National Health Service से जुड़े एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि ऑनलाइन सिंगिंग और ब्रीदिंग प्रोग्राम “ENO Breathe” लंबे समय से Long COVID से जूझ रहे मरीजों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। रिसर्च के मुताबिक इस कार्यक्रम से सांस फूलने की समस्या, एंग्जायटी और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया।
ENO Breathe एक 6 हफ्तों का ऑनलाइन breathing और wellbeing programme है, जिसमें singing techniques के जरिए लोगों को सांस लेने के बेहतर तरीके सिखाए जाते हैं। यह प्रोग्राम खासतौर पर उन लोगों के लिए तैयार किया गया, जिन्हें COVID-19 के बाद लंबे समय तक सांस लेने में दिक्कत और थकान जैसी समस्याएं बनी रहीं।
यह अध्ययन ब्रिटेन के 51 Long COVID Clinics से जुड़े 1,413 मरीजों पर किया गया। इन मरीजों की औसत उम्र 49 साल थी और करीब 80 प्रतिशत प्रतिभागी महिलाएं थीं। अधिकतर लोग लगभग 415 दिनों से Long COVID के लक्षणों से जूझ रहे थे।
रिसर्च में पाया गया कि ENO Breathe प्रोग्राम पूरा करने के बाद मरीजों में सांस फूलने की समस्या में काफी कमी आई। Dyspnoea-12 स्कोर में औसतन 4.29 अंकों का सुधार दर्ज किया गया।
सीढ़ियां चढ़ने, चलने और दौड़ने जैसी गतिविधियों के दौरान भी मरीजों ने पहले के मुकाबले बेहतर सांस लेने की क्षमता महसूस की। साथ ही Anxiety और मानसिक तनाव में भी कमी देखने को मिली।
हालांकि, आराम की स्थिति में सांस लेने की समस्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं पाया गया।
शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रोग्राम का असर उम्र, जेंडर, नस्ल या पहले से मौजूद अस्थमा जैसी बीमारियों के आधार पर अलग-अलग नहीं था। यानी लगभग सभी प्रतिभागियों को समान रूप से फायदा मिला।
अध्ययन के दौरान कोई गंभीर साइड इफेक्ट भी सामने नहीं आया, जिससे इसे सुरक्षित और आसानी से अपनाए जाने वाला विकल्प माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ENO Breathe जैसे ऑनलाइन प्रोग्राम Long COVID से जूझ रहे लोगों के लिए कम लागत और आसानी से उपलब्ध होने वाला प्रभावी समाधान बन सकते हैं। भविष्य में इसे chronic breathlessness यानी लंबे समय तक सांस लेने में परेशानी वाली अन्य बीमारियों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
ड्रैगन फ्रूट अपनी आकर्षक गुलाबी रंगत और अनोखे स्वाद के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यह केवल देखने में ही खूबसूरत नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से भी भरपूर होता है। इसमें फाइबर, विटामिन C, एंटीऑक्सीडेंट और पानी अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो संतुलित आहार का हिस्सा बनने पर स्वास्थ्य को कई तरह से लाभ पहुंचा सकता है। हालांकि, किसी भी एक फल को चमत्कारी इलाज नहीं माना जाना चाहिए। इसके फायदे संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के साथ ही बेहतर रूप से मिलते हैं। 1. शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद ड्रैगन फ्रूट में पानी की मात्रा अधिक होती है, जिससे गर्मियों में शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद मिल सकती है। इसमें पोटैशियम, मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स भी कम मात्रा में मौजूद होते हैं। 2. पाचन और आंतों की सेहत के लिए फायदेमंद इसमें मौजूद फाइबर प्रीबायोटिक की तरह काम करता है, जो आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को पोषण देने में मदद कर सकता है। इससे पाचन बेहतर रहने और कब्ज जैसी समस्याओं का जोखिम कम हो सकता है। 3. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर ड्रैगन फ्रूट में बेटालेन्स, फ्लेवोनॉयड्स और अन्य एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। ये शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने और कोशिकाओं की सुरक्षा में मदद कर सकते हैं। 4. त्वचा की सेहत को मिल सकता है समर्थन विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा में कोलेजन बनने की प्रक्रिया को समर्थन देते हैं। साथ ही, पर्याप्त पानी त्वचा को हाइड्रेट रखने में मदद करता है, जिससे त्वचा स्वस्थ दिख सकती है। 5. ब्लड शुगर संतुलित रखने में सहायक ड्रैगन फ्रूट का ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत कम माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर ग्लूकोज के अवशोषण की गति को धीमा करने में मदद कर सकता है। हालांकि, मधुमेह के मरीज इसे दवा का विकल्प न मानें और डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह के अनुसार ही सेवन करें। 6. आयरन के अवशोषण में मदद ड्रैगन फ्रूट में मौजूद विटामिन C शरीर को पौधों से मिलने वाले आयरन को बेहतर तरीके से अवशोषित करने में मदद कर सकता है। इसे दाल, हरी पत्तेदार सब्जियों या बीन्स जैसे आयरन युक्त खाद्य पदार्थों के साथ खाया जा सकता है। 7. रोग प्रतिरोधक क्षमता को मिल सकता है समर्थन फाइबर, विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सामान्य रूप से बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। संतुलित आहार का हिस्सा बनने पर यह लंबे समय तक स्वास्थ्य को समर्थन दे सकता है। एक दिन में कितना ड्रैगन फ्रूट खाना चाहिए? विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के लिए 150 से 200 ग्राम (लगभग एक कप) ड्रैगन फ्रूट प्रतिदिन संतुलित आहार के हिस्से के रूप में खाया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति को एलर्जी या पाचन संबंधी समस्या है, तो इसे धीरे-धीरे आहार में शामिल करना बेहतर माना जाता है। इन बातों का रखें ध्यान ड्रैगन फ्रूट वजन घटाने या शरीर को "डिटॉक्स" करने का कोई चमत्कारी उपाय नहीं है। इसे किसी बीमारी की दवा का विकल्प न समझें। अधिकतम लाभ के लिए इसे संतुलित आहार और नियमित व्यायाम के साथ शामिल करें।
रांची। रांची जिले के तमाड़ प्रखंड के बेलबेड़ा गांव में मलेरिया का संक्रमण तेजी से फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने विशेष निगरानी और रोकथाम अभियान शुरू कर दिया है। अराहंगा पंचायत के टुंगरी टोला में 27 जून से चलाए जा रहे विशेष स्क्रीनिंग अभियान के तहत अब तक 336 लोगों की जांच की गई है, जिनमें 160 लोग मलेरिया पॉजिटिव पाए गए हैं। इनमें 16 मरीजों में बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और अन्य लक्षण मिले हैं, जबकि बाकी संक्रमितों का भी नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार किया जा रहा है। मेडिकल टीम कर रही लगातार निगरानी सीएचसी प्रभारी डॉ. सावित्री कुजूर ने बताया कि संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है। मेडिकल टीम रोजाना प्रभावित गांवों का दौरा कर रही है और मौके पर ही मलेरिया रोधी दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि समय पर जांच और इलाज से बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। बिना लक्षण वाले लोगों की भी हो रही जांच अराहंगा की सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) अनुलता भुतकुंवर ने बताया कि मेडिकल टीम केवल बुखार या अन्य लक्षण वाले लोगों की ही नहीं, बल्कि बिना लक्षण वाले ग्रामीणों की भी जांच कर रही है। इसका उद्देश्य संक्रमण की शुरुआती अवस्था में पहचान कर समय रहते इलाज शुरू करना है। शुरुआत में कुछ ग्रामीण जांच से हिचकिचा रहे थे, लेकिन जागरूकता अभियान के बाद अब लोग स्वयं आगे आकर जांच करा रहे हैं। सावधानी बरतने की अपील स्वास्थ्य विभाग की टीम घर-घर जाकर दवा वितरण के साथ लोगों को मच्छरदानी के नियमित उपयोग, साफ-सफाई बनाए रखने और घर के आसपास पानी जमा नहीं होने देने की सलाह दे रही है। विभाग ने लोगों से अपील की है कि बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द या कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराएं। अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित क्षेत्र में स्क्रीनिंग, निगरानी और उपचार अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक संक्रमण पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ जाता।
नई दिल्ली, एजेंसियां। स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लंबे समय तक डिजिटल स्क्रीन के सामने रहने के कारण आंखों में थकान, जलन और सिरदर्द जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। ऐसे में ब्लू लाइट फिल्टर वाले चश्मे (ब्लू लाइट ग्लासेस) तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ये चश्मे कुछ स्थितियों में राहत जरूर देते हैं, लेकिन आंखों को स्थायी रूप से नुकसान से बचाने या नजर की कमजोरी को ठीक करने का दावा सही नहीं है। कैसे काम करते हैं ब्लू लाइट ग्लासेस? ब्लू लाइट ग्लासेस कंप्यूटर, मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली हाई-एनर्जी विजिबल ब्लू लाइट (HEV Blue Light) को आंशिक रूप से फिल्टर करने के लिए बनाए जाते हैं। इससे स्क्रीन की चकाचौंध कम महसूस हो सकती है और विशेष रूप से रात में स्क्रीन इस्तेमाल करने पर नींद के चक्र पर पड़ने वाला प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकता है। क्या आंखों का तनाव और सिरदर्द कम होता है? विशेषज्ञों के अनुसार, स्क्रीन देखने के दौरान बार-बार पलकें न झपकाने से आंखें सूख जाती हैं, जिससे जलन और थकान बढ़ती है। गलत बैठने की मुद्रा और स्क्रीन की अधिक चमक भी सिरदर्द का कारण बन सकती है। ब्लू लाइट ग्लासेस कुछ लोगों को आराम दे सकते हैं, लेकिन ये इन समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं हैं। नंबर वाले चश्मे का विकल्प नहीं ब्लू लाइट वाले चश्मे मायोपिया, हाइपरमेट्रोपिया या एस्टिग्मेटिज्म जैसी दृष्टि संबंधी समस्याओं को ठीक नहीं करते। यदि किसी व्यक्ति की आंखों का नंबर है, तो उसे डॉक्टर द्वारा निर्धारित प्रिस्क्रिप्शन वाले चश्मे की ही जरूरत होगी। जरूरत पड़ने पर उन लेंसों पर ब्लू लाइट फिल्टर कोटिंग भी लगाई जा सकती है। आंखों की सुरक्षा के लिए अपनाएं ये आदतें विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें, जिसे 20-20-20 नियम कहा जाता है। इसके अलावा बार-बार पलकें झपकाना, पर्याप्त रोशनी में काम करना और सोने से कम से कम दो घंटे पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना आंखों और नींद दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है। ब्लू लाइट ग्लासेस सहायक हो सकते हैं, लेकिन स्वस्थ डिजिटल आदतों का कोई विकल्प नहीं हैं।