बेरूत/तेल अवीव: इजराइल और हिजबुल्ला के बीच तनाव एक बार फिर हिंसक टकराव में बदल गया है। इजरायली सेना ने शुक्रवार (19 जून) को दक्षिणी लेबनान और पूर्वी बेका घाटी में हिजबुल्ला के ठिकानों पर रातभर हवाई हमले किए, जबकि जवाबी कार्रवाई में हिजबुल्ला ने इजरायली सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। संघर्ष में अब तक कम से कम 18 लोगों की मौत की खबर है, जबकि कई अन्य घायल बताए जा रहे हैं। लेबनान की सरकारी समाचार एजेंसी नेशनल न्यूज एजेंसी (NNA) के अनुसार, इजरायली हवाई हमलों में मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि कई इलाकों में राहत और बचाव अभियान जारी है। वहीं, इजराइल ने कहा है कि उसकी सैन्य कार्रवाई अभी समाप्त नहीं हुई है और हिजबुल्ला के सैन्य ढांचे को निशाना बनाया जा रहा है। इजराइल के चार सैनिक भी मारे गए इजराइली सेना के मुताबिक, दक्षिणी लेबनान में जारी संघर्ष के दौरान एक लेफ्टिनेंट कर्नल समेत चार सैनिक मारे गए हैं। इसके अलावा एक विस्फोटक ड्रोन हमले में पांच सैनिक घायल हुए हैं, जिनका इलाज किया जा रहा है। बेका घाटी में भी सैन्य कार्रवाई दक्षिणी लेबनान के अलावा इजरायली सेना ने पूर्वी बेका घाटी में भी कई ठिकानों पर हमले किए। सेना का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य हिजबुल्ला की सैन्य क्षमताओं और बुनियादी ढांचे को कमजोर करना है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि जब तक हिजबुल्ला से उत्पन्न खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी कार्रवाई जारी रखेगी। ईरान-अमेरिका वार्ता स्थगित इजराइल-हिजबुल्ला संघर्ष के बीच शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित ईरान-अमेरिका वार्ता को स्थगित कर दिया गया है। इस बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के शामिल होने की संभावना थी। क्षेत्रीय अधिकारियों के अनुसार, मध्यस्थ नई तारीख तय करने और वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं। मौजूदा हालात ने हाल ही में हुए ईरान-अमेरिका प्रारंभिक युद्धविराम समझौते के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। युद्धविराम समझौते पर संकट हालिया समझौते में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने और क्षेत्रीय अखंडता एवं संप्रभुता का सम्मान करने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। लेकिन जमीनी हालात इस समझौते की भावना के विपरीत दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं थमी, तो पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लग सकता है। हॉर्मुज जलमार्ग खुलने से राहत इस बीच, ईरान और अमेरिका के बीच हुए प्रारंभिक समझौते के बाद हॉर्मुज जलमार्ग अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए फिर से खुल गया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति को राहत मिली है। युद्ध के दौरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता पैदा हो गई थी। इजराइल-हिजबुल्ला के बीच फिर बढ़ते संघर्ष ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की संभावनाओं को एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में पहुंचा दिया है।
ईरान पर हमले रोकने के फैसले से चौंके नेतन्याहू अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों के बीच एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले रोकने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का फैसला किया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने यह फैसला तब लिया जब उन्हें संकेत मिले कि ईरानी नेतृत्व युद्ध समाप्त करने के लिए तैयार किए गए एक प्रारूप समझौते पर सहमत हो गया है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू को इस बातचीत की पूरी जानकारी नहीं थी और वे अमेरिकी प्रशासन के करीबी लोगों से इसके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे। क्या इजरायल को वार्ता से दूर रखा गया? सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल सीधे तौर पर शामिल नहीं है। जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान के साथ समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, तो इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया कि वह इस प्रस्तावित समझौते का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर इजरायल को वार्ता प्रक्रिया से अलग रखा गया। 'इस्लामाबाद समझौता' बन सकता है नया मोड़ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किए जा रहे इस समझौते को "इस्लामाबाद एग्रीमेंट" नाम दिया जा सकता है। प्रस्तावित समझौते में कई अहम बिंदु शामिल हैं। इसके तहत Strait of Hormuz को तुरंत फिर से खोलने, समुद्री व्यापार सामान्य करने, ईरान को सीमित प्रतिबंध राहत देने और 60 दिनों के युद्धविराम को आगे बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल बताए जा रहे हैं। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी आगे बातचीत हो सकती है। इजरायल की शर्तें अब भी सख्त नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग करते रहे हैं। इजरायल चाहता है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम भंडार को हटाए, परमाणु संवर्धन ढांचे को खत्म करे, मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाए और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को समर्थन देना बंद करे। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित समझौते में इजरायल की इन मांगों को कितना स्थान मिला है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ रही दूरी? रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में ट्रंप और नेतन्याहू के संबंधों में तनाव बढ़ा है। दोनों नेताओं की रणनीति में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। जहां ट्रंप युद्ध को जल्द समाप्त कर क्षेत्र में स्थिरता लाना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ अधिक कठोर और लंबी रणनीति के पक्षधर माने जा रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती तेल कीमतों, वैश्विक आर्थिक दबाव और घरेलू राजनीतिक चुनौतियों के कारण ट्रंप युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दे रहा है। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अंतिम रूप ले लेता है, तो यह पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को भी राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि इजरायल की चिंताओं और उसकी भविष्य की रणनीति पर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति लाता है या नए राजनीतिक मतभेदों को जन्म देता है।
अमेरिका और इजरायल के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान में इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी बीच पश्चिम एशिया की नीतियों और ईरान संकट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। पेंटागन में बढ़ी सतर्कता रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अस्थायी संचार उपकरणों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा स्थिति की पुष्टि नहीं की है। खुफिया गतिविधियों को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में अमेरिका और इजरायल करीबी सहयोगी माने जाते हैं, लेकिन अतीत में भी दोनों देशों के बीच खुफिया गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रहती है। इसी संदर्भ में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय चर्चाओं के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की चर्चा रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया नीति को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच हाल के महीनों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभरे हैं। बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच हुई एक बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर तीखी चर्चा हुई। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इजरायल ने आरोपों को किया खारिज वॉशिंगटन स्थित इजरायली अधिकारियों ने जासूसी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इजरायल अपने सहयोगी देशों के खिलाफ ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने भी इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है और कहा है कि अमेरिका-इजरायल सुरक्षा सहयोग पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई संवेदनशीलता विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग जारी है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। फिलहाल, जासूसी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं से जुड़े कई दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। आधिकारिक स्तर पर इनकी पुष्टि सीमित है, इसलिए इन्हें सावधानी के साथ देखने की आवश्यकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति समझौते की बातचीत ने पश्चिम एशिया की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। इस बीच इजरायल की चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को आशंका है कि अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला संभावित समझौता इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व दिए बिना आगे बढ़ सकता है। वार्ता में इजरायल का प्रभाव घटने की चर्चा रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल की भूमिका पहले की तुलना में काफी सीमित हो गई है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू ने निजी बातचीत में स्वीकार किया है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया पर उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा और अंतिम निर्णय मुख्य रूप से वाशिंगटन और तेहरान के बीच ही तय हो रहे हैं। सार्वजनिक रूप से इजरायली नेतृत्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की आलोचना करने से बच रहा है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती चिंता की खबरें सामने आ रही हैं। ईरान पर दबाव बनाए रखने की थी मांग सूत्रों के अनुसार, अप्रैल में घोषित शुरुआती युद्धविराम के बाद नेतन्याहू लगातार इस बात की वकालत करते रहे कि ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बनाए रखा जाए। उनका मानना था कि लगातार दबाव से तेहरान की रणनीतिक क्षमता कमजोर की जा सकती है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने सैन्य दबाव बढ़ाने के बजाय कूटनीतिक बातचीत और समझौते के रास्ते को प्राथमिकता दी। इससे दोनों सहयोगी देशों के दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट हो गया। किन मुद्दों को लेकर चिंतित है इजरायल? इजरायल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संभावित समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों (प्रॉक्सी नेटवर्क) से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त प्रतिबंध या नियंत्रण शामिल न हो। इजरायली अधिकारियों का मानना है कि यदि इन प्रमुख सुरक्षा मुद्दों का समाधान किए बिना ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो तेहरान को रणनीतिक लाभ मिल सकता है। 'खराब अंतरिम समझौते' का डर रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारियों को आशंका है कि अमेरिका किसी ऐसे अंतरिम समझौते पर सहमत हो सकता है जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केवल सीमित नियंत्रण स्थापित करे। इजरायल चाहता है कि किसी भी समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को लेकर स्पष्ट और सत्यापित प्रावधान हों। इजरायली पक्ष का तर्क है कि केवल आश्वासनों के आधार पर किया गया समझौता भविष्य में नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। पश्चिम एशिया की राजनीति पर रहेगा असर विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई व्यापक समझौता होता है, तो उसका असर पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में इजरायल, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को लेकर लगातार अमेरिकी प्रशासन के संपर्क में बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि संभावित समझौते में इजरायल की मांगों को कितनी जगह मिलती है।
Benjamin Netanyahu ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ हुई अहम बातचीत में साफ संकेत दिया है कि Israel अपनी सुरक्षा नीति में किसी तरह की नरमी नहीं बरतेगा। अमेरिका और Iran के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल को Lebanon समेत हर मोर्चे पर सैन्य कार्रवाई करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए। लेबनान में कार्रवाई जारी रखने पर जोर रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेतन्याहू ने ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान कहा कि इजरायल अपने खिलाफ किसी भी खतरे पर कार्रवाई करने की आजादी बनाए रखेगा। इसमें लेबनान में चल रहे अभियान भी शामिल हैं, जहां इजरायली सेना ईरान समर्थित Hezbollah के खिलाफ लगातार ऑपरेशन चला रही है। बताया गया कि ट्रंप ने भी इजरायल के इस रुख का समर्थन किया। ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर ट्रंप सख्त रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने बातचीत में दोहराया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने और ईरानी क्षेत्र से समृद्ध यूरेनियम हटाने की मांग पर अमेरिका कायम रहेगा। उन्होंने साफ किया कि इन शर्तों के बिना किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। बातचीत के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि नेतन्याहू के साथ उनकी बातचीत “बेहद अच्छी” रही। नेतन्याहू ने किया बातचीत का खुलासा नेतन्याहू ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि उन्होंने ट्रंप के साथ ईरान के परमाणु कार्यक्रम और Strait of Hormuz को दोबारा खोलने से जुड़े समझौते पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” और “एपिक फ्यूरी” के दौरान अमेरिकी और इजरायली सेनाओं ने मिलकर ईरानी खतरे के खिलाफ काम किया। साथ ही उन्होंने इजरायल की सुरक्षा के प्रति ट्रंप की प्रतिबद्धता की भी सराहना की। होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर बन रहा समझौता इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बातचीत तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर काफी हद तक चर्चा पूरी हो चुकी है, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। फरवरी में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद यह समुद्री मार्ग लगभग बंद हो गया था, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि Pakistan की मध्यस्थता से वार्ता आगे बढ़ रही है। ड्राफ्ट समझौते में क्या शर्तें? ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्तावित मसौदे में यह शर्त शामिल है कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान या उसके समर्थक समूहों पर हमला नहीं करेंगे। बदले में ईरान भी पहले हमला न करने का आश्वासन देगा। इजरायल के भीतर इस संभावित समझौते को लेकर मतभेद दिखाई दे रहे हैं। Benny Gantz ने चेतावनी दी है कि यदि समझौते के हिस्से के रूप में लेबनान में युद्धविराम लागू किया गया, तो यह इजरायल के लिए रणनीतिक गलती साबित हो सकती है।
ईरान की संसद में एक ऐसे प्रस्तावित कानून पर चर्चा की खबर सामने आई है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की हत्या करने वाले को 50 मिलियन यूरो यानी करीब 560 करोड़ रुपये तक का इनाम देने का प्रावधान शामिल हो सकता है। क्या है पूरा मामला? ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति इस प्रस्ताव पर विचार कर रही है। बताया जा रहा है कि प्रस्तावित बिल का नाम “इस्लामिक रिपब्लिक की सैन्य और सुरक्षा बलों द्वारा जवाबी कार्रवाई” रखा गया है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान के सांसद Ebrahim Azizi ने कहा कि ईरान अपने शीर्ष नेतृत्व पर हुए हमलों के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार मानता है। ट्रंप और नेतन्याहू पर गंभीर आरोप ईरानी नेताओं का आरोप है कि फरवरी में हुए हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के पीछे अमेरिका और इजरायल की भूमिका थी। प्रस्तावित बिल में अमेरिकी सैन्य अधिकारी एडमिरल Brad Cooper का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। संसद में क्या कहा गया? ईरानी सांसद Mahmoud Nabavian ने कथित तौर पर कहा कि संसद जल्द ही ऐसे प्रस्ताव पर मतदान कर सकती है, जिसमें “ट्रंप और नेतन्याहू को खत्म करने” वाले को इनाम देने की बात शामिल होगी। इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। पहले भी मिल चुकी हैं धमकियां ईरान में इससे पहले भी अमेरिकी नेताओं के खिलाफ कड़े बयान दिए जाते रहे हैं, खासकर ईरानी जनरल Qasem Soleimani की हत्या के बाद। कई ईरान समर्थक समूह पहले भी ट्रंप के खिलाफ इनाम घोषित करने जैसे अभियान चला चुके हैं। रिपोर्ट्स में “ब्लड कोवेनेंट” नामक अभियान का जिक्र किया गया है, जिसने कथित तौर पर करोड़ों डॉलर जुटाने का दावा किया था। अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया? इससे पहले ट्रंप प्रशासन साफ कह चुका है कि अगर अमेरिकी नेताओं के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई की कोशिश हुई तो उसका बेहद कड़ा जवाब दिया जाएगा। अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय संघर्ष और पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को लेकर पहले से ही टकराव बना हुआ है। ऐसे में इस तरह की रिपोर्ट्स ने वैश्विक सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच बेंजामिन नेतन्याहू ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है और यह युद्ध उम्मीद से कहीं जल्दी समाप्त हो सकता है। नेतन्याहू के अनुसार, अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों के बाद ईरान अब न तो यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) करने की स्थिति में है और न ही बैलिस्टिक मिसाइल बनाने में सक्षम है। हालांकि, उन्होंने अपने इन दावों के समर्थन में कोई ठोस सबूत सार्वजनिक नहीं किया। “ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हुई” नेतन्याहू ने कहा कि संयुक्त अभियान के तहत ईरान के उन कारखानों को निशाना बनाया गया है, जहां मिसाइल और परमाणु हथियारों के पुर्जे तैयार किए जाते थे। उनके मुताबिक, मिसाइल और ड्रोन क्षमता “तेजी से नष्ट” की जा रही है सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है अभियान “तेजी से लक्ष्य हासिल कर रहा है” उन्होंने दावा किया कि यह कार्रवाई क्षेत्र और दुनिया की सुरक्षा के लिए जरूरी है। अमेरिका की भूमिका पर क्या कहा? नेतन्याहू ने इस बात से इनकार किया कि इजरायल ने अमेरिका को युद्ध में खींचा है। उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप अपने फैसले खुद लेते हैं और अमेरिका-इजरायल के बीच गहरा तालमेल है। उन्होंने दोनों देशों की साझेदारी को “महत्वपूर्ण” बताते हुए कहा कि यह गठबंधन वैश्विक सुरक्षा के लिए काम कर रहा है। गैस ठिकानों पर हमले रोकने का फैसला नेतन्याहू ने यह भी बताया कि अमेरिका के अनुरोध पर इजरायल ने ईरान के प्रमुख गैस क्षेत्रों पर आगे हमले फिलहाल रोक दिए हैं। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पहले किए गए हमले इजरायल ने “स्वतंत्र रूप से” किए थे। युद्ध का विस्तार संभव, जमीनी कार्रवाई के संकेत अब तक यह संघर्ष मुख्य रूप से हवाई हमलों तक सीमित रहा है, लेकिन नेतन्याहू ने संकेत दिए कि जमीनी कार्रवाई (Ground Operation) भी संभव है। उन्होंने कहा कि इसके कई विकल्प मौजूद हैं, हालांकि उन्होंने विस्तार से कुछ नहीं बताया। ईरान के अंदर अस्थिरता का दावा नेतन्याहू ने ईरान के नेतृत्व में अंदरूनी तनाव और अस्थिरता के संकेत भी दिए। उनका कहना है कि वहां सत्ता के भीतर खींचतान बढ़ रही है और स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह स्थिति किसी बड़े जनविद्रोह में बदलेगी या नहीं। क्या जल्द खत्म होगा युद्ध? नेतन्याहू का मानना है कि मौजूदा सैन्य बढ़त के चलते यह युद्ध उम्मीद से जल्दी समाप्त हो सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी हकीकत, क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक दबाव इस संघर्ष की दिशा तय करेंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।