विधानसभा में उठा बड़ा मुद्दा झारखंड के गढ़वा जिले से जुड़ा मंडल डैम विस्थापन का मामला अब विधानसभा तक पहुंच गया है। क्षेत्रीय विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने बजट सत्र के आखिरी दिन ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए पुनर्वास योजना पर गंभीर आपत्ति जताई। जंगल उजाड़कर बसाने की योजना पर सवाल विधायक ने सरकार की उस योजना का विरोध किया, जिसमें बलीगढ़, बिरापुर और विश्रामपुर जैसे गांवों के बीच स्थित जंगल क्षेत्र में विस्थापित परिवारों को बसाने की तैयारी है। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत करीब 780 विस्थापित परिवारों को बसाया जाना प्रस्तावित है। 5000 ग्रामीणों की आजीविका पर खतरा सत्येंद्र तिवारी ने सदन में कहा कि इस फैसले से आसपास के करीब 5000 ग्रामीणों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी। इन गांवों के लोग जंगल पर निर्भर हैं और महुआ फूल, तेंदूपत्ता, पत्तल-दोना, लाह और जड़ी-बूटियों से अपनी आजीविका चलाते हैं। जंगल क्षेत्र में बसावट होने से उनके जीवन पर सीधा असर पड़ेगा। पर्यावरण संतुलन बिगड़ने की आशंका विधायक ने यह भी चेतावनी दी कि जंगल क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों को बसाने से पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ सकता है। जनसंख्या का दबाव बढ़ेगा और प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त भार पड़ेगा, जिससे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को नुकसान हो सकता है। वैकल्पिक स्थान पर पुनर्वास की मांग उन्होंने सरकार से मांग की कि विस्थापित परिवारों को किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर बसाया जाए, ताकि स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रह सकें। सड़क और पुल निर्माण की भी उठाई मांग इसके अलावा विधायक ने गैर-सरकारी संकल्प के तहत सिरोई पंचायत के ढोटी गांव तक लगभग 7 किलोमीटर पक्की सड़क और पुलिया निर्माण की मांग भी विधानसभा में रखी। इस पर संबंधित मंत्री ने सकारात्मक पहल का आश्वासन दिया है।
झारखंड में विधायकों और पूर्व विधायकों को ग्रेटर रांची क्षेत्र में जमीन उपलब्ध कराने की योजना अब आगे बढ़ती नजर आ रही है। राज्य सरकार ने इस लंबे समय से लंबित प्रक्रिया को गति देते हुए जल्द जमीन की रजिस्ट्री कराने का निर्णय लिया है। सरकार की ओर से कहा गया है कि अगले तीन दिनों के भीतर रजिस्ट्री के लिए ऑनलाइन पोर्टल शुरू कर दिया जाएगा, जिससे संबंधित विधायक और पूर्व विधायक अपनी जमीन की रजिस्ट्री करा सकेंगे। विधानसभा में उठा मुद्दा मंगलवार को विधानसभा की कार्यवाही के दौरान इस मुद्दे को झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के विधायक मथुरा महतो ने सदन में उठाया। उन्होंने कहा कि विधायकों और पूर्व विधायकों से जमीन आवंटन के लिए राशि पहले ही जमा कर ली गई है, लेकिन इसके बावजूद रजिस्ट्री की प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं हो सकी है। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस मामले में जल्द कार्रवाई करते हुए प्रक्रिया पूरी की जाए ताकि संबंधित लोगों को राहत मिल सके। भाजपा विधायक ने प्रशासन पर लगाए आरोप इस पर भाजपा विधायक सी.पी. सिंह ने रांची जिला प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जमीन के लिए ली गई राशि सहकारी लिमिटेड के खाते में जमा है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर देरी के कारण रजिस्ट्री प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है। सी.पी. सिंह ने बताया कि उन्होंने इस मामले को लेकर रांची के उपायुक्त से भी बातचीत की थी। उस समय यह आश्वासन दिया गया था कि विधानसभा के मौजूदा सत्र के दौरान एक सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री पोर्टल शुरू कर दिया जाएगा। लेकिन करीब 20 दिन बीत जाने के बाद भी पोर्टल शुरू नहीं होने से विधायकों और पूर्व विधायकों में नाराजगी बढ़ रही है। मंत्री ने सदन में दिया भरोसा मामले की गंभीरता को देखते हुए संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सदन में स्पष्ट किया कि अब इस प्रक्रिया में और देरी नहीं होगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि अगले तीन दिनों के भीतर जमीन की रजिस्ट्री के लिए पोर्टल खोल दिया जाएगा और सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएंगी। बताया जा रहा है कि राज्य सरकार ने विधायकों और पूर्व विधायकों के लिए ग्रेटर रांची क्षेत्र में जमीन चिन्हित कर ली है। पोर्टल शुरू होने के बाद जमीन की रजिस्ट्री की प्रक्रिया तेजी से पूरी की जाएगी, जिससे लंबे समय से लंबित मांग का समाधान हो सकेगा।
डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष की कुर्सी पर भाजपा की नजर, जानिए नगर निकायों में कैसे होता है चुनाव झारखंड में नगर निकाय चुनाव में महापौर और पार्षद के परिणाम आने के बाद अब डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष के पदों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी इन पदों पर अपने समर्थित उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए संगठन स्तर पर रणनीति तैयार कर रही है। पार्टी का लक्ष्य है कि राज्य के सभी 48 नगर निकायों में डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष की कुर्सी पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी काबिज हों। इसके लिए महापौर, अध्यक्ष और पार्षद के रूप में निर्वाचित भाजपा समर्थित उम्मीदवारों के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं की पहचान की जा रही है, ताकि चुनाव के दौरान उन्हें समर्थन मिल सके। भाजपा को जीत की उम्मीद प्रदेश भाजपा के मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक का कहना है कि महापौर और पार्षद चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को अन्य दलों की तुलना में बेहतर सफलता मिली है। उनका दावा है कि राज्य के नौ नगर निगमों में से पांच में भाजपा समर्थित उम्मीदवार महापौर बने हैं। ऐसे में पार्टी को भरोसा है कि जहां महापौर उनके समर्थन से चुने गए हैं, वहां डिप्टी मेयर भी भाजपा समर्थित ही होगा। वहीं जिन निकायों में महापौर या अध्यक्ष भाजपा के नहीं हैं, वहां भी पार्टी अपने समर्थकों को डिप्टी मेयर या उपाध्यक्ष बनाने का प्रयास करेगी। नगर निकाय चुनाव में उम्मीद से कम सफलता हालांकि भाजपा को इस बार शहरी क्षेत्रों में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। राज्य के 48 नगर निकायों में महापौर और अध्यक्ष पदों पर भाजपा समर्थित करीब 16 उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर सके। नौ नगर निगमों में से रांची, आदित्यपुर और मेदिनीनगर में भाजपा समर्थित प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। नगर परिषद की 20 सीटों में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को तीन सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस समर्थित दो, झामुमो समर्थित चार और 11 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। नगर पंचायतों में भाजपा का पलड़ा भारी नगर पंचायतों में भाजपा समर्थित उम्मीदवार अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखे। यहां छह सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवार जीते, जबकि झामुमो समर्थित चार और आठ निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए। एक सीट पर भाकपा माले समर्थित उम्मीदवार धनवार से अध्यक्ष पद पर चुने गए। रांची में महापौर पद पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी रोशनी खलखो ने जीत दर्ज की, हालांकि गिरिडीह और देवघर जैसे महत्वपूर्ण नगर निगम भाजपा के हाथ से निकल गए। गिरिडीह नगर निगम में पहली बार झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जीत हासिल की, जबकि देवघर में भी झामुमो समर्थित उम्मीदवार को सफलता मिली। पार्षद निभाते हैं अहम भूमिका डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष के चुनाव में निर्वाचित पार्षदों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। उदाहरण के तौर पर रांची नगर निगम में 53 वार्ड हैं और सभी वार्डों से चुने गए पार्षद ही डिप्टी मेयर के चुनाव में मतदान करेंगे। जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिलेंगे, वही डिप्टी मेयर चुना जाएगा। 10 से 20 मार्च तक पूरी होगी प्रक्रिया राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार सभी 48 नगर निकायों में डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया 10 मार्च से शुरू होकर 20 मार्च तक पूरी कर ली जाएगी। आयोग के सचिव राधेश्याम प्रसाद के मुताबिक सभी नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों के लिए तिथिवार कार्यक्रम तय कर दिया गया है। ऐसे होता है डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष का चुनाव नगर निगमों में डिप्टी मेयर और नगर परिषद व नगर पंचायतों में उपाध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। इसमें आम मतदाता हिस्सा नहीं लेते, बल्कि केवल निर्वाचित वार्ड पार्षद ही मतदान करते हैं। मेयर या अध्यक्ष इस चुनाव में हिस्सा नहीं लेते। पार्षदों में से कोई भी उम्मीदवार डिप्टी मेयर या उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ सकता है और इस पद के लिए किसी प्रकार का आरक्षण भी नहीं होता। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पहले सभी वार्ड पार्षदों का शपथ ग्रहण कराया जाता है। इसके बाद डिप्टी मेयर या उपाध्यक्ष पद के लिए नामांकन और मतदान की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।