वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एंड्रयू टेट और ट्रिस्टन टेट के ब्रिटेन प्रत्यर्पण की कानूनी प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। व्हाइट हाउस की ओर से यह बयान उन अटकलों के बीच आया है जिनमें दावा किया जा रहा था कि ट्रंप प्रशासन दोनों भाइयों को कानूनी राहत दिलाने की कोशिश कर सकता है। व्हाइट हाउस ने अफवाहों पर लगाया विराम व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट से जब प्रेस ब्रीफिंग के दौरान पूछा गया कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप या उनका प्रशासन टेट ब्रदर्स के प्रत्यर्पण को रोकने के लिए हस्तक्षेप करेगा, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा— "नहीं।" इसके साथ ही उन्होंने इस विषय पर चल रही तमाम अटकलों को खारिज कर दिया। मार्को रुबियो ने भी बनाई दूरी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कहा कि इस मामले में सरकार की फिलहाल कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा कि यह मामला अमेरिकी अदालतों की कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रहा है और प्रशासन उसका सम्मान करेगा। रुबियो के अनुसार, अमेरिका और ब्रिटेन के बीच प्रत्यर्पण संधि लागू है और उसी के अनुरूप प्रक्रिया चलेगी। क्या हैं टेट ब्रदर्स पर आरोप? ब्रिटेन ने एंड्रयू और ट्रिस्टन टेट पर बलात्कार, यौन तस्करी, मानव तस्करी और महिलाओं के शोषण सहित कई गंभीर आरोप लगाए हैं। ब्रिटिश अभियोजन पक्ष ने हाल ही में दोनों भाइयों के खिलाफ दर्जनों नए आरोप जोड़े हैं, जिसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने उन्हें मियामी में हिरासत में लिया। दोनों भाई इन सभी आरोपों से इनकार कर रहे हैं और अपने प्रत्यर्पण का अदालत में विरोध कर रहे हैं। कानूनी प्रक्रिया के बाद होगा अंतिम फैसला अमेरिकी अदालत पहले यह तय करेगी कि प्रत्यर्पण संधि की सभी कानूनी शर्तें पूरी होती हैं या नहीं। यदि अदालत प्रत्यर्पण को मंजूरी देती है, तो अंतिम प्रशासनिक निर्णय अमेरिकी विदेश विभाग के स्तर पर होगा। हालांकि व्हाइट हाउस ने साफ कर दिया है कि राजनीतिक स्तर पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। राजनीतिक चर्चाएं भी तेज टेट ब्रदर्स को ट्रंप समर्थक माना जाता रहा है और अमेरिकी मीडिया में यह चर्चा भी रही कि उन्होंने ट्रंप परिवार के कुछ सदस्यों से संपर्क बनाने की कोशिश की थी। इसी कारण यह मामला कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया है। हाल ही में कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने संभावित राजनीतिक प्रभाव की जांच की मांग भी उठाई है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वर्ष 2027 की शुरुआत में भारत का दौरा कर सकते हैं। इस संभावना का संकेत अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत के साथ संबंधों को और मजबूत करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा की तैयारी कर रहा है। व्यापार समझौते को मिल सकता है अंतिम रूप मार्को रुबियो ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) पर बातचीत अंतिम चरण में है। उम्मीद है कि आने वाले महीनों में इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी और राष्ट्रपति ट्रंप की संभावित भारत यात्रा के दौरान इस पर बड़ा ऐलान हो सकता है। भारत-अमेरिका रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह यात्रा होती है, तो दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग और मजबूत होगा। यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत की पहली आधिकारिक यात्रा होगी। जी-7 बैठक के बाद बढ़ी कूटनीतिक सक्रियता हाल ही में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ा है। इसके बाद व्यापार समझौते और रणनीतिक साझेदारी पर बातचीत में भी तेजी आई है। अभी आधिकारिक कार्यक्रम जारी नहीं हालांकि, व्हाइट हाउस या भारत सरकार की ओर से ट्रंप की यात्रा की अंतिम तारीख या आधिकारिक कार्यक्रम जारी नहीं किया गया है। फिलहाल अमेरिकी प्रशासन ने केवल इतना कहा है कि यात्रा की तैयारी पर काम चल रहा है और समय तय होने पर औपचारिक घोषणा की जाएगी।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना जन्मदिन इस बार बेहद अनोखे अंदाज में मनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस के साउथ लॉन को एक विशाल UFC फाइटिंग एरिना में तब्दील कर दिया गया, जहां अल्टीमेट फाइटिंग चैंपियनशिप (UFC) के कई मुकाबले आयोजित किए गए। इस दौरान ट्रंप फ्रंट रो में बैठकर मुकाबलों का आनंद लेते नजर आए। बताया जा रहा है कि बारिश के कारण कार्यक्रम की शुरुआत में थोड़ी देरी हुई, लेकिन इसके बाद फाइटिंग केज के अंदर जोरदार मुकाबले देखने को मिले। 92 फीट ऊंचे ‘द क्लॉ’ नामक फाइटिंग केज में दुनिया के कई फाइटर्स ने हिस्सा लिया। एयर शो से हुई शुरुआत कार्यक्रम की शुरुआत अमेरिकी वायुसेना के विशेष फ्लाईपास्ट से हुई। इस दौरान छह एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट और छह एफ-16 फाइटिंग फाल्कन विमानों ने ‘सुपर डेल्टा फॉर्मेशन’ में उड़ान भरी। फ्लाईपास्ट के दौरान ट्रंप सैल्यूट करते नजर आए। इसके बाद संगीत की धुनों के बीच ट्रंप व्हाइट हाउस से निकलकर फाइटिंग एरिना तक पहुंचे और मुकाबलों का सिलसिला शुरू हुआ। ट्रंप परिवार और प्रशासन के वरिष्ठ सदस्य रहे मौजूद मुकाबलों के दौरान डोनाल्ड ट्रंप UFC के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डाना व्हाइट और प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप के साथ पहली पंक्ति में बैठे दिखाई दिए। उनके दोनों बेटे भी कार्यक्रम में मौजूद थे। इस आयोजन में ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ सदस्य शामिल हुए, जिनमें स्वास्थ्य मंत्री रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर, काश पटेल और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के नाम प्रमुख हैं। जन्मदिन समारोह या MAGA शक्ति प्रदर्शन? ट्रंप ने इस आयोजन को अमेरिका की 250वीं स्वतंत्रता वर्षगांठ समारोह का हिस्सा बताया, लेकिन कार्यक्रम में मौजूद समर्थकों का उत्साह इसे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी पेश करता दिखा। पूरे कार्यक्रम के दौरान समर्थक ‘यूएसए, यूएसए’ के नारे लगाते रहे। ब्रिटिश हेवीवेट मुक्केबाज टायसन फ्यूरी भी कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने ‘Donald Trump for Prime Minister’ लिखी टोपी पहन रखी थी, जिसने लोगों का ध्यान खींचा। शुरुआती मुकाबलों में किसने जीता? शुरुआती मुकाबलों में ट्रंप के करीबी माने जाने वाले बो निकल (Bo Nickal) ने काइल डौकाउस (Kyle Daukaus) को हराया। वहीं डिएगो लोपेस (Diego Lopes) ने स्टीव गार्सिया (Steve Garcia) के खिलाफ जीत दर्ज की। रिपोर्ट लिखे जाने तक कई अन्य मुकाबले भी जारी थे और दुनिया भर के फाइटर्स इस आयोजन का हिस्सा बने हुए थे। UFC और ट्रंप की राजनीति का पुराना रिश्ता UFC लंबे समय से ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) समर्थक वर्ग के बीच लोकप्रिय रहा है। मशहूर पॉडकास्टर जो रोगन समेत UFC से जुड़े कई प्रभावशाली चेहरे ट्रंप के समर्थकों में गिने जाते हैं। यही वजह है कि इस आयोजन को खेल के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्या व्हाइट हाउस में स्थायी होगा UFC केज? रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने मजाकिया अंदाज में कहा कि वह शायद ‘द क्लॉ’ फाइटिंग केज को कभी हटाना नहीं चाहेंगे और इसे व्हाइट हाउस परिसर का स्थायी हिस्सा भी बनाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह व्हाइट हाउस में ट्रंप प्रशासन के दौरान किए गए बड़े बदलावों की सूची में एक और अनोखा अध्याय जोड़ सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के प्रशासन ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ अपने अभियान को नया रूप देते हुए एक अनोखी वेबसाइट लॉन्च की है। 'Aliens.gov' नाम की इस वेबसाइट को अंतरिक्ष और एलियन थीम पर तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य अमेरिका में बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे प्रवासियों से जुड़ी कार्रवाई और गिरफ्तारियों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना है। साइंस-फिक्शन जैसी थीम ने खींचा ध्यान गुरुवार को शुरू की गई इस वेबसाइट का डिज़ाइन किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा दिखाई देता है। वेबसाइट पर तारों और आकाशगंगाओं की पृष्ठभूमि के साथ नियॉन-हरे रंग के अक्षरों का इस्तेमाल किया गया है। साइट खोलते ही एक संदेश दिखाई देता है— "They are among us" (वे हमारे बीच घूम रहे हैं)। यह संदेश उन अवैध प्रवासियों की ओर संकेत करता है, जिन्हें ट्रंप प्रशासन लंबे समय से कानूनी शब्दावली में "एलियंस" कहकर संबोधित करता रहा है। गिरफ्तारियों को दिखाने के लिए बनाया गया प्लेटफॉर्म 'Aliens.gov' को अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन एजेंसी (ICE) की कार्रवाई को प्रदर्शित करने के लिए विकसित किया गया है। वेबसाइट पर दावा किया गया है कि वर्षों से ऐसे लोग अमेरिका में रह रहे थे जिनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं थी और अब प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। साइट पर एक लाइव काउंटर भी लगाया गया है, जिसमें प्रवासियों की गिरफ्तारी और कार्रवाई से जुड़े आंकड़े प्रदर्शित किए जा रहे हैं। इंटरैक्टिव मैप से देखी जा सकती है गिरफ्तारी की जानकारी वेबसाइट की सबसे प्रमुख विशेषताओं में एक इंटरैक्टिव डिजिटल मैप शामिल है। इसके जरिए उपयोगकर्ता अमेरिका के किसी भी राज्य या शहर में हुई आव्रजन कार्रवाई की जानकारी देख सकते हैं। मैप पर उपलब्ध जानकारी में गिरफ्तार व्यक्ति का मूल देश, उस पर लगे आरोप और कथित आपराधिक रिकॉर्ड जैसी जानकारियां भी शामिल की गई हैं। इसके अलावा वेबसाइट पर एक रिपोर्टिंग फॉर्म भी दिया गया है, जहां नागरिक संदिग्ध अवैध प्रवासियों की जानकारी साझा कर सकते हैं। पहले UFO से जुड़ी अटकलें लगी थीं इस वेबसाइट के लॉन्च से पहले व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक टीजर वीडियो साझा किया था। वीडियो में खेतों में बने रहस्यमयी निशानों और सर्चलाइट का इस्तेमाल किया गया था, जिससे लोगों ने अनुमान लगाया कि सरकार UFO या दूसरे ग्रहों के जीवों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने वाली है। बाद में स्पष्ट हो गया कि यह अभियान अवैध प्रवासियों पर केंद्रित था और वेबसाइट का एलियंस से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। मानवाधिकार संगठनों ने जताई आपत्ति वेबसाइट लॉन्च होने के बाद कई मानवाधिकार और प्रवासी अधिकार संगठनों ने इसकी आलोचना की है। उनका कहना है कि वेबसाइट पर इस्तेमाल की गई भाषा प्रवासियों को इंसानों की बजाय "एलियन" के रूप में पेश करती है, जिससे समाज में उनके प्रति नकारात्मक धारणा और भेदभाव बढ़ सकता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि इस तरह की प्रस्तुति प्रवासियों को अमानवीय रूप में दिखाती है और सामाजिक तनाव को बढ़ावा दे सकती है। ट्रंप प्रशासन अपने फैसले पर कायम विवादों के बावजूद ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वेबसाइट का उद्देश्य आव्रजन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना और नागरिकों को जानकारी उपलब्ध कराना है। प्रशासन का दावा है कि सीमाओं की सुरक्षा और अवैध प्रवास पर नियंत्रण उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। इस बीच, अमेरिका के कई शहरों में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों और निर्वासन अभियानों को लेकर विरोध प्रदर्शन भी जारी हैं, लेकिन प्रशासन फिलहाल अपने सख्त आव्रजन रुख पर कायम नजर आ रहा है।
Donald Trump प्रशासन एक बार फिर ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य कदम की तैयारी में जुटा दिखाई दे रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाइट हाउस, पेंटागन और खुफिया एजेंसियों में हाई अलर्ट जैसी स्थिति बना दी गई है। इसी बीच ट्रंप ने अपने निजी कार्यक्रम और छुट्टियां भी रद्द कर दी हैं, जिससे अटकलें और तेज हो गई हैं। बेटे की शादी में भी नहीं जाएंगे ट्रंप अमेरिका में 25 मई को मेमोरियल डे के चलते लंबा वीकेंड है। ट्रंप पहले न्यू जर्सी स्थित अपने गोल्फ क्लब में समय बिताने वाले थे, लेकिन उन्होंने अचानक कार्यक्रम बदल दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और बेटिना एंडरसन की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने इसकी वजह “सरकारी परिस्थितियां” बताई। इसके बाद उनका काफिला वॉशिंगटन डीसी में तेजी से व्हाइट हाउस लौटता देखा गया। अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियां अलर्ट पर रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सेना और इंटेलिजेंस एजेंसियों के कई अधिकारियों ने भी अपनी छुट्टियां रद्द कर दी हैं। विदेशों में तैनात अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए “रिकॉल रोस्टर” अपडेट किए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार मध्य पूर्व में मौजूद कुछ अमेरिकी सैनिकों को संवेदनशील इलाकों से हटाया भी जा रहा है। माना जा रहा है कि अमेरिका संभावित जवाबी हमले की आशंका को देखते हुए अपनी तैयारियां मजबूत कर रहा है। ईरान के IRGC की बड़ी चेतावनी Islamic Revolutionary Guard Corps यानी IRGC ने अमेरिका और इजरायल को खुली चेतावनी दी है। IRGC ने कहा कि अगर ईरान पर फिर हमला हुआ तो जवाब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान ने अपने पश्चिमी हवाई क्षेत्र में NOTAM जारी कर सोमवार तक उड़ानों पर रोक लगा दी है। इसे संभावित सैन्य गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिका ने दिया “फाइनल ऑफर” रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने ईरान को एक “अंतिम प्रस्ताव” दिया है। कहा जा रहा है कि अगर तेहरान इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता, तो अगले 24 घंटे में सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू हो सकती है। ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया कि “ईरान समझौता करना चाहता है” और अमेरिका हालात पर नजर बनाए हुए है। असली विवाद क्या है? अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा विवाद परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट पूरी तरह बंद करे ईरान इस मांग को मानने को तैयार नहीं है तेहरान अपने विदेशी फ्रीज एसेट्स जारी करने और युद्ध नुकसान की भरपाई की मांग कर रहा है ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर टोल व्यवस्था की भी बात कर रहा है विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव की जड़ यही मुद्दे हैं। पाकिस्तान और कतर निभा रहे मध्यस्थ की भूमिका रिपोर्ट्स के अनुसार Asim Munir इस समय तेहरान में मौजूद हैं। वहीं कतर का प्रतिनिधिमंडल भी ईरान पहुंचा हुआ है। दोनों देश अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल बातचीत कराने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान सेना प्रमुख की मुलाकात IRGC के वरिष्ठ अधिकारियों से हो सकती है। फरवरी में शुरू हुआ था संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले किए थे। इसके बाद दोनों पक्षों में जवाबी कार्रवाई का दौर शुरू हुआ। 8 अप्रैल को सीजफायर पर सहमति बनी, लेकिन उसके बाद भी धमकियों, प्रतिबंधों और सैन्य तैयारियों का सिलसिला जारी है। अब ट्रंप प्रशासन की गतिविधियों से यह आशंका बढ़ गई है कि हालात फिर से बड़े टकराव की ओर बढ़ सकते हैं।
अमेरिका में राष्ट्रपति Donald Trump की हत्या की कोशिश के आरोप में एक व्यक्ति पर गंभीर संघीय आरोप लगाए गए हैं। यह घटना White House Correspondents' Association Dinner के दौरान हुई, जब भारी सुरक्षा के बीच अफरा-तफरी मच गई। कौन है आरोपी? आरोपी की पहचान 31 वर्षीय Cole Tomas Allen के रूप में हुई है, जो कैलिफोर्निया के टॉरेंस का निवासी है। अदालत ने उसे फिलहाल न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। क्या हुआ था? शनिवार रात वॉशिंगटन के Washington Hilton में आयोजित डिनर के दौरान आरोपी कथित तौर पर सुरक्षा घेरा तोड़कर बॉलरूम की ओर बढ़ा। उसके पास एक शॉटगन, पिस्तौल और कई चाकू थे। इस दौरान United States Secret Service के एजेंटों के साथ गोलीबारी हुई। ट्रंप को तुरंत सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। वह पूरी तरह सुरक्षित हैं। सुरक्षा अधिकारी घायल गोलीबारी में एक सीक्रेट सर्विस अधिकारी घायल हुआ, हालांकि उसने बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट पहन रखी थी, जिससे उसकी जान बच गई। पहले से रची गई थी साजिश एफबीआई के अनुसार, आरोपी ने 6 अप्रैल को ही होटल में कमरा बुक कर लिया था। वह कैलिफोर्निया से ट्रेन द्वारा वॉशिंगटन पहुंचा था। जांच एजेंसियों का मानना है कि हमले की योजना कई सप्ताह पहले बनाई गई थी। ईमेल से मिला सुराग गिरफ्तारी से ठीक पहले आरोपी ने अपने परिवार और पूर्व नियोक्ता को एक ईमेल भेजा था, जिसमें उसने खुद को "Friendly Federal Assassin" बताया। ईमेल में ट्रंप प्रशासन की नीतियों को लेकर नाराजगी झलक रही थी। क्या-क्या आरोप लगे? राष्ट्रपति की हत्या के प्रयास का आरोप हिंसक अपराध के दौरान हथियार चलाने का आरोप अवैध हथियार रखने और इस्तेमाल करने के आरोप दोष सिद्ध होने पर आरोपी को उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। जांच जारी Federal Bureau of Investigation और न्याय विभाग मामले की गहन जांच कर रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थानों पर हिंसा किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं की जाएगी।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान के साथ शांति समझौता (पीस डील) पाकिस्तान में होता है, तो वह खुद Islamabad जाने पर विचार कर सकते हैं। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, “पाकिस्तान बहुत अच्छा काम कर रहा है। अगर डील साइन होती है, तो मैं इस्लामाबाद जा सकता हूं।” उन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा नेतृत्व व्यवस्था की भी तारीफ की। पाकिस्तान की भूमिका पर ट्रंप की टिप्पणी ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व शांति प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से Asim Munir और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की सराहना करते हुए कहा कि दोनों “बेहतरीन काम कर रहे हैं।” ईरान में चल रही कूटनीतिक हलचल इस बीच, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर इन दिनों Tehran में मौजूद हैं, जहां उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian से मुलाकात की। यह मुलाकात अमेरिका-ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता के प्रयासों के तहत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। PM मोदी को बताया ‘अच्छा दोस्त’ ट्रंप ने बातचीत के दौरान भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi की भी तारीफ की और उन्हें अपना “अच्छा दोस्त” बताया। इस बयान को भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में भी अहम माना जा रहा है। पहले भी दे चुके हैं संकेत हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू हो सकती है। अब उनका इस्लामाबाद जाने का संकेत देना इस पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया को और अहम बना देता है। अमेरिका, पाकिस्तान और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक गतिविधियों के बीच ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि आने वाले समय में शांति वार्ता तेज हो सकती है। अगर ऐसा होता है, तो इस्लामाबाद एक अहम कूटनीतिक केंद्र बन सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।