चेन्नई: तमिलनाडु भाजपा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद पार्टी में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। शुक्रवार को भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष कारू नागराजन और राज्य सचिव सुमति वेंकटेश ने भी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। दोनों नेताओं के फैसले ने राज्य इकाई में राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। अन्नामलाई के नए अभियान के साथ जुड़े कारू नागराजन भाजपा छोड़ने के बाद कारू नागराजन ने स्पष्ट किया कि वह अन्नामलाई के नए राजनीतिक अभियान का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि अपने समर्थकों के साथ विचार-विमर्श के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया है। मीडिया से बातचीत में नागराजन ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी नेता या पार्टी की आलोचना करना नहीं है, बल्कि वे अन्नामलाई की कार्यशैली और नेतृत्व क्षमता से प्रभावित हैं। उनके अनुसार, अन्नामलाई एक ऊर्जावान और जनसरोकारों से जुड़े नेता हैं, जिनके साथ मिलकर वे काम करना चाहते हैं। प्रदेश सचिव सुमति वेंकटेश ने भी दिया इस्तीफा अन्नामलाई के इस्तीफे के कुछ ही समय बाद तमिलनाडु भाजपा की प्रदेश सचिव सुमति वेंकटेश ने भी पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपना इस्तीफा साझा करते हुए प्राथमिक सदस्यता समाप्त करने की जानकारी दी। उनके इस्तीफे को भी राज्य भाजपा में बढ़ते असंतोष और अन्नामलाई के प्रति समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। युवा मोर्चा के नेता ने भी छोड़ा साथ भाजपा युवा मोर्चा की तमिलनाडु इकाई के कानूनी संयोजक अभिलाष गोपीनाथ ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने कहा कि अन्नामलाई के नेतृत्व, ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन के प्रति समर्पण ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी वे अन्नामलाई के राजनीतिक विजन और विचारों का समर्थन करते रहेंगे। नई राजनीति का दावा कर रहे हैं अन्नामलाई पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई ने भाजपा छोड़ने के बाद एक नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा की है। उनका कहना है कि यह पहल व्यक्ति-पूजा, चाटुकारिता और वंशवादी राजनीति से अलग आम लोगों की राजनीति को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की जा रही है। सोशल मीडिया पर जारी संदेश में उन्होंने कहा कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि विचार और सामाजिक परिवर्तन पर आधारित होगा। उन्होंने अपने अभियान का मूल मंत्र “मारुवोम, मातृवोम” (खुद को बदलें, बदलाव लाएं) बताया। किसी दल से टकराव नहीं, वैकल्पिक राजनीति पर जोर अन्नामलाई ने स्पष्ट किया है कि उनका नया राजनीतिक अभियान किसी मौजूदा राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सभी दलों को अपने विचार रखने का अधिकार है और उनका उद्देश्य केवल जनता के सामने एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। उन्होंने कहा कि उचित समय आने पर आंदोलन की नीतियों और कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। वेबसाइट लॉन्च होते ही हजारों समर्थक जुड़े अपने नए राजनीतिक अभियान को संगठित करने के लिए अन्नामलाई ने एक विशेष वेबसाइट भी लॉन्च की है। उनके अनुसार, वेबसाइट शुरू होने के कुछ ही घंटों के भीतर लगभग 8.9 लाख लोगों ने स्वयंसेवक के रूप में पंजीकरण कराया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा से लगातार हो रहे इस्तीफे और अन्नामलाई के नए अभियान को मिल रहा शुरुआती समर्थन तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत हो सकता है।
कोलकाता, एजेंसियां। एनआईए की टीम ने बड़ी कार्रवाई करते हुए बम विस्फोट मामले में फरार चल रहे टीएमसी के पूर्व विधायक को गिरफ्तार कर लिया है। एनआईए की टीम ने पश्चिम बंगाल के चर्चित भांगड़ बम विस्फोट मामले में यह कार्रवाई की है। जांच एजेंसी ने मामले के मुख्य संदिग्ध और फरार चल रहे पूर्व विधायक शौकत मोल्ला को दक्षिण 24 परगना जिले से गिरफ्तार किया है। चुनाव से पहले बम बनाते समय हुआ था धमाका एनआईए की जांच के मुताबिक, यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले का है। जब अवैध रूप से क्रूड बम (कच्चा बम) बनाने के दौरान एक जोरदार विस्फोट हुआ था। इस धमाके में बम बनाने वाले एक शख्स की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। साजिश रचने और सबूत मिटाने का आरोप शौकत मोल्ला इस पूरे मामले में चौथे आरोपी हैं, जिन्हें गिरफ्तार किया गया है। एनआईए की तफ्तीश में यह बात सामने आई है कि पूर्व विधायक ही इस पूरी साजिश के मुख्य सूत्रधार थे। उन्होंने ही अन्य आरोपियों को बम बनाने के निर्देश दिए थे। यही नहीं, विस्फोट होने के बाद कानून के शिकंजे से बचने के लिए मोल्ला ने आरोपियों को घटनास्थल से सबूत मिटाने और दृश्य के साथ छेड़छाड़ करने का भी आदेश दिया था।
सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार आज अपने मंत्रिमंडल का बड़ा विस्तार करने जा रही है। गुरुवार सुबह चेन्नई में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में 23 विधायक मंत्री पद की शपथ लेंगे। मुख्यमंत्री की सिफारिश पर राज्यपाल ने सभी नियुक्तियों को मंजूरी दे दी है। यह शपथ ग्रहण समारोह सुबह 10 बजे चेन्नई के लोक भवन में आयोजित होगा। सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, नए मंत्रियों के शामिल होने से प्रशासनिक कामकाज में तेजी और क्षेत्रीय संतुलन को मजबूती मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस की सरकार में वापसी इस कैबिनेट विस्तार की सबसे बड़ी राजनीतिक खासियत कांग्रेस की सरकार में एंट्री मानी जा रही है। लंबे समय बाद तमिलनाडु में किसी क्षेत्रीय दल के नेतृत्व वाली सरकार में कांग्रेस को प्रतिनिधित्व मिला है। कांग्रेस के दो विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जिससे राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं। ये विधायक बनेंगे मंत्री नई कैबिनेट में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है। मंत्री पद की शपथ लेने वालों में थूथुकुडी से श्रीनाथ, अविनाशी से कमाली एस, कुमारपालयम से सी विजयलक्ष्मी और कांचीपुरम से आरवी रंजीतकुमार शामिल हैं। इसके अलावा कुंभकोणम से विनोद, तिरुवदानई से राजीव, कडलूर से बी राजकुमार, अरक्कोनम से वी गांधीराज और ओट्टापिडारम से मथन राजा पी को भी मंत्रिमंडल में जगह मिली है। सूची में राजपालयम से जगदेश्वरी के, किल्लियूर से कांग्रेस विधायक राजेश कुमार एस, ईरोड ईस्ट से एम विजय बालाजी, रासीपुरम से लोगेश तमिलसेल्वन डी और सेलम साउथ से विजय तमिलन पार्थिबन ए के नाम भी शामिल हैं। इसके साथ ही श्रीरंगम से रमेश, मेलूर से कांग्रेस विधायक पी विश्वनाथन, वेलाचेरी से कुमार आर, श्रीपेरंबदूर से थेन्नारासु के और कोयंबटूर नॉर्थ से वी संपत कुमार भी मंत्री पद की शपथ लेंगे। अंतिम सूची में अरंथांगी से मोहम्मद फरवास जे, तांबरम से डी सरथकुमार, डॉ. राधाकृष्णन नगर से एन मैरी विल्सन और किनाथुकादावु से विग्नेश के को भी शामिल किया गया है। सरकार को मिलेगी नई ऊर्जा राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस विस्तार के जरिए विजय सरकार संगठन और प्रशासन दोनों स्तरों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की रणनीति इस कैबिनेट विस्तार में साफ दिखाई दे रही है।
तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा विवाद उस समय खत्म होता दिखा जब मुख्यमंत्री C Joseph Vijay ने अपने ज्योतिषी राधान पंडित Rickey Radhan Pandit Vettrivel की विशेष कर्तव्य अधिकारी (OSD) के रूप में हुई नियुक्ति को वापस ले लिया। यह फैसला भारी राजनीतिक विरोध और सहयोगी दलों की नाराज़गी के बाद लिया गया। नियुक्ति के बाद बढ़ा विवाद, विपक्ष और सहयोगियों ने जताई आपत्ति कुछ ही दिन पहले राधान वेत्रिवेल को मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD नियुक्त किया गया था। लेकिन इस फैसले के तुरंत बाद राज्य की राजनीति में हंगामा मच गया। सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी दलों–जैसे Viduthalai Chiruthaigal Katchi, Communist Party of India (Marxist) और Communist Party of India–ने इस नियुक्ति पर कड़ी आपत्ति जताई। इन दलों का कहना था कि सरकारी पद पर ज्योतिषी की नियुक्ति “अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला कदम” है और इससे वैज्ञानिक सोच को नुकसान पहुंचता है। “वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दें” – नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया विरोध जताते हुए वकिल और नेताओं ने सरकार से अपील की कि प्रशासन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जाए। एक विधायक ने कहा कि सरकार को जनता के पैसों से ऐसे पद नहीं बनाने चाहिए जो अंधविश्वास को बढ़ावा दें। वाम दलों के नेताओं ने भी कहा कि सरकार का दायित्व है कि वह तर्कसंगत सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूत करे। DMDK नेता ने भी उठाए सवाल Desiya Murpokku Dravida Kazhagam की नेता ने भी इस फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जनता, खासकर युवाओं ने बदलाव के लिए सरकार को चुना है, ऐसे में इस तरह की नियुक्तियां गलत संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति निजी रूप से ज्योतिष पर विश्वास करता है, तो वह उसका व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन सरकारी पद पर इसकी भूमिका उचित नहीं है। जयललिता के दौर से भी हुई तुलना इस पूरे विवाद के बीच पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के शासनकाल की भी चर्चा शुरू हो गई, जहां कथित तौर पर ज्योतिष और सलाहकारों की भूमिका को लेकर पहले भी बहस होती रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद पुरानी राजनीतिक परंपराओं की याद भी दिलाता है। दबाव बढ़ा तो सरकार ने लिया यू-टर्न विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री विजय ने संकेत दिया था कि इस नियुक्ति पर पुनर्विचार किया जाएगा। इसके बाद ही आधिकारिक रूप से राधान वेत्रिवेल की OSD नियुक्ति को रद्द कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने यह कदम गठबंधन सहयोगियों की नाराज़गी और विपक्ष के तीखे हमलों को देखते हुए उठाया। राजनीतिक संदेश और आगे की स्थिति हालांकि गठबंधन दलों ने सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है, लेकिन इस घटना ने राजनीतिक हलकों में हलचल जरूर पैदा कर दी है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सरकार के लिए एक बड़ा “मैसेजिंग इश्यू” बन गया था, जिसे संभालना जरूरी हो गया था। अब सभी की नजर इस बात पर है कि मुख्यमंत्री विजय आगे प्रशासनिक फैसलों में किस तरह संतुलन बनाते हैं और क्या यह विवाद लंबे समय तक राजनीतिक असर छोड़ेगा।
Tamil Nadu Govt Formation : तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. एएमएमके (AMMK) ने विजय की पार्टी टीवीके (TVK) के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. आरोप है कि टीवीके ने फर्जी समर्थन पत्र का इस्तेमाल कर यह दिखाने की कोशिश की कि एएमएमके उनकी सरकार को समर्थन दे रही है. इस विवाद ने राज्य की राजनीति को और गर्मा दिया है. पूरा मामला एएमएमके के इकलौते विधायक कामराज एस के समर्थन को लेकर खड़ा हुआ है. एएमएमके प्रमुख टीटीवी दिनाकरन ने आरोप लगाया कि टीवीके ने विधायक कामराज के समर्थन पत्र की “फर्जी कॉपी” राज्यपाल को सौंपी है. उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई और पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की चेतावनी दी थी. अब इस मामले में औपचारिक शिकायत भी दर्ज करा दी गई है. TVK ने वीडियो जारी कर दिया जवाब विवाद बढ़ने के बाद टीवीके ने 8 मई की शाम एक वीडियो जारी किया. इस वीडियो में कथित तौर पर विधायक कामराज खुद टीवीके के समर्थन में चिट्ठी लिखते दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में वह यह कहते भी नजर आते हैं कि उन्होंने एएमएमके नेतृत्व की जानकारी और मंजूरी के साथ टीवीके को समर्थन दिया है. टीवीके नेताओं ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर करते हुए दावा किया कि दिनाकरन के आरोप पूरी तरह निराधार हैं. पार्टी का कहना है कि समर्थन पत्र पूरी तरह वैध है और इसे लेकर फैलाए जा रहे आरोप राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं. सरकार बनाने के लिए राज्यपाल से मिले विजय तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी टीवीके के अध्यक्ष चंद्रशेखर जोसफ विजय ने वामपंथी दलों के समर्थन के बाद राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मुलाकात की. विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए राज्यपाल से सरकार गठन का न्योता देने की मांग की. बताया जा रहा है कि यह राज्यपाल के साथ विजय की तीसरी मुलाकात थी. हालांकि बहुमत के आंकड़े को लेकर अब भी सस्पेंस बना हुआ है और हर विधायक का समर्थन बेहद अहम माना जा रहा है. समर्थन पत्र विवाद से बढ़ा राजनीतिक संकट समर्थन पत्र को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब कानूनी और संवैधानिक मुद्दा बनता जा रहा है. एक ओर एएमएमके टीवीके पर फर्जीवाड़े का आरोप लगा रही है, वहीं टीवीके वीडियो जारी कर खुद को सही साबित करने में जुटी है. अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि पुलिस जांच में क्या सच सामने आता है और राज्यपाल किस दल को सरकार बनाने का मौका देते हैं. आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति में यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है.
तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर जारी सस्पेंस के बीच राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. सूत्रों के मुताबिक, एआईएडीएमके (AIADMK) भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन से अलग होने पर विचार कर रही है. चर्चा है कि पार्टी प्रमुख एडप्पाडी के. पलानीस्वामी (EPS) अभिनेता-विजय की पार्टी टीवीके (TVK) को समर्थन देकर नई सरकार बनाने का रास्ता खोल सकते हैं. पुडुचेरी रिसॉर्ट में हुई अहम बैठक AIADMK महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी ने 7 मई को पुडुचेरी के बाहरी इलाके अरियानकुप्पम स्थित एक निजी रिसॉर्ट में पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों के साथ महत्वपूर्ण बैठक की. इस बैठक में करीब 40 विधायक शामिल हुए. बैठक लगभग एक घंटे तक चली, जिसमें मौजूदा राजनीतिक हालात और सरकार गठन के विकल्पों पर चर्चा हुई. सूत्रों के अनुसार, पलानीस्वामी ने विधायकों से एकजुट रहने और धैर्य बनाए रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ दिनों में “अच्छी खबर” मिल सकती है, इसलिए सभी विधायक साथ बने रहें. TVK को सत्ता से दूर रखना मुश्किल? तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) विधानसभा चुनाव में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. हालांकि बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटों के आंकड़े से पार्टी अभी पीछे है. कांग्रेस के 5 विधायकों का समर्थन मिलने के बाद भी TVK की संख्या 112 तक ही पहुंचती है. ऐसे में AIADMK का समर्थन विजय के लिए सत्ता का रास्ता आसान बना सकता है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर AIADMK समर्थन देती है, तो तमिलनाडु में नई राजनीतिक धुरी बन सकती है. किस पार्टी को कितनी सीटें? 234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में सीटों का गणित इस प्रकार है: TVK – 108 सीट DMK – 59 सीट AIADMK – 47 सीट कांग्रेस – 5 सीट PMK – 4 सीट IUML – 2 सीट CPI – 2 सीट CPM – 2 सीट VCK – 2 सीट BJP, DMDK और AMMK – 1-1 सीट विजय को अपनी जीती हुई दो सीटों में से एक सीट छोड़नी होगी, जिससे TVK की प्रभावी संख्या 107 रह जाएगी. माकपा भी करेगी फैसला इधर, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) ने भी शुक्रवार को बैठक बुलाई है. पार्टी यह तय करेगी कि वह TVK को समर्थन देगी या नहीं. TVK ने सभी धर्मनिरपेक्ष दलों से नई सरकार के समर्थन की अपील की है. तमिलनाडु में बढ़ा सियासी रोमांच तमिलनाडु में अब राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं. अगर AIADMK NDA से अलग होकर TVK का साथ देती है, तो राज्य की राजनीति में यह सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जाएगा. वहीं DMK भी लगातार बैकचैनल बातचीत में जुटी हुई है, ताकि सत्ता समीकरण अपने पक्ष में बनाए जा सकें.
तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव दिख रहा है। 2026 विधानसभा चुनाव के रुझानों में Tamilaga Vettri Kazhagam (टीवीके) ने पहली बार चुनाव लड़कर ही पारंपरिक दिग्गजों Dravida Munnetra Kazhagam (डीएमके) और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (एआईएडीएमके) को कड़ी टक्कर दी है। क्या हुआ चुनाव में? Vijay की पार्टी टीवीके करीब 110 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है डीएमके गठबंधन लगभग 57 सीटों पर एआईएडीएमके गठबंधन करीब 66 सीटों पर आगे सरकार बनाने के लिए 117 सीटों का आंकड़ा जरूरी है, यानी टीवीके बहुमत के काफी करीब है। क्यों खास है यह परिणाम? टीवीके का यह पहला चुनाव है पहली बार में ही उसने 20+ साल से चली आ रही डीएमके–एआईएडीएमके की राजनीति को चुनौती दी तमिलनाडु में लंबे समय से सत्ता इन्हीं दो पार्टियों के बीच घूमती रही है क्या सरकार बना पाएगी टीवीके? पार्टी का दावा है कि वह अपने दम पर सरकार बनाएगी लेकिन जरूरत पड़ने पर छोटी पार्टियों का समर्थन मिल सकता है राजनीति में क्या बदल रहा है? यह नतीजे संकेत देते हैं कि: जनता नई राजनीति और नए चेहरे चाहती है परिवारवाद और पारंपरिक दलों के खिलाफ नाराजगी है स्टार पावर + एंटी-इंकम्बेंसी का असर दिखा
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में बड़ी चुनावी कार्रवाई सामने आई है। चुनाव आयोग की निगरानी में अब तक ₹1,200 करोड़ से अधिक की नकदी, सोना-चांदी, फ्रीबीज, शराब और ड्रग्स जब्त किए गए हैं। जब्ती का बड़ा आंकड़ा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार: ₹169.85 करोड़ कैश ₹650.87 करोड़ के सोना-चांदी इसके अलावा भारी मात्रा में फ्रीबीज, शराब और नशीले पदार्थ यह कार्रवाई चुनाव में पैसे और प्रलोभनों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए की जा रही है। पीएम मोदी पर आचार संहिता उल्लंघन का आरोप इसी बीच नरेंद्र मोदी के 18 अप्रैल के संबोधन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। 700 से अधिक नागरिकों–जिनमें पूर्व ब्यूरोक्रेट्स, एक्टिविस्ट और पत्रकार शामिल हैं–ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इसे आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन बताया है। शिकायत में कहा गया है कि यह संबोधन दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सरकारी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुआ, जो चुनाव के दौरान पक्षपातपूर्ण प्रचार जैसा प्रतीत होता है। विपक्ष के हमले तेज ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पीएम मोदी चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों–रेल और विमान–का दुरुपयोग कर रहे हैं। राहुल गांधी ने तमिलनाडु में कहा कि भाजपा “रिमोट कंट्रोल” वाली सरकार बनाना चाहती है, जैसा उन्होंने बिहार का उदाहरण देकर आरोप लगाया। मद्रास हाई कोर्ट का नोटिस इस बीच मद्रास हाई कोर्ट ने TVK प्रमुख विजय के खिलाफ याचिका पर चुनाव आयोग और आयकर विभाग को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप है कि अलग-अलग हलफनामों में उनकी संपत्ति के आंकड़ों में करीब ₹100 करोड़ का अंतर है। चुनावी माहौल और सख्त तमिलनाडु में चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, चुनाव आयोग की सख्ती और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप दोनों तेज होते जा रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।