शंघाई, एजेंसियां। चीन के शंघाई में आयोजित वर्ल्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कॉन्फ्रेंस (WAIC 2026) में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वैश्विक AI सहयोग को लेकर बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) दुनिया के विकास का नया इंजन बन सकता है, लेकिन इसके लिए सभी देशों को मिलकर सुरक्षित, पारदर्शी और समावेशी AI व्यवस्था विकसित करनी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि AI तकनीक का लाभ केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरी दुनिया को इसका फायदा मिलना चाहिए। वैश्विक AI गवर्नेंस पर दिया जोर अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने AI के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा नियम और मानक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि AI के विकास के साथ डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और नैतिक मानकों का पालन भी उतना ही जरूरी है। चीन इस दिशा में सभी देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। चीनी कंपनियों ने दिखाई नई तकनीक सम्मेलन में Huawei, Alibaba, Tencent, Baidu समेत कई प्रमुख चीनी कंपनियों ने अपने नए AI मॉडल, क्लाउड प्लेटफॉर्म, रोबोटिक्स तकनीक और स्मार्ट कंप्यूटिंग सिस्टम पेश किए। कई कंपनियों ने जनरेटिव AI, औद्योगिक ऑटोमेशन और हेल्थकेयर से जुड़े नए समाधान भी प्रदर्शित किए, जिन्हें भविष्य की तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच अहम संदेश विशेषज्ञों का मानना है कि यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब AI तकनीक को लेकर अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में चीन ने वैश्विक सहयोग की बात करके यह संकेत देने की कोशिश की है कि वह केवल तकनीकी नेतृत्व ही नहीं, बल्कि AI गवर्नेंस में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहता है। दुनियाभर के प्रतिनिधियों ने की भागीदारी सम्मेलन में कई देशों के नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, टेक कंपनियों और उद्योग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इस दौरान AI के सुरक्षित उपयोग, साइबर सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और भविष्य की तकनीकों पर व्यापक चर्चा हुई। माना जा रहा है कि इस सम्मेलन से AI क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा मिल सकती है और आने वाले समय में कई नई वैश्विक साझेदारियों का रास्ता भी खुल सकता है।
ताइपे: ताइवान के आसपास एक बार फिर चीन की समुद्री गतिविधियां बढ़ गई हैं। ताइवान के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने रविवार को बताया कि द्वीप के आसपास चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) के 5 युद्धपोत और 10 सरकारी जहाज देखे गए। हालांकि इस दौरान किसी भी चीनी सैन्य विमान की गतिविधि दर्ज नहीं की गई। मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में कहा कि ताइवान के सशस्त्र बलों ने पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर रखी और स्थिति के अनुसार आवश्यक कदम उठाए। अधिकारियों के मुताबिक, किसी भी चीनी लड़ाकू विमान की मौजूदगी नहीं मिलने के कारण इस बार विमान संबंधी कोई अलग रिपोर्ट जारी नहीं की गई। पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी गतिविधियां ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने इससे पहले भी अपने आसपास चीनी सैन्य विमान और नौसैनिक पोतों की मौजूदगी की जानकारी दी थी। हर बार ताइवान की सेना ने निगरानी बढ़ाते हुए स्थिति पर नजर रखी और आवश्यक सुरक्षा उपाय अपनाए। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इस तरह की नियमित सैन्य और समुद्री गतिविधियां ताइवान पर दबाव बनाने की उसकी रणनीति का हिस्सा हैं। चीन ने अमेरिका से क्या कहा? इसी बीच, 3 जुलाई को चीन ने अमेरिका से ताइवान से जुड़े मामलों में अतिरिक्त सावधानी बरतने की अपील की थी। भारत में चीन के राजदूत जू फीहोंग के अनुसार, चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बातचीत में दोनों देशों के बीच मतभेद कम करने और संबंधों को सही दिशा में आगे बढ़ाने पर जोर दिया। ताइवान को लेकर चीन का दावा चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और लंबे समय से 'वन चाइना' नीति पर जोर देता रहा है। दूसरी ओर, ताइवान अपनी अलग सरकार, सेना और लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ स्वतंत्र रूप से प्रशासन चला रहा है। ताइवान की राजनीतिक स्थिति आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल है। यह विवाद संप्रभुता, आत्मनिर्णय और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। इतिहास से जुड़ा है विवाद चीन का ताइवान पर दावा 1683 से जुड़ा माना जाता है, जब किंग राजवंश ने मिंग समर्थक कोक्सिंगा को हराकर द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया था। इसके बाद से ताइवान की राजनीतिक स्थिति कई ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण लगातार अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी हुई है।
बीजिंग/वॉशिंगटन: चीन ने सोमवार को प्रशांत महासागर में अपनी परमाणु पनडुब्बी (Nuclear Submarine) से बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया। इस परीक्षण के बाद अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की है। चीन ने इसे अपनी नियमित सैन्य अभ्यास गतिविधि का हिस्सा बताया है। परमाणु पनडुब्बी से हुआ मिसाइल परीक्षण चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) नेवी ने स्थानीय समयानुसार दोपहर 12:01 बजे परमाणु पनडुब्बी से एक रणनीतिक बैलिस्टिक मिसाइल का प्रक्षेपण किया। चीनी सेना का दावा है कि मिसाइल में डमी (बिना विस्फोटक) वारहेड लगाया गया था और उसने प्रशांत महासागर के खुले समुद्री क्षेत्र में निर्धारित लक्ष्य पर सफलतापूर्वक निशाना साधा। चीन का कहना है कि यह उसकी वार्षिक सैन्य प्रशिक्षण गतिविधियों का हिस्सा था और संबंधित देशों को इसकी पूर्व सूचना दे दी गई थी। अमेरिका ने जताई गंभीर चिंता अमेरिकी विदेश विभाग ने परीक्षण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन के इस कदम पर उसकी करीबी नजर थी। अमेरिका ने कहा कि जब दुनिया परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के प्रयास कर रही है, तब चीन अपने परमाणु शस्त्रागार का तेजी से विस्तार कर रहा है। अमेरिकी बयान में कहा गया कि बीजिंग का बिना पर्याप्त पारदर्शिता के परमाणु क्षमताओं का विस्तार वैश्विक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। जापान और ऑस्ट्रेलिया ने भी उठाए सवाल जापान और ऑस्ट्रेलिया ने भी चीन के मिसाइल परीक्षण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियां एशिया-प्रशांत की स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती हैं। न्यूजीलैंड ने भी चीन से अधिक पारदर्शिता बरतने और क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले सैन्य कदमों पर स्पष्ट जानकारी साझा करने की अपील की है। हथियार नियंत्रण वार्ता की अपील अमेरिका ने चीन से परमाणु हथियार नियंत्रण वार्ता में शामिल होने का आग्रह किया है। साथ ही अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) और अंतरिक्ष प्रक्षेपणों की नियमित जानकारी साझा करने की व्यवस्था अपनाने की भी मांग की है। अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने रक्षा दायित्वों का पालन करता रहेगा। क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे रणनीतिक मिसाइल परीक्षण अमेरिका और चीन के बीच पहले से जारी सैन्य प्रतिस्पर्धा को और तेज कर सकते हैं। दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच यह परीक्षण क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई बहस खड़ी कर सकता है।
मुंबई, एजेंसियां। टाटा समूह ने नेतृत्व परिवर्तन और डिजिटल विस्तार की रणनीति के तहत नई पीढ़ी को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपने की दिशा में अहम कदम उठाया है। समूह की फैशन रिटेल कंपनी ट्रेंट की प्रमुख ब्रांड ‘वेस्टसाइड’ के ई-कॉमर्स और डिजिटल मार्केटिंग की कमान अब नोएल टाटा की बेटी माया टाटा संभालेंगी। हालांकि कंपनी की ओर से इस नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की गई है, लेकिन इसे टाटा समूह की दीर्घकालिक उत्तराधिकार योजना और डिजिटल कारोबार को मजबूत करने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। डिजिटल कारोबार को मिलेगी नई दिशा 37 वर्षीय माया टाटा ने अपने करियर की शुरुआत टाटा कैपिटल से की थी। इसके बाद उन्होंने टाटा डिजिटल में काम करते हुए ई-कॉमर्स, ऑनलाइन रिटेल, ग्राहक अधिग्रहण और डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालन का व्यापक अनुभव हासिल किया। टाटा नियो, बिगबास्केट, क्रोमा और टाटा 1एमजी जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ काम करने का अनुभव उन्हें वेस्टसाइड की ओमनीचैनल और ई-कॉमर्स रणनीति का नेतृत्व करने के लिए उपयुक्त बनाता है। उनका मुख्य लक्ष्य वेस्टसाइड की ऑनलाइन मौजूदगी को मजबूत करना और ब्रांड का वैश्विक विस्तार करना होगा। नई पीढ़ी को मिल रही बड़ी जिम्मेदारियां नोएल टाटा वर्तमान में ट्रेंट के चेयरमैन हैं और नवंबर 2026 में इस पद से हटने की संभावना है। माना जा रहा है कि वे माया के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे। वहीं उनके बेटे नेविल टाटा पहले से ट्रेंट के स्टार बाजार हाइपरमार्केट डिवीजन की कमान संभाल रहे हैं, जबकि बेटी लिआ टाटा इंडियन होटल्स कंपनी (ताज) में वाइस प्रेसिडेंट हैं। तीनों भाई-बहन टाटा ट्रस्ट्स से जुड़ी संस्थाओं के बोर्ड का भी हिस्सा हैं। वेस्टसाइड का तेजी से विस्तार ट्रेंट की कुल आय में लगभग 40 प्रतिशत योगदान वेस्टसाइड का है। वित्त वर्ष 2026 में कंपनी का राजस्व करीब 19,700 करोड़ रुपये रहा। कंपनी हर साल लगभग 50 नए स्टोर खोलने की योजना पर काम कर रही है और उसके स्टोरों की संख्या बढ़कर 321 शहरों में 1,286 हो चुकी है। माया टाटा की नियुक्ति से संकेत मिलते हैं कि टाटा समूह आने वाले वर्षों में ई-कॉमर्स, डिजिटल इंटीग्रेशन और भारतीय ब्रांड्स को वैश्विक पहचान दिलाने पर विशेष जोर देगा।
बीजिंग: चीन के पश्चिमी गांसू प्रांत में मंगलवार को हुए भीषण भूस्खलन में 33 लोग मलबे में दब गए। सरकारी मीडिया के अनुसार, राहत एवं बचाव दल अब तक 17 लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने में सफल रहे हैं, जबकि 16 लोगों की तलाश जारी है। घटना के बाद स्थानीय प्रशासन, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और बचाव दलों को तत्काल मौके पर भेजा गया है। मलबा हटाने और लापता लोगों की खोज के लिए युद्धस्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दिए राहत कार्य तेज करने के निर्देश चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सभी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर फंसे हुए लोगों को जल्द से जल्द सुरक्षित निकाला जाए। उन्होंने प्रभावित लोगों को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने और राहत कार्यों में तेजी लाने पर जोर दिया। हुबेई में तूफान ने मचाई तबाही उधर, मध्य चीन के हुबेई प्रांत में सोमवार रात आए तेज तूफान और भारी बारिश ने व्यापक नुकसान पहुंचाया। अधिकारियों के अनुसार, इस प्राकृतिक आपदा में कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई, जबकि 275 लोग घायल हुए हैं। एक व्यक्ति अब भी लापता बताया जा रहा है। तेज हवाओं और भारी बारिश के कारण कई इलाकों में पेड़ उखड़ गए, बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई और यातायात बाधित हो गया। 149 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चली हवाएं चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्रों में हवाओं की रफ्तार 149 किलोमीटर प्रति घंटा तक दर्ज की गई। अगले 24 घंटों के दौरान कुछ इलाकों में 260 मिमी तक बारिश होने की संभावना जताई गई है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि लगातार बारिश के कारण कई पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बना हुआ है। सुपर टाइफून 'बावी' को लेकर भी अलर्ट चीन के मौसम विभाग ने प्रशांत महासागर में सक्रिय सुपर टाइफून 'बावी' को लेकर भी हाई अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग के अनुसार, यह शक्तिशाली तूफान 290 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार वाली हवाओं के साथ ताइवान की दिशा में बढ़ रहा है। इसके प्रभाव से तटीय क्षेत्रों में तेज हवाएं, भारी वर्षा और ऊंची समुद्री लहरें उठने की आशंका है। लोगों से सतर्क रहने की अपील प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों के लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने, स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करने और संभावित आपदा को देखते हुए सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की है। राहत एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त बचाव दल तैनात किए जा रहे हैं।
बीजिंग: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के खिलाफ जारी अभियान के तहत बड़ा कदम उठाते हुए नेशनल पीपल्स कांग्रेस (NPC) के 13 सदस्यों को उनके पदों से हटा दिया है। इनमें पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के छह वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी शामिल हैं। इस कार्रवाई को चीनी सेना में चल रहे व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। NPC ने जारी की आधिकारिक अधिसूचना नेशनल पीपल्स कांग्रेस की ओर से जारी अधिसूचना में संबंधित अधिकारियों को पद से हटाने की पुष्टि की गई है। नोटिस में उनके खिलाफ कार्रवाई के विस्तृत कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के तहत लिया गया है। किन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई? पद से हटाए गए छह वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में शामिल हैं— जनरल शू श्वेचियांग जनरल ली फेंगबियाओ जनरल गुओ पुशियाओ वांग कांगपिंग झांग मिंगहुआ यिन होंगशिंग ये अधिकारी पीएलए के विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों और कमांड में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं, जिनमें थिएटर कमांड, साइबर स्पेस फोर्स और इक्विपमेंट डेवलपमेंट डिपार्टमेंट शामिल हैं। लंबे समय से सार्वजनिक कार्यक्रमों से थे गायब रिपोर्टों के अनुसार, इन अधिकारियों की गतिविधियों को लेकर काफी समय से सवाल उठ रहे थे। कई अधिकारी लंबे समय से महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्यक्रमों और आधिकारिक आयोजनों से भी अनुपस्थित थे, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की अटकलें तेज हो गई थीं। 2012 से जारी है भ्रष्टाचार विरोधी अभियान साल 2012 में सत्ता संभालने के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन में व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान शुरू किया था। इस अभियान के तहत अब तक हजारों सरकारी और सैन्य अधिकारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की जा चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में विशेष रूप से पीएलए के शीर्ष नेतृत्व और रक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के आरोपों में पद से हटाया गया है। सेना पर नियंत्रण मजबूत करने की रणनीति विशेषज्ञों का मानना है कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना ही नहीं, बल्कि सेना पर केंद्रीय नेतृत्व का नियंत्रण और मजबूत करना भी है। शी जिनपिंग लगातार पीएलए को आधुनिक, अनुशासित और पार्टी के प्रति पूर्णतः जवाबदेह बनाने पर जोर देते रहे हैं। चीन सरकार ने इस ताजा कार्रवाई के पीछे के विशिष्ट कारणों का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया है।
चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping सात वर्षों बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात उत्तर कोरियाई नेता Kim Jong Un से होगी। यह दौरा केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं माना जा रहा, बल्कि पूर्वी एशिया में बदलते शक्ति संतुलन के बीच चीन की नई रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत भी माना जा रहा है। रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकियों से चिंतित है बीजिंग विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में रूस और उत्तर कोरिया के संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। विशेष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच रक्षा, आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ा है। इससे उत्तर कोरिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया समर्थन मिला है। चीन नहीं चाहता कि उसका पारंपरिक सहयोगी पूरी तरह रूस के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। इसी कारण बीजिंग अब प्योंगयांग के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। 2019 के बाद पहली बार आमने-सामने होंगे दोनों नेता शी जिनपिंग आखिरी बार 2019 में उत्तर कोरिया गए थे। उस समय अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता विफल होने के बाद चीन और उत्तर कोरिया के संबंध काफी मजबूत दिखाई दिए थे। बाद के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ दूरी देखने को मिली। ऐसे में सात साल बाद हो रही यह यात्रा दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कूटनीतिक तौर पर किम जोंग उन के लिए बड़ी उपलब्धि हाल के महीनों में चीन और उत्तर कोरिया के रिश्तों में तनाव की चर्चाएं भी सामने आई थीं। कुछ महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में चीनी प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति ने इन अटकलों को और बढ़ाया था। ऐसे माहौल में चीन के राष्ट्रपति का प्योंगयांग पहुंचना उत्तर कोरिया के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। इससे किम जोंग उन की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को भी मजबूती मिल सकती है। सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता भी अहम मुद्दा चीन और उत्तर कोरिया के बीच करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा है। बीजिंग के लिए यह सीमा रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। चीन चाहता है कि उसके पड़ोस में किसी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता या सैन्य संकट पैदा न हो। इसके अलावा उत्तर कोरिया अपनी नई विकास योजनाओं के तहत पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। चीन की कंपनियां और निवेशक भी इसमें अवसर तलाश रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम पर भी हो सकती है चर्चा उत्तर कोरिया का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। चीन लगातार कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता और संवाद की वकालत करता रहा है। वहीं उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा बताता है। माना जा रहा है कि शी जिनपिंग इस यात्रा के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु मुद्दों पर भी चर्चा कर सकते हैं। चीन का बड़ा लक्ष्य: प्योंगयांग पर प्रभाव बनाए रखना विश्लेषकों के अनुसार इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य उत्तर कोरिया पर चीन का राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बनाए रखना है। रूस के बढ़ते प्रभाव के बीच बीजिंग यह संदेश देना चाहता है कि पूर्वी एशिया की सुरक्षा और क्षेत्रीय राजनीति में उसकी भूमिका अब भी केंद्रीय बनी हुई है। शी जिनपिंग और किम जोंग उन की यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि यह रूस, अमेरिका और पूरे पूर्वी एशिया की भू-राजनीति पर भी असर डाल सकती है।
चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping अगले सप्ताह उत्तर कोरिया की राजधानी Pyongyang का दौरा करेंगे। सात वर्षों बाद होने जा रही यह यात्रा चीन और उत्तर कोरिया के संबंधों के लिए अहम मानी जा रही है। चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार, शी जिनपिंग 8 और 9 जून को उत्तर कोरिया के नेता Kim Jong Un के निमंत्रण पर राजकीय यात्रा पर रहेंगे। इस दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। परमाणु कार्यक्रम पर हो सकती है अहम बातचीत इस दौरे की घोषणा ऐसे समय हुई है जब उत्तर कोरिया ने हाल ही में एक नई सुविधा का खुलासा किया है, जिसे परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्योंगयांग के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और पूर्वी एशिया की रणनीतिक स्थिति पर दोनों नेताओं के बीच विस्तृत चर्चा हो सकती है। उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले से चिंता जताता रहा है। रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकियां भी चर्चा में हाल के वर्षों में उत्तर कोरिया और रूस के बीच संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। रक्षा सहयोग, सैन्य संपर्क और विभिन्न रणनीतिक समझौतों ने दोनों देशों को और करीब लाया है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उत्तर कोरिया पर उसका पारंपरिक प्रभाव बरकरार रहे। ऐसे में शी जिनपिंग की यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से भी जुड़ी हुई मानी जा रही है। बीजिंग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है प्योंगयांग? चीन लंबे समय से उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक दबावों के बीच बीजिंग ने कई मौकों पर प्योंगयांग का समर्थन किया है। चीन के लिए उत्तर कोरिया केवल पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वी एशिया में उसकी रणनीतिक सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। इसलिए कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता बनाए रखना बीजिंग की प्राथमिकताओं में शामिल है। अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया की भी नजर शी जिनपिंग की यात्रा पर अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया समेत कई देशों की करीबी नजर रहेगी। इन देशों को आशंका है कि चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस दौरे के बाद परमाणु नीति, सैन्य सहयोग और क्षेत्रीय रणनीति को लेकर नए संकेत मिल सकते हैं। 2019 के बाद पहली उत्तर कोरिया यात्रा शी जिनपिंग इससे पहले वर्ष 2019 में उत्तर कोरिया गए थे। उससे पहले किसी चीनी राष्ट्रपति की प्योंगयांग यात्रा 2005 में हुई थी। ऐसे में सात साल बाद होने वाली यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ सकती है नई हलचल पूर्वी एशिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात, रूस-उत्तर कोरिया संबंधों की मजबूती और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के बीच शी जिनपिंग का प्योंगयांग दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जा रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि इस मुलाकात से चीन-उत्तर कोरिया साझेदारी को नई मजबूती मिलती है या फिर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में कोई नया संदेश सामने आता है।
Donald Trump और Xi Jinping के बीच हालिया बातचीत और रिश्तों में नरमी की चर्चाओं के बीच अमेरिका में चीन के खिलाफ बड़ा कदम उठाया गया है। अमेरिकी संसद में एक नया विधेयक पेश किया गया है, जिसका मकसद चीन की सेना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी कंपनियों पर तेजी से प्रतिबंध लगाना है। इस कदम को अमेरिका की चीन के खिलाफ रणनीतिक और आर्थिक सख्ती के रूप में देखा जा रहा है। क्या है CCP Sanctions Shot Clock Act? अमेरिका में रिपब्लिकन सांसद Rick Scott और Elise Stefanik ने ‘CCP Sanctions Shot Clock Act’ नाम का विधेयक पेश किया है। इस कानून के तहत अमेरिकी ट्रेजरी विभाग को उन चीनी कंपनियों और व्यक्तियों पर एक साल के भीतर कार्रवाई करनी होगी, जिन्हें अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना गया है। यह विधेयक वित्त वर्ष 2026 के National Defense Authorization Act में संशोधन के रूप में लाया गया है। अब तय समय सीमा में लगेगा बैन मौजूदा व्यवस्था में अमेरिकी राष्ट्रपति हर दो साल में उन चीनी कंपनियों और नागरिकों की रिपोर्ट जारी करते हैं, जिन्हें चीन के सैन्य-औद्योगिक नेटवर्क से जुड़ा माना जाता है। लेकिन अभी तक अमेरिकी ट्रेजरी विभाग पर इन संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डालने की कोई तय समय सीमा नहीं थी। नए प्रस्ताव के अनुसार, राष्ट्रपति की रिपोर्ट आने के बाद ट्रेजरी विभाग को एक साल के भीतर संबंधित कंपनियों और व्यक्तियों को “Non-SDN Chinese Military-Industrial Complex Companies List” में शामिल करना होगा। इसके बाद इस सूची को आधिकारिक रूप से फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया जाएगा। “कम्युनिस्ट चीन हमारा दुश्मन” सीनेटर रिक स्कॉट ने चीन पर बेहद सख्त बयान दिया। उन्होंने कहा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अमेरिका के लिए सीधा खतरा है और अब कार्रवाई में देरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “जो संस्थाएं चीनी सैन्य हितों के लिए काम कर रही हैं, उन्हें अमेरिका में कारोबार करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। कम्युनिस्ट चीन हमारा दुश्मन है और अब उसी हिसाब से कार्रवाई का समय आ गया है।” चीन पर आर्थिक निर्भरता घटाने की रणनीति एलिस स्टेफानिक ने कहा कि यह कानून रिपब्लिकन पार्टी की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य चीन से जुड़ी आर्थिक निर्भरता कम करना है। उन्होंने कहा कि चीन के सैन्य विस्तार और दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ अमेरिका को तेजी से कार्रवाई करनी होगी। स्टेफानिक के मुताबिक, कांग्रेस पहले ही प्रशासन से ऐसी चीनी कंपनियों की रिपोर्ट मांग चुकी है, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार धीमी रही। नया कानून इसी प्रक्रिया को तेज करने के लिए लाया गया है। ट्रंप-शी रिश्तों पर पड़ सकता है असर यह विधेयक ऐसे समय पेश किया गया है जब हाल ही में ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच रिश्तों में सुधार की चर्चाएं हो रही थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह कानून पास होता है, तो अमेरिका-चीन संबंधों में फिर तनाव बढ़ सकता है। खासकर तकनीक, रक्षा, चिप निर्माण और वैश्विक व्यापार से जुड़ी चीनी कंपनियों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। वैश्विक बाजार पर भी दिख सकता है असर अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ती सख्ती का असर वैश्विक बाजार, सप्लाई चेन और निवेश माहौल पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में अमेरिका चीन की सैन्य और टेक कंपनियों पर और ज्यादा आर्थिक दबाव बना सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है।
Vladimir Putin ने बुधवार को China की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले Donald Trump चीन दौरे पर गए थे। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा बीजिंग में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इनमें प्रमुख रूप से: ईरान संकट यूक्रेन युद्ध वैश्विक व्यापार पश्चिम एशिया की स्थिति ऊर्जा सुरक्षा रणनीतिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने तथा बदलते वैश्विक हालात में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में हुआ स्वागत बीजिंग स्थित Great Hall of the People में शी जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच विस्तृत वार्ता हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन मंगलवार रात बीजिंग पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ने किया। पुतिन बोले- रिश्ते अभूतपूर्व स्तर पर चीन यात्रा से पहले जारी अपने वीडियो संदेश में पुतिन ने कहा कि रूस और चीन के संबंध “अभूतपूर्व स्तर” तक पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे उच्चस्तरीय संपर्क रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बना रहे हैं और सहयोग की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। चीन ने क्या कहा? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने कहा कि शी जिनपिंग और पुतिन के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुतिन की 25वीं चीन यात्रा है, जो दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाती है। ट्रंप की यात्रा के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। 14 और 15 मई को ट्रंप ने चीन का दौरा किया था, जहां उनकी और शी जिनपिंग की बातचीत में भी ईरान, यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद पुतिन का बीजिंग पहुंचना चीन-रूस संबंधों की रणनीतिक गहराई को दिखाता है। ईरान और होर्मुज संकट पर भी फोकस पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर Iran द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े कदमों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ गई है। रूस, चीन और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से आयात करता रहा है। वैश्विक राजनीति में बढ़ती रूस-चीन साझेदारी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की हाई-प्रोफाइल चीन यात्रा खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin का बीजिंग दौरा वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या China खुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में नए वैश्विक शक्ति केंद्र के तौर पर स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक पुतिन दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर मंगलवार को चीन पहुंचेंगे। यह दौरा चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के निमंत्रण पर हो रहा है। क्रेमलिन ने भी इस यात्रा की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों नेता रणनीतिक साझेदारी, ऊर्जा सहयोग, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक चर्चा करेंगे। ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद क्यों अहम है पुतिन का दौरा? ट्रंप ने 13 से 15 मई तक चीन का दौरा किया था। करीब एक दशक में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पहली चीन यात्रा थी। इस दौरान ट्रंप के साथ अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों के कई सीईओ भी मौजूद थे। हालांकि यात्रा के बाद कोई बड़ा व्यापारिक समझौता सामने नहीं आया। इसी के कुछ दिनों बाद पुतिन का चीन जाना कई रणनीतिक संकेत दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग अब खुद को ऐसी शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है जो अमेरिका और रूस दोनों के साथ अलग-अलग स्तर पर संवाद बनाए रख सके। चीन-रूस साझेदारी लगातार मजबूत रूस और चीन के संबंध पिछले कुछ वर्षों में तेजी से गहरे हुए हैं। दोनों देशों ने फरवरी 2022 में “असीमित रणनीतिक साझेदारी” (No Limits Partnership) की घोषणा की थी। यह समझौता रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के ठीक पहले हुआ था। युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, लेकिन चीन ने न तो रूस की खुलकर आलोचना की और न ही पश्चिमी प्रतिबंधों का समर्थन किया। इसके उलट दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा और रक्षा सहयोग बढ़ता गया। रॉयटर्स के अनुसार, पुतिन और शी जिनपिंग पिछले कुछ वर्षों में 40 से अधिक बार मुलाकात कर चुके हैं। पिछले साल दोनों देशों ने “पावर ऑफ साइबेरिया 2” गैस पाइपलाइन परियोजना को आगे बढ़ाने पर भी समझौता किया था, जिससे रूस की ऊर्जा आपूर्ति चीन की ओर और बढ़ेगी। क्या बदल रहा है वैश्विक शक्ति संतुलन? विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया धीरे-धीरे “मल्टीपोलर वर्ल्ड” यानी बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। अब केवल अमेरिका ही वैश्विक राजनीति का केंद्र नहीं रह गया है। चीन, रूस, भारत और खाड़ी देशों जैसी शक्तियां भी अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को प्रभावित कर रही हैं। चीन की रणनीति केवल सैन्य या आर्थिक ताकत तक सीमित नहीं है। बीजिंग: BRICS और SCO जैसे मंचों के जरिए प्रभाव बढ़ा रहा है डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बड़े निवेश कर रहा है AI, चिप्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना चाहता है चीन के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हालांकि चीन की बढ़ती ताकत से अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता बढ़ी है, लेकिन बीजिंग के सामने कई मुश्किलें भी हैं। ताइवान मुद्दा, पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी टकराव, आर्थिक सुस्ती और सप्लाई चेन शिफ्ट जैसी चुनौतियां चीन के लिए बड़ी परीक्षा बनी हुई हैं। इसके अलावा रूस के साथ अत्यधिक नजदीकी भी चीन के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, क्योंकि इससे पश्चिमी देशों के साथ उसका तनाव और बढ़ सकता है। नया वर्ल्ड ऑर्डर या नई शक्ति प्रतिस्पर्धा? पुतिन की चीन यात्रा और ट्रंप के हालिया दौरे ने यह साफ कर दिया है कि दुनिया अब तेजी से बदलते भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर चुकी है। चीन खुद को केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि नए वैश्विक संतुलन की धुरी के रूप में स्थापित करना चाहता है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि दुनिया पूरी तरह चीन केंद्रित हो गई है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति अधिक प्रतिस्पर्धी, बहुध्रुवीय और रणनीतिक गठबंधनों पर आधारित होने वाली है।
United States के व्यापार प्रतिनिधि Jamieson Greer ने दावा किया है कि China ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वह Iran की मदद नहीं करेगा। एबीसी न्यूज को दिए इंटरव्यू में ग्रीर ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का मुख्य फोकस इस बात पर था कि चीन, ईरान के समर्थन में कोई कदम न उठाए। ग्रीर ने कहा, “हमें चीन की ओर से इसकी प्रतिबद्धता मिली है और उन्होंने इसकी पुष्टि भी की है।” होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी बयान ग्रीर ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने चीन से Strait of Hormuz को दोबारा खोलने के लिए किसी सैन्य हस्तक्षेप की मांग नहीं की थी। उन्होंने कहा कि चीन खुद भी इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को खुला रखना चाहता है, क्योंकि इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई पर पड़ता है। ग्रीर के मुताबिक, “राष्ट्रपति ट्रंप चीन की सैन्य मदद नहीं चाहते। अमेरिका सिर्फ यह सुनिश्चित करना चाहता है कि चीन, अमेरिका द्वारा उठाए जा रहे कदमों में बाधा न बने।” ट्रंप-शी जिनपिंग बातचीत में टैरिफ मुद्दा नहीं उठा हाल के महीनों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव और टैरिफ विवाद चर्चा में रहे हैं। हालांकि ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उनकी और Xi Jinping के बीच हुई बातचीत में टैरिफ का मुद्दा नहीं उठा। ग्रीर ने इस पर कहा कि व्यापार वार्ता जरूर हुई थी, लेकिन वह शीर्ष नेताओं के स्तर पर नहीं थी। उन्होंने बताया कि अमेरिका की ओर से उन्होंने, वित्त मंत्री Scott Bessent और उनकी टीम ने चीनी अधिकारियों के साथ टैरिफ समेत कई मुद्दों पर चर्चा की। ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ बनाने पर विचार ग्रीर ने यह भी बताया कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक नियमों और विवादों को व्यवस्थित करने के लिए ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ बनाने पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि चीन ने कई अमेरिकी मीट निर्यात इकाइयों से आयात फिर शुरू करने, कुछ बायोटेक मामलों की समीक्षा करने और 200 Boeing विमानों की खरीद पर सहमति जताई है। हालांकि चीन की ओर से अब तक इन समझौतों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने पर जोर ग्रीर ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच कई “ठोस कदम” पहले ही शुरू हो चुके हैं और सबसे अहम बात यह है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक स्थिरता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका-चीन संबंध आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपनी तीन दिवसीय चीन यात्रा के बाद दावा किया है कि अमेरिका और चीन इस बात पर सहमत हैं कि Iran के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए और होर्मुज जलडमरूमध्य हर हाल में खुला रहना चाहिए। ट्रंप ने यह बयान चीन से लौटते समय एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिया। उन्होंने बताया कि उनकी चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के साथ मध्य पूर्व, ताइवान और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। ‘होर्मुज खुला रहना बेहद जरूरी’ ट्रंप ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसे खुला रखा जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी नौसैनिक दबाव और नाकेबंदी के कारण पिछले ढाई सप्ताह में ईरान को प्रतिदिन लगभग 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। ट्रंप ने कहा, “राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी बहुत जोर देकर कहा कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते और होर्मुज स्ट्रेट खुला रहना चाहिए।” ईरान को लेकर अमेरिका-चीन की ‘अच्छी समझ’ ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि ईरान और ताइवान के मुद्दों पर अमेरिका और चीन के बीच “अच्छी समझ” बनी है। उन्होंने कहा, “हमने ईरान और ताइवान दोनों मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। मुझे लगता है कि इन विषयों पर हमारी समझ काफी अच्छी रही।” हालांकि चीन की ओर से ट्रंप के इन दावों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ताइवान मुद्दे पर भी हुई चर्चा ट्रंप ने बताया कि शी चिनफिंग ने ताइवान को लेकर अपनी चिंताएं स्पष्ट रूप से रखीं। उनके अनुसार, चीनी राष्ट्रपति नहीं चाहते कि ताइवान में किसी तरह का स्वतंत्रता संघर्ष या सैन्य टकराव हो, क्योंकि इससे बड़ा क्षेत्रीय संकट पैदा हो सकता है। ट्रंप ने कहा, “मैंने उनकी बात पूरी तरह सुनी। मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है।” ताइवान को हथियार बिक्री पर क्या बोले ट्रंप? प्रेस वार्ता के दौरान ट्रंप से 1982 के उस अमेरिकी आश्वासन को लेकर सवाल पूछा गया जिसमें कहा गया था कि अमेरिका ताइवान को हथियार बिक्री के मामलों में चीन से सलाह नहीं लेगा। इस पर ट्रंप ने कहा, “1982 बहुत पुरानी बात हो चुकी है। हमने ताइवान और हथियारों की बिक्री पर चर्चा की। यह एक अहम मुद्दा है और मैं जल्द इस पर फैसला लूंगा।” वैश्विक तनाव के बीच अहम मानी जा रही यात्रा ट्रंप की यह चीन यात्रा ऐसे समय हुई जब मध्य पूर्व में तनाव, ईरान संकट और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और चीन वास्तव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और समुद्री सुरक्षा को लेकर साझा रुख अपनाते हैं, तो इसका असर वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
Donald Trump के चीन दौरे का एक खास वीडियो सामने आया है, जिसमें वह चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के साथ बीजिंग के मशहूर झोंगनानहाई गार्डन में घूमते नजर आ रहे हैं। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच हल्की-फुल्की बातचीत भी हुई, जिसने सबका ध्यान खींच लिया। गुलाब देखकर प्रभावित हुए ट्रंप गार्डन में टहलते वक्त ट्रंप वहां लगे खूबसूरत गुलाबों को देखकर काफी प्रभावित दिखे। उन्होंने कहा कि उन्होंने इतने सुंदर गुलाब पहले कभी नहीं देखे। इस पर शी जिनपिंग ने मुस्कुराते हुए मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि वह ट्रंप को इन गुलाबों के बीज भेजेंगे। दोनों नेताओं के बीच हुई यह बातचीत कैमरे में कैद हो गई, जिसका वीडियो न्यूज एजेंसी PTI ने जारी किया है। कई अहम मुद्दों पर हुई बातचीत चीन दौरे के दौरान ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय संबंधों से लेकर वैश्विक मुद्दों तक पर विस्तृत चर्चा हुई। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, दोनों नेताओं ने कई नए साझा समझौतों पर भी सहमति जताई है। बताया गया है कि दोनों नेताओं ने गुरुवार को दो अलग-अलग दौर की बैठकें कीं, जिनमें व्यापार, रणनीतिक सहयोग और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। साथ में किया लंच बैठकों के अलावा ट्रंप और शी जिनपिंग ने साथ में लंच भी किया। दोनों नेताओं के बीच दिखी गर्मजोशी को हाल के महीनों में अमेरिका-चीन संबंधों में आई नरमी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। तीन दिवसीय दौरे का आखिरी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप शुक्रवार को अपनी तीन दिवसीय चीन यात्रा समाप्त कर लौटेंगे। यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यापार, टैरिफ और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर तनाव बना हुआ था। ऐसे में इस मुलाकात को वैश्विक राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर पूर्व राष्ट्रपति Joe Biden पर निशाना साधते हुए दावा किया कि उनके कार्यकाल में अमेरिका ने तेज़ प्रगति की, जबकि देश की गिरावट बाइडेन प्रशासन के दौरान हुई। ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping के उस बयान का जिक्र किया जिसमें अमेरिका को “गिरावट की ओर बढ़ता देश” बताया गया था। ट्रंप ने कहा कि वह शी जिनपिंग की बात से “100 फीसदी सहमत” हैं, लेकिन यह टिप्पणी उनके कार्यकाल पर नहीं बल्कि बाइडेन सरकार के दौर पर लागू होती है। ‘बाइडेन के समय देश कमजोर हुआ’ ट्रंप ने कहा कि बाइडेन प्रशासन के चार वर्षों में अमेरिका को आर्थिक और सामाजिक स्तर पर काफी नुकसान हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि खुली सीमाओं, ज्यादा टैक्स, गलत व्यापार समझौतों और बढ़ते अपराध ने देश को कमजोर किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर किए गए पोस्ट में ट्रंप ने ट्रांसजेंडर नीतियों, महिलाओं के खेलों में पुरुषों की भागीदारी और DEI (डाइवर्सिटी, इक्विटी और इन्क्लूजन) नीतियों की भी आलोचना की। ‘मेरे नेतृत्व में अमेरिका ने जबरदस्त उछाल देखा’ ट्रंप ने दावा किया कि उनके नेतृत्व में अमेरिका ने केवल 16 महीनों में बड़ी आर्थिक सफलता हासिल की। उन्होंने कहा कि शेयर बाजार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, 401K निवेश मजबूत हुए और अमेरिका फिर से आर्थिक ताकत के रूप में उभरा। उन्होंने यह भी कहा कि उनके कार्यकाल में अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली बनी रही और ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया गया। ट्रंप ने वेनेजुएला के साथ रिश्तों में सुधार और रिकॉर्ड निवेश आने का भी दावा किया। ‘शी जिनपिंग ने दी थी बधाई’ ट्रंप ने अपने बयान में दावा किया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खुद उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें बधाई दी थी। उन्होंने कहा कि उनके शासनकाल में रोजगार के अवसर बढ़े और कई नीतिगत बदलावों ने अमेरिका को मजबूत बनाया। हालांकि ट्रंप के इन दावों पर विपक्षी डेमोक्रेटिक नेताओं की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का चीन दौरा वैश्विक राजनीति में नई चर्चा का विषय बन गया है। करीब नौ वर्षों बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति Beijing पहुंचा है। यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और भारत के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं दिख रही, जबकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अमेरिका की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर, भारत और China के बीच भी सीमाई और रणनीतिक मुद्दों को लेकर भरोसे की कमी बनी हुई है। ऐसे में ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच बढ़ती नरमी और सकारात्मक संकेतों को भारत बेहद ध्यान से देख रहा है। तनाव के बाद दिखी नरमी पिछले कई महीनों से अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ विवाद, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव जारी था। इसके बावजूद ट्रंप ने शी जिनपिंग को “महान नेता” और “मित्र” कहकर संबंधों में नरमी का संकेत दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब टकराव के बजाय स्थिर संबंधों की दिशा में बढ़ना चाहती हैं। हालांकि इसे सीधे तौर पर भारत के खिलाफ नहीं माना जा रहा, लेकिन इसके रणनीतिक असर को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। भारत के लिए क्यों अहम है यह समीकरण? भारत लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलने की नीति अपनाता रहा है। भारत की कोशिश रहती है कि उसके किसी भी देश से रिश्ते दूसरे देश के खिलाफ न दिखें। India के लिए अमेरिका और चीन दोनों ही बड़े व्यापारिक साझेदार हैं। तकनीक, रक्षा, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला जैसे कई क्षेत्रों में भारत की दोनों देशों पर अलग-अलग स्तर पर निर्भरता भी है। भारत लगातार बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और “मल्टीपोलर एशिया” की बात करता रहा है। लेकिन मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और एशिया में चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए रणनीतिक संतुलन की चुनौती पैदा करती है। एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं? भारत-अमेरिका संबंधों के विशेषज्ञ और रणनीतिक मामलों के जानकार Ashley Tellis ने पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था कि ट्रंप की नीतियों से पैदा हुई अनिश्चितताएं भारत को असहज करती हैं और इससे अमेरिका के साथ गहरी साझेदारी को लेकर भारत की सतर्कता बढ़ती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत की रणनीतिक हिचकिचाहट केवल ट्रंप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पुरानी विदेश नीति और खुद महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा से जुड़ी हुई है। टेलिस के मुताबिक, चीन की बढ़ती ताकत और उसका आक्रामक रुख भारत के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती है। ऐसे में अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी भारत की आवश्यकता बनी रहेगी, क्योंकि अकेले भारत के लिए चीन का संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। भारत के सामने संतुलन की चुनौती विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिका और चीन के संबंधों में स्थिरता आती है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर भी पड़ सकता है। भारत को ऐसे माहौल में अपनी विदेश नीति को बेहद संतुलित और व्यावहारिक तरीके से आगे बढ़ाना होगा। फिलहाल नई दिल्ली की नजर इस बात पर है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल कूटनीतिक नरमी तक सीमित रहती है या आने वाले समय में यह वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करती है।
व्यापार, ईरान और ताइवान मुद्दे पर हुई बड़ी बातचीत Donald Trump और Xi Jinping के बीच गुरुवार को बीजिंग में हाई-प्रोफाइल शिखर वार्ता हुई। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब वैश्विक स्तर पर व्यापार तनाव, ईरान संकट और भू-राजनीतिक अस्थिरता तेजी से बढ़ रही है। बैठक की शुरुआत बीजिंग के Great Hall of the People में औपचारिक स्वागत समारोह के साथ हुई। इस दौरान सैन्य सम्मान दिया गया और बच्चों ने चीन तथा अमेरिका के झंडे लहराकर दोनों नेताओं का स्वागत किया। ट्रंप ने की शी जिनपिंग की तारीफ वार्ता की शुरुआत में ट्रंप ने शी जिनपिंग की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंध पहले से बेहतर दिशा में बढ़ रहे हैं। ट्रंप ने कहा, “आप एक महान नेता हैं। लोग शायद मुझे यह कहते हुए पसंद न करें, लेकिन मैं फिर भी कहता हूं।” उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और चीन के रिश्ते “पहले से ज्यादा मजबूत” हो सकते हैं। वहीं शी जिनपिंग ने भी नरम रुख अपनाते हुए कहा कि चीन और अमेरिका को “प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि साझेदार” बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थिर चीन-अमेरिका संबंध पूरी दुनिया के लिए फायदेमंद हैं और टकराव दोनों देशों को नुकसान पहुंचाएगा। व्यापार और टैरिफ विवाद पर फोकस बैठक में व्यापार और टैरिफ विवाद प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा। पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच लगाए गए जवाबी टैरिफ से वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ है। दोनों पक्ष फिलहाल एक अस्थायी व्यापार समझौते को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वैश्विक बाजार भी इस बैठक पर नजर बनाए हुए हैं क्योंकि इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश पर पड़ सकता है। ईरान युद्ध और तेल संकट पर भी चर्चा ईरान-इजरायल संघर्ष और Hormuz Strait में बढ़ते तनाव को लेकर भी दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई। अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर अपना प्रभाव इस्तेमाल कर क्षेत्रीय तनाव कम करने में मदद करे। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा है। AI, सेमीकंडक्टर और ताइवान भी एजेंडे में दोनों देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर तकनीक और ताइवान मुद्दे को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि इन विषयों पर भी शिखर वार्ता में विस्तृत चर्चा हुई। ट्रंप के साथ अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio, रक्षा मंत्री Pete Hegseth, कारोबारी Elon Musk और Nvidia CEO Jensen Huang भी चीन पहुंचे हैं। वैश्विक बाजारों की नजर इस बैठक पर विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक से किसी बड़े समझौते की संभावना भले कम हो, लेकिन दोनों देश तनाव को और बढ़ने से रोकने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस वार्ता का असर वैश्विक राजनीति, व्यापार और बाजारों पर देखने को मिल सकता है।
बीजिंग में शुरू हुई हाई-प्रोफाइल शिखर वार्ता Donald Trump और Xi Jinping के बीच गुरुवार को बीजिंग में दो दिवसीय अहम बैठक शुरू हुई। इस वार्ता में व्यापार समझौते, ईरान युद्ध और ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ट्रंप ने इस बैठक को “अब तक की सबसे बड़ी समिट” बताया और शी जिनपिंग को महान नेता और अपना मित्र कहा। भव्य स्वागत के साथ हुई मुलाकात बैठक की शुरुआत बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में हुई, जहां ट्रंप का भव्य स्वागत किया गया। दोनों नेताओं ने रेड कार्पेट पर हाथ मिलाया और गर्मजोशी से बातचीत की। चीनी सैनिकों की परेड और बच्चों द्वारा अमेरिकी-चीनी झंडे लहराने के बीच यह मुलाकात दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी रही। व्यापार समझौता सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिका और चीन के बीच पिछले कई महीनों से जारी व्यापार तनाव इस बैठक का सबसे अहम मुद्दा माना जा रहा है। पिछले साल दोनों देशों के बीच एक अस्थायी व्यापार समझौता हुआ था, जिसके तहत अमेरिका ने चीन पर भारी टैरिफ लगाने का फैसला टाल दिया था। अब अमेरिका चाहता है कि चीन अपने बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए ज्यादा खोले। ट्रंप के साथ इस दौरे पर कई बड़े कारोबारी भी पहुंचे हैं, जिनमें Elon Musk और Jensen Huang शामिल हैं। ईरान युद्ध पर भी चर्चा बैठक में मध्य पूर्व का तनाव भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डाले ताकि युद्ध और तनाव कम किया जा सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ईरान के खिलाफ खुलकर कदम उठाने से बच सकता है, क्योंकि तेहरान को वह अमेरिका के खिलाफ रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है। ताइवान पर बढ़ सकता है तनाव Taiwan को अमेरिकी हथियारों की बिक्री भी बैठक में संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। चीन ने हाल ही में अमेरिका के प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के रक्षा पैकेज का विरोध किया है। बीजिंग का कहना है कि ताइवान चीन का हिस्सा है और बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। ट्रंप पर घरेलू दबाव इस यात्रा को ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है। मध्य पूर्व युद्ध और बढ़ती महंगाई के कारण उनकी लोकप्रियता प्रभावित हुई है। ऐसे में चीन दौरे को उनकी बड़ी कूटनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन विशेषज्ञों का कहना है कि 2017 की तुलना में अब अमेरिका-चीन संबंधों का समीकरण काफी बदल चुका है। पहले जहां चीन अमेरिका को प्रभावित करने की कोशिश करता था, अब अमेरिका खुद चीन की वैश्विक ताकत को खुलकर स्वीकार करता दिख रहा है। दोनों नेताओं के बीच आने वाले दिनों में कई दौर की बातचीत और औपचारिक कार्यक्रम होने हैं, जिन पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump चीन की बहुप्रतीक्षित यात्रा पर पहुंचे, जहां उनके साथ टेक दिग्गज कंपनी Jensen Huang समेत कई बड़े अमेरिकी कॉरपोरेट नेता भी मौजूद रहे। इस दौरे का मकसद चीन-अमेरिका व्यापार संबंधों को नए सिरे से मजबूत करना और बीजिंग में अमेरिकी कंपनियों के लिए बाजार खोलने की मांग रखना बताया जा रहा है। व्यापार और कूटनीति एक साथ, ट्रंप का ‘ओपन चाइना’ एजेंडा ट्रंप ने चीन रवाना होने से पहले कहा कि वह चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से अपील करेंगे कि चीन अमेरिकी कंपनियों के लिए अपने बाजार को “अधिक खुला” बनाए। उन्होंने इसे अमेरिकी व्यापार जगत के लिए बड़ा अवसर बताया और कहा कि यह उनकी प्राथमिक प्राथमिकताओं में शामिल होगा। इस यात्रा को अमेरिका-चीन के बीच नाजुक व्यापार संघर्ष को संतुलित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। टेक कंपनियों के सीईओ भी डेलिगेशन में शामिल इस बार ट्रंप अपने साथ केवल राजनीतिक प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि बड़े कॉर्पोरेट नेताओं को भी लेकर गए हैं। इनमें विशेष रूप से Nvidia के सीईओ जेंसन हुआंग शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, हुआंग को अंतिम समय में इस यात्रा में शामिल किया गया, क्योंकि Nvidia चीन में अपने एडवांस AI चिप्स की बिक्री के लिए नियामक मंजूरी पाने की कोशिश कर रही है। टेक इंडस्ट्री के अन्य प्रमुख अधिकारी भी इस डेलिगेशन का हिस्सा हैं, जो चीन में व्यापारिक अवसरों को फिर से खोलने की उम्मीद कर रहे हैं। व्यापार समझौते और वैश्विक तनाव एक साथ यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव पहले से ही संवेदनशील स्थिति में है। पिछले साल हुए अस्थायी व्यापार समझौते को बनाए रखने के लिए दोनों देशों के अधिकारी लगातार बातचीत कर रहे हैं। इसी बीच अमेरिका ईरान संकट और ताइवान मुद्दे को भी चीन के साथ वार्ता में शामिल कर रहा है, जिससे यह दौरा और अधिक जटिल हो गया है। ईरान और ताइवान मुद्दा भी बातचीत के केंद्र में अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मध्य पूर्व में तनाव कम करने में मदद करे। वहीं दूसरी ओर, ताइवान को लेकर बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और अमेरिका की सैन्य बिक्री और समर्थन का विरोध करता रहा है। व्यापार संतुलन और सेमीकंडक्टर नीति पर फोकस वार्ता में सबसे अहम मुद्दों में से एक सेमीकंडक्टर और AI चिप्स का व्यापार है। अमेरिका चीन को उच्च तकनीक वाले चिप्स की बिक्री पर प्रतिबंध में ढील चाहता है, जबकि चीन अमेरिकी कृषि और ऊर्जा उत्पादों के बड़े आयात की मांग कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बातचीत वैश्विक तकनीकी सप्लाई चेन पर बड़ा असर डाल सकती है। ट्रंप की कूटनीति पर वैश्विक नजरें ट्रंप इस यात्रा के जरिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए नए व्यापारिक समझौते और निवेश की उम्मीद कर रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार चीन अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है, जिससे बातचीत और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि बीजिंग में होने वाली यह बैठक अमेरिका-चीन रिश्तों को नई दिशा देती है या तनाव को और बढ़ाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump 13 से 15 मई तक चीन दौरे पर रहने वाले हैं। यह दौरा अमेरिका-चीन संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। करीब एक दशक बाद कोई मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति चीन जा रहा है। इससे पहले ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में 2017 में चीन का दौरा किया था। हालांकि ट्रंप कई बार चीन के खिलाफ सख्त बयान दे चुके हैं, लेकिन उन्होंने हाल के दिनों में चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping की खुलकर तारीफ भी की है। पिछले सप्ताह ट्रंप ने शी जिनपिंग को “अच्छा और समझदार व्यक्ति” बताया था और कहा था कि दोनों के रिश्ते काफी अच्छे हैं। लेकिन इस दोस्ताना बयानबाजी के पीछे कई बड़े वैश्विक दबाव छिपे हुए हैं। खासकर ईरान संकट, ताइवान विवाद और ट्रेड वॉर इस मुलाकात को बेहद संवेदनशील बना रहे हैं। ईरान संकट बना ट्रंप की बड़ी चुनौती ट्रंप के चीन दौरे पर सबसे बड़ा असर ईरान संकट का माना जा रहा है। अमेरिका लंबे समय से चीन पर दबाव बना रहा है कि वह तेहरान को समझाकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने और संघर्ष कम करने में मदद करे। हालांकि अब तक वॉशिंगटन को इसमें खास सफलता नहीं मिली है। अमेरिका की कोशिशों के बावजूद मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है और इसका असर वैश्विक तेल बाजारों पर भी पड़ रहा है। ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि शी जिनपिंग भी इस संकट का समाधान चाहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिका को सख्त संदेश दिया है। ईरान के वरिष्ठ नेता अली अकबर वेलायती ने कहा कि अमेरिका यह न सोचे कि मौजूदा हालात का फायदा उठाकर वह बीजिंग में बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल कर लेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय अमेरिका को चीन की जरूरत ज्यादा है, क्योंकि चीन ईरान का बड़ा आर्थिक साझेदार है और वह बड़ी मात्रा में ईरानी तेल खरीदता है। ताइवान मुद्दे पर चीन बना सकता है दबाव विश्लेषकों का कहना है कि अगर चीन ईरान मुद्दे पर अमेरिका की मदद करता है तो बदले में वह ताइवान को लेकर रियायत मांग सकता है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और अमेरिका-ताइवान संबंधों पर लगातार आपत्ति जताता रहा है। ऐसे में बीजिंग ट्रंप की मौजूदा कूटनीतिक मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है। यह बैठक इस बात की भी परीक्षा मानी जा रही है कि ट्रंप चीन से सहयोग पाने के लिए कितनी दूर तक समझौता करने को तैयार हैं। ट्रेड वॉर और रेयर अर्थ पर भी होगी बड़ी बातचीत अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर भी इस मुलाकात का अहम मुद्दा रहेगा। पिछले साल दोनों देशों के बीच टैरिफ युद्ध ने वैश्विक बाजारों को हिला दिया था। अमेरिका ने चीनी सामानों पर 145 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिए थे, जिसके जवाब में चीन ने रेयर अर्थ मिनरल्स के निर्यात पर सख्ती बढ़ा दी थी। इन मिनरल्स का इस्तेमाल अमेरिकी टेक्नोलॉजी और रक्षा उद्योग में बड़े पैमाने पर होता है। चीन की इस रणनीति से कई अमेरिकी फैक्ट्रियों पर असर पड़ा था। अब दोनों देश रिश्तों को कुछ हद तक स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि चीन ज्यादा अमेरिकी कृषि और ऊर्जा उत्पाद खरीदे, जबकि चीन अमेरिकी तकनीक तक पहुंच और एक्सपोर्ट प्रतिबंधों में राहत चाहता है। बोइंग डील पर भी टिकी नजरें रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन और अमेरिका के बीच बड़ी एविएशन डील की भी संभावना है। चीन करीब 500 Boeing 737 Max विमान खरीदने पर विचार कर रहा है। अगर यह समझौता होता है तो यह 2017 के बाद बोइंग के लिए चीन का सबसे बड़ा ऑर्डर होगा। क्या ट्रंप को मिलेगा कूटनीतिक फायदा? ट्रंप की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब आलोचक उनकी विदेश नीति को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और ईरान जैसे देशों ने अमेरिका को कई मुद्दों पर रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि बीजिंग में होने वाली ट्रंप-शी मुलाकात वैश्विक राजनीति, व्यापार और सुरक्षा समीकरणों को किस दिशा में ले जाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump इस महीने चीन के दौरे पर जाएंगे, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से होगी। चीन के विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा की आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि ट्रंप 13 मई से 15 मई तक चीन में रहेंगे। बीजिंग में होगी अहम बैठक जानकारी के मुताबिक, Donald Trump बुधवार शाम बीजिंग पहुंचेंगे। गुरुवार को उनका औपचारिक स्वागत और द्विपक्षीय बैठक होगी। यात्रा शुक्रवार को समाप्त होगी। व्हाइट हाउस की चीफ डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी Anna Kelly ने बताया कि इस यात्रा का उद्देश्य अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। ईरान युद्ध समेत कई मुद्दों पर चर्चा अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप और Xi Jinping के बीच कई बड़े वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होगी। इनमें: Iran से जुड़ा तनाव और युद्ध ताइवान मुद्दा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) परमाणु हथियार नियंत्रण महत्वपूर्ण खनिज समझौते जैसे विषय शामिल हैं। युद्ध के कारण टली थी यात्रा यह दौरा पहले साल की शुरुआत में प्रस्तावित था, लेकिन Iran और अमेरिका-इजरायल तनाव के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। अब यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस दौरे के जरिए चीन के साथ संवाद बढ़ाकर वैश्विक तनाव कम करने की कोशिश कर सकते हैं। चीन की टेक्नोलॉजी पर अमेरिका सख्त ट्रंप के चीन दौरे से पहले अमेरिका में चीनी टेक्नोलॉजी कंपनियों को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में अमेरिका ने ईरान से कथित संबंधों के आरोप में कई चीनी कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। CNN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग ने चार कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया, जिनमें तीन चीन की हैं। इन कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने सैटेलाइट इमेजरी उपलब्ध कराकर पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को मदद पहुंचाई। तेल खरीद को लेकर भी बढ़ा विवाद अमेरिका ने हाल ही में ईरान से कच्चा तेल खरीदने के आरोप में कुछ चीनी रिफाइनरियों पर भी प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद चीन ने अपनी कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन न करने का संकेत दिया। Ministry of Foreign Affairs of the People's Republic of China ने कहा कि वह एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है और चीनी कंपनियों तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा। क्यों अहम मानी जा रही है यह यात्रा? विशेषज्ञों के मुताबिक, यह दौरा सिर्फ अमेरिका-चीन संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक राजनीति, व्यापार और पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी पड़ सकता है। दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और सुरक्षा हालात लगातार दबाव में हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।