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Bengal politics update
बंगाल में कैसे 15 साल बाद ढहा ‘दीदी’ का किला?

कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया है। 15 साल तक सत्ता में रहने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी को करारी हार का सामना करना पड़ा, जबकि Bharatiya Janata Party (भाजपा) ने 207 सीटें जीतकर पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने का रास्ता साफ किया। यह परिणाम केवल सीटों का बदलाव नहीं, बल्कि वोटिंग पैटर्न और जनमत में बड़े बदलाव का संकेत है।   7.44% वोट स्विंग बना गेम चेंजर इस चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर 7.44% वोट स्विंग रहा। 2021 में भाजपा को 38.4% वोट मिले थे, जो 2026 में बढ़कर 45.84% हो गए। वहीं टीएमसी का वोट शेयर 48.5% से घटकर 40.80% रह गया। यानी लगभग जितना वोट टीएमसी ने खोया, उतना ही भाजपा को मिला। यही सीधा ट्रांसफर भाजपा की ऐतिहासिक जीत की वजह बना।   रिकॉर्ड वोटिंग ने बदले समीकरण इस चुनाव में करीब 92% से ज्यादा मतदान हुआ, जो अपने आप में रिकॉर्ड है। उच्च मतदान प्रतिशत का सीधा फायदा भाजपा को मिला। जिन सीटों पर 80% से अधिक मतदान हुआ, उनमें भाजपा ने भारी बढ़त बनाई। इससे साफ है कि बड़ी संख्या में मतदाता बदलाव के मूड में थे और उन्होंने खुलकर वोट किया।   ‘दीदी’ की हार और नेतृत्व पर सवाल सबसे चौंकाने वाला परिणाम खुद Mamata Banerjee की हार रही। उन्हें Suvendu Adhikari ने भवानीपुर सीट से हराया। इसके अलावा टीएमसी के 12 मंत्री भी अपनी सीट नहीं बचा सके। इससे साफ संकेत मिलता है कि जनता का असंतोष केवल सरकार से नहीं, बल्कि नेतृत्व से भी था।   टीएमसी की हार के प्रमुख कारण टीएमसी की हार के पीछे कई मुद्दे एक साथ काम करते दिखे। • कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा: RG Kar Medical College से जुड़े रेप और हत्या मामले ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया।  • भ्रष्टाचार और ‘कट मनी’ आरोप: स्थानीय स्तर पर पाड़ा क्लबों के जरिए कथित वसूली ने जनता में नाराजगी बढ़ाई।  • हिंसा की घटनाएं: Murshidabad में हुई हिंसा ने कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।  • ईडी की कार्रवाई: I-PAC से जुड़े मामलों में जांच और छापों ने राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया।  • सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी: सातवें वेतन आयोग का लागू न होना बड़ा मुद्दा बना।  इन सभी कारणों ने मिलकर सत्ता विरोधी लहर को मजबूत किया।   भाजपा की रणनीति और ‘X फैक्टर’ भाजपा की जीत केवल सत्ता विरोधी लहर का परिणाम नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का नतीजा भी थी। Narendra Modi और Amit Shah की जोड़ी ने इस बार चुनावी नैरेटिव को बदल दिया। पिछले चुनावों के विपरीत, इस बार भाजपा ने व्यक्तिगत हमलों से बचते हुए शासन, भ्रष्टाचार और विकास के मुद्दों पर फोकस किया। पार्टी ने बूथ स्तर तक संगठन मजबूत किया और स्थानीय कनेक्ट बनाने की कोशिश की। “चाय पर चर्चा”, “झालमुड़ी संवाद” जैसे कैंपेन ने आम लोगों से जुड़ाव बढ़ाया।   युवाओं और नए मतदाताओं की भूमिका इस चुनाव में युवाओं की भूमिका निर्णायक रही। राज्य में लगभग 1.5 करोड़ युवा मतदाता थे, जिनमें बड़ी संख्या पहली बार वोट डालने वालों की थी। बेरोजगारी, भर्ती घोटाले और शिक्षा से जुड़े मुद्दों ने युवाओं को टीएमसी से दूर कर दिया। शिक्षक भर्ती घोटाले और हजारों नियुक्तियों के रद्द होने से नाराजगी और बढ़ी।   चुनाव आयोग और शांतिपूर्ण मतदान पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा आम बात रही है, लेकिन इस बार चुनाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहे। चुनाव आयोग द्वारा भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती और संवेदनशील बूथों की निगरानी ने मतदाताओं का भरोसा बढ़ाया। इससे वे लोग भी वोट देने निकले जो पहले डर के कारण मतदान नहीं करते थे।   आगे की राजनीति पर असर यह जीत केवल राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकती है। भाजपा की यह सफलता पूर्वी भारत में उसकी पकड़ मजबूत करेगी, जबकि टीएमसी के लिए यह आत्ममंथन का समय है। कुल मिलाकर, 2026 का बंगाल चुनाव दिखाता है कि छोटा सा वोट स्विंग, मजबूत रणनीति और जनभावनाओं की सही समझ कैसे एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का कारण बन सकती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरती है।

Unknown मई 6, 2026 0
Manoj Tiwari quits TMC
पश्चिम बंगाल: पूर्व क्रिकेटर मनोज तिवारी ने छोड़ी TMC पार्टी, पार्टी ने लगाए गंभीर आरोप

कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद TMC को एक और बड़ा झटका लगा है। पूर्व भारतीय क्रिकेटर Manoj Tiwary ने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया है। वह TMC के विधायक थे और Mamata Banerjee सरकार में खेल राज्य मंत्री के पद पर भी कार्यरत थे।   टिकट के बदले पैसे मांगने का आरोप मनोज तिवारी ने पार्टी छोड़ते हुए TMC पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि चुनाव टिकट के लिए उनसे करोड़ों रुपये मांगे गए थे। उनके मुताबिक, हावड़ा के शिबपुर सीट से टिकट देने से इसलिए इनकार कर दिया गया क्योंकि उन्होंने करीब 5 करोड़ रुपये देने से मना कर दिया। तिवारी ने यह भी आरोप लगाया कि इस चुनाव में कई उम्मीदवारों ने टिकट पाने के लिए भारी रकम दी।   हार पर नहीं जताई हैरानी तिवारी ने TMC की हार पर आश्चर्य न जताते हुए कहा कि पार्टी में भ्रष्टाचार बढ़ गया था और विकास कार्यों की कमी थी। उन्होंने कहा कि जब पूरी व्यवस्था ही गड़बड़ हो, तो ऐसी हार स्वाभाविक है। इस चुनाव में Bharatiya Janata Party (BJP) ने 207 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया और 15 साल से चल रही TMC सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।   मेसी इवेंट पर भी उठाए सवाल तिवारी ने कोलकाता में Lionel Messi के कार्यक्रम के दौरान हुई अव्यवस्था पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आयोजन खराब था और आम लोगों को निराशा हाथ लगी। इसी वजह से उन्होंने उस कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी।   क्रिकेट करियर भी रहा शानदार मनोज तिवारी का क्रिकेट करियर भी प्रभावशाली रहा है। उन्होंने 148 फर्स्ट-क्लास मैचों में 10,000 से ज्यादा रन बनाए और भारत के लिए 12 वनडे व 3 टी20 मैच खेले।

Unknown मई 6, 2026 0
Massive voter turnout in West Bengal election sparks battle between Mamata Banerjee and Narendra Modi
बंगाल में बंपर वोटिंग: क्या ममता की वापसी या मोदी का मिशन पूरा?

West Bengal विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में रिकॉर्ड मतदान ने सियासी पारा चरम पर पहुंचा दिया है। करीब 92 फीसदी मतदान ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता इस बार चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है–क्या यह वोटिंग सत्ता परिवर्तन का संकेत है या फिर Mamata Banerjee एक बार फिर वापसी करेंगी? या Narendra Modi का बंगाल फतह का सपना पूरा होगा? रिकॉर्ड वोटिंग ने बढ़ाई धड़कनें पहले चरण में 152 सीटों पर लगभग 91.78 फीसदी मतदान हुआ। पिछले चुनाव की तुलना में यह करीब 9 फीसदी अधिक है। इतनी बड़ी बढ़ोतरी ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है। टीएमसी और बीजेपी दोनों इसे अपने पक्ष में बता रही हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में एक पुरानी कहावत है–"ज्यादा वोटिंग का मतलब हमेशा सत्ता परिवर्तन नहीं होता।" क्या SIR बना गेमचेंजर? इस बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत लाखों नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। मृतक, पलायन कर चुके और डुप्लीकेट वोटरों के नाम हटने से कुल मतदाताओं की संख्या कम हुई। ऐसे में मतदान प्रतिशत स्वाभाविक रूप से ऊपर गया। यानी सिर्फ प्रतिशत देखकर नतीजों का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। इतिहास क्या कहता है? 2011 में भारी मतदान के बीच ममता बनर्जी ने लेफ्ट के 34 साल के शासन का अंत किया था। लेकिन 2016 और 2021 में मतदान कम होने के बावजूद टीएमसी सत्ता में लौटी। दूसरी ओर, 1984 में रिकॉर्ड मतदान के बावजूद कांग्रेस ऐतिहासिक जीत दर्ज करने में सफल रही थी। वहीं 1989 में अपेक्षाकृत कम मतदान के बावजूद सत्ता बदल गई। मतलब साफ है–वोटिंग प्रतिशत अकेला पैमाना नहीं है। ममता के लिए क्या है चुनौती? ममता बनर्जी की सरकार को 15 साल पूरे हो चुके हैं। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। हालांकि, लक्ष्मी भंडार, मुफ्त राशन और अन्य कल्याणकारी योजनाएं अभी भी टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई हैं। खासकर महिला वोटरों में ममता की पकड़ मजबूत मानी जा रही है। बीजेपी की उम्मीदें क्यों बढ़ीं? बीजेपी पहली बार बंगाल में पूर्ण बहुमत का सपना देख रही है। पार्टी हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोध, NRC, घुसपैठ और केंद्र की योजनाओं को लेकर आक्रामक अभियान चला रही है। अगर बीजेपी को जीतना है, तो उसे हिंदू वोटों का भारी ध्रुवीकरण करना होगा। साथ ही, उसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी मजबूत प्रदर्शन करना होगा। मुस्लिम वोट निर्णायक बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है। यदि यह वोट एकजुट होकर टीएमसी के पक्ष में जाता है, तो बीजेपी की राह कठिन हो सकती है। लेकिन अगर Asaduddin Owaisi या अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ी मुस्लिम वोटों में सेंध लगाते हैं, तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो जाएगा। ज्यादा वोटिंग का असली मतलब इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि मतदाता उत्साहित है। वह बदलाव भी चाहता हो सकता है, और मौजूदा सरकार को बचाने के लिए भी निकल सकता है। वोटिंग का उछाल लोकतंत्र के लिए शानदार संकेत है, लेकिन नतीजों की गारंटी नहीं। आखिर बाजी किसके हाथ? फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। ममता बनर्जी के पास मजबूत संगठन, महिला वोट बैंक और कल्याणकारी योजनाओं का सहारा है। वहीं बीजेपी के पास मोदी फैक्टर, आक्रामक प्रचार और सत्ता विरोधी माहौल का भरोसा। 4 मई को ही तय होगा कि बंगाल में फिर "दीदी" का जादू चलेगा या "मोदी मैजिक" इतिहास रचेगा। अभी के लिए इतना तय है–बंगाल की लड़ाई बेहद रोमांचक और कांटे की है।  

surbhi अप्रैल 24, 2026 0
Pm modi west bengal visit
बंगाल दौरे पर पीएम मोदी ने हुगली में फोटोग्राफी कर खींचा सबका ध्यान

कोलकाता/हुगली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह हुगली नदी के तट पर समय बिताया। अपने बंगाल दौरे के दौरान पीएम मोदी ने न सिर्फ लोगों और नाविकों से मुलाकात की, बल्कि उन्होंने फोटोग्राफी में भी हाथ आजमाया। उन्होंने इस अनुभव की तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा कीं।   हुगली तट पर पीएम मोदी का दौरा और जनता से संवाद पीएम मोदी सुबह हुगली नदी पहुंचे, जहां उन्होंने मॉर्निंग वॉक कर रहे लोगों और स्थानीय नाविकों से बातचीत की। उन्होंने नाविकों की मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि उनका परिश्रम बेहद प्रेरणादायक है। इस दौरान उन्होंने नदी के किनारे खड़े होकर कई तस्वीरें भी लीं, जिसमें उनकी फोटोग्राफी में रुचि देखने को मिली।   सोशल मीडिया पर साझा की भावनाएं प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा कि गंगा का बंगाल की संस्कृति और आत्मा में विशेष स्थान है। उन्होंने इसे सभ्यता की शाश्वत चेतना से जोड़ते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। पीएम मोदी ने कहा कि यह दौरा मां गंगा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर था।   विकास और समृद्धि का संदेश पीएम मोदी ने अपने संदेश में पश्चिम बंगाल के विकास और बंगाली समाज की समृद्धि के लिए काम करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि राज्य के विकास के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।   चुनावी माहौल में बढ़ी गतिविधि गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग पूरी हो चुकी है और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। पीएम मोदी राज्य में भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।   4 मई को आएंगे नतीजे पूरे चुनावी प्रक्रिया के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। ऐसे में पीएम मोदी का यह दौरा राजनीतिक दृष्टि से भी काफी अहम माना जा रहा है, जहां वे लगातार जनता से संवाद कर रहे हैं और पार्टी के प्रचार को मजबूत कर रहे हैं।

Unknown अप्रैल 24, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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