हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। ऐसे में 5 अप्रैल 2026 को पड़ने वाली विकट संकष्टी चतुर्थी विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत व पूजा करने से जीवन की कठिन बाधाएं दूर होती हैं और करियर व व्यापार में सफलता के नए रास्ते खुलते हैं। क्या है इस दिन का विशेष महत्व? वैशाख मास में आने वाली यह चतुर्थी भगवान गणेश के “विकट” स्वरूप को समर्पित होती है, जो हर प्रकार के संकट को हरने वाले माने जाते हैं। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, इस दिन पूजा करने से बुध और केतु ग्रह के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं, जिससे मानसिक स्पष्टता, निर्णय क्षमता और सफलता में वृद्धि होती है। शुभ मुहूर्त (5 अप्रैल 2026) चतुर्थी प्रारंभ: सुबह 11:59 बजे चतुर्थी समाप्त: 6 अप्रैल, दोपहर 02:10 बजे अमृत काल: शाम 06:20 से रात 08:06 बजे अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:59 से 12:49 बजे तक पूजा विधि इस दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें और घर के पूजा स्थान पर स्वच्छ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। पंचामृत से अभिषेक करें सिंदूर, अक्षत, फूल, फल और दूर्वा अर्पित करें मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं आरती करें और रात में चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें व्रत कथा का महत्व धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत कथा का पाठ करने से पूजा का फल दोगुना हो जाता है। कथा के अनुसार, सच्ची श्रद्धा और भक्ति से भगवान गणेश अपने भक्तों के सबसे बड़े संकट भी दूर कर देते हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। क्या मिलता है इस व्रत से? करियर और व्यापार में आ रही रुकावटें दूर होती हैं जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ता है परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है
भारतीय सनातन परंपरा में शनि देव को न्याय, कर्म और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। आम धारणा के विपरीत, शनि देव भय के नहीं बल्कि न्याय के देवता हैं, जो मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। जीवन में आने वाले कठिन समय जैसे साढ़ेसाती या ढैय्या दरअसल व्यक्ति को आत्ममंथन, धैर्य और सही मार्ग पर चलने की सीख देते हैं। शनिवार का महत्व शनिवार का दिन विशेष रूप से शनि देव की आराधना के लिए समर्पित माना गया है। यह दिन हमें अपने कर्मों का मूल्यांकन करने और जीवन में अनुशासन व विनम्रता अपनाने का अवसर देता है। इस दिन व्रत, पूजा और दान करने से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। शनि देव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है? धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, तिल का तेल नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने की क्षमता रखता है। जब भक्त शनि देव को तेल अर्पित करते हैं, तो यह प्रतीक होता है कि उनके जीवन की बाधाएं, कष्ट और नकारात्मक कर्म धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। तेल की चिकनाहट और शीतलता शनि की कठोर ऊर्जा को शांत करती है, जिससे जीवन में स्थिरता और राहत मिलती है। पूजा विधि शनिवार के दिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें और शनि मंदिर जाएं। पीपल के पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें सरसों के तेल का दीपक जलाएं शनि देव की मूर्ति पर तिल का तेल चढ़ाएं काले तिल, उड़द या लोहे की वस्तुएं दान करें शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय जरूरतमंदों को दान करना विशेष फलदायी माना गया है काले वस्त्र, जूते-चप्पल, काली उड़द आदि का दान करें नियमित रूप से शनि मंत्रों का जाप करें शनि मंत्र “ॐ शं शनेश्वराय नमः” या “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः” इन मंत्रों का श्रद्धा से जाप करने से शनि दोषों में कमी आती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।
ईसाई धर्म में ‘गुड फ्राइडे’ एक बेहद महत्वपूर्ण और भावनात्मक दिन माना जाता है। यह दिन मानवता के लिए प्रेम, त्याग और बलिदान का प्रतीक है। 2026 में यह पर्व 3 अप्रैल को मनाया जा रहा है। हालांकि यह दिन दुखद घटना से जुड़ा है, फिर भी इसे “Good” यानी ‘अच्छा’ कहा जाता है-और इसके पीछे की वजह गहरी आध्यात्मिक भावना से जुड़ी है। क्या हुआ था इस दिन? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। उन्हें अनेक यातनाएं दी गईं और अंततः क्रूस (Cross) पर उनकी मृत्यु हुई। ईसाई धर्म में इसे मानवता के इतिहास का सबसे बड़ा बलिदान माना जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने प्राण दूसरों के पापों के प्रायश्चित के लिए दिए। ‘Good Friday’ नाम क्यों पड़ा? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि जब यह दिन दुख और पीड़ा से जुड़ा है, तो इसे ‘Good’ क्यों कहा जाता है? दरअसल, यहां ‘Good’ का अर्थ खुशी नहीं, बल्कि ‘पवित्र’, ‘महान’ और ‘कल्याणकारी’ होता है। ईसाई मान्यता के अनुसार, ईसा मसीह के बलिदान के कारण मानवता को मुक्ति और उद्धार का मार्ग मिला। इसलिए यह दिन भले ही दुखद हो, लेकिन इसका संदेश अत्यंत सकारात्मक और पवित्र है। क्या यह शोक का दिन है? जी हां, गुड फ्राइडे को शोक और आत्मचिंतन का दिन माना जाता है। इस दिन लोग चर्च जाकर शांतिपूर्वक प्रार्थना करते हैं, उपवास रखते हैं और ईसा मसीह के बलिदान को याद करते हैं। इस दिन किसी प्रकार का उत्सव नहीं मनाया जाता, बल्कि सादगी, श्रद्धा और मौन का वातावरण रहता है। इस दिन लोग क्या करते हैं? चर्च में विशेष प्रार्थना और सभाएं आयोजित होती हैं उपवास और संयम का पालन किया जाता है आत्मचिंतन और प्रायश्चित किया जाता है मानवता, प्रेम और क्षमा के संदेश को अपनाने का संकल्प लिया जाता है क्या संदेश देता है गुड फ्राइडे? गुड फ्राइडे हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम और बलिदान क्या होता है। यह दिन यह याद दिलाता है कि त्याग और करुणा के माध्यम से ही मानवता को सही दिशा मिलती है। यही कारण है कि इस दिन को “Good Friday” कहा जाता है-क्योंकि इसका संदेश पूरी मानवता के लिए कल्याणकारी है।
हिंदू धर्म में आस्था और आध्यात्म का विशेष महत्व है, और इसी क्रम में आज 3 अप्रैल 2026 से हिंदू नववर्ष का दूसरा महीना वैशाख शुरू हो गया है। इस महीने को “माधव मास” के नाम से भी जाना जाता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे माह में प्रतिदिन स्नान, पूजा और दान का विशेष महत्व होता है। पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण प्रतिपदा तिथि 2 अप्रैल सुबह 7:41 बजे से शुरू होकर 3 अप्रैल सुबह 8:42 बजे तक रही, लेकिन उदया तिथि के आधार पर आज 3 अप्रैल से वैशाख माह का आरंभ माना गया है। क्यों जरूरी है वैशाख में रोज स्नान? धार्मिक ग्रंथों और व्रत-परंपराओं के अनुसार, चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से लेकर वैशाख शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। मान्यता है कि इस दौरान सूर्योदय से पहले स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप, रोग और दोष समाप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि तीर्थ स्थल जैसे नदी, कुआं या सरोवर में स्नान संभव न हो, तो घर पर शुद्ध जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी समान फलदायी माना गया है। इस माह में नियमित स्नान करने से पुण्य में वृद्धि होती है और व्यक्ति का प्रभाव व तेज बढ़ता है। वैशाख में स्नान और पूजा के प्रमुख नियम प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना श्रेष्ठ माना गया है। स्नान के जल में गंगाजल मिलाना शुभ होता है। स्नान के दौरान अपने इष्ट देव का स्मरण करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की पूजा करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “हरे राम हरे राम” मंत्र का जाप करें। मंत्र जाप 108 या 1008 बार किया जा सकता है। इस माह में एक समय भोजन करने का भी विधान बताया गया है। पूरे 31 दिनों तक इन नियमों का पालन करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। मेष संक्रांति का विशेष महत्व वैशाख माह में मेष संक्रांति का पर्व भी आता है। इस दिन सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश करते हैं, जो अत्यंत शुभ माना जाता है। साल 2026 में मेष संक्रांति 14 अप्रैल को मनाई जाएगी। इस दिन सुबह 9:39 बजे सूर्य देव के मेष राशि में प्रवेश के समय स्नान और दान करने से विशेष पुण्य और सूर्य कृपा प्राप्त होती है। वैशाख माह का धार्मिक महत्व वैशाख को “माधव मास” कहा जाता है, इसलिए इस पूरे महीने भगवान विष्णु और जल देवता की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस माह में किए गए स्नान, दान और पूजा से “अक्षय पुण्य” प्राप्त होता है, जो कभी समाप्त नहीं होता।
देशभर में आज चैत्र पूर्णिमा के पावन अवसर पर हनुमान जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन हनुमान जी का जन्म हुआ था। पवनपुत्र, रामभक्त और चिरंजीवी हनुमान जी को ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता’ कहा जाता है, जिसका उल्लेख हनुमान चालीसा में भी मिलता है। भक्ति साहित्य के महान कवि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा- “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस वर दीन जानकी माता” मान्यता है कि माता सीता ने हनुमान जी को इन दिव्य शक्तियों और संपत्तियों का वरदान दिया था। क्या हैं हनुमान जी की 8 सिद्धियां? हनुमान जी के पास आठ अद्भुत दिव्य शक्तियां मानी जाती हैं, जिन्हें अष्ट सिद्धि कहा जाता है- अणिमा – स्वयं को अत्यंत सूक्ष्म बनाने की शक्ति महिमा – इच्छानुसार विशाल रूप धारण करने की शक्ति गरिमा – शरीर को अत्यधिक भारी बनाने की क्षमता लघिमा – शरीर को अत्यंत हल्का कर लेने की शक्ति प्राप्ति – किसी भी वस्तु को तुरंत प्राप्त कर लेने की शक्ति प्राकाम्य – कहीं भी जाने, आकाश में उड़ने या जल में रहने की क्षमता ईशित्व – दैवीय शक्तियों पर नियंत्रण रखने की क्षमता वशित्व – इंद्रियों और मन को वश में करने की शक्ति इन सिद्धियों के कारण हनुमान जी किसी भी रूप में प्रकट होकर असंभव कार्यों को संभव बना सकते हैं। क्या हैं 9 निधियां? नव निधियां दिव्य संपत्तियों का प्रतीक मानी जाती हैं, जो जीवन में समृद्धि और संतुलन का संकेत देती हैं- पद्म निधि – स्वर्ण-चांदी संग्रह और दान की प्रवृत्ति महापद्म निधि – धर्म कार्यों में धन का उपयोग नील निधि – कई पीढ़ियों तक चलने वाली संपत्ति मुकुंद निधि – राज्य और सत्ता से जुड़ी संपत्ति नंद निधि – परिवार और वंश को संभालने वाली संपत्ति मकर निधि – अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह कच्छप निधि – स्वयं के उपयोग की संपत्ति शंख निधि – सीमित अवधि तक रहने वाली संपत्ति खर्व निधि – मिश्रित और विविध फल देने वाली संपत्ति भक्तों को क्या मिलता है हनुमान जी की कृपा से? धार्मिक मान्यता के अनुसार हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों को साहस, शक्ति और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, क्योंकि उनकी कृपा से जीवन के कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं।
हिंदू धर्म में हर महीने का अपना विशेष महत्व होता है, लेकिन वैशाख मास को अत्यंत पुण्यदायक और श्रेष्ठ माना गया है। 3 अप्रैल 2026 से वैशाख मास की शुरुआत हो रही है, जिसे धार्मिक ग्रंथों में मोक्ष प्रदान करने वाला और पापों का नाश करने वाला महीना बताया गया है। शास्त्रों, विशेषकर नारद पुराण और स्कंद पुराण में वैशाख मास की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, जिस प्रकार वेदों का स्थान सर्वोच्च है, उसी तरह सभी महीनों में वैशाख का स्थान श्रेष्ठ माना गया है। माधव मास: नाम में ही छिपी है महिमा वैशाख मास को ‘माधव मास’ भी कहा जाता है। ‘माधव’ भगवान विष्णु का एक प्रमुख नाम है। धार्मिक मान्यता है कि इस पूरे महीने में भगवान विष्णु जल में निवास करते हैं। यही कारण है कि इस दौरान सूर्योदय से पहले पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता यह भी है कि जो व्यक्ति इस महीने में नियमपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। वैशाख में हुए भगवान विष्णु के प्रमुख अवतार इस पावन महीने में भगवान विष्णु के कई महत्वपूर्ण अवतार प्रकट हुए, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है- परशुराम अवतार: वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को भगवान परशुराम का जन्म हुआ। नृसिंह अवतार: वैशाख चतुर्दशी को भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान ने नृसिंह रूप धारण किया। कूर्म अवतार: समुद्र मंथन के दौरान भगवान ने कछुए का रूप लेकर मंदराचल पर्वत को सहारा दिया। इन दिव्य घटनाओं के कारण वैशाख मास को विष्णु भक्तों के लिए अत्यंत पावन और उत्सवमय माना जाता है। दान-पुण्य और सेवा का विशेष महत्व वैशाख मास केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक कल्याण और सेवा का भी महीना है। गर्मी के इस समय में प्यासे लोगों को पानी पिलाना, प्याऊ लगवाना, पेड़ लगाना, सत्तू और पंखे का दान करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस महीने में किया गया दान सीधे भगवान विष्णु की सेवा के समान फल देता है। शास्त्रों का संदेश नारद पुराण में कहा गया है- “न वैशाख समो मासो, न सत्येन समं तपः” अर्थात् वैशाख के समान कोई महीना नहीं है और सत्य के समान कोई तप नहीं है।
हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह हिंदू नववर्ष की पहली पूर्णिमा मानी जाती है, जिसमें पूजा, व्रत, दान और स्नान का अत्यंत पुण्य फल बताया गया है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, चंद्रदेव और हनुमान जी की उपासना की जाती है। इस वर्ष 1 अप्रैल 2026 को व्रत और चंद्र पूजन किया जाएगा, जबकि 2 अप्रैल को स्नान-दान और हनुमान जयंती मनाई जाएगी। तिथि और शुभ मुहूर्त पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 1 अप्रैल 2026, सुबह 07:06 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त: 2 अप्रैल 2026, सुबह 07:41 बजे व्रत और चंद्र अर्घ्य: 1 अप्रैल (संध्या समय) स्नान-दान और हनुमान जयंती: 2 अप्रैल (उदयातिथि के अनुसार) शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन पूर्णिमा की तिथि शाम और रात में रहती है, उसी दिन व्रत और चंद्रमा की पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि चैत्र पूर्णिमा की शाम चंद्रोदय के समय अर्घ्य देना विशेष फलदायी माना जाता है। चांदी या तांबे के पात्र में जल लें उसमें कच्चा दूध, अक्षत (चावल), सफेद फूल और थोड़ी चीनी मिलाएं चंद्रमा को देखते हुए धीरे-धीरे जल अर्पित करें “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का जाप करें अंत में हाथ जोड़कर सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की कामना करें प्रमुख मंत्र ॐ सोमाय नमः ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः ॐ क्लीं सोम मंत्राय नमः ॐ नमः शशांकशेखराय नियम और सावधानियां तामसिक भोजन से बचें (लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा) क्रोध और विवाद से दूर रहें अर्घ्य के बाद सफेद वस्तुओं (चावल, चीनी, दूध, वस्त्र) का दान करें सत्यनारायण कथा का पाठ या श्रवण करें धार्मिक महत्व मान्यता है कि पूर्णिमा की रात चंद्रदेव अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होते हैं। इस दिन अर्घ्य देने से मानसिक शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है। साथ ही, यह दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता को बढ़ाने वाला माना जाता है।
सनातन परंपरा में हनुमान जी को शक्ति, भक्ति और सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि वे अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता हैं। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में उनके पराक्रम और चमत्कारिक शक्तियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यदि इन आठ सिद्धियों में से एक भी किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाए, तो उसका जीवन सफल और धन्य हो जाता है। यही सिद्धियां बजरंगी को ‘महाबली’ बनाती हैं। 1. अणिमा सिद्धि इस सिद्धि के माध्यम से कोई भी व्यक्ति स्वयं को अत्यंत सूक्ष्म, यानी अणु के समान छोटा कर सकता है। हनुमान जी ने इसी शक्ति से लंका में प्रवेश किया और सुरसा के मुख से सुरक्षित बाहर निकले। 2. महिमा सिद्धि महिमा सिद्धि से शरीर का आकार विशाल किया जा सकता है। हनुमान जी ने समुद्र पार करते समय और माता सीता को आश्वस्त करने के लिए इस शक्ति का उपयोग किया। 3. गरिमा सिद्धि इस शक्ति से शरीर को इतना भारी बनाया जा सकता है कि कोई उसे हिला भी न सके। भीम के साथ प्रसंग में हनुमान जी ने इसी सिद्धि से उनके अभिमान को तोड़ा। 4. लघिमा सिद्धि लघिमा सिद्धि से शरीर अत्यंत हल्का हो जाता है, जिससे व्यक्ति हवा से भी तेज गति से चल सकता है। हनुमान जी ने अशोक वाटिका में स्वयं को छिपाने के लिए इसका उपयोग किया। 5. प्राप्ति सिद्धि इस सिद्धि के माध्यम से किसी भी वस्तु या ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। माना जाता है कि हनुमान जी ने सीता माता का पता लगाने के लिए जीव-जंतुओं से संवाद करने में इसका उपयोग किया। 6. प्राकाम्य सिद्धि यह सिद्धि इच्छाओं को पूर्ण करने और लोक-परलोक के ज्ञान की प्राप्ति कराती है। इसके प्रभाव से व्यक्ति कहीं भी, किसी भी रूप में जा सकता है। 7. ईशित्व सिद्धि इस शक्ति से व्यक्ति देवतुल्य बन जाता है और नेतृत्व करने की क्षमता प्राप्त करता है। हनुमान जी ने लंका युद्ध में वानर सेना का नेतृत्व इसी सिद्धि के बल पर किया। 8. वशित्व सिद्धि वशित्व सिद्धि से व्यक्ति अपनी इंद्रियों और मन को नियंत्रित कर सकता है। यह आत्मसंयम और वैराग्य का सर्वोच्च रूप है, जो हनुमान जी के चरित्र में स्पष्ट दिखाई देता है। धार्मिक महत्व इन अष्ट सिद्धियों के कारण हनुमान जी को ‘अतुलित बल का धाम’ कहा जाता है। उनकी भक्ति न केवल शक्ति प्रदान करती है, बल्कि व्यक्ति को संयम, समर्पण और आत्मविश्वास भी सिखाती है।
हिंदू धर्म में Hanuman Jayanti का विशेष महत्व है। इस वर्ष यह पावन पर्व 2 अप्रैल को मनाया जाएगा। मान्यता है कि इस दिन Hanuman का जन्म हुआ था, इसलिए इसे चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और कुंडली का मंगल दोष भी शांत होता है। हनुमान जयंती पर करें ये 5 प्रभावी उपाय 1. व्रत और राम नाम का जप इस दिन व्रत रखकर हनुमान जी की पूजा करें और Ram का नाम जपें। रामचरितमानस, राम स्तुति या राम चालीसा का पाठ करने से बजरंगबली की विशेष कृपा प्राप्त होती है। 2. सिंदूर अर्पित करें हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे मनोकामनाएं पूरी होती हैं, भय दूर होता है और शत्रुओं पर विजय मिलती है। 3. हनुमान बाहुक और अष्टक का पाठ रोग, भय या संकट से मुक्ति के लिए हनुमान बाहुक और संकटमोचन हनुमान अष्टक का पाठ करें। यह उपाय मानसिक और शारीरिक कष्टों को दूर करने में सहायक माना जाता है। 4. बजरंग बाण का पाठ (विशेष परिस्थिति में) यदि जीवन में गंभीर संकट हो, तो बजरंग बाण का पाठ किया जा सकता है। हालांकि इसे सामान्य परिस्थितियों में पढ़ने की सलाह नहीं दी जाती, लेकिन कठिन समय में यह अत्यंत प्रभावी माना गया है। 5. दान और भोग का महत्व हनुमान जयंती पर मसूर की दाल, गुड़, चना दाल और लाल वस्त्र का दान करें। साथ ही हनुमान जी को लड्डू और बूंदी का भोग लगाएं। इससे मंगल और शनि दोष शांत होते हैं। आस्था और विश्वास का पर्व हनुमान जयंती केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस दिन किए गए छोटे-छोटे उपाय भी जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
आज देशभर में Mahavir Jayanti श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह दिन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर Mahavira के जन्मोत्सव के रूप में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और मानवता के मूल्यों को भी दर्शाता है। भगवान महावीर के सिद्धांत: जीवन को दिशा देने वाले विचार भगवान महावीर ने अपने जीवन में जिन पांच मूल सिद्धांतों का पालन करने का संदेश दिया, उन्हें ‘पंच महाव्रत’ कहा जाता है। इनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संपत्ति का मोह त्यागना) शामिल हैं। ये सिद्धांत आज भी लोगों को नैतिक, शांतिपूर्ण और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं, खासकर ऐसे समय में जब भौतिकवाद तेजी से बढ़ रहा है। देशभर में धार्मिक आयोजन और शोभायात्राएं महावीर जयंती के अवसर पर जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, ध्यान और प्रवचन आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु भगवान महावीर की प्रतिमा को सुसज्जित रथ में विराजमान कर भव्य शोभायात्राएं निकालते हैं। प्रभात फेरियां, भक्ति गीत और धार्मिक कार्यक्रमों से वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक रंग में रंग जाता है। उपवास, दान और सेवा का महत्व इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, जैन ग्रंथों का पाठ करते हैं और दान-पुण्य के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। जरूरतमंदों की मदद, पशु-पक्षियों के प्रति करुणा और शाकाहार के प्रचार को विशेष महत्व दिया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा और करुणा में भी निहित है। शांति और मानवता का संदेश महावीर जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समाज को शांति, सहिष्णुता और आत्मअनुशासन का संदेश देने वाला पर्व है। भगवान महावीर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने हजारों साल पहले थे।
हिंदू धर्म में हनुमान जयंती का विशेष महत्व है। यह दिन हनुमान जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने पर सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। हनुमान जयंती 2026: तिथि और मुहूर्त साल 2026 में हनुमान जयंती चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि आरंभ: 1 अप्रैल 2026, सुबह 07:06 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त: 2 अप्रैल 2026, सुबह 07:41 बजे उदया तिथि के अनुसार पर्व: 2 अप्रैल 2026 शुभ मुहूर्त: 2 अप्रैल को सूर्योदय से लेकर सुबह 07:41 बजे तक पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है। पूजा सामग्री हनुमान जी की कृपा पाने के लिए पूजा में इन चीजों का विशेष महत्व है: लाल कपड़ा और चौकी चमेली का तेल, सिंदूर, जनेऊ लाल फूल, चंदन, अक्षत बेसन के लड्डू, बूंदी, गुड़-चना, केला घी का दीपक, धूप, कपूर, गंगाजल तुलसी दल (भोग में अनिवार्य) पूजा विधि हनुमान जयंती के दिन विधि-विधान से पूजा करना बेहद फलदायी माना जाता है: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ या लाल वस्त्र पहनें। चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करें। गंगाजल से स्नान कराकर चमेली तेल और सिंदूर से चोला चढ़ाएं। धूप-दीप जलाकर फूल, फल, चंदन और अक्षत अर्पित करें। बेसन के लड्डू या बूंदी का भोग लगाएं, साथ में तुलसी दल जरूर रखें। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या सुंदरकांड का पाठ करें। अंत में आरती कर सुख-समृद्धि और रक्षा की प्रार्थना करें। प्रमुख मंत्र ॐ ऐं ह्रीं हनुमते श्री रामदूताय नमः ऊँ नमो हनुमते रुद्रावताराय विश्वरूपाय अमितविक्रमाय रामदूताय स्वाहा ऊँ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहरणाय सर्वरोगहराय रामदूताय स्वाहा इन मंत्रों के जप से मानसिक शांति, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। क्या है मान्यता? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जयंती पर पूजा करने से भय, रोग, शत्रु बाधा और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। भक्त इस दिन व्रत रखकर और भक्ति भाव से पूजा कर बजरंगबली का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। अयोध्या की पावन रामनगरी में रामनवमी उत्सव इस बार विशेष श्रद्धा, भक्ति और भव्यता के साथ मनाया जा रहा है। राम जन्मभूमि मंदिर में शुक्रवार दोपहर ठीक 12 बजे, भगवान सूर्यदेव की किरणों ने रामलला के ललाट पर तिलक किया। यह दिव्य क्षण लगभग चार मिनट तक बना रहा। खास बात यह रही कि यह सूर्य तिलक उसी समय हुआ, जिसे भगवान श्रीराम के जन्म का शुभ मुहूर्त माना जाता है। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु बड़ी संख्या में अयोध्या पहुंचे। आस्था और विज्ञान का अनोखा संगम रामलला के सूर्य तिलक को लेकर मंदिर परिसर में भक्ति का अद्भुत माहौल देखने को मिला। यह केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से भी बेहद खास रहा। मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया के लिए विशेष रिफ्लेक्टर, लेंस और मिरर सिस्टम लगाए गए थे। सूर्य की किरणों को एक निश्चित दिशा में मोड़कर करीब 75 मिलीमीटर के आकार में रामलला के ललाट तक पहुंचाया गया, जिससे तिलक का दिव्य दृश्य साकार हुआ। तीन दिन तक चला सफल ट्रायल इस विशेष आयोजन की तैयारी पहले से ही की जा रही थी। मंदिर प्रशासन ने बताया कि लगातार तीन दिन तक सूर्य तिलक का सफल ट्रायल किया गया था। बृहस्पतिवार को भी दोपहर 12 बजे सूर्य की किरणें रामलला के मस्तक पर पड़ी थीं, जिसके बाद शुक्रवार को रामनवमी के अवसर पर इसे विधिवत रूप से दोहराया गया। पूरे देश ने देखा राम जन्मोत्सव रामनवमी के इस पावन अवसर पर रामलला का अभिषेक, शृंगार और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का भी आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों का लाइव प्रसारण किया गया, जिससे देश और विदेश में बैठे करोड़ों श्रद्धालु इस अलौकिक क्षण के साक्षी बन सके। इस बार रवि योग और सर्वार्थसिद्धि योग का संयोग भी बन रहा है, जिससे इस उत्सव का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नवरात्रि का पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। नौ दिन तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा और आराधना के बाद पर्व का समापन नवमी के दिन होता है। इस दिन कन्या पूजन करने की परंपरा होती है, जिसमें देवी के नौ रूपों के प्रतिनिधि माने जाने वाली कन्याओं का सम्मान और सेवा की जाती है। नवमी के अवसर पर मां सिद्धिदात्री का प्रिय भोग तैयार करना इस दिन का विशेष महत्व रखता है। मां सिद्धिदात्री का पसंदीदा भोग मां सिद्धिदात्री के भोग में सूजी का हलवा और काला चना सबसे प्रिय माने जाते हैं। अगर आप इस नवमी पर कन्या पूजन का आयोजन कर रहे हैं, तो इन दोनों व्यंजनों को बनाने की विधि और सामग्री का ध्यान रखना जरूरी है। सूजी का हलवा बनाने की सामग्री: • सूजी – 1 कप • पानी – 4 कप • चीनी – 2 कप • घी – 2 टेबलस्पून • दूध – 2 कप • काजू, किशमिश, बादाम – सजाने के लिए • इलायची पाउडर – 1/4 टीस्पून विधि: 1. कड़ाही में घी गरम करें और उसमें सूजी डालकर हल्का सुनहरा होने तक भूनें। 2. भुनी हुई सूजी में धीरे-धीरे पानी डालें और लगातार चलाते रहें। 3. चीनी मिलाकर 2-3 मिनट पकाएं और फिर इलायची पाउडर डालें। 4. ऊपर से काजू, किशमिश और बादाम डालकर हलवा सजाएं। 5. गरमा-गरम हलवा कन्या पूजन में भोग के रूप में परोसें। काला चना बनाने की सामग्री और विधि सामग्री: • काला चना – 1 कप (भीगा हुआ) • नमक – स्वादानुसार • जीरा पाउडर – 1/4 टीस्पून • हरा धनिया – सजाने के लिए विधि: 1. चनों को रात भर पानी में भिगो दें। 2. अगली सुबह चनों को साफ पानी में 20–25 मिनट या प्रेशर कुकर में 2-3 सीटी तक पकाएं। 3. उबले चनों में नमक और जीरा पाउडर मिलाएं। 4. ऊपर से हरा धनिया डालकर सजाएं। 5. इसे बिना प्याज-लहसुन के फ्राई कर कन्या पूजन में भोग के रूप में अर्पित करें। नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री को भोग अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। सूजी का हलवा और काला चना बनाना आसान है और ये पारंपरिक भोग के रूप में बेहद पसंद किए जाते हैं। इस नवमी, इन व्यंजनों के साथ कन्या पूजन कर पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त करें।
देहरादून, एजेंसियां। उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा 2026 इस साल 19 अप्रैल से शुरू हो रही है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु हर साल इस धार्मिक यात्रा में शामिल होते हैं। चारधाम यात्रा का आयोजन सुरक्षित और व्यवस्थित रूप से करने के लिए सरकार ने इस बार रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया ऑनलाइन, मोबाइल ऐप, व्हाट्सएप और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से शुरू कर दी है। यात्रा का शेड्यूल इस साल चारधाम यात्रा अक्षय तृतीया के अवसर पर शुरू हो रही है। 19 अप्रैल को यमुनोत्री और गंगोत्री धाम खुलेंगे, वहीं 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम श्रद्धालुओं के लिए खुलेगा। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कैसे करें ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन 6 मार्च 2026 से शुरू हो चुका है। प्रक्रिया इस प्रकार है: * आधिकारिक वेबसाइट registrationandtouristcare.uk.gov.in पर जाएं। * Register/Sign In बटन पर क्लिक कर अपनी आईडी बनाएं। * लॉगिन करने के बाद ‘Create/Manage Tour’ विकल्प चुनें। * यात्रा की तारीख और धाम का चयन करें। * Add Pilgrim पर क्लिक कर सभी यात्रियों की जानकारी भरें और आधार या वोटर आईडी अपलोड करें। * रजिस्ट्रेशन पूरा होने पर आपको यूनिक रजिस्ट्रेशन नंबर (URN) मिलेगा। * रजिस्ट्रेशन लेटर डाउनलोड करें, जिसमें QR कोड होगा। व्हाट्सएप और मोबाइल ऐप से रजिस्ट्रेशन व्हाट्सएप: मोबाइल में नंबर 8394833833 सेव करें, YATRA लिखकर मैसेज भेजें और पूछी गई जानकारी दें। मोबाइल ऐप: Google Play या App Store से Tourist Care Uttarakhand ऐप डाउनलोड करें और आवश्यक जानकारी भरकर सबमिट करें। ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन और हेल्पलाइन ऑफलाइन काउंटर 17 अप्रैल 2026 से हरिद्वार, ऋषिकेश और मुख्य यात्रा मार्गों पर उपलब्ध होंगे। यात्रा संबंधी जानकारी के लिए टोल-फ्री नंबर 0135-1364 पर कॉल कर सकते हैं। रजिस्ट्रेशन क्यों जरूरी है? चारधाम यात्रा पर सभी श्रद्धालुओं के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। यह व्यवस्था यात्रियों की सुरक्षा, ट्रैकिंग और बेहतर सुविधा सुनिश्चित करने के लिए लागू की गई है। पहले 24 घंटों में 1 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने अपना पंजीकरण करवा लिया था।
चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन, जिसे महाअष्टमी के नाम से जाना जाता है, मां महागौरी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां महागौरी को शांति, पवित्रता और समृद्धि की देवी माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों को धन-धान्य, सुख-शांति और सभी कष्टों से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मिर्जापुर के विंध्यधाम के विद्वान आचार्य पं. अनुपम महाराज के अनुसार, महाअष्टमी के दिन विशेष पूजा और कुछ सरल उपाय करने से मां की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। पूजा विधि: ऐसे करें मां महागौरी की आराधना महाअष्टमी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को शुद्ध करें। इसके बाद एक थाली में लाल चुनरी, चंदन, अक्षत, धूप, लाल और पीले पुष्प रखें। मां को अर्पित करने के लिए 7 गोमती चक्र, 7 कौड़ियां, चांदी या पीतल का कछुआ, लक्ष्मी बैल और पान रखें। मान्यता है कि पूजा के बाद कछुए को तिजोरी में रखने से धन की कमी नहीं होती। मां को प्रसन्न करने के लिए 56 भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि संभव न हो तो पूड़ी और लप्सी का भोग भी लगाया जा सकता है। कन्या पूजन का महत्व और सही विधि महाअष्टमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। 1 वर्ष से अधिक और 9 वर्ष से कम आयु की कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। कन्याओं को हलवा और खीर का भोग खिलाएं मिष्ठान अर्पित करें और दक्षिणा दें ध्यान रखें कि कन्या पूजन में नमक का उपयोग न करें मां को नारियल अर्पित करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है धार्मिक मान्यता के अनुसार, नारियल की आठ आहुति देने से अष्टलक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। खास उपाय: दूर होंगे कष्ट और बढ़ेगा धन-धान्य मां महागौरी को 7 कौड़ियां और 7 गोमती चक्र अर्पित करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। इसके साथ ही घी, शक्कर और बेल के मुरब्बे से हवन करने से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
भारत में आस्था और श्रद्धा के प्रमुख पर्वों में से एक राम नवमी इस वर्ष 27 मार्च 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन भगवान राम का जन्म हुआ था, जिन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जाना जाता है। धार्मिक शास्त्रों में इस दिन कुछ विशेष वस्तुओं को घर लाना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इन वस्तुओं से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, सुख-समृद्धि आती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। 1. शंख राम नवमी के दिन शंख को घर लाना बेहद शुभ माना जाता है। इसकी ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सकारात्मकता का वास होता है। साथ ही माता लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहती है। 2. श्रीराम यंत्र इस पावन अवसर पर श्रीराम यंत्र की स्थापना घर में सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। यह परिवार में प्रेम, एकता और सम्मान को बढ़ाता है और बुरी नजर से भी रक्षा करता है। 3. राम दरबार राम नवमी के दिन राम दरबार (राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की प्रतिमा) घर लाना अत्यंत शुभ होता है। नियमित पूजा करने से घर में शांति, सौहार्द और देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। 4. चांदी की वस्तुएं इस दिन चांदी की वस्तुएं खरीदना भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर में मान-सम्मान और समृद्धि बढ़ती है और भगवान राम की कृपा बनी रहती है। 5. तुलसी का पौधा यदि घर में तुलसी का पौधा नहीं है, तो राम नवमी के दिन इसे अवश्य लगाएं। तुलसी को पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जो वास्तु दोष दूर करने और आर्थिक समस्याओं को कम करने में सहायक मानी जाती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। चैत्र नवरात्रि का पर्व अपने अंतिम चरण में है। इस दौरान अष्टमी और नवमी का विशेष महत्व होता है, जब भक्त कन्या पूजन कर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस बार तिथियों को लेकर कुछ असमंजस था, जिसे अब स्पष्ट कर दिया गया है। अष्टमी कब है? वैदिक पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 25 मार्च 2026 को दोपहर 1:50 बजे से शुरू होकर 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर दुर्गा अष्टमी 26 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। अष्टमी पर कन्या पूजन का शुभ समय * सुबह: 6:18 बजे से 7:50 बजे तक * वैकल्पिक समय: 10:55 बजे से दोपहर 3:31 बजे तक नवमी (राम नवमी) कब है? नवमी तिथि 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च को सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार राम नवमी 27 मार्च 2026 को मनाना अधिक शुभ रहेगा। नवमी पर कन्या पूजन का समय * सुबह: 6:18 बजे से 7:50 बजे तक * वैकल्पिक समय: 10:55 बजे से दोपहर 3:31 बजे तक कन्या पूजन का महत्व अष्टमी और नवमी पर छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का रूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। उन्हें भोजन कराकर, उपहार देकर आशीर्वाद लिया जाता है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि और शांति आती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। चैत्र नवरात्रि की महाष्टमी का दिन विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है। साल 2026 में यह तिथि 26 मार्च को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवी दुर्गा की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और सच्चे मन से किए गए उपायों का फल जल्दी मिलता है। ऐसे में भक्तों के लिए कुछ खास स्थानों पर दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना गया है। घर के मुख्य द्वार और ईशान कोण का महत्व महाष्टमी के दिन शाम के समय घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर घी का दीपक जलाना चाहिए। मान्यता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सकारात्मकता का प्रवेश होता है। इसके साथ ही घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में दीपक जलाने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और आर्थिक समस्याएं कम होती हैं। मंदिर में दीपक और मंत्र जाप का महत्व नवरात्रि की महाष्टमी की रात घर के मंदिर में घी का दीपक जलाकर “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” मंत्र का 108 बार जाप करना बेहद लाभकारी माना गया है। इस उपाय से व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से रक्षा मिलती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। पीपल के पेड़ के पास दीप जलाने की मान्यता महाष्टमी की शाम पीपल के पेड़ के नीचे तेल का दीपक जलाना भी विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पीपल के पेड़ में त्रिदेव और देवी का वास होता है। यहां दीपक जलाने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है और संतान संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। अखंड ज्योति का विशेष महत्व नवरात्रि के नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाने की परंपरा भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। कहा जाता है कि जहां अखंड ज्योति जलती है, वहां माता का वास होता है और परिवार को हर प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलती है।
चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन देवी शक्ति के उग्र और प्रभावशाली स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा को समर्पित होता है। यह दिन विशेष रूप से भय, संकट और नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक सच्चे मन से मां कालरात्रि की आराधना करता है, उसके जीवन से भय और बाधाएं दूर होती हैं और साहस, शांति तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मां कालरात्रि का स्वरूप और आध्यात्मिक महत्व मां कालरात्रि का रूप अत्यंत तेजस्वी और अद्भुत माना जाता है। उनका वर्ण श्याम, केश खुले, गले में विद्युत समान चमकती माला और तीन नेत्र-यह स्वरूप भले ही उग्र दिखाई देता हो, लेकिन भक्तों के लिए वह सुरक्षा और कल्याण का प्रतीक हैं। इसी कारण उन्हें “शुभंकारी” भी कहा जाता है, जो अपने भक्तों को हर संकट से उबारती हैं और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करती हैं। पूजा विधि: सरलता और श्रद्धा का विशेष महत्व नवरात्रि के सातवें दिन पूजा विधि को अत्यंत पवित्र और अनुशासित माना गया है: प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें रोली, कुमकुम, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें श्रद्धा और सादगी के साथ पूजा करें, दिखावे से बचें भोग और आरती का महत्व मां कालरात्रि को गुड़ और चना का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप में परिवार में बांटा जाता है। अंत में मां की आरती करना अनिवार्य माना गया है, जो पूजा को पूर्णता प्रदान करती है। मंत्र और शुभ रंग इस दिन मां कालरात्रि के बीज मंत्र का जाप विशेष फलदायी होता है: “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः” नियमित मंत्र जाप से मन शांत होता है और नकारात्मक विचारों का नाश होता है। शुभ रंग के रूप में नीला रंग धारण करना उत्तम माना गया है, जो आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन का प्रतीक है। पौराणिक कथा: बुराई पर अच्छाई की जीत पौराणिक कथा के अनुसार, जब दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में आतंक फैलाया, तब देवी दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण किया। रक्तबीज को यह वरदान था कि उसके रक्त की हर बूंद से नया राक्षस उत्पन्न होता था। मां कालरात्रि ने अद्भुत रणनीति से उसका वध किया और उसके रक्त को भूमि पर गिरने से पहले ही अपने मुख में समाहित कर लिया। इस प्रकार बुराई का अंत हुआ और देवताओं को मुक्ति मिली। यह कथा जीवन में साहस, धैर्य और बुद्धिमत्ता की शक्ति को दर्शाती है।
चैत्र नवरात्रि सनातन धर्म में शक्ति उपासना का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक मनाया जा रहा है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की साधना के बाद अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। कब करें कन्या पूजन? पंचांग के अनुसार, दुर्गाष्टमी (26 मार्च 2026): प्रातः 11:48 बजे तक कन्या पूजन करना शुभ रहेगा। महानवमी (26 मार्च 11:48 बजे से शुरू): यह तिथि 27 मार्च सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। ऐसे में श्रद्धालु अपनी सुविधा अनुसार 26 या 27 मार्च को उदया तिथि के अनुसार कन्या पूजन कर सकते हैं। किस उम्र की कन्या का क्या महत्व? नवरात्रि में 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को देवी के विभिन्न स्वरूप माना जाता है। प्रत्येक उम्र की कन्या की पूजा अलग-अलग फल प्रदान करती है: 2 वर्ष (कुमारी): दुख-दरिद्रता दूर, सुख-समृद्धि की प्राप्ति 3 वर्ष (त्रिमूर्ति): धन, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद 4 वर्ष (कल्याणी): परिवार और कुल का कल्याण 5 वर्ष (रोहिणी): स्वास्थ्य और सौभाग्य 6 वर्ष (कालिका): बुद्धि, विद्या और विवेक 7 वर्ष (शाम्भवी): ऐश्वर्य और शक्ति 8 वर्ष (दुर्गा/शांभवी): विवाद और मुकदमों में सफलता 9 वर्ष (चंडिका/दुर्गा): शत्रुओं पर विजय और कार्य सिद्धि 10 वर्ष (सुभद्रा): सभी मनोकामनाओं की पूर्ति कैसे करें कन्या पूजन? कन्या पूजन की विधि सरल लेकिन अत्यंत श्रद्धापूर्ण होती है: अष्टमी या नवमी के दिन स्नान कर मां दुर्गा की पूजा करें। 9 कन्याओं और एक बालक (भैरव स्वरूप) को आमंत्रित करें। कन्याओं के चरण धोकर उनका तिलक करें और मौली बांधें। लाल चुनरी अर्पित करें और आसन पर बैठाएं। उन्हें पूरी, हलवा, चना, खीर आदि भोजन कराएं। अंत में उपहार, वस्त्र या दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें। धार्मिक मान्यता है कि विधिपूर्वक किया गया कन्या पूजन जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।
रांची। छठ पूजा के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य के बाद व्रती पूजा के अंतिम यानी चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देते है, जिसे उषा अर्घ्य कहा जाता है। इस बार उषा अर्घ्य 25 मार्च को है। पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्योदय सुबह 06:20 बजे होगा।सूर्योदय के समय पूजा कर व्रती 36 घंटे के इस कठिन व्रत का समापन करते हैं । इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत खोलते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।