रांची। झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा छात्रों का आंदोलन शुक्रवार को 14वें दिन भी जारी रहा। इसी दौरान भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता राहुल क्रांति की तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें रांची के सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। छह दिन से भूख हड़ताल पर थे छात्र रिपोर्ट के अनुसार राहुल क्रांति उन छह प्रदर्शनकारियों में शामिल हैं, जो भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के विरोध में भूख हड़ताल कर रहे हैं। लगातार कई दिनों तक भोजन नहीं लेने के कारण उनकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने लगी। तबीयत खराब होने के बाद उन्हें जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम स्थित आंदोलन स्थल से सदर अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उनका उपचार शुरू किया। JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी का विरोध छात्र और नौकरी के अभ्यर्थी JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया से जुड़े सवालों का सरकार और संबंधित आयोग को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। आंदोलन के 14वें दिन छात्रों का विरोध और तेज हो गया है। प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। विधानसभा मार्च की भी तैयारी भूख हड़ताल के बीच आंदोलनकारी छात्रों ने शुक्रवार को झारखंड विधानसभा की ओर मार्च करने की तैयारी की। छात्रों का कहना है कि वे अपनी मांगों को सरकार और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाना चाहते हैं। आंदोलन को लेकर राजनीतिक समर्थन भी सामने आया है। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच बयानबाजी तेज होने के साथ ही छात्रों की मांगों को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। छात्रों की मांगों पर टिकी नजर JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर जारी आंदोलन अब स्वास्थ्य संकट तक पहुंच गया है। भूख हड़ताल पर बैठे छात्र की तबीयत बिगड़ने के बाद आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच बातचीत की मांग भी तेज हो रही है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार आंदोलनकारी छात्रों की मांगों पर क्या कदम उठाती है और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए क्या ठोस निर्णय लिया जाता है।
रांची। राजधानी रांची के सदर अस्पताल स्थित सुपर स्पेशियलिटी बिल्डिंग में मंगलवार तड़के एक बड़ा हादसा टल गया। नामकुम निवासी 28 वर्षीय छोटू महतो अस्पताल की लिफ्ट में करीब दो घंटे तक फंसा रहा। काफी देर तक मदद नहीं मिलने और इमरजेंसी व्यवस्था के समय पर सक्रिय नहीं होने से अस्पताल की सुरक्षा और रखरखाव व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार जानकारी के अनुसार, छोटू महतो अपनी परिजन रीता कुमारी से मिलने अस्पताल आए थे, जो लेबर वार्ड में भर्ती हैं। मंगलवार सुबह करीब चार बजे वह नई बिल्डिंग से नीचे आ रहे थे, तभी बीच रास्ते में लिफ्ट अचानक बंद हो गई। कुछ देर के लिए लिफ्ट के भीतर अंधेरा छा गया, जिससे युवक घबरा गया और लगातार मदद के लिए आवाज लगाने लगा। उसने फोन से संपर्क करने की कोशिश भी की, लेकिन किसी से बात नहीं हो सकी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार करीब एक घंटे बाद वहां से गुजर रही एक नर्स ने युवक की आवाज सुनी और अस्पताल प्रबंधन को सूचना दी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कई बार लिफ्ट ऑपरेटर, टेक्नीशियन और इमरजेंसी नंबरों पर संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन तत्काल कोई सहायता नहीं मिली। आखिरकार सुबह लगभग छह बजे टेक्नीशियन और अन्य कर्मचारियों की मदद से युवक को सुरक्षित बाहर निकाला गया। घटना के बाद युवक ने अस्पताल प्रबंधन को लिखित शिकायत भी दी। बताया जा रहा है कि अस्पताल की कई लिफ्टें रात के समय बिजली या तकनीकी खराबी के कारण अक्सर बंद हो जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लिफ्ट का सेंसर और ऑटोमेटेड रेस्क्यू सिस्टम सही तरीके से काम करता तो ऐसी स्थिति नहीं बनती। सदर अस्पताल में 500 बेड की सुपर स्पेशियलिटी सुविधा होने के बावजूद केवल तीन लिफ्ट ऑपरेटर तैनात हैं, जबकि कई लिफ्टमैन को अन्य कार्यों में लगा दिया गया है। वहीं, लिफ्ट मेंटेनेंस का जिम्मा भी ऐसी एजेंसी को सौंपे जाने पर सवाल उठ रहे हैं, जिसे इस क्षेत्र का पर्याप्त अनुभव नहीं है। घटना के बाद अस्पताल की लिफ्ट सुरक्षा, आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली और रखरखाव व्यवस्था की समीक्षा की मांग तेज हो गई है।
आषाढ़ अमावस्या को सनातन धर्म में पितरों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से किए गए कर्म पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति में सहायक होते हैं। वहीं, स्वप्न शास्त्र में भी अमावस्या के दिन सपने में पितरों के दर्शन को विशेष संकेत माना गया है। यदि इस दिन आपको सपने में अपने पूर्वज दिखाई दें, तो कुछ धार्मिक उपाय करने की परंपरा बताई गई है। आइए जानते हैं इन मान्यताओं के बारे में। आषाढ़ अमावस्या पर सपने में पितर दिखने का क्या माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या के दिन सपने में पूर्वजों का दिखाई देना उनके आशीर्वाद, स्मरण या किसी संदेश का संकेत माना जाता है। स्वप्न शास्त्र में कहा गया है कि ऐसे सपनों के बाद श्रद्धापूर्वक पितरों का तर्पण और दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है। सपने में पितरों के दर्शन हों तो करें ये उपाय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि अमावस्या के दिन सपने में पूर्वज दिखाई दें तो ये कार्य किए जा सकते हैं- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काले तिल और कुश मिलाकर पितरों का तर्पण करें। जरूरतमंदों या ब्राह्मण को भोजन कराएं। अपनी श्रद्धा अनुसार अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करें। शाम के समय दक्षिण दिशा में या पीपल के वृक्ष के समीप सरसों के तेल का दीपक जलाएं और श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें। सपने में मुस्कुराते हुए पितर दिखें तो क्या संकेत मिलता है? स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि यदि सपने में पूर्वज प्रसन्न या मुस्कुराते हुए दिखाई दें, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह उनके संतोष और आशीर्वाद का प्रतीक हो सकता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि का संकेत देता है। अगर सपने में पितर भोजन मांगें तो क्या करें? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि सपने में पूर्वज भोजन मांगते हुए दिखाई दें, तो तर्पण, पिंडदान या ब्राह्मण भोजन कराने जैसी धार्मिक परंपराओं का पालन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। आषाढ़ अमावस्या का धार्मिक महत्व आषाढ़ अमावस्या को पितरों के निमित्त किए जाने वाले तर्पण, दान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए धार्मिक कार्यों को पुण्यदायी माना जाता है। साथ ही, जरूरतमंदों की सहायता और दान-पुण्य को भी इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है। अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, स्वप्न शास्त्र और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित है। IDTV Indradhanush इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं करता। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या उपाय को अपनाने से पहले अपने विवेक का उपयोग करें।
रांची। रांची के सदर अस्पताल में बनने वाली झारखंड की पहली सरकारी बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट का निर्माण फिलहाल अंतिम प्रशासनिक मंजूरी का इंतजार कर रहा है। परियोजना की लागत 6.45 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 10 करोड़ रुपये हो गई है। एल-1 कंपनी ने संशोधित डिजाइन और नई लागत के आधार पर सबसे कम बोली लगाई है। लागत बढ़ने के साथ यूनिट के प्लान और डिजाइन में भी कई तकनीकी बदलाव किए गए हैं, जिसके कारण निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो सका है। स्वास्थ्य विभाग की मंजूरी के बाद तीन माह में होगा निर्माण सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि यूनिट का संशोधित डिजाइन पूरी तरह तैयार कर लिया गया है और इसे स्वास्थ्य विभाग को भेजा जा रहा है। विभाग से संशोधित डीपीआर और बढ़ी हुई लागत को मंजूरी मिलते ही चयनित एजेंसी को कार्यादेश जारी कर दिया जाएगा। निर्माण शुरू होने के बाद एजेंसी को तीन महीने के भीतर यूनिट तैयार कर पूरी तरह संचालन योग्य बनाना होगा। सातवीं मंजिल पर बनेगी अत्याधुनिक यूनिट संक्रमण के खतरे को देखते हुए बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट सदर अस्पताल की सातवीं मंजिल पर विकसित की जाएगी। यहां नियंत्रित वातावरण, क्लीन रूम, आइसोलेशन जोन, सीमित प्रवेश व्यवस्था, आईसीयू स्तर की सुविधाएं और हाई-एफिशिएंसी एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम स्थापित किए जाएंगे। साथ ही सेंसर आधारित हैंड-फ्री स्टेशन जैसी आधुनिक संक्रमण नियंत्रण व्यवस्थाएं भी उपलब्ध होंगी। झारखंड के मरीजों को मिलेगा बड़ा लाभ यूनिट शुरू होने के बाद राज्य के हजारों मरीजों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। सदर अस्पताल के हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक रंजन और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम रांची में ही यह जटिल उपचार उपलब्ध कराएगी। वर्तमान में निजी अस्पतालों में इस उपचार पर 15 से 30 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च आता है। सरकारी अस्पताल में यह सुविधा शुरू होने से मरीजों को कम लागत में इलाज मिलेगा और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी।
रांची। राजधानी रांची में लगातार हुई भारी बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। सोमवार रात से मंगलवार सुबह तक हुई मूसलाधार बारिश के कारण शहर के कई प्रमुख मार्गों और निचले इलाकों में जलजमाव हो गया। कई घरों में बारिश का पानी घुस गया, जबकि पंडरा स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग पर जलभराव के कारण करीब तीन घंटे तक यातायात बाधित रहा। लोगों को पानी से भरी सड़कों के बीच आवागमन करना पड़ा और कई दोपहिया वाहन भी बंद हो गए। रिम्स और सदर अस्पताल भी प्रभावित बारिश ने राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स की जल निकासी व्यवस्था की भी पोल खोल दी। नालियां जाम होने से अस्पताल के बेसमेंट में गंदा पानी भर गया, जिससे फिजियोथेरेपी विभाग और आसपास के हिस्सों में जलभराव की स्थिति बन गई। मरीजों और उनके परिजनों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। अस्पताल कर्मियों के अनुसार जलभराव और सीलन से बदबू फैलने के साथ संक्रमण का खतरा भी बढ़ गया। वहीं सदर अस्पताल में भी कई जगह पानी रिसने से इमरजेंसी के पास फर्श पर पानी जमा हो गया और ओपीडी में मरीजों की संख्या कम रही। कई कॉलोनियों में घरों में घुसा पानी अरगोड़ा कटहल मोड़ के पास स्थानीय लोगों ने एक बिल्डर पर नाली भरकर जल निकासी बाधित करने का आरोप लगाया, जिसके कारण कई घरों में पानी घुस गया। वहीं सेल सिटी रोड स्थित बालाजी कॉलोनी में नाली नहीं होने से पूरी कॉलोनी जलमग्न हो गई और लोग घंटों घरों में फंसे रहे। स्थानीय निवासियों ने स्थायी जल निकासी व्यवस्था की मांग दोहराई। नगर निगम की टीमें राहत कार्य में जुटीं जलजमाव की सूचना मिलते ही रांची नगर निगम की क्विक रिस्पांस टीम (QRT) जेसीबी, मोटर पंप और अन्य उपकरणों के साथ विभिन्न प्रभावित इलाकों में पहुंची। टीमों ने जाम नालियों की सफाई कर पानी निकाला। नगर निगम ने नागरिकों से अपील की है कि जलजमाव की स्थिति में हेल्पलाइन 18005701235 पर सूचना दें, ताकि राहत दल तुरंत मौके पर पहुंचकर आवश्यक कार्रवाई कर सके।
रांची। झारखंड सरकार ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी और संसाधन संपन्न बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), सदर अस्पताल, अनुमंडल अस्पताल और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों को वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार दिए गए हैं। इस फैसले के बाद उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों और विकास कार्यों के लिए सिविल सर्जन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। प्रभारियों को बनाया गया डीडीओ स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने बताया कि अधिकारों के विकेंद्रीकरण के तहत सभी स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभारियों को ड्राइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) बनाया गया है। इससे वे अपने संस्थान की जरूरतों के अनुसार स्वयं निर्णय लेकर राशि खर्च कर सकेंगे। दवाओं की खरीद, आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता, आउटसोर्स कर्मियों की नियुक्ति और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं अब स्थानीय स्तर पर ही की जा सकेंगी। रखरखाव और विकास कार्यों में मिलेगी तेजी इस निर्णय के बाद स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभारियों को अस्पताल संचालन एवं रखरखाव के लिए मिलने वाली राशि के उपयोग में भी स्वतंत्रता मिलेगी। अब उन्हें हर छोटे खर्च के लिए सिविल सर्जन की अनुमति का इंतजार नहीं करना होगा। इससे अस्पतालों में आवश्यक मरम्मत, सुविधाओं के विस्तार और मरीजों के लिए जरूरी संसाधन समय पर उपलब्ध कराए जा सकेंगे। हर स्तर के अस्पतालों को मिलती है वार्षिक राशि राज्य सरकार मुख्यमंत्री अस्पताल संचालन एवं रखरखाव योजना के तहत सदर अस्पतालों को 75 लाख रुपये, अनुमंडल अस्पतालों को 50 लाख रुपये, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र एवं रेफरल अस्पतालों को 10 लाख रुपये, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 5 लाख रुपये तथा स्वास्थ्य उपकेंद्र और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को प्रतिवर्ष 2 लाख रुपये उपलब्ध कराती है। अब इन निधियों का उपयोग संबंधित केंद्रों के प्रभारी स्थानीय जरूरतों के अनुसार कर सकेंगे। मरीजों को मिलेगा सीधा लाभ स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इस व्यवस्था से एक ओर सिविल सर्जनों पर प्रशासनिक बोझ कम होगा, वहीं दूसरी ओर अस्पतालों में निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी। स्थानीय स्तर पर त्वरित फैसले होने से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार आएगा और मरीजों को बेहतर एवं समय पर उपचार की सुविधा मिल सकेगी।
देवघर। आगामी श्रावणी मेले को देखते हुए देवघर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने तैयारियां तेज कर दी हैं। सदर अस्पताल स्थित जिला पब्लिक हेल्थ लैबोरेट्री (DPHL) की कार्य अवधि बढ़ाकर अब तीन पालियों यानी 24 घंटे संचालित करने की योजना बनाई गई है। अब तक यह केंद्र केवल एक पाली में चलता था। पहले एक पाली में चलती थी लैब, मरीज होते थे परेशान सदर अस्पताल की अधीक्षक डॉ. सुषमा वर्मा ने बताया कि कर्मचारियों की कमी के कारण अब तक जांच केंद्र एक ही पाली में संचालित होता था। इससे दूर-दराज से आने वाले मरीजों, विशेषकर गर्भवती महिलाओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। मरीजों की समस्याओं को देखते हुए अतिरिक्त कर्मियों की व्यवस्था की गई और अब जांच केंद्र दो पालियों में कार्य कर रहा है। मेले के दौरान हजारों मरीज रोज पहुंचते हैं अस्पताल डॉ. सुषमा वर्मा ने बताया कि श्रावणी मेले के दौरान सदर अस्पताल पर मरीजों का दबाव कई गुना बढ़ जाता है। देवघर का सदर अस्पताल न केवल स्थानीय लोगों बल्कि देशभर से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए भी प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र की भूमिका निभाता है। मेले के दौरान प्रतिदिन हजारों मरीज अस्पताल पहुंचते हैं। 24 घंटे लैब चलाने के लिए वरीय अधिकारियों से हो रही चर्चा श्रावणी मेले के समय जांच केंद्र को 24 घंटे संचालित करने के लिए सिविल सर्जन और स्वास्थ्य विभाग के वरीय अधिकारियों से चर्चा की जा रही है। हालांकि देवघर के कई स्वास्थ्य केंद्रों में कर्मचारियों की कमी अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग की यह पहल श्रावणी मेले के दौरान लाखों श्रद्धालुओं के लिए बड़ी राहत साबित होगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।