West Bengal Assembly

Calcutta High Court building in Kolkata, where a legal challenge is being heard over the appointment of the Leader of Opposition in the West Bengal Assembly.
रीतब्रत बनर्जी की नेता प्रतिपक्ष नियुक्ति पर आज कलकत्ता हाईकोर्ट में सुनवाई, TMC विधायक की याचिका पर होगी बहस

कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) की नियुक्ति को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दायर अपील पर आज हाईकोर्ट की खंडपीठ सुनवाई करेगी। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी गुट के विधायक रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। रीतब्रत बनर्जी की ओर से संविधान का हवाला मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान रीतब्रत बनर्जी की ओर से पेश अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति शम्पा सरकार और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ के सामने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि रीतब्रत बनर्जी की नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्ति संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून)के प्रावधानों के अनुरूप की गई है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई बुधवार तक जारी रखने का निर्णय लिया। एकल पीठ ने अंतरिम राहत देने से किया था इनकार इससे पहले 18 जून को कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत ने मुख्य मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की थी। शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ का किया रुख एकल पीठ के फैसले के बाद टीएमसी विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ में अपील दायर की। उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया कि नेता प्रतिपक्ष पद के लिए उनके नाम की अनदेखी की गई और रीतब्रत बनर्जी की नियुक्ति कानून के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इस नियुक्ति को पूरी तरह गैर-कानूनी बताते हुए निरस्त करने की मांग की है। आज की सुनवाई पर टिकी राजनीतिक नजरें बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहे इस विवाद पर अब सभी की नजरें कलकत्ता हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के फैसले का असर राज्य की राजनीतिक स्थिति और विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका पर पड़ सकता है।  

Deepshikha जुलाई 15, 2026 0
West Bengal Assembly prepares to debate the Uniform Civil Code (UCC) Bill during a crucial legislative session.
बंगाल विधानसभा में आज UCC विधेयक पर संग्राम, सत्ता पक्ष बनाम टीएमसी के दोनों गुटों के बीच होगी तीखी टक्कर

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा का सोमवार का सत्र राजनीतिक रूप से बेहद अहम रहने वाला है। राज्य की भाजपा सरकार अपना बहुप्रतीक्षित और विवादास्पद समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक सदन में पेश करने जा रही है। विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद यह भाजपा सरकार का सबसे बड़ा वैचारिक विधेयक माना जा रहा है। इस विधेयक पर मुकाबला सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच नहीं होगा। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान भी विधानसभा में खुलकर सामने आने की संभावना है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुट यूसीसी के विरोध को लेकर अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। UCC पर टीएमसी के दोनों गुट आमने-सामने विधानसभा में यूसीसी विधेयक पर बहस के दौरान टीएमसी के दोनों गुट सरकार को घेरने की तैयारी कर चुके हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने अपने विधायकों को विधेयक का कड़ा विरोध करने के निर्देश दिए हैं। ममता बनर्जी का कहना है कि समान नागरिक संहिता देश की सामाजिक विविधता, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। उनका आरोप है कि इस तरह के कानून से भारत की बहुलतावादी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। वहीं विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी का गुट भी सरकार पर निशाना साधने की रणनीति बना चुका है। उनका कहना है कि सरकार बिना व्यापक चर्चा और सामाजिक सहमति के इतना महत्वपूर्ण कानून लाने की जल्दबाजी कर रही है। भाजपा के पास बहुमत, विधेयक पारित होने की संभावना विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण विधेयक के पारित होने में किसी बड़ी बाधा की संभावना नहीं है। इसके बावजूद सदन में होने वाली बहस राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह राज्य की नई राजनीतिक दिशा और विपक्ष की रणनीति दोनों को स्पष्ट करेगी। क्या है समान नागरिक संहिता (UCC)? समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए धर्म से अलग एक समान नागरिक कानून लागू करना है। इसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार, गोद लेने और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। भाजपा लंबे समय से इसे अपने प्रमुख चुनावी और वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है। पार्टी का तर्क है कि इससे सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे और कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित होगी। सदन में होगी विस्तृत चर्चा विधानसभा की कार्यवाही सोमवार सुबह 11 बजे शुरू होगी। सरकार पहले अन्य विधेयक पेश करेगी, जिसके बाद दूसरे चरण में यूसीसी विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है। इस दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी और विभिन्न दलों के वरिष्ठ विधायक अपनी-अपनी बात रखेंगे। बहस के बाद सरकार विधेयक को सदन से पारित कराने का प्रयास करेगी। राजनीतिक नजरें विधानसभा पर यूसीसी विधेयक पर होने वाली चर्चा को केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति का अहम पड़ाव माना जा रहा है। एक ओर भाजपा इसे अपने वैचारिक एजेंडे की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करना चाहती है, वहीं टीएमसी के दोनों गुट इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता साबित करने की कोशिश करेंगे। ऐसे में सोमवार का विधानसभा सत्र राज्य की राजनीति के लिए काफी अहम रहने वाला है।  

Deepshikha जून 29, 2026 0
West Bengal Assembly expected to discuss a Uniform Civil Code (UCC) bill during a special legislative session.
पश्चिम बंगाल में लागू होगा यूनिफॉर्म सिविल कोड? विधानसभा के मौजूदा सत्र में आ सकता है UCC विधेयक

  कोलकाता: उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) लागू करने की तैयारी तेज होती दिखाई दे रही है। विधानसभा और राज्य प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार अगले सप्ताह विधानसभा के विशेष सत्र में यूसीसी से संबंधित विधेयक पेश कर सकती है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो पश्चिम बंगाल समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का चौथा भाजपा शासित राज्य बन जाएगा। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है। साथ ही महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार ने बताई यूसीसी की जरूरत विधानसभा और प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, सरकार का मानना है कि अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान नागरिक कानून लागू होने से न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनेगी। सरकार का दावा है कि इससे कानूनी विवादों में एकरूपता आएगी और सभी नागरिकों को समान अधिकार सुनिश्चित किए जा सकेंगे। असम मॉडल पर आगे बढ़ सकती है सरकार सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार यूसीसी लागू करने के लिए असम मॉडल का अध्ययन कर रही है। हाल ही में असम विधानसभा ने लंबी बहस के बाद समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया था। उस कानून में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन संबंधों के पंजीकरण और बहुविवाह पर रोक जैसे कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। असम सरकार ने इसे संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुरूप बताया था और कहा था कि इसका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है। जनजातीय समुदायों को मिल सकती है छूट सूत्रों के मुताबिक, असम की तरह पश्चिम बंगाल में भी कुछ जनजातीय समुदायों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने पर विचार किया जा रहा है। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र और जंगलमहल के कुछ आदिवासी समुदायों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं।  इस संबंध में अंतिम फैसला विधेयक पेश होने के बाद ही स्पष्ट होगा। राजनीतिक मुद्दा बनने की संभावना राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम बंगाल विधानसभा में यूसीसी विधेयक पेश होता है तो यह राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। भाजपा इसे महिलाओं के अधिकार, समान कानून और सुशासन से जोड़कर पेश कर सकती है, जबकि विपक्ष धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के आधार पर इसका विरोध कर सकता है। सरकार का कहना है कि समान नागरिक संहिता किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करने का संवैधानिक प्रयास है। वहीं विपक्षी दल पहले ही इस प्रस्तावित कानून को लेकर विरोध के संकेत दे चुके हैं। विधेयक पर रहेगी सबकी नजर अब सभी की नजर विधानसभा के आगामी विशेष सत्र पर टिकी है, जहां सरकार यूसीसी विधेयक पेश कर सकती है। विधेयक के अंतिम स्वरूप, उसमें शामिल प्रावधानों और संभावित छूटों को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है।  

Deepshikha जून 26, 2026 0
West Bengal Chief Minister Shubhendu Adhikari addresses Assembly on illegal infiltration and deportation policy.
घुसपैठ पर बंगाल सरकार का सख्त रुख, ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति पर अडिग रहने का दावा

  पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार ने अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उनकी सरकार केंद्र की ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति को पूरी दृढ़ता के साथ लागू कर रही है और इससे पीछे हटने का कोई सवाल नहीं है। 10 हजार घुसपैठियों की पहचान का दावा मुख्यमंत्री ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार बनने के बाद पिछले लगभग डेढ़ महीने के दौरान 10 हजार अवैध घुसपैठियों की पहचान की गई है। उन्होंने दावा किया कि इनमें से बड़ी संख्या में लोगों को सीमा पार वापस भेजा जा चुका है और शेष के खिलाफ भी कार्रवाई जारी है। 12 होल्डिंग सेंटरों में रखे गए 1800 लोग मुख्यमंत्री के अनुसार राज्य सरकार ने हाल ही में 12 होल्डिंग सेंटर स्थापित किए हैं, जहां फिलहाल 1800 लोगों को रखा गया है। उन्होंने कहा कि आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन लोगों को भी जल्द डिपोर्ट किया जाएगा। गिरफ्तारी के बाद बीएसएफ को सौंपे जाएंगे लोग मुख्यमंत्री ने कहा कि अवैध घुसपैठ के मामलों में गिरफ्तार व्यक्तियों को जेल में रखने के बजाय सीधे सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को सौंपा जाएगा, ताकि उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत सीमा पार भेजा जा सके। उन्होंने कहा कि राज्य की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। पूर्ववर्ती सरकार पर लगाए आरोप अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए आवश्यक सहयोग नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्षों तक सीमा पर बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं कराई गई। बीएसएफ को 142.79 एकड़ भूमि देने का दावा मुख्यमंत्री ने बताया कि उनकी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद डेढ़ महीने से भी कम समय में बीएसएफ को 142.79 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई है। उनके अनुसार इससे सीमा पर कंटीले तार लगाने और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने का काम तेज होगा। ‘जो भागना चाहते हैं, वे भाग जाएं’ मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि जो लोग अवैध रूप से राज्य में रह रहे हैं और भागना चाहते हैं, वे सीमा पर बाड़ पूरी होने से पहले चले जाएं। उन्होंने दावा किया कि सरकार की सख्ती के बाद कुछ क्षेत्रों से अवैध घुसपैठियों के वापस लौटने की सूचनाएं भी मिली हैं। भारतीय नागरिकों को चिंता की जरूरत नहीं मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वास्तविक भारतीय नागरिकों को किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार की कार्रवाई केवल अवैध घुसपैठियों के खिलाफ है और इसका किसी धर्म, जाति या समुदाय से कोई संबंध नहीं है। सरकारी योजनाओं का लाभ केवल नागरिकों को मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार की सभी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ केवल भारतीय नागरिकों को मिलेगा। उन्होंने अन्नपूर्णा भंडार, वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी संसाधनों का उपयोग केवल पात्र नागरिकों के लिए किया जाएगा और किसी भी अवैध घुसपैठिये को इन योजनाओं का लाभ नहीं लेने दिया जाएगा। आगे और तेज हो सकती है कार्रवाई मुख्यमंत्री के बयान से संकेत मिला है कि राज्य सरकार आने वाले दिनों में अवैध घुसपैठ के खिलाफ अपनी कार्रवाई को और तेज कर सकती है। पहचान, हिरासत और डिपोर्टेशन की प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां जारी हैं और सरकार इसे अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर रही है।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
West Bengal Chief Minister Shubhendu Adhikari addresses Assembly on anti-corruption measures and asset seizure law.
भ्रष्टाचार पर बंगाल सरकार का बड़ा संदेश, अवैध संपत्तियां जब्त कर भूमिहीनों को बसाने का संकेत

  पश्चिम बंगाल विधानसभा में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति दोहराते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि भ्रष्टाचार और अपराध से अर्जित संपत्तियों को केवल जब्त ही नहीं किया जाएगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उनकी नीलामी भी की जा सकती है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्तियों पर बनेगा नया कानून विधानसभा में अपने जवाबी भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में गुंडाराज, माफियातंत्र और वसूली की राजनीति को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सरकार इस सत्र में एक नया विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, जिसके माध्यम से भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों से अर्जित संपत्तियों को जब्त करने तथा उनकी नीलामी का कानूनी प्रावधान किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल जेल जाने या लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से कोई बच नहीं सकेगा। यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति अवैध तरीके से अर्जित पाई जाती है तो सरकार उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। आलीशान इमारतों का किया उल्लेख अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने कोलकाता के हरीश मुखर्जी रोड और हरीश चटर्जी रोड स्थित आलीशान इमारतों का उल्लेख करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी बड़ी संपत्तियों का उपयोग उन लोगों के पुनर्वास के लिए किया जा सकता है, जो आज सड़कों, फुटपाथों और फ्लाईओवरों के नीचे जीवन बिताने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई करना नहीं, बल्कि उन्हें जनहित में उपयोग में लाना भी है। राजनीतिक गलियारों में बढ़ी चर्चाएं मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान के बाद राजनीतिक हलकों में इसे तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी की ओर इशारा माना जा रहा है। हरीश मुखर्जी रोड और हरीश चटर्जी रोड क्षेत्र में स्थित कुछ चर्चित संपत्तियों को लेकर पहले भी निर्माण संबंधी अनियमितताओं और अन्य विवादों की चर्चा होती रही है। सरकार की ओर से किसी विशेष व्यक्ति या संपत्ति के खिलाफ आधिकारिक कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है। सत्ता पक्ष ने किया समर्थन मुख्यमंत्री के बयान के दौरान सत्ता पक्ष के कई विधायकों और मंत्रियों ने मेज थपथपाकर समर्थन जताया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार का यह रुख आने वाले समय में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को और तेज करने का संकेत है। विपक्ष की प्रतिक्रिया पर नजर मुख्यमंत्री के बयान के बाद अब विपक्ष की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हैं। माना जा रहा है कि प्रस्तावित विधेयक और उससे जुड़े प्रावधानों को लेकर विधानसभा और राज्य की राजनीति में आगे भी तीखी बहस देखने को मिल सकती है।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
TMC rebel leader Ritabrata Banerjee attends assembly meeting as Bengal's political crisis deepens before the budget session.
बजट सत्र से पहले ममता गुट को बड़ा झटका, सर्वदलीय बैठक में शोभनदेव को नहीं बुलाया; बागी नेता रीतब्रत को मिला न्योता

  पश्चिम बंगाल विधानसभा के 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आंतरिक कलह और गहरा गई है। विधानसभा की सर्वदलीय और कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार एवं ममता बनर्जी के करीबी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर बैठक में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया। इस घटनाक्रम को विधानसभा के भीतर बदलते सियासी समीकरणों और बागी गुट की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है। रीतब्रत को मिली मान्यता, शोभनदेव रहे बाहर विधानसभा सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक के लिए जारी सूची में शोभनदेव चट्टोपाध्याय और बेलेघाटा से विधायक कुणाल घोष का नाम शामिल नहीं था। इसके विपरीत, हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र नाथ बसु द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त रीतब्रत बनर्जी को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संकेत देता है कि विधानसभा प्रशासन सदन के भीतर उभरी नई संख्या-स्थिति को स्वीकार करने लगा है। बागी गुट के साथ 65 विधायक तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई बगावत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। कुछ दिन पहले पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले को खारिज करते हुए विपक्ष के नेता पद के लिए रीतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था। अब बागी गुट का दावा है कि उसके समर्थन में 65 विधायक हैं, जिससे विधानसभा में रीतब्रत की स्थिति और मजबूत हुई है। सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए अन्य विपक्षी नेता सर्वदलीय बैठक में विभिन्न विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इनमें शामिल थे: नौशाद सिद्दीकी हुमायूं कबीर मुस्तफिजुर रहमान संसद से विधानसभा तक टीएमसी में संकट विधानसभा में बढ़ते संकट के बीच तृणमूल कांग्रेस को संसद में भी बड़ा झटका लग चुका है। हाल ही में पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का फैसला किया और भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की। बजट सत्र से पहले बढ़ा सियासी तापमान बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू हो रहा है। उससे पहले विपक्ष के नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा के भीतर बदलते संख्या बल और टीएमसी की आंतरिक टूट का असर आगामी सत्र की कार्यवाही और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर किस रूप में पड़ता है।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
TMC leaders and legal representatives amid Calcutta High Court challenge over opposition leader recognition.
टीएमसी का हाईकोर्ट रुख, रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मान्यता देने के फैसले को दी चुनौती

  पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी खींचतान अब अदालत तक पहुंच गई है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें बागी नेता रीतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में होगी। कोर्ट ने इस याचिका को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करते हुए 11 जून को विस्तृत सुनवाई की तारीख तय की है। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कानूनी आपत्ति टीएमसी की ओर से दायर याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी गई है। पार्टी का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़ा फैसला पार्टी की आधिकारिक स्थिति और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप नहीं है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष के फैसले के कारण विधानसभा के भीतर संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। बागी गुट के समर्थन से बढ़ा विवाद विवाद की जड़ टीएमसी विधायकों के भीतर उभरा मतभेद है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद विपक्ष की भूमिका में पहुंची टीएमसी के 80 विधायकों में से बड़ी संख्या ने कथित तौर पर रीतब्रत बनर्जी के समर्थन में रुख अपनाया। इसी समर्थन के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पार्टी नेतृत्व इस फैसले को चुनौती दे रहा है और आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी दलील रख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी के संगठनात्मक निर्णयों की अनदेखी कर नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं बागी गुट का तर्क है कि उन्हें पर्याप्त विधायकों का समर्थन प्राप्त है और इसी आधार पर उन्हें मान्यता मिली है। इस विवाद ने विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और टीएमसी के आंतरिक नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर उभरे मतभेदों ने उसके सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सभी की निगाहें 11 जून को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष के पद की वैधता तय करेगा, बल्कि राज्य की विपक्षी राजनीति और टीएमसी के आंतरिक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।  

Deepshikha जून 9, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0