मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए जाने के बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई करते हुए तेहरान समेत कई ईरानी शहरों में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर अंतिम निर्णय वही लेते हैं और कूटनीतिक समाधान की कोशिशें अभी भी जारी हैं। ईरानी मिसाइल हमले के बाद बदला घटनाक्रम रविवार रात ईरान ने इजरायल पर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। अप्रैल में हुए युद्धविराम के बाद दोनों देशों के बीच यह पहली प्रत्यक्ष सैन्य भिड़ंत मानी जा रही है। तेहरान ने कहा कि यह कार्रवाई लेबनान की राजधानी Beirut पर इजरायली हमलों के जवाब में की गई है। ईरान का आरोप है कि लेबनान में इजरायल के सैन्य अभियान ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाया है। उत्तरी इजरायल में गूंजे सायरन ईरान ने दावा किया कि उसने उत्तरी इजरायल की ओर 10 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले की चेतावनी मिलते ही कई इलाकों में एयर रेड सायरन बजने लगे और नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश दिए गए। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के अनुसार, हमले का प्रमुख लक्ष्य रामत डेविड एयर बेस था। दूसरी ओर इजरायली सेना ने कहा कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने अधिकांश मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर दिया। तेहरान, इस्फहान और तबरीज में धमाकों की आवाजें ईरान के हमले के कुछ घंटों बाद तेहरान के कई हिस्सों में जोरदार विस्फोट सुनाई दिए। Tehran के मेहराबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास भी धमाकों की सूचना मिली। इसके अलावा Isfahan और Tabriz में भी विस्फोट दर्ज किए गए। रिपोर्टों के मुताबिक, खुजेस्तान प्रांत के बंदर-ए-महशहर स्थित करुण पेट्रोकेमिकल कंपनी को भी निशाना बनाया गया। इजरायली वायु सेना ने कहा कि उसके वरिष्ठ सैन्य अधिकारी लगातार स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं और ईरान में चल रहे सैन्य अभियानों की निगरानी कर रहे हैं। लेबनान बना विवाद का केंद्र मौजूदा संघर्ष का सबसे बड़ा कारण लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियां हैं। ईरान लगातार कहता रहा है कि लेबनान पर इजरायली हमले बंद होना किसी भी व्यापक शांति समझौते की पूर्व शर्त है। मार्च से इजरायल, Hezbollah के खिलाफ अभियान चला रहा है। इजरायल का आरोप है कि संगठन ने उसकी सीमा पर रॉकेट और ड्रोन हमले किए थे, जबकि ईरान का कहना है कि लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रहने तक स्थायी शांति संभव नहीं है। ट्रंप बोले- अंतिम फैसले मैं लेता हूं तनावपूर्ण हालात के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उम्मीद जताई कि ईरान के साथ वार्ता पूरी तरह विफल नहीं हुई है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मौजूदा घटनाक्रम से समझौते की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा और क्षेत्रीय मामलों में अंतिम निर्णय वही लेते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने हाल ही में इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu से फोन पर बातचीत भी की थी और उन्हें आगे सैन्य कार्रवाई से बचने की सलाह दी थी। ईरान की कड़ी चेतावनी ईरान के संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि अमेरिकी सैन्य ठिकाने और इजरायली हित अब वैध लक्ष्य हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्रीय समझौतों का उल्लंघन होने के कारण हालात बिगड़े हैं। अप्रैल में युद्धविराम लागू होने के बाद से रविवार तक ईरान ने सीधे तौर पर इजरायल पर हमला नहीं किया था, लेकिन अब उसने प्रत्यक्ष जवाबी कार्रवाई की है। तेल बाजार में बढ़ी चिंता ईरान-इजरायल तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दिया। सोमवार की शुरुआती ट्रेडिंग में कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई और ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, खासकर Strait of Hormuz को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है।
अमेरिका और इजरायल के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान में इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी बीच पश्चिम एशिया की नीतियों और ईरान संकट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। पेंटागन में बढ़ी सतर्कता रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अस्थायी संचार उपकरणों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा स्थिति की पुष्टि नहीं की है। खुफिया गतिविधियों को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में अमेरिका और इजरायल करीबी सहयोगी माने जाते हैं, लेकिन अतीत में भी दोनों देशों के बीच खुफिया गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रहती है। इसी संदर्भ में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय चर्चाओं के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की चर्चा रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया नीति को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच हाल के महीनों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभरे हैं। बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच हुई एक बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर तीखी चर्चा हुई। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इजरायल ने आरोपों को किया खारिज वॉशिंगटन स्थित इजरायली अधिकारियों ने जासूसी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इजरायल अपने सहयोगी देशों के खिलाफ ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने भी इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है और कहा है कि अमेरिका-इजरायल सुरक्षा सहयोग पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई संवेदनशीलता विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग जारी है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। फिलहाल, जासूसी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं से जुड़े कई दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। आधिकारिक स्तर पर इनकी पुष्टि सीमित है, इसलिए इन्हें सावधानी के साथ देखने की आवश्यकता है।
Donald Trump ने कहा है कि अगर उनकी सरकार के दौरान Iran के साथ कोई नया समझौता होता है, तो वह पूर्व राष्ट्रपति Barack Obama के दौर की परमाणु डील से पूरी तरह अलग होगा। ट्रंप ने साफ कहा कि उनकी संभावित डील में ईरान को किसी तरह की आर्थिक राहत या नकद सहायता नहीं दी जाएगी। उन्होंने एक बार फिर ओबामा प्रशासन की परमाणु नीति पर निशाना साधते हुए कहा कि पुराना समझौता कमजोर था। “हमारी डील मजबूत होगी” सोशल मीडिया पर जारी बयान में ट्रंप ने कहा, “अगर मैं ईरान के साथ कोई समझौता करता हूं, तो वह मजबूत और सही होगा। यह ओबामा की डील जैसा नहीं होगा, जिसमें ईरान को भारी मात्रा में कैश मिला था और परमाणु हथियार की दिशा में खुला रास्ता दिया गया था।” उन्होंने आगे कहा कि अभी तक प्रस्तावित समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं है और कई लोग बिना तथ्य जाने आलोचना कर रहे हैं। ट्रंप के मुताबिक, “मैंने हमेशा खराब समझौतों से बचने की कोशिश की है।” क्या थी ओबामा की न्यूक्लियर डील? साल 2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान ईरान और विश्व शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ था, जिसे Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) कहा जाता है। इस समझौते में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी शामिल थे। डील के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध स्वीकार किए थे। उसने संवर्धित यूरेनियम का भंडार काफी घटाने और बड़ी संख्या में सेंट्रीफ्यूज हटाने पर सहमति दी थी। साथ ही International Atomic Energy Agency (IAEA) को ईरान के परमाणु ठिकानों की निगरानी की अनुमति दी गई थी। इसके बदले पश्चिमी देशों ने ईरान पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी थी। 2018 में ट्रंप ने तोड़ी थी डील ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में साल 2018 में अमेरिका को JCPOA से बाहर कर लिया था। उनका आरोप था कि यह समझौता ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए पर्याप्त सख्त नहीं था। इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर दोबारा कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। 2025 से बढ़ा तनाव रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2025 में अमेरिका ने Natanz Nuclear Facility, Isfahan Nuclear Technology Center और Fordow Fuel Enrichment Plant पर बड़े हमले किए थे। बताया गया कि इन हमलों में बी-2 बॉम्बर विमानों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद इजरायल और ईरान के बीच चला 12 दिन का संघर्ष समाप्त हुआ था। बाद में यह दावा सामने आया कि ईरान के पास अब भी लगभग 400 किलोग्राम तक संवर्धित यूरेनियम मौजूद है। 2026 में और बिगड़े हालात रिपोर्ट्स के मुताबिक, फरवरी 2026 में अमेरिका और Israel ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य कार्रवाई की। इसमें ईरान के कई वरिष्ठ नेताओं के मारे जाने का दावा किया गया, जिनमें Ali Khamenei का नाम भी शामिल रहा। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में पश्चिम एशिया के कई हिस्सों को निशाना बनाया और Strait of Hormuz की नाकेबंदी कर दी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। समझौते की ओर बढ़ रहे दोनों देश? तनाव बढ़ने के बाद अप्रैल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम लागू हुआ। इसके बाद से दोनों देशों के बीच लगातार बातचीत जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, संभावित समझौते में ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन स्तर को कम करने, स्टॉक नष्ट करने या किसी तीसरे देश को सौंपने पर विचार कर सकता है। ईरान के सत्ता प्रतिष्ठान के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अब भी ऐसी किसी डील पर सहमति से इनकार किया है।
Donald Trump अब सिर्फ Iran के साथ युद्धविराम या शांति समझौते तक सीमित नहीं रहना चाहते। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप अब पूरे पश्चिम एशिया की राजनीतिक व्यवस्था को नए सिरे से आकार देने की कोशिश में जुटे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कई अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं से कहा है कि ईरान युद्ध खत्म होने के बाद वे Israel के साथ अपने संबंध सामान्य करें और Abraham Accords में शामिल हों। हाई-लेवल कॉल में उठी मांग रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शनिवार को हुई एक उच्चस्तरीय कॉन्फ्रेंस कॉल में ट्रंप ने यह मुद्दा उठाया। इस बातचीत में Saudi Arabia, United Arab Emirates, Qatar, Pakistan, Turkey, Egypt, Jordan और Bahrain के नेता शामिल थे। बताया गया कि ट्रंप ने कहा कि जो देश अब तक इजरायल को मान्यता नहीं देते हैं, उन्हें अब रिश्ते सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। ट्रंप की बात के बाद छा गया सन्नाटा अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप के इस बयान के बाद कॉल पर कुछ देर के लिए खामोशी छा गई। माहौल हल्का करने के लिए ट्रंप ने मजाक में पूछा, “क्या आप लोग अभी भी लाइन पर हैं?” रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। इन देशों के इजरायल के साथ अब तक औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। ईरान को भी दिया संकेत ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी कहा कि अगर पश्चिम एशिया के देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होते हैं तो क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा, “कौन जानता है, शायद ईरान भी इसमें शामिल होना चाहे। इसे फिलहाल बेहद मुश्किल संभावना माना जा रहा है। ईरान लंबे समय से इजरायल को मान्यता देने से इनकार करता रहा है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi पहले ही कह चुके हैं कि ईरान ऐसे शासन को कभी मान्यता नहीं देगा, जिस पर बच्चों की हत्या और नरसंहार के आरोप हों। क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स? अब्राहम अकॉर्ड्स की शुरुआत साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुई थी। इसका उद्देश्य अरब देशों और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करना था। सबसे पहले United Arab Emirates और Bahrain ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। बाद में Sudan और Morocco भी इसमें शामिल हुए। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहल पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव को सीमित करने और इजरायल व अरब देशों के बीच व्यापार, तकनीक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। सऊदी अरब सबसे बड़ी चुनौती ट्रंप की इस योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती Mohammed bin Salman के नेतृत्व वाला सऊदी अरब माना जा रहा है। सऊदी अरब ने साफ कहा है कि इजरायल के साथ किसी भी औपचारिक रिश्ते की शुरुआत तभी होगी, जब फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन की दिशा में ठोस और स्थायी कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर, इजरायल फिलहाल इस मांग को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं दिख रहा। ईरान समझौते पर अब भी कई अड़चनें ट्रंप पश्चिम एशिया में नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ईरान के साथ समझौता अभी आसान नहीं दिख रहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में 60 दिन का युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे की बातचीत शामिल हो सकती है। लेकिन प्रतिबंध हटाने, यूरेनियम भंडार और फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों जैसे मुद्दों पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है।
Donald Trump ने एक AI-जनरेटेड वीडियो शेयर कर नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस वीडियो में अमेरिकी टीवी होस्ट Stephen Colbert को कूड़ेदान में फेंकते हुए दिखाया गया है। वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। क्या है वीडियो में? वीडियो में दिखाया गया है कि जैसे ही The Late Show with Stephen Colbert के अंतिम एपिसोड में स्टीफन कोल्बर्ट दर्शकों का स्वागत करते हैं, तभी पीछे से ट्रंप आते हैं। इसके बाद ट्रंप उन्हें कॉलर से पकड़कर डस्टबिन में फेंक देते हैं और फिर डांस करने लगते हैं। बैकग्राउंड में उनके चुनावी कैंपेन की धुन जैसी म्यूजिक भी सुनाई देती है। यह वीडियो AI तकनीक से तैयार किया गया बताया जा रहा है। शो के आखिरी एपिसोड के बाद बढ़ा विवाद यह वीडियो ऐसे समय सामने आया, जब ‘The Late Show with Stephen Colbert’ का आखिरी एपिसोड हाल ही में प्रसारित हुआ। 2015 में शुरू हुआ यह शो अमेरिका के सबसे लोकप्रिय लेट-नाइट टॉक शोज में शामिल रहा। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक शो का फिनाले एपिसोड रिकॉर्ड व्यूअरशिप के साथ खत्म हुआ। ओवरनाइट नीलसन रेटिंग्स के अनुसार इसे करीब 6.74 मिलियन लोगों ने देखा, जो 2015 के पहले एपिसोड से भी ज्यादा था। फिनाले एपिसोड में कई स्टार्स पहुंचे 21 मई को प्रसारित अंतिम एपिसोड में कई सेलिब्रिटी मेहमान शामिल हुए। कोल्बर्ट ने अपने खास अंदाज में दर्शकों को अलविदा कहा। शो के दौरान अभिनेता Bryan Cranston ने सरप्राइज एंट्री भी दी। क्यों बंद हुआ शो? CBS ने जुलाई 2025 में घोषणा की थी कि 30 साल पुराने इस शो को बंद किया जा रहा है। नेटवर्क ने इसके पीछे आर्थिक कारण बताए थे और कहा था कि पारंपरिक टीवी ब्रॉडकास्टिंग पर बढ़ते दबाव के चलते यह फैसला लिया गया। हालांकि आलोचकों और खुद कोल्बर्ट ने संकेत दिए थे कि इसके पीछे राजनीतिक वजहें भी हो सकती हैं। सोशल मीडिया और यूट्यूब का असर रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में लेट-नाइट टीवी शोज की लोकप्रियता में गिरावट आई है। अब बड़ी संख्या में दर्शक टीवी पर लाइव देखने के बजाय यूट्यूब और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शो के क्लिप्स देखना पसंद करते हैं। अब फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखेंगे कोल्बर्ट ‘The Late Show’ खत्म होने के बाद Stephen Colbert अब फिल्मों की स्क्रीनराइटिंग पर काम कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक वह Peter Jackson और अन्य राइटर्स के साथ मिलकर The Lord of the Rings: Shadow of the Past की कहानी लिख रहे हैं।
Iran और United States के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान के ताजा शांति प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद तेहरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो उसके सशस्त्र बल “हमलावर को सबक सिखाने” के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ट्रंप ने क्या कहा? वॉशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को “अस्वीकार्य” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा: “यह युद्धविराम गंभीर लाइफ सपोर्ट पर है।” ट्रंप ने हालात की तुलना ऐसे मरीज से की जिसकी “जीवित रहने की संभावना सिर्फ एक प्रतिशत” बची हो। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने दी जवाबी चेतावनी ट्रंप की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि ईरान किसी भी संघर्ष के लिए तैयार है। उन्होंने X पर लिखा: “हमारे सशस्त्र बल किसी भी हमले का जवाब देने और हमलावर को सबक सिखाने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “खराब रणनीति और गलत फैसलों का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।” ईरान के प्रस्ताव में क्या था? ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, तेहरान ने जो प्रस्ताव दिया था उसमें: ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने पूरे क्षेत्र में सैन्य अभियान रोकने लेबनान में Hezbollah को निशाना बनाने वाले हमलों पर रोक विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल थीं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: “हमने किसी तरह की रियायत नहीं मांगी, सिर्फ ईरान के वैध अधिकारों की मांग की है।” होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा दबाव तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी दिखाई देने लगा है। Strait of Hormuz में पहले से चल रही रुकावटों के कारण तेल बाजार दबाव में हैं। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो: कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पेट्रोल-डीजल महंगा होना खाद्य और परिवहन लागत बढ़ना जैसे असर देखने को मिल सकते हैं। क्यों बढ़ रहा है तनाव? विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद: ईरान के परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी प्रतिबंध मिडिल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी इजरायल और हिजबुल्ला को लेकर टकराव को लेकर है। हालिया बयानबाजी से साफ है कि फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अपने ही सहयोगी देशों पर सख्त रुख अपना लिया है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वे इटली और स्पेन में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम कर सकते हैं। इस बयान के बाद नाटो के भीतर हलचल तेज हो गई है। “साथ नहीं देंगे तो क्यों रखें फौज?” ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने साफ कहा कि अगर सहयोगी देश ईरान मुद्दे पर अमेरिका का साथ नहीं देते, तो वहां अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी पर सवाल उठना लाजिमी है। उन्होंने कहा, “शायद मैं ऐसा करूंगा… आखिर क्यों नहीं?” ट्रंप का आरोप है कि: इटली ने ईरान संकट में कोई खास सहयोग नहीं किया स्पेन का रवैया “बहुत खराब” रहा ईरान जंग से बढ़ी दरार यह विवाद तब गहराया जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। नाटो के कई सदस्य देश इस युद्ध में सीधे शामिल होने से बच रहे हैं, जिससे ट्रंप नाराज हैं। ट्रंप चाहते हैं कि सहयोगी देश खासतौर पर: होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में मदद करें समुद्री सुरक्षा और तेल सप्लाई बहाल करने में भूमिका निभाएं यूरोप में अमेरिकी सेना की मौजूदगी ताजा आंकड़ों (31 दिसंबर 2025) के अनुसार: जर्मनी: 36,436 अमेरिकी सैनिक इटली: 12,662 सैनिक स्पेन: 3,814 सैनिक ट्रंप का कहना है कि ये देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे और अमेरिका पर निर्भर हैं। मेलोनी पर सीधा हमला ट्रंप ने जॉर्जिया मेलोनी को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि मेलोनी में ईरान मामले पर “साहस की कमी” है। वहीं, स्पेन को लेकर नाराजगी इतनी ज्यादा बताई जा रही है कि कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिका द्वारा उसे नाटो से बाहर करने के विकल्पों पर विचार की बात कही गई है (हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है)। जर्मनी से भी टकराव ट्रंप ने फ्रेडरिक मर्ज पर भी सोशल मीडिया के जरिए निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जर्मनी को दूसरे देशों के मामलों में टिप्पणी करने के बजाय अपने देश की ऊर्जा और इमिग्रेशन समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। जर्मन नेतृत्व ने हालांकि साफ किया है कि: वे अमेरिका के साथ साझेदारी बनाए रखना चाहते हैं लेकिन सैन्य कार्रवाई के तरीके पर उनके अलग विचार हो सकते हैं यूरोप की प्रतिक्रिया जोहान वेडफुल ने कहा कि वे अमेरिकी सैनिकों की संभावित कटौती के लिए तैयार हैं और इस मुद्दे पर नाटो के भीतर चर्चा जारी है। यूरोपीय देशों का रुख फिलहाल संतुलन बनाए रखने का है–वे अमेरिका से दूरी भी नहीं बनाना चाहते और युद्ध में सीधे कूदने से भी बच रहे हैं। वैश्विक असर: तेल और बाजार पर दबाव ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण: वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है कीमतों में तेजी देखी जा रही है ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ी है इसके अलावा स्पेन ने गाजा के लिए जा रहे सहायता जहाजों को रोकने पर इजरायल की आलोचना भी की है, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच मतभेद और बढ़ गए हैं। क्या बदल सकता है NATO समीकरण? यह पूरा घटनाक्रम नाटो के अंदर नई दरारों की ओर इशारा करता है। अगर अमेरिका सच में यूरोप से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करता है, तो: यूरोप को अपनी सुरक्षा रणनीति बदलनी पड़ेगी नाटो की एकजुटता पर असर पड़ सकता है वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव आ सकता है
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच United States Navy ने ईरान के समुद्री रास्तों पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। United States Central Command (CENTCOM) द्वारा जारी वीडियो में अमेरिकी जंगी जहाज USS Michael Murphy (DDG-112) को ओमान की खाड़ी में एक मर्चेंट शिप को रोकते हुए देखा गया। नेवी अधिकारियों ने जहाज के क्रू को निर्देश दिया कि वे अब अमेरिकी निगरानी में अगले बंदरगाह तक जाएंगे। इस ऑपरेशन के दौरान हेलिकॉप्टर भी ऊपर से लगातार नजर रख रहे थे। 10 हजार सैनिक और 100 से ज्यादा विमान तैनात CENTCOM के मुताबिक, इस घेराबंदी में अमेरिका ने भारी सैन्य ताकत तैनात की है: 10,000 से अधिक सैनिक 12+ युद्धपोत 100+ लड़ाकू विमान इस मिशन का नेतृत्व एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln (CVN-72) कर रहा है, जो अरब सागर में मौजूद है। इस पर F-35C स्टील्थ फाइटर, F/A-18 जेट्स और आधुनिक हेलिकॉप्टर तैनात हैं। इसके अलावा गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Delbert D. Black (DDG-119) भी संदिग्ध जहाजों पर नजर बनाए हुए है। होर्मुज जलडमरूमध्य खुला, सिर्फ ईरानी पोर्ट्स पर पाबंदी अमेरिकी सेना ने साफ किया है कि Strait of Hormuz को बंद नहीं किया गया है। यह कार्रवाई केवल Iran के बंदरगाहों और उसकी तटीय सीमा तक सीमित है। ट्रम्प का सख्त संदेश अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा: “हमारी नेवी शानदार काम कर रही है। अब कोई भी जहाज हमारी मंजूरी के बिना ईरान की सीमा में घुसने की सोच भी नहीं सकता।” बातचीत फेल होने के बाद बढ़ा तनाव रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता बेनतीजा रही, जिसके बाद यह सख्त कदम उठाया गया। हालांकि, दोनों देशों के बीच फिलहाल दो हफ्ते का सीजफायर लागू है। जमीनी हकीकत भी अलग शिपिंग डेटा के अनुसार, घेराबंदी के बावजूद कुछ जहाज–जिनमें ईरानी टैंकर भी शामिल हैं–इस मार्ग से गुजरने में सफल रहे हैं। इससे स्थिति की जटिलता और बढ़ गई है। ईरान के खिलाफ अमेरिका की यह समुद्री घेराबंदी क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती है। हालांकि, अमेरिका इसे सुरक्षा और रणनीतिक कदम बता रहा है, लेकिन इससे वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
Donald Trump और Pope Leo XIV के बीच विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। ट्रंप ने खुद को Jesus Christ जैसा दिखाते हुए एक AI तस्वीर शेयर की, जिससे नया बवाल खड़ा हो गया है। AI फोटो से छिड़ा विवाद ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर जो तस्वीर शेयर की, उसमें वे लंबे चोगे में एक बीमार व्यक्ति को हाथ लगाकर ठीक करते नजर आते हैं। बैकग्राउंड में अमेरिकी झंडा, मिलिट्री प्लेन और फरिश्तों जैसी छवियां दिखती हैं–जो बाइबिल में वर्णित चमत्कारों की ओर इशारा करती हैं। पोप पर ट्रंप का हमला ट्रंप ने पोप लियो XIV को विदेशी मामलों में “बेकार” और अपराध रोकने में “कमजोर” बताया। उनका कहना है कि चर्च को राजनीति से दूर रहकर शांति पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर वे राष्ट्रपति न होते, तो पोप इस पद तक नहीं पहुंच पाते। ईरान-वेनेजुएला पर टकराव ईरान और वेनेजुएला के मुद्दे पर दोनों के बीच मतभेद और गहरा गया है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि पोप अमेरिका के सख्त रुख की आलोचना कर रहे हैं, जबकि वे खुद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं। कोविड और चर्च का मुद्दा ट्रंप ने कोविड काल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय धार्मिक संगठनों को दबाव झेलना पड़ा, लेकिन पोप इस मुद्दे पर खुलकर नहीं बोले। उन्होंने पोप के भाई लुईस की तारीफ करते हुए उन्हें ‘MAGA’ समर्थक बताया। ‘लेफ्ट’ नेताओं से करीबी पर सवाल ट्रंप ने पोप की कथित तौर पर वामपंथी नेताओं से नजदीकी पर भी सवाल उठाए और कहा कि इससे चर्च की छवि प्रभावित हो रही है। विवाद क्यों बढ़ा? दरअसल, पोप लगातार युद्ध के खिलाफ शांति और कूटनीति की बात कर रहे हैं, जबकि ट्रंप इसे अपनी नीतियों में दखल मानते हैं। 60 Minutes की एक रिपोर्ट में भी अमेरिकी चर्च नेताओं ने ट्रंप की नीतियों पर नैतिक सवाल उठाए हैं।
वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव संकेत दे रहा है कि शक्ति संतुलन अब बदल रहा है। ताजा सर्वे के मुताबिक, United States की वैश्विक साख में गिरावट आई है, जबकि China ने पहली बार उसे पीछे छोड़ दिया है। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब मिडिल ईस्ट में तनाव और युद्ध जैसे हालात दुनिया की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। Gallup सर्वे में बड़ा उलटफेर Gallup के ताजा ग्लोबल अप्रूवल सर्वे के अनुसार, चीन को 36% और अमेरिका को 31% अप्रूवल रेटिंग मिली है। यह पिछले दो दशकों में चीन की सबसे बड़ी बढ़त मानी जा रही है। चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping के नेतृत्व में यह सुधार देखा गया है, जबकि Donald Trump की नीतियों को लेकर असंतोष बढ़ा है। अमेरिका की छवि क्यों कमजोर हुई? विश्लेषकों के मुताबिक, इसके पीछे कई बड़े कारण हैं- ट्रेड वॉर और रेसिप्रोकल टैरिफ सहयोगी देशों पर भी सख्त आर्थिक नीतियां ईरान के साथ बढ़ता सैन्य तनाव वैश्विक स्तर पर आक्रामक विदेश नीति इन वजहों से अमेरिका की अस्वीकृति दर 48% तक पहुंच गई, जो अब तक का उच्चतम स्तर है। चीन की स्थिति क्यों मजबूत हुई? दूसरी ओर, चीन की छवि में सुधार दर्ज किया गया है। वैश्विक स्तर पर उसकी अप्रूवल रेटिंग 32% से बढ़कर 36% हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिर आर्थिक नीतियां और रणनीतिक कूटनीति ने चीन को फायदा पहुंचाया है। अन्य देशों की स्थिति सर्वे के अनुसार: Germany लगातार नौवें साल सबसे ज्यादा सकारात्मक रेटिंग (48%) के साथ शीर्ष पर बना हुआ है Russia की अप्रूवल रेटिंग 26% रही क्या बदल रही है दुनिया की ताकत? यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि वैश्विक नेतृत्व को लेकर लोगों की सोच बदल रही है। अमेरिका की पारंपरिक ‘सुपरपावर’ छवि को चुनौती मिल रही है, जबकि चीन अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। हालांकि यह सर्वे कुछ बड़े हालिया घटनाक्रमों से पहले किया गया था, लेकिन इसके संकेत गंभीर हैं। आने वाले समय में अमेरिका-चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, जो वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टेक्सास में लगभग 300 अरब डॉलर की विशाल तेल रिफाइनरी परियोजना की घोषणा करते हुए भारत और भारतीय कंपनी रिलायंस का आभार जताया है। ट्रंप ने कहा कि यह निवेश अमेरिका के ऊर्जा क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक कदम है और करीब 50 वर्षों में देश में स्थापित होने वाली पहली नई तेल रिफाइनरी होगी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इस परियोजना की जानकारी देते हुए बताया कि यह रिफाइनरी टेक्सास के ब्राउनस्विल (Brownsville) में स्थापित की जाएगी। उनके अनुसार यह परियोजना न केवल अमेरिका के ऊर्जा उत्पादन को मजबूत करेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ आर्थिक संबंधों को भी नई दिशा देगी। भारत और रिलायंस को दिया धन्यवाद परियोजना की घोषणा करते हुए ट्रंप ने भारत और उसकी सबसे बड़ी निजी ऊर्जा कंपनी रिलायंस की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक निवेश में भारत के सहयोग से अमेरिका के ऊर्जा क्षेत्र को नई गति मिलेगी। ट्रंप ने लिखा, “भारत में हमारे साझेदारों और उनकी सबसे बड़ी निजी ऊर्जा कंपनी रिलायंस को इस जबरदस्त निवेश के लिए धन्यवाद। यह अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र और दक्षिण टेक्सास के लोगों के लिए बड़ी जीत है।” हालांकि फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह रिफाइनरी भारत के साथ किसी व्यापक आर्थिक समझौते का हिस्सा है या नहीं, लेकिन इस घोषणा को दोनों देशों के बीच ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ते सहयोग के रूप में देखा जा रहा है। 50 वर्षों में पहली नई अमेरिकी रिफाइनरी ट्रंप ने इस परियोजना को अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उनके अनुसार, यह रिफाइनरी पिछले पांच दशकों में अमेरिका में बनने वाली पहली नई बड़ी तेल रिफाइनरी होगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक बार फिर ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। ट्रंप के शब्दों में, “अमेरिका ‘रियल एनर्जी सेक्टर’ में अपना प्रभुत्व फिर से स्थापित कर रहा है। टेक्सास के ब्राउनस्विल में बनने वाली यह रिफाइनरी अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी ऊर्जा परियोजनाओं में से एक होगी।” ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का असर ट्रंप ने इस निवेश को अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति, परमिट प्रक्रिया को सरल बनाने और करों में कटौती से जुड़ा परिणाम बताया। उनके मुताबिक इन नीतियों के कारण ही अरबों डॉलर का निवेश अमेरिका की ओर आकर्षित हो रहा है। उन्होंने कहा कि ब्राउनस्विल पोर्ट पर बनने वाली यह नई रिफाइनरी न केवल अमेरिकी बाजार को ऊर्जा उपलब्ध कराएगी, बल्कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत करेगी। रोजगार और आर्थिक विकास को मिलेगा बढ़ावा ट्रंप के अनुसार यह परियोजना दक्षिण टेक्सास के लिए आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी। इससे हजारों नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और क्षेत्र में लंबे समय से प्रतीक्षित औद्योगिक विकास को गति मिलेगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि यह दुनिया की सबसे आधुनिक और स्वच्छ रिफाइनरियों में से एक होगी, जो वैश्विक स्तर पर ऊर्जा निर्यात को भी बढ़ावा देगी। वैश्विक परिस्थितियों के बीच अहम घोषणा यह घोषणा ऐसे समय में सामने आई है जब मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे माहौल में अमेरिका में नई रिफाइनरी की स्थापना को ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना तय समय के अनुसार आगे बढ़ती है, तो इससे न केवल अमेरिका के ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि होगी, बल्कि भारत-अमेरिका के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी भी और मजबूत हो सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।