संघर्ष, दर्द और हिम्मत की कहानी अगर किसी एक नाम में समेटनी हो, तो वह है इसाक मालसावमतलुआंगा। महज 18 साल की उम्र में इस युवा वेटलिफ्टर ने न केवल व्यक्तिगत त्रासदियों को हराया, बल्कि देश के पहले Khelo India Tribal Games 2026 में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। कम उम्र में टूटा सहारा, फिर भी नहीं टूटा हौसला मिजोरम के इस होनहार खिलाड़ी की जिंदगी आसान नहीं रही। 16 साल की उम्र पूरी होने से पहले ही उन्होंने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया। पिता की 2018 में सड़क दुर्घटना में मौत हुई और कुछ साल बाद मां भी कैंसर से जूझते हुए दुनिया छोड़ गईं। इस दोहरे सदमे ने इसाक को अंदर से तोड़ दिया। हालात ऐसे बन गए कि उन्हें खेल छोड़ने का विचार भी आया। संघर्ष के बीच चमका टैलेंट हर मुश्किल के बीच उनके बचपन के कोच और चाचा-चाची ने उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने इसाक को संभाला और वेटलिफ्टिंग जारी रखने के लिए प्रेरित किया। छत्तीसगढ़ में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में इसाक ने पुरुषों के 60 Kg वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 235 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। स्नैच में दूसरे स्थान पर रहे क्लीन एंड जर्क में शानदार वापसी चोट के बावजूद दिया बेहतरीन प्रदर्शन चोट भी नहीं रोक सकी जज्बा टूर्नामेंट से पहले इसाक पीठ की चोट से जूझ रहे थे। कोच ने उन्हें आराम करने की सलाह भी दी थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। रायपुर में मंच पर उतरकर उन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया और साबित कर दिया कि असली ताकत शरीर में नहीं, हौसले में होती है। चाचा-चाची बने सबसे बड़ा सहारा माता-पिता के जाने के बाद उनके चाचा-चाची ने उन्हें अपनाया। एक छोटे से रेस्तरां में काम करने वाला यह परिवार इसाक के सपनों का आधार बना। उनकी पढ़ाई और ट्रेनिंग दोनों जारी रही। आज भी उनके चाचा हर प्रतियोगिता में उनके साथ रहते हैं। गोल्ड जीतने के बाद जब चाचा ने उन्हें गले लगाया, वह पल बेहद भावुक था। पढ़ाई और ट्रेनिंग साथ-साथ इसाक फिलहाल भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, इम्फाल में ट्रेनिंग ले रहे हैं और साथ ही 12वीं की पढ़ाई भी कर रहे हैं। 2024: यूथ नेशनल में सिल्वर 2025: जूनियर प्रतियोगिता में सिल्वर 2025: नेशनल चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज 2026: ट्राइबल गेम्स में गोल्ड क्यों खास है यह कहानी? यह सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि यह कहानी है- हिम्मत की परिवार के सहारे की सपनों के लिए लड़ने की इसाक ने साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी कठिन हों, अगर इरादे मजबूत हों तो सफलता जरूर मिलती है।
भारतीय क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी के मामा अभिषेक चौहान ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा 2025 में शानदार सफलता हासिल की है। उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया रैंक (AIR) 102 हासिल कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। खास बात यह है कि अभिषेक चौहान ने बिना किसी बड़े कोचिंग संस्थान के सिर्फ सेल्फ स्टडी के दम पर यह सफलता प्राप्त की है। UPSC का अंतिम परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हुआ, जिसमें उनका नाम 102वीं रैंक के साथ शामिल है। अभिषेक की सफलता की जानकारी क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी के पिता संजीव सूर्यवंशी ने सोशल मीडिया के माध्यम से दी। उन्होंने अभिषेक के साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि यह परिवार के लिए गर्व का क्षण है। IIT के गोल्ड मेडलिस्ट हैं अभिषेक अभिषेक चौहान बचपन से ही मेधावी छात्र रहे हैं। उन्होंने जियोलॉजी विषय में इंटीग्रेटेड एमटेक की पढ़ाई पूरी की और आईआईटी से गोल्ड मेडल भी हासिल किया। पढ़ाई के बाद उन्होंने एक मल्टीनेशनल कंपनी में लगभग 6 महीने तक नौकरी भी की, लेकिन देश सेवा की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद वर्ष 2022 से हाजीपुर में रहकर UPSC की तैयारी शुरू की। कड़ी मेहनत और लगातार अध्ययन के दम पर उन्होंने 2025 में पहली बार परीक्षा दी और प्री, मेंस और इंटरव्यू तीनों चरण सफलतापूर्वक पास कर लिए। गांव में जश्न का माहौल अभिषेक की सफलता की खबर मिलते ही मोहिउद्दीननगर के राजाजान गांव में जश्न का माहौल बन गया। ग्रामीणों ने सड़कों पर उतरकर आतिशबाजी की और मिठाइयां बांटी। अभिषेक के पिता वर्तमान में नालंदा खुला विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक तरफ भांजा वैभव सूर्यवंशी क्रिकेट के मैदान पर जिले का नाम रोशन कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ मामा अभिषेक चौहान प्रशासनिक सेवा में जाकर क्षेत्र का गौरव बढ़ा रहे हैं। यह मामा-भांजे की जोड़ी पूरे इलाके के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।
झारखंड के Latehar जिले के महुआडांड़ प्रखंड के चटकपुर गांव के रहने वाले Vipul Gupta ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा 2025 में शानदार सफलता हासिल की है। उन्होंने 103वीं ऑल इंडिया रैंक प्राप्त कर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में जगह बनाई है और अपने जिले का नाम रोशन किया है। संघर्ष और मेहनत से मिली सफलता बिपुल गुप्ता की यह सफलता उनकी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प का परिणाम है। पिछले साल भी उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास की थी, लेकिन 368वीं रैंक आने के कारण उनका चयन आईएएस में नहीं हो पाया था। हालांकि उसी वर्ष उन्होंने Indian Forest Service (IFS) की परीक्षा में देशभर में 12वीं रैंक हासिल की थी और फिलहाल वन विभाग में अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। लेकिन उनका लक्ष्य हमेशा से आईएएस बनकर समाज की सेवा करना था, जिसे उन्होंने इस बार हासिल कर लिया। परिवार और गांव में खुशी बिपुल गुप्ता के पिता पवन कुमार गुप्ता और माता दीपा गुप्ता हैं। जैसे ही यूपीएससी परिणाम में उनके 103वीं रैंक हासिल करने की खबर मिली, पूरे परिवार और गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। उनके दादा जयप्रकाश गुप्ता सहित परिवार के सभी लोगों ने मिठाई बांटकर जश्न मनाया। परिजनों ने कहा कि बिपुल ने अपनी मेहनत और लगन से न केवल अपना सपना पूरा किया, बल्कि पूरे जिले और समाज को गौरवान्वित किया है। युवाओं के लिए प्रेरणा ग्रामीणों का कहना है कि बिपुल की सफलता गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा है। उनकी उपलब्धि यह साबित करती है कि कठिन परिश्रम, आत्मविश्वास और लगातार प्रयास से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। रिजल्ट आने के बाद से ही उन्हें बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है और सभी उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना कर रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।