदाताओं की गरिमा और निजता (privacy) बनी रहेगी क्यों जरूरी हुआ यह कदम? चुनाव आयोग के मुताबिक, कई बार देखा गया है कि: कुछ लोग नकली पहचान के साथ वोट डालने की कोशिश करते हैं घूंघट या बुर्का का इस्तेमाल पहचान छिपाने के लिए किया जाता है इससे फर्जी मतदान (Bogus Voting) की संभावना बढ़ जाती है इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने इस बार सख्ती बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि हर वोट असली मतदाता द्वारा ही डाला जाए। पहले भी हो चुका है विवाद यह मुद्दा नया नहीं है। इससे पहले Bihar के चुनावों में भी घूंघट और बुर्का में पहचान सत्यापन को लेकर विवाद हुआ था। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी वहीं चुनाव आयोग ने इसे चुनाव की निष्पक्षता के लिए जरूरी बताया था इस बार बंगाल में पहले से ही स्पष्ट नियम जारी कर दिए गए हैं, ताकि मतदान के दिन किसी तरह की भ्रम की स्थिति न बने। संवेदनशील माने जा रहे हैं ज्यादातर बूथ चुनाव आयोग के अनुसार: राज्य के अधिकांश मतदान केंद्र संवेदनशील श्रेणी में आते हैं करीब 8,500 बूथों को अत्यंत संवेदनशील घोषित किया गया है पहले चरण में होने वाले मतदान के लिए 1,500 बूथों पर अतिरिक्त सुरक्षा दी जा रही है यह आंकड़े बताते हैं कि इस बार चुनाव को लेकर प्रशासन काफी सतर्क है। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए कई अतिरिक्त कदम उठाए गए हैं: सभी प्रमुख मतदान केंद्रों पर CCTV कैमरे लगाए जाएंगे केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की जाएगी मतदान केंद्रों के अंदर और बाहर कड़ी निगरानी रखी जाएगी भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी क्या होगा असर? विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के कई असर हो सकते हैं: फर्जी मतदान पर रोक लगेगी चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी मतदाताओं का भरोसा मजबूत होगा
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में आई तकनीकी गड़बड़ी को लेकर चुनाव आयोग (EC) ने सफाई दी है। आयोग ने बुधवार को स्वीकार किया कि डिस्प्ले एरर के कारण कई मतदाताओं का नाम “जांच के दायरे में” दिख रहा था, जबकि वे पहले से ही फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल थे। क्या थी गड़बड़ी? मंगलवार शाम को जब लोगों ने EPIC नंबर के जरिए अपना वोटर स्टेटस चेक किया, तो: उनके नाम के आगे “जांच के दायरे में” दिख रहा था यह समस्या उन वोटरों के साथ भी हुई, जिनका नाम पहले से फाइनल लिस्ट में था 2 घंटे में ठीक हुई समस्या चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक: यह पूरी तरह तकनीकी (टेक्निकल) गड़बड़ी थी टेक्निकल टीम ने करीब 2 घंटे में इसे ठीक कर दिया फिलहाल आयोग इस मामले की जांच कर रहा है TMC ने उठाए सवाल इस गड़बड़ी पर सत्ताधारी पार्टी TMC (तृणमूल कांग्रेस) ने सवाल उठाए: पार्टी ने कहा कि इससे ऐसा लग रहा था जैसे सभी वोटरों पर शक किया जा रहा है हालांकि, चुनाव आयोग ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ एक डिस्प्ले एरर था, किसी भी तरह की जांच या कार्रवाई से इसका कोई संबंध नहीं है। क्या है स्थिति अब? तकनीकी समस्या को ठीक कर दिया गया है वोटर स्टेटस अब सामान्य रूप से दिख रहा है आयोग मामले की विस्तृत जांच कर रहा है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।