नई दिल्ली, एजेंसियां। रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी में थकान, चिड़चिड़ापन, नींद में बदलाव या किसी काम में मन न लगना अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन अगर ये बदलाव लगातार कई दिनों या हफ्तों तक बने रहें और आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो इन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। ये डिप्रेशन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। डिप्रेशन केवल उदासी तक सीमित नहीं होता। इसका असर व्यक्ति के मूड, ऊर्जा, नींद, भूख, एकाग्रता और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। समय रहते लक्षणों को पहचानकर विशेषज्ञ से सलाह लेना मददगार हो सकता है। 1. लगातार उदासी या निराशा लंबे समय तक उदास, खालीपन या निराशा महसूस करना डिप्रेशन का प्रमुख संकेत हो सकता है। कई बार व्यक्ति को अपनी स्थिति का स्पष्ट कारण भी समझ नहीं आता। भविष्य को लेकर नकारात्मक विचार बढ़ना और पहले की तरह खुशी महसूस न होना भी इसके लक्षण हो सकते हैं। 2. पसंदीदा कामों में रुचि खत्म होना अगर व्यक्ति उन गतिविधियों में भी रुचि खोने लगे, जिन्हें वह पहले पसंद करता था, तो यह ध्यान देने वाला संकेत है। दोस्तों से मिलना, घूमना, फिल्म देखना या किसी शौक में समय बिताना बोझ जैसा लग सकता है। व्यक्ति धीरे-धीरे सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगता है। 3. आराम के बाद भी लगातार थकान पर्याप्त नींद और आराम के बावजूद हर समय थकान या ऊर्जा की कमी महसूस होना भी डिप्रेशन से जुड़ा हो सकता है। सामान्य काम करने में भी ज्यादा मेहनत लगना, सुबह उठने में परेशानी या पढ़ाई-ऑफिस के काम में ऊर्जा न लगना इसके संकेत हो सकते हैं। 4. नींद और भूख में बदलाव डिप्रेशन का असर नींद और खाने की आदतों पर भी पड़ सकता है। कुछ लोगों को नींद आने में परेशानी होती है या बार-बार नींद टूटती है, जबकि कुछ लोग जरूरत से ज्यादा सोने लगते हैं। इसी तरह भूख कम या ज्यादा हो सकती है और इसके कारण वजन में बदलाव भी देखने को मिल सकता है। 5. ध्यान लगाने और फैसले लेने में दिक्कत डिप्रेशन के दौरान व्यक्ति को किसी काम पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो सकती है। पढ़ाई या ऑफिस के काम में मन न लगना, चीजें भूलना और छोटे-छोटे फैसले लेने में कठिनाई महसूस होना भी इसके संकेत हो सकते हैं। कब लेनी चाहिए विशेषज्ञ की सलाह? अगर ये लक्षण लगातार बने हुए हैं, बढ़ रहे हैं या आपकी पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेना उचित है। सिर्फ थकान मानकर लंबे समय तक इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नोट: ये लक्षण डिप्रेशन का निश्चित निदान नहीं हैं। अलग-अलग कारणों से भी ऐसी परेशानियां हो सकती हैं। सही आकलन और उपचार के लिए योग्य डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनी Meta को युवाओं और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामले में बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी अदालत ने कंपनी पर करीब 56.7 करोड़ डॉलर (लगभग ₹4,700 करोड़) का जुर्माना लगाया है। मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल और उससे बच्चों व युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों से जुड़ा है। Meta पर गंभीर आरोप मामले में आरोप लगाया गया कि Meta के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Facebook और Instagram के डिजाइन और कुछ फीचर्स युवाओं को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने में योगदान दे सकते हैं। याचिकाकर्ताओं और अभियोजन पक्ष की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कंपनी को बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के संभावित मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों की जानकारी थी, लेकिन जोखिमों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंध को लेकर अमेरिका में लंबे समय से बहस चल रही है। विशेषज्ञों और अभिभावकों की ओर से खास तौर पर कम उम्र के बच्चों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई जाती रही है। चिंताओं में चिंता, अवसाद, नींद में परेशानी और शरीर की छवि को लेकर नकारात्मक सोच जैसे संभावित प्रभाव शामिल हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव कई कारकों पर निर्भर करता है। Meta के लिए बढ़ सकता है कानूनी दबाव इस मामले में भारी जुर्माना Meta के लिए आर्थिक नुकसान के साथ-साथ कानूनी और नियामकीय दबाव बढ़ाने वाला फैसला माना जा रहा है। कंपनी को अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन, बच्चों की सुरक्षा और कम उम्र के उपयोगकर्ताओं से जुड़े फीचर्स को लेकर अतिरिक्त जांच का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में पहले भी कानूनी कार्रवाई होती रही है। सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर बहस इस फैसले से सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही को लेकर बहस और तेज हो सकती है। खासकर बच्चों और किशोरों को लक्षित करने वाले फीचर्स तथा उन्हें लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने वाली तकनीकों पर नियामकों की नजर बढ़ सकती है। Meta की ओर से फैसले के खिलाफ अपील या अन्य कानूनी विकल्प अपनाए जाने की स्थिति में मामले की आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल यह फैसला सोशल मीडिया और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
न्यू मैक्सिको। अमेरिका के न्यू मैक्सिको की एक अदालत ने फेसबुक और इंस्टाग्राम की पेरेंट कंपनी मेटा (Meta) पर बड़ा जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने कंपनी को 567 मिलियन डॉलर (करीब 4,700 करोड़ रुपये) का भुगतान करने का आदेश दिया है। अदालत का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के कारण बच्चों और किशोरों की मानसिक सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है और कंपनी को इस नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। इलाज और जागरूकता कार्यक्रमों पर खर्च होगी राशि जज ब्रायन बिडशेड ने अपने फैसले में कहा कि 567 मिलियन डॉलर में से 420 मिलियन डॉलर युवाओं के इलाज और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किए जाएंगे। शेष राशि अगले पांच वर्षों में जागरूकता अभियान, स्क्रीनिंग सेवाओं और अन्य रोकथाम कार्यक्रमों पर खर्च होगी। यह राशि मार्च 2026 में जूरी द्वारा लगाए गए 375 मिलियन डॉलर के सिविल जुर्माने से अलग है। इस तरह मेटा पर कुल वित्तीय दायित्व 942 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। कोर्ट ने मेटा पर लगाए गंभीर आरोप अदालत ने माना कि मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म के ऐसे फीचर्स विकसित किए, जो बच्चों और किशोरों में लत (Addiction) बढ़ाते हैं। साथ ही कंपनी पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी जानकारी छिपाने और संभावित खतरों को पर्याप्त तरीके से नियंत्रित नहीं करने के आरोप भी लगे। कोर्ट ने मेटा को प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा संबंधी फीचर्स, प्राइवेसी सेटिंग्स और आपत्तिजनक कंटेंट की रिपोर्टिंग प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के निर्देश दिए हैं। एज वेरिफिकेशन और AI टूल्स होंगे मजबूत फैसले के तहत मेटा को न्यू मैक्सिको में अपने एज एश्योरेंस सिस्टम को और मजबूत करना होगा। कंपनी को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से कम उम्र के संभावित यूजर्स की पहचान करने, 13 वर्ष से कम आयु के संदिग्ध खातों से उम्र का प्रमाण मांगने और उनकी व्यक्तिगत जानकारी हटाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा स्कूलों और बाल सुरक्षा संस्थाओं के सहयोग से एक विशेष रिपोर्टिंग पोर्टल विकसित करने को भी कहा गया है, ताकि कम उम्र के संभावित यूजर्स की पहचान कर उचित कार्रवाई की जा सके। मेटा ने फैसले को बताया गलत, करेगा अपील मेटा ने अदालत के फैसले पर असहमति जताते हुए कहा कि कंपनी अपने प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाने के लिए लगातार काम कर रही है और हानिकारक कंटेंट हटाने के लिए कई सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। कंपनी ने कहा कि उसे किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अपने प्रयासों पर भरोसा है और वह अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करेगी। अन्य राज्यों में भी बढ़ रही कानूनी चुनौती मेटा को अमेरिका में सोशल मीडिया से बच्चों को होने वाले नुकसान से जुड़े हजारों मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। इस महीने कैलिफोर्निया में भी कंपनी पर बहु-राज्यीय मुकदमे की सुनवाई शुरू होने वाली है, जिसमें आरोप है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के डिज़ाइन ने युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट और सोशल मीडिया की लत को बढ़ावा दिया। वहीं हाल ही में चार किशोरों के परिवारों ने भी मेटा, टिकटॉक, स्नैप और यूट्यूब के खिलाफ मुकदमा दायर कर आरोप लगाया है कि इन प्लेटफॉर्म के लंबे समय तक इस्तेमाल से उनके बच्चों को गंभीर मानसिक नुकसान पहुंचा।
Morning Headache Causes: अगर आपकी सुबह की शुरुआत अक्सर सिरदर्द के साथ होती है, तो इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। सुबह उठते ही होने वाला सिरदर्द कई बार शरीर की किसी अंदरूनी समस्या या बिगड़ती जीवनशैली का संकेत हो सकता है। खराब नींद, शरीर में पानी की कमी, तनाव, ब्लड प्रेशर में बदलाव और कुछ अन्य स्वास्थ्य कारण इसके पीछे जिम्मेदार हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सुबह का सिरदर्द बार-बार हो रहा है, तो केवल दर्द निवारक दवा लेने के बजाय इसकी असली वजह जानना और समय रहते सुधार करना जरूरी है। सुबह उठते ही सिरदर्द होने के 6 बड़े कारण 1. पर्याप्त और अच्छी नींद न लेना अगर आपकी नींद पूरी नहीं होती या रात में बार-बार टूटती है, तो सुबह उठने पर सिरदर्द महसूस हो सकता है। अच्छी गुणवत्ता वाली 7–8 घंटे की नींद शरीर और मस्तिष्क दोनों के लिए जरूरी है। 2. डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) रातभर पानी न पीने या दिनभर पर्याप्त पानी न लेने से शरीर डिहाइड्रेट हो सकता है। इसका असर सुबह सिर भारी लगने और सिरदर्द के रूप में दिखाई दे सकता है। 3. नींद में दांत पीसना या जबड़ा कसना कुछ लोगों को नींद के दौरान दांत पीसने (Bruxism) या जबड़ा कसकर रखने की आदत होती है। इससे सिर और चेहरे की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ता है, जो सुबह दर्द का कारण बन सकता है। 4. तनाव और मानसिक दबाव लगातार तनाव, चिंता और मानसिक थकान भी सुबह के सिरदर्द का एक प्रमुख कारण हो सकते हैं। तनाव शरीर की मांसपेशियों और नसों पर असर डालता है, जिससे दर्द बढ़ सकता है। 5. ब्लड प्रेशर में बदलाव कुछ लोगों में सुबह के समय ब्लड प्रेशर बढ़ने या असंतुलित रहने के कारण भी सिरदर्द की समस्या हो सकती है। यदि यह समस्या बार-बार हो, तो नियमित जांच कराना जरूरी है। 6. दर्द निवारक दवाओं का अधिक सेवन बार-बार पेनकिलर लेने से रिबाउंड हेडेक (Rebound Headache) की समस्या हो सकती है, जिसमें दवा का असर खत्म होने के बाद सिरदर्द फिर शुरू हो जाता है। सुबह के सिरदर्द से बचने के आसान उपाय रोजाना 7–8 घंटे की अच्छी और पर्याप्त नींद लें। हर दिन एक ही समय पर सोने और जागने की आदत बनाएं। दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बंद करें। रात में अत्यधिक कैफीन और शराब के सेवन से बचें। तनाव कम करने के लिए मेडिटेशन और रिलैक्सेशन तकनीकों को अपनाएं। अगर खर्राटे, नींद में सांस रुकने या दांत पीसने की समस्या हो, तो विशेषज्ञ से सलाह लें। कौन-से योग और प्राणायाम मददगार हो सकते हैं? सुबह नियमित रूप से अनुलोम-विलोम, भ्रामरी प्राणायाम, बालासन, शशांकासन और मार्जरी-व्याघ्रासन (Cat-Cow Pose) करने से तनाव कम करने, शरीर को रिलैक्स रखने और बेहतर नींद में मदद मिल सकती है। हालांकि, यदि सिरदर्द लगातार बना रहे या तेज हो, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर न रहें और डॉक्टर से जांच जरूर कराएं। कब डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें? यदि सुबह का सिरदर्द रोजाना हो, बहुत तेज हो, इसके साथ चक्कर, धुंधला दिखना, उल्टी, बोलने में परेशानी या शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी महसूस हो, तो इसे सामान्य सिरदर्द समझकर नजरअंदाज न करें और तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें। ध्यान रखें: सुबह का सिरदर्द कई बार शरीर का एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। समय पर कारण की पहचान, संतुलित जीवनशैली, पर्याप्त नींद, नियमित योग और सही खानपान अपनाकर इस समस्या के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। डिजिटल युग में मोबाइल फोन, लैपटॉप और इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इनका अत्यधिक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर भी डाल रहा है। लगातार स्क्रीन से जुड़े रहने, सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल और ऑनलाइन काम के दबाव के कारण लोगों में डिजिटल स्ट्रेस तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते इसके लक्षणों को पहचानकर डिजिटल आदतों में संतुलन लाना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन देखने से मानसिक थकान, आंखों में तनाव, सिरदर्द, नींद की समस्या और एकाग्रता में कमी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। वहीं, मोबाइल पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, ईमेल और सोशल मीडिया अलर्ट दिमाग को लगातार सक्रिय रखते हैं, जिससे तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। सोशल मीडिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी डिजिटल स्ट्रेस का एक बड़ा कारण माना जाता है। दूसरों की जीवनशैली और उपलब्धियों से लगातार तुलना करने की प्रवृत्ति आत्मविश्वास में कमी, चिंता और असंतोष जैसी भावनाओं को जन्म दे सकती है। इसके अलावा, वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन कार्य संस्कृति के कारण ऑफिस और निजी जीवन के बीच की दूरी कम हो गई है, जिससे लोग हर समय ऑनलाइन रहने का दबाव महसूस करते हैं। डिजिटल स्ट्रेस के सामान्य लक्षणों में बार-बार मोबाइल चेक करने की इच्छा, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, नींद प्रभावित होना, मानसिक थकान और काम में रुचि कम होना शामिल हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्क्रीन टाइम सीमित रखें, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करें, सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग करें और नियमित अंतराल पर डिजिटल ब्रेक लेकर मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
नई दिल्ली, एजेंसियां। हर साल 22 जुलाई को वर्ल्ड ब्रेन डे मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को मस्तिष्क स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना है। आधुनिक जीवनशैली, तनाव, अनियमित दिनचर्या, खराब खानपान और डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते उपयोग का असर दिमाग पर भी पड़ रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ अच्छी आदतों को अपनाकर याददाश्त, एकाग्रता और मानसिक क्षमता को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखा जा सकता है। पर्याप्त नींद और पौष्टिक आहार है जरूरी विशेषज्ञों के अनुसार, रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद मस्तिष्क को आराम देने, याददाश्त मजबूत करने और नई जानकारी को व्यवस्थित करने में मदद करती है। वहीं, हरी सब्जियां, मौसमी फल, साबुत अनाज, मेवे और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर आहार मस्तिष्क की कोशिकाओं को पोषण प्रदान करते हैं और उसकी कार्यक्षमता बनाए रखते हैं। रोजाना व्यायाम और मानसिक गतिविधियां बढ़ाएं नियमित व्यायाम से मस्तिष्क में रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ती है। इसके अलावा किताब पढ़ना, शतरंज खेलना, पजल हल करना, नई भाषा या नई स्किल सीखना जैसी गतिविधियां दिमाग को सक्रिय रखती हैं और सोचने-समझने की क्षमता को मजबूत बनाती हैं। तनाव कम करें, नशे से रहें दूर लंबे समय तक तनाव में रहने से एकाग्रता और याददाश्त प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ तनाव कम करने के लिए योग, मेडिटेशन, गहरी सांस लेने की तकनीक और पसंदीदा गतिविधियों में समय बिताने की सलाह देते हैं। साथ ही धूम्रपान और अत्यधिक शराब से दूरी बनाए रखना भी ब्रेन हेल्थ के लिए जरूरी माना जाता है। स्वस्थ आदतों से कम हो सकता है गंभीर बीमारियों का जोखिम स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से अल्जाइमर, डिमेंशिया और स्ट्रोक जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। वर्ल्ड ब्रेन डे के अवसर पर लोगों को अपने मस्तिष्क के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और दैनिक जीवन में सकारात्मक बदलाव अपनाने की सलाह दी जा रही है।
आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। कामकाज, पढ़ाई, बैंकिंग, मनोरंजन और लोगों से जुड़े रहने तक लगभग हर काम मोबाइल के जरिए होने लगा है। हालांकि, जब इसका इस्तेमाल जरूरत से बढ़कर आदत और फिर लत में बदल जाता है, तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोग बिना समझे ही मोबाइल एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं। यदि आपके व्यवहार में भी कुछ खास बदलाव दिखाई दे रहे हैं, तो समय रहते सावधान होना जरूरी है। बार-बार मोबाइल देखने की आदत अगर बिना किसी जरूरी कॉल, मैसेज या नोटिफिकेशन के भी आप हर थोड़ी देर में फोन अनलॉक करके देखते रहते हैं, तो यह मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता का संकेत हो सकता है। धीरे-धीरे यह आदत आपकी एकाग्रता और उत्पादकता को भी प्रभावित कर सकती है। फोन दूर होने पर बेचैनी महसूस होना कुछ लोगों को मोबाइल कुछ समय के लिए भी अपने पास न होने पर घबराहट, चिड़चिड़ापन या बेचैनी होने लगती है। यदि आपके साथ भी ऐसा होता है, तो यह मोबाइल की लत का स्पष्ट संकेत माना जा सकता है। सुबह उठते ही और रात को सोने से पहले फोन इस्तेमाल करना यदि आपकी सुबह की शुरुआत मोबाइल देखने से होती है और रात को सोने से पहले भी लंबे समय तक स्क्रीन पर नजरें टिकी रहती हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकती है। देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है और शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। काम, पढ़ाई और परिवार से ज्यादा मोबाइल को प्राथमिकता देना जब सोशल मीडिया, वीडियो देखने या मोबाइल गेम्स की वजह से पढ़ाई, नौकरी या परिवार के साथ बिताने वाला समय कम होने लगे, तो यह गंभीर चेतावनी हो सकती है। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। स्क्रीन टाइम कम करने में बार-बार असफल होना अगर आपने कई बार मोबाइल का इस्तेमाल कम करने का फैसला किया, लेकिन हर बार कुछ समय बाद फिर पहले जैसी आदत लौट आई, तो यह भी मोबाइल एडिक्शन का प्रमुख संकेत माना जाता है। मोबाइल की लत से हो सकते हैं ये नुकसान मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल लंबे समय में कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। इनमें शामिल हैं: आंखों में जलन, दर्द और सिरदर्द की समस्या। नींद की गुणवत्ता खराब होना और लगातार थकान महसूस होना। तनाव और मानसिक दबाव बढ़ना। ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आना। पढ़ाई और कामकाज की कार्यक्षमता प्रभावित होना। परिवार और दोस्तों के साथ संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ना। मोबाइल इस्तेमाल कैसे करें संतुलित? मोबाइल का उपयोग पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, लेकिन इसकी आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें, सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन का इस्तेमाल बंद करें, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद रखें और खाली समय में किताब पढ़ने, व्यायाम करने या परिवार के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियों को प्राथमिकता दें। अगर मोबाइल का अत्यधिक उपयोग आपकी दिनचर्या, मानसिक स्थिति या सामाजिक जीवन को लगातार प्रभावित कर रहा है, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या काउंसलर से सलाह लेना भी लाभदायक हो सकता है।
आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। काम, पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल करना आम बात है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्क्रीन के सामने बिताया गया समय ही नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है, यह भी मानसिक स्वास्थ्य और याददाश्त पर बड़ा असर डालता है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के अनुसार, स्क्रीन टाइम को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है—Passive Screen Time और Active Screen Time। इनमें से पैसिव स्क्रीन टाइम दिमाग के लिए अधिक नुकसानदायक माना जाता है। क्या होता है Passive Screen Time? Passive Screen Time वह होता है, जिसमें व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य के लगातार स्क्रीन पर समय बिताता रहता है। इसमें सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करना, ऑटो-प्ले वीडियो देखते रहना या बैकग्राउंड में वीडियो चलाकर अन्य काम करना शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग पर बहुत कम मानसिक दबाव डालता है, लेकिन धीरे-धीरे यह याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कैसे प्रभावित होती है याददाश्त और फोकस? विशेषज्ञों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति औसतन रोजाना 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताता है, जिसमें बड़ा हिस्सा पैसिव स्क्रीन टाइम का होता है। लगातार बिना सोचे-समझे कंटेंट देखने की आदत से कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे— ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई वर्किंग मेमोरी कमजोर होना मानसिक थकान बढ़ना किसी काम पर लंबे समय तक टिके रहने में परेशानी छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन विशेषज्ञ बताते हैं कि छोटे-छोटे वीडियो और लगातार मिलने वाली तुरंत संतुष्टि (Instant Gratification) दिमाग को इसी तरह के कंटेंट का आदी बना सकती है, जिससे ध्यान अवधि (Attention Span) धीरे-धीरे कम होने लगती है। Active Screen Time क्यों है बेहतर? Active Screen Time में व्यक्ति स्क्रीन का इस्तेमाल किसी उद्देश्य के साथ करता है। जैसे— नई स्किल सीखना ऑनलाइन कोर्स करना किताब पढ़ना नई भाषा सीखना पजल या ब्रेन गेम खेलना डिजिटल जर्नलिंग ऑनलाइन फिटनेस क्लास लेना क्रिएटिव कंटेंट बनाना ऐसी गतिविधियां दिमाग को सक्रिय रखती हैं और सोचने, समझने तथा समस्या सुलझाने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। क्या स्क्रीन टाइम से बढ़ सकता है डिमेंशिया का खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार, केवल स्क्रीन टाइम को डिमेंशिया का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि लंबे समय तक दिमाग को पर्याप्त मानसिक चुनौती न मिलने पर याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, सीखने और दिमाग को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां "कॉग्निटिव रिजर्व" को मजबूत बनाने में मदद करती हैं, जिससे उम्र बढ़ने के साथ मानसिक कार्यक्षमता को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। कैसे करें स्क्रीन का सही इस्तेमाल? अगर आप स्क्रीन का उपयोग करते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें— बिना उद्देश्य के लगातार स्क्रॉल करने से बचें। सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए समय सीमा तय करें। हर 30–45 मिनट बाद स्क्रीन से ब्रेक लें। स्क्रीन का उपयोग सीखने और नई स्किल विकसित करने के लिए करें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें। निष्कर्ष स्क्रीन अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप उसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं। यदि स्क्रीन का उपयोग केवल मनोरंजन और लगातार स्क्रॉलिंग तक सीमित है, तो यह आपकी याददाश्त, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। वहीं, सीखने और रचनात्मक कार्यों के लिए किया गया स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकता है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। यदि आपको याददाश्त, ध्यान या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी लगातार समस्या हो रही है, तो किसी योग्य डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।
सप्ताह की शुरुआत अक्सर कई कर्मचारियों के लिए तनाव और लंबे टू-डू लिस्ट के साथ होती है। दो दिन की छुट्टी के बाद अचानक काम के मोड में लौटना कई लोगों को भारी लगता है। ऐसे में अब एक नया वर्कप्लेस ट्रेंड 'Bare Minimum Mondays' तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसका उद्देश्य सोमवार के तनाव को कम करते हुए पूरे सप्ताह की उत्पादकता को बेहतर बनाना है। क्या है Bare Minimum Mondays? Bare Minimum Mondays का मतलब काम से बचना या आलस करना नहीं है। इसका उद्देश्य सोमवार को केवल सबसे जरूरी और उच्च प्राथमिकता वाले कार्य पूरे करना है, जबकि कम महत्वपूर्ण कामों, गैर-जरूरी बैठकों और अन्य गतिविधियों को सप्ताह के बाकी दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है। इस तरीके से कर्मचारी बिना अधिक दबाव महसूस किए धीरे-धीरे पूरे सप्ताह की गति बना सकते हैं। कैसे अपनाएं Bare Minimum Mondays? 1. सबसे जरूरी काम पहले करें सोमवार की शुरुआत उन कार्यों से करें जिनकी समय-सीमा नजदीक हो या जिनका प्रभाव सबसे अधिक हो। बाकी कम जरूरी कार्य बाद में किए जा सकते हैं। 2. सोमवार का शेड्यूल हल्का रखें पूरे दिन को लगातार मीटिंग्स और भारी कामों से भरने के बजाय सीमित कार्य रखें। इससे मानसिक दबाव कम होता है और फोकस बेहतर रहता है। 3. गैर-जरूरी मीटिंग्स से बचें केवल उन्हीं बैठकों में शामिल हों जो वास्तव में आवश्यक हों। इससे महत्वपूर्ण कार्यों पर अधिक समय दिया जा सकता है। 4. वास्तविक लक्ष्य तय करें ऐसी टू-डू लिस्ट बनाएं जिसे कार्य समय के भीतर आसानी से पूरा किया जा सके। छोटे और पूरे होने वाले लक्ष्य आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। 5. बीच-बीच में ब्रेक लें लगातार काम करने की बजाय छोटे-छोटे ब्रेक लें। कुछ मिनट टहलना या स्ट्रेचिंग करना मानसिक थकान कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद कर सकता है। क्या हैं इसके फायदे? यदि इस तरीके को सही ढंग से अपनाया जाए तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। सोमवार की चिंता और तनाव कम हो सकता है। कार्यस्थल पर बर्नआउट का जोखिम घट सकता है। जरूरी कार्यों पर बेहतर फोकस बना रहता है। पूरे सप्ताह के लिए सकारात्मक कार्य गति (Momentum) बनती है। काम की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार हो सकता है। क्या यह तरीका सभी के लिए उपयुक्त है? Bare Minimum Mondays हर पेशे में लागू नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य सेवाओं, आपातकालीन सेवाओं, कस्टमर सपोर्ट, रिटेल और ऐसे क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए यह मॉडल व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि वहां तत्काल प्रतिक्रिया और तय समय पर काम करना जरूरी होता है। हालांकि, जिन कर्मचारियों के पास अपने कार्यों की प्राथमिकता तय करने की स्वतंत्रता होती है, वे इस रणनीति का उपयोग करके सप्ताह की शुरुआत अधिक संतुलित और कम तनावपूर्ण बना सकते हैं। निष्कर्ष Bare Minimum Mondays का उद्देश्य कम काम करना नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से काम की प्राथमिकता तय करना है। सोमवार को केवल आवश्यक कार्यों पर ध्यान देकर कर्मचारी मानसिक दबाव कम कर सकते हैं, बेहतर फोकस बनाए रख सकते हैं और पूरे सप्ताह अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोग रात में बार-बार नींद टूटने, खर्राटे आने या सुबह उठने के बाद भी थकान महसूस करने जैसी समस्याओं से जूझते हैं। अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। स्लीप एपनिया केवल नींद की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ स्ट्रोक और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा सकता है। क्या है स्लीप एपनिया? ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय श्वसन मार्ग बार-बार आंशिक या पूरी तरह बंद हो जाता है। इसके कारण सांस लेने में रुकावट आती है और व्यक्ति की नींद बार-बार टूटती रहती है। कई बार मरीज को इसका एहसास भी नहीं होता, लेकिन उसका शरीर पूरी रात इस समस्या से जूझता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुकावट एक रात में दर्जनों या यहां तक कि सैकड़ों बार भी हो सकती है। दिमाग को कैसे पहुंचता है नुकसान? ऑक्सीजन की कमी बनती है सबसे बड़ा खतरा स्लीप एपनिया के दौरान शरीर और दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इस स्थिति को "इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया" कहा जाता है। दिमाग को लगातार ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जब बार-बार ऑक्सीजन की कमी होती है, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रभावित होने लगती हैं। खासकर वे हिस्से जो याददाश्त, ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। रिसर्च में पाया गया है कि लंबे समय तक बिना इलाज वाले स्लीप एपनिया से हिप्पोकैम्पस और फ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे महत्वपूर्ण ब्रेन क्षेत्रों में बदलाव हो सकते हैं। याददाश्त और सोचने की क्षमता पर असर स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों में अक्सर ये समस्याएं देखी जाती हैं— चीजें भूलना ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई निर्णय लेने में परेशानी मानसिक प्रतिक्रिया की गति धीमी होना पढ़ाई और काम में प्रदर्शन प्रभावित होना नींद की रिकवरी प्रक्रिया हो जाती है प्रभावित हर बार सांस रुकने पर शरीर हल्की अवस्था में जाग जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में "अराउजल" कहा जाता है। इससे गहरी नींद और REM Sleep बार-बार बाधित होती है। यही वे चरण हैं जिनमें— दिमाग खुद की मरम्मत करता है यादें मजबूत होती हैं भावनात्मक संतुलन बनता है सीखने की क्षमता बेहतर होती है जब ये प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो पातीं, तो व्यक्ति दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और सुस्ती महसूस करता है। बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार स्लीप एपनिया केवल नींद की बीमारी नहीं है, बल्कि यह रक्त वाहिकाओं को भी प्रभावित करता है। बार-बार ऑक्सीजन की कमी और फिर अचानक ऑक्सीजन मिलने की प्रक्रिया से— सूजन बढ़ती है ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है हृदय रोगों की संभावना बढ़ती है इन सभी कारणों से स्ट्रोक और मस्तिष्क संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। अल्जाइमर और डिमेंशिया से भी जुड़ सकता है संबंध हाल के शोध बताते हैं कि लंबे समय तक अनुपचारित स्लीप एपनिया अल्जाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। नींद में लगातार व्यवधान आने से दिमाग में जमा होने वाले हानिकारक प्रोटीन, जैसे बीटा-एमिलॉयड, ठीक तरह से साफ नहीं हो पाते। यही प्रोटीन आगे चलकर डिमेंशिया और अल्जाइमर से जुड़े पाए गए हैं। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है— तेज खर्राटे आना रात में बार-बार नींद खुलना सोते समय सांस रुकने जैसा महसूस होना सुबह सिरदर्द होना दिनभर अत्यधिक नींद आना लगातार थकान महसूस होना ध्यान और याददाश्त कमजोर होना क्या है इसका इलाज? अच्छी बात यह है कि स्लीप एपनिया का इलाज संभव है। विशेषज्ञ इसके लिए कई उपाय सुझाते हैं— CPAP (Continuous Positive Airway Pressure) थेरेपी वजन नियंत्रित करना नियमित व्यायाम धूम्रपान और शराब से दूरी ओरल डिवाइस का उपयोग सोने की सही पोजीशन अपनाना समय पर पहचान और उपचार से न केवल नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि दिमाग को होने वाले लंबे समय के नुकसान से भी बचा जा सकता है।
Stress Side Effects: तनाव हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक होता है, यह बात लगभग हर कोई जानता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि केवल लंबे समय तक बना रहने वाला स्ट्रेस ही नहीं, बल्कि सिर्फ 3 से 5 मिनट का तनाव भी शरीर में कई नकारात्मक बदलाव पैदा कर सकता है। बार-बार होने वाला छोटा तनाव धीरे-धीरे दिल, दिमाग, इम्यूनिटी और पाचन तंत्र पर गहरा असर डाल सकता है। गुरुग्राम स्थित सीके बिड़ला हॉस्पिटल के एसोसिएट डायरेक्टर (इंटरनल मेडिसिन) डॉ. तुषार तायल के अनुसार, शरीर हर प्रकार के तनाव को एक खतरे की तरह लेता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया देता है। तनाव के दौरान शरीर में क्या होता है? जब मस्तिष्क किसी चुनौती या खतरे को महसूस करता है, तो ब्रेन का एमिग्डाला सक्रिय हो जाता है। इसके बाद शरीर में एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप: हार्ट रेट बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। शरीर अधिक सतर्क हो जाता है। ऊर्जा मांसपेशियों की ओर केंद्रित हो जाती है। इस प्रक्रिया को "फाइट या फ्लाइट रिस्पॉन्स" कहा जाता है। असली खतरा कब शुरू होता है? कुछ मिनटों का तनाव सामान्य रूप से खत्म हो जाता है, लेकिन यदि दिनभर में बार-बार तनाव की स्थिति पैदा होती रहे, तो शरीर सामान्य अवस्था में लौट नहीं पाता। लगातार: काम का दबाव मोबाइल नोटिफिकेशन छोटी-छोटी बहसें डेडलाइन का तनाव इन सबकी वजह से कोर्टिसोल का स्तर लगातार ऊंचा बना रह सकता है। दिल पर पड़ता है असर शोध के अनुसार, बार-बार सक्रिय होने वाला स्ट्रेस रिस्पॉन्स: हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ाता है। धमनियों में प्लाक जमने की संभावना बढ़ाता है। हृदय रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है। वजन और नींद भी होती है प्रभावित कॉर्टिसोल का बढ़ा हुआ स्तर: भूख बढ़ा सकता है। मोटापे का कारण बन सकता है। नींद की गुणवत्ता खराब कर सकता है। व्यायाम करने की इच्छा कम कर सकता है। कमजोर हो सकती है इम्यूनिटी लगातार तनाव इम्यून सिस्टम की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। ऐसे लोगों में: बार-बार संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। बीमारी से रिकवरी में अधिक समय लग सकता है। गट हेल्थ पर भी पड़ता है असर बार-बार होने वाला तनाव: गट माइक्रोबायोम का संतुलन बिगाड़ सकता है। एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स बढ़ा सकता है। IBS (इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) जैसी समस्याओं को ट्रिगर कर सकता है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है प्रभाव लगातार छोटे-छोटे तनाव के एपिसोड से: एंग्जायटी बढ़ सकती है। भावनात्मक सहनशक्ति कम हो सकती है। डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है। तनाव से राहत पाने के आसान उपाय विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे-छोटे रिलैक्सेशन ब्रेक तनाव के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। अपनाएं ये आदतें गहरी डायाफ्रामिक ब्रीदिंग करें। 5 मिनट शांत बैठें। थोड़ी देर बाहर टहलें। स्क्रीन से कुछ समय का ब्रेक लें। पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम करें। इन छोटे प्रयासों से कोर्टिसोल का स्तर नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है और शरीर को अगली तनावपूर्ण स्थिति से पहले सामान्य होने का मौका मिलता है।
Weekend Therapy: सिर्फ छुट्टी नहीं, खुद को रीचार्ज करने का मौका है वीकेंड पूरे सप्ताह ऑफिस, पढ़ाई, बिजनेस और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच लोग शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं। ऐसे में वीकेंड केवल आराम का दिन नहीं, बल्कि खुद को फिर से ऊर्जा से भरने का अवसर भी होता है। हालांकि कई लोग शनिवार और रविवार का ज्यादातर समय मोबाइल चलाने या देर तक सोने में बिताते हैं, जिससे शरीर और दिमाग को वास्तविक आराम नहीं मिल पाता। यदि आप वीकेंड का सही उपयोग करें तो आने वाले सप्ताह की शुरुआत नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच के साथ कर सकते हैं। 1. पूरी करें अधूरी नींद, लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं कामकाजी दिनों में अक्सर पर्याप्त नींद नहीं मिल पाती। वीकेंड पर शरीर को आराम देने के लिए अच्छी और गहरी नींद लेना जरूरी है। हालांकि बहुत ज्यादा देर तक सोना भी नुकसानदायक हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य समय से एक-दो घंटे अधिक आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा रखने के लिए पर्याप्त होता है। अच्छी नींद मानसिक तनाव कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद करती है। 2. कुछ घंटों के लिए करें डिजिटल डिटॉक्स मोबाइल, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन आज हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुकी हैं। लगातार सोशल मीडिया और ईमेल्स देखने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता। वीकेंड पर कम से कम चार से पांच घंटे के लिए फोन और अन्य डिजिटल डिवाइस से दूरी बनाएं। डिजिटल डिटॉक्स से आंखों को आराम मिलता है और मानसिक तनाव भी कम होता है। 3. प्रकृति के करीब बिताएं समय बंद कमरों और व्यस्त शहरों की जिंदगी से निकलकर थोड़ी देर प्रकृति के बीच समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। सुबह या शाम किसी पार्क में टहलना, हरियाली के बीच बैठना या ताजी हवा में गहरी सांस लेना मन को शांति देता है। प्रकृति के संपर्क में रहने से सकारात्मक भावनाएं बढ़ती हैं और तनाव कम होता है। 4. अपने शौक को दें समय भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर अपने पसंदीदा शौक भूल जाते हैं। वीकेंड पर कुछ समय उन गतिविधियों के लिए निकालें जो आपको खुशी देती हैं। चाहे किताब पढ़ना हो, संगीत सुनना, पेंटिंग करना, गार्डनिंग करना या कोई नया हुनर सीखना—अपनी पसंद का काम करने से मन प्रसन्न रहता है और मानसिक दबाव कम होता है। 5. मसाज और गुनगुने पानी से दें शरीर को राहत लगातार काम करने से शरीर की मांसपेशियों में खिंचाव और थकान महसूस हो सकती है। ऐसे में गुनगुने पानी से स्नान करना या हल्के तेल से मसाज करना फायदेमंद साबित हो सकता है। इसके अलावा गुनगुने पानी में सेंधा नमक डालकर कुछ देर पैर डुबोकर बैठने से भी शरीर को आराम मिलता है। यह तरीका ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करने और शारीरिक थकान कम करने में मदद करता है। 6. परिवार और दोस्तों के साथ बिताएं क्वालिटी टाइम काम का दबाव और व्यस्त दिनचर्या कई बार लोगों को भावनात्मक रूप से भी थका देती है। वीकेंड पर परिवार, दोस्तों या प्रियजनों के साथ समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। खुलकर बातचीत करना, हंसी-मजाक करना और पुरानी यादें साझा करना तनाव कम करने का प्रभावी तरीका माना जाता है। छोटी-छोटी आदतें बदल सकती हैं आपका पूरा वीकेंड वीकेंड का सही इस्तेमाल केवल आराम करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से बेहतर बनाने के लिए भी किया जा सकता है। यदि आप अच्छी नींद, डिजिटल डिटॉक्स, प्रकृति के साथ समय, अपनी हॉबी, रिलैक्सेशन और अपनों के साथ बातचीत जैसी आदतों को अपनाते हैं, तो न सिर्फ आपकी थकान दूर होगी बल्कि आप नए सप्ताह की शुरुआत भी अधिक उत्साह और ऊर्जा के साथ कर पाएंगे।
नई दिल्ली: गर्मी के मौसम में डिहाइड्रेशन, थकान और स्किन संबंधी समस्याएं आम बात हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य स्वास्थ्य संस्थाओं के अनुसार, अत्यधिक गर्मी तनाव, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी और मानसिक थकान को बढ़ा सकती है। क्यों बिगड़ सकता है मानसिक स्वास्थ्य? विशेषज्ञों के अनुसार, जब तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है तो शरीर को अपना सामान्य तापमान बनाए रखने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। इसका असर दिमाग की कार्यक्षमता पर भी पड़ सकता है। गर्मी के कारण शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है, जिससे व्यक्ति बेचैनी, गुस्सा या मानसिक थकान महसूस कर सकता है। कई शोधों में यह भी पाया गया है कि अत्यधिक गर्मी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी आपात स्थितियों और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में वृद्धि देखी जाती है। नींद और डिहाइड्रेशन भी बनते हैं समस्या गर्मी के मौसम में पर्याप्त नींद न मिलना, मूड स्विंग्स और एंग्जायटी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। वहीं डिहाइड्रेशन के कारण कमजोरी, एकाग्रता में कमी और काम पर फोकस करने में परेशानी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जो लोग पहले से मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित दवाएं ले रहे हैं, वे गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ऐसे रखें मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। संतुलित और हल्का भोजन करें। मौसमी फलों और ताजे खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करें। नियमित योग, व्यायाम और मेडिटेशन करें। दोपहर की तेज धूप से बचें। प्रतिदिन 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लें। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं। अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लें। सेल्फ-केयर भी है जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सेल्फ-केयर केवल आराम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी मानसिक और भावनात्मक जरूरतों को समझना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि लंबे समय तक तनाव, चिंता या उदासी महसूस हो रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय रहते डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट जहां नई चीजें सीखने और दुनिया से जुड़े रहने का अवसर देते हैं, वहीं इनका अत्यधिक इस्तेमाल शरीर और दिमाग पर गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार ऑनलाइन रहने की आदत मानसिक थकान को बढ़ा रही है और सिर्फ नींद लेने से इस समस्या से पूरी तरह राहत नहीं मिलती। कैलाश दीपक हॉस्पिटल के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. बिपिन कुमार शर्मा के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन के संपर्क में रहने से मस्तिष्क को लगातार भारी मात्रा में जानकारी प्रोसेस करनी पड़ती है, जिससे मानसिक ऊर्जा तेजी से खत्म होने लगती है। क्यों थकने लगता है दिमाग? विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार मोबाइल और लैपटॉप इस्तेमाल करने से मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स प्रभावित होता है। यह हिस्सा निर्णय लेने, ध्यान केंद्रित करने और भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होता है। जब यह हिस्सा लगातार ओवरलोड रहता है, तो व्यक्ति में निम्न समस्याएं दिखाई देने लगती हैं— ध्यान लगाने में कठिनाई चिड़चिड़ापन भावनात्मक सुन्नता लगातार थकान महसूस होना मानसिक तनाव बढ़ना डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह की मानसिक थकान केवल अच्छी नींद से पूरी तरह दूर नहीं होती, बल्कि दिमाग को डिजिटल आराम (Digital Detox) की भी जरूरत होती है। कैसे बदल रहा है इंटरनेट हमारे दिमाग को? लगातार स्क्रॉलिंग और बार-बार ऐप्स बदलने की आदत मस्तिष्क को तेज उत्तेजनाओं का आदी बना देती है। इससे किसी एक काम पर लंबे समय तक फोकस बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा— नोटिफिकेशन और लाइक्स डोपामाइन को बार-बार सक्रिय करते हैं। धीरे-धीरे डिजिटल कंटेंट पर निर्भरता बढ़ने लगती है। आत्म-नियंत्रण और निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है। रिसर्च के अनुसार, अत्यधिक इंटरनेट उपयोग मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में ग्रे मैटर के घनत्व को भी प्रभावित कर सकता है। सिर्फ दिमाग ही नहीं, शरीर के अन्य अंग भी होते हैं प्रभावित आंखों पर असर लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। इसके लक्षण हैं— आंखों में सूखापन जलन धुंधला दिखाई देना सिरदर्द गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर दबाव लंबे समय तक झुककर मोबाइल देखने से "टेक नेक" की समस्या हो सकती है, जिससे गर्दन और ऊपरी रीढ़ में दर्द बढ़ सकता है। मांसपेशियों में तनाव कीबोर्ड और टचस्क्रीन के लगातार उपयोग से कंधों, हाथों और कलाइयों में दर्द या रिपिटिटिव स्ट्रेन इंजरी की समस्या हो सकती है। दिल और वजन पर असर अधिक स्क्रीन टाइम शारीरिक गतिविधियों को कम कर देता है, जिससे— मोटापे का खतरा बढ़ता है ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है नींद और इम्यूनिटी पर प्रभाव स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, जिससे हार्मोनल संतुलन, मेटाबॉलिज्म और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। क्या करें? विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि— स्क्रीन टाइम सीमित करें। हर 30-40 मिनट में छोटा ब्रेक लें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद करें। नियमित व्यायाम और आउटडोर गतिविधियों को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। समय-समय पर डिजिटल डिटॉक्स अपनाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का संतुलित उपयोग ही बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की कुंजी है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव (Stress) लगभग हर व्यक्ति की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। नौकरी का दबाव, आर्थिक चुनौतियां, पारिवारिक जिम्मेदारियां और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव लोगों की मानसिक शांति को प्रभावित कर रहा है। हालांकि थोड़े समय का तनाव सामान्य माना जाता है, लेकिन जब यह लंबे समय तक बना रहता है तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार तनाव न केवल व्यक्ति के व्यवहार और सोचने की क्षमता को प्रभावित करता है, बल्कि यह हृदय, पाचन तंत्र, नींद और शरीर की कई अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है। तनाव का दिमाग पर क्या असर पड़ता है? 1. निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है लगातार तनाव के दौरान शरीर में कॉर्टिसोल (Cortisol) नामक हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। यह हार्मोन दिमाग के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को प्रभावित करता है, जो सोचने, समझने, निर्णय लेने और समस्याओं का समाधान खोजने के लिए जिम्मेदार होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति छोटे-छोटे फैसले लेने में भी कठिनाई महसूस कर सकता है और गलत निर्णय लेने की संभावना बढ़ जाती है। 2. याददाश्त और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है लंबे समय तक तनाव में रहने से दिमाग का हिप्पोकैम्पस हिस्सा प्रभावित हो सकता है, जो नई चीजें सीखने और याद रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कारण व्यक्ति को बातें भूलने, ध्यान भटकने और नई जानकारी को याद रखने में परेशानी होने लगती है। 3. चिंता और डिप्रेशन का खतरा शुरुआत में तनाव केवल बेचैनी, चिड़चिड़ापन या चिंता के रूप में दिखाई देता है, लेकिन समय के साथ यह गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकता है। लगातार तनाव के कारण: एंग्जायटी बढ़ सकती है डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है आत्मविश्वास कम हो सकता है भावनात्मक संतुलन बिगड़ सकता है 4. प्रोडक्टिविटी में गिरावट जब दिमाग लगातार तनाव में रहता है तो किसी भी काम में ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है। व्यक्ति जल्दी थक जाता है और उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ता है। इसका प्रभाव नौकरी, पढ़ाई और व्यक्तिगत जीवन सभी पर दिखाई देने लगता है। नींद पर पड़ता है सीधा असर तनाव की स्थिति में व्यक्ति अक्सर एक ही समस्या के बारे में बार-बार सोचता रहता है। इससे रात में नींद आने में देर हो सकती है या बार-बार नींद टूट सकती है। खराब नींद के कारण: दिनभर थकान महसूस होती है ऊर्जा कम हो जाती है चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है मानसिक प्रदर्शन प्रभावित होता है तनाव का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? 1. हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है तनाव के दौरान दिल की धड़कन तेज हो जाती है और रक्तचाप बढ़ सकता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। 2. मांसपेशियों में दर्द और अकड़न लगातार तनाव में रहने पर शरीर की मांसपेशियां तनावग्रस्त रहती हैं। इससे गर्दन, कंधों और पीठ में दर्द की समस्या हो सकती है। 3. पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है तनाव का असर सीधे हमारे पाचन तंत्र पर भी पड़ता है। इसके कारण: अपच गैस पेट दर्द कब्ज या दस्त जैसी समस्याएं उभर सकती हैं। 4. वजन बढ़ने का खतरा कई लोग तनाव के दौरान जरूरत से ज्यादा खाना खाने लगते हैं, जिसे इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। इससे: कैलोरी का सेवन बढ़ता है वजन बढ़ सकता है मोटापे का खतरा बढ़ जाता है तनाव कम करने के आसान तरीके विशेषज्ञों के अनुसार तनाव को नियंत्रित करने के लिए कुछ सरल आदतें अपनाई जा सकती हैं: रोजाना 20-30 मिनट वॉक करें मेडिटेशन और योग का अभ्यास करें पर्याप्त नींद लें दोस्तों और परिवार से बातचीत करें पसंदीदा संगीत सुनें सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करें प्रकृति के बीच समय बिताएं यदि तनाव लंबे समय तक बना रहे, रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे या चिंता और उदासी लगातार महसूस हो, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। तनाव केवल मन की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समय रहते इसके संकेतों को पहचानना और उचित कदम उठाना बेहद जरूरी है।
बाहर से सफल, अंदर से परेशान! जानिए हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी के 7 संकेत आज के कॉर्पोरेट दौर में व्यस्त रहना और लगातार बेहतर प्रदर्शन करना सफलता की निशानी माना जाता है। लेकिन कई बार यही सफलता अंदर ही अंदर मानसिक दबाव और चिंता को छिपा देती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति बाहर से पूरी तरह सफल और आत्मविश्वासी दिखाई देता है, लेकिन भीतर लगातार चिंता, तनाव और असुरक्षा महसूस करता रहता है। हालांकि यह कोई आधिकारिक मेडिकल डायग्नोसिस नहीं है, फिर भी इसका असर व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ सकता है। आइए जानते हैं इसके प्रमुख संकेतों के बारे में। 1. हर बात को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचना यदि आप मीटिंग, बातचीत या भेजे गए ईमेल को बार-बार दिमाग में दोहराते रहते हैं और सोचते हैं कि इसे बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता था, तो यह हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी का संकेत हो सकता है। लगातार ओवरथिंकिंग मानसिक थकान बढ़ाती है। 2. परफेक्शनिस्ट बनने की आदत ऐसे लोग छोटी-सी गलती से भी डरते हैं और हर काम को बिल्कुल परफेक्ट करना चाहते हैं। खुद की लगातार आलोचना करना और हर निर्णय पर संदेह करना भी इसी का हिस्सा हो सकता है। 3. काम खत्म होने के बाद भी दिमाग का एक्टिव रहना ऑफिस से घर आने के बाद भी यदि आपका दिमाग काम, टारगेट और अधूरे प्रोजेक्ट्स के बारे में सोचता रहता है, तो यह मानसिक तनाव का संकेत है। ऐसे लोगों को काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई होती है। 4. चिंता से बचने के लिए जरूरत से ज्यादा काम करना कई लोग तनाव और चिंता से बचने के लिए खुद को काम में पूरी तरह डुबो देते हैं। शुरुआत में यह उत्पादकता बढ़ाने जैसा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बर्नआउट का कारण बन सकती है। 5. बार-बार होने वाले शारीरिक लक्षण मानसिक तनाव का असर शरीर पर भी दिखाई देता है। लगातार सिरदर्द, गर्दन या कंधों में दर्द, थकान, मांसपेशियों में तनाव और नींद की कमी जैसे लक्षण हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी से जुड़े हो सकते हैं। 6. हर चीज अपने नियंत्रण में रखने की इच्छा यदि आपको दूसरों को जिम्मेदारी सौंपने में परेशानी होती है और हर काम खुद मॉनिटर करने की जरूरत महसूस होती है, तो यह भी चिंता का संकेत हो सकता है। विशेष रूप से मैनेजमेंट या नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले लोगों में यह व्यवहार अधिक देखा जाता है। 7. सफलता के बावजूद असफलता का डर कई बार व्यक्ति अच्छी नौकरी, प्रमोशन और उपलब्धियों के बावजूद खुद को योग्य नहीं मानता। उसे लगता है कि वह किसी भी समय असफल हो सकता है। इसे आमतौर पर "इम्पोस्टर सिंड्रोम" कहा जाता है, जो हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी का प्रमुख संकेत माना जाता है। क्यों नजर नहीं आती यह समस्या? समाज अक्सर केवल उपलब्धियों और परिणामों को महत्व देता है। ऐसे में जो लोग बाहर से सफल दिखाई देते हैं, उनकी मानसिक परेशानियां अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। यही कारण है कि हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी को पहचानना मुश्किल हो जाता है। कब लेनी चाहिए विशेषज्ञ की मदद? यदि चिंता आपके दैनिक जीवन, रिश्तों, स्वास्थ्य या कामकाज को प्रभावित करने लगे, शारीरिक लक्षण लगातार बने रहें या आप भावनात्मक रूप से थका हुआ महसूस करें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है। इन आसान तरीकों से करें प्रबंधन काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करें। नियमित रूप से गहरी सांस लेने और रिलैक्सेशन तकनीकों का अभ्यास करें। ईमेल और मैसेज बार-बार चेक करने की आदत कम करें। पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। जरूरत महसूस होने पर काउंसलिंग या थेरेपी की मदद लें। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी को समय रहते पहचानकर और सही कदम उठाकर बर्नआउट, तनाव और अन्य मानसिक समस्याओं से बचा जा सकता है।
एक नई स्टडी में सामने आया है कि गंभीर मानसिक बीमारियों (Serious Mental Illness - SMI) से जूझ रहे Veterans ने स्वास्थ्य निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले Wearable Devices को काफी सकारात्मक तरीके से स्वीकार किया। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये डिवाइस मरीजों की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखने में मदद कर सकते हैं, खासकर तब जब डॉक्टर की अपॉइंटमेंट्स के बीच लंबा अंतर हो। Veterans पर किया गया अध्ययन यह अध्ययन अमेरिका के Greater Los Angeles Veterans Affairs System के तहत इलाज करा रहे मरीजों पर किया गया। इसमें schizophrenia spectrum disorders, bipolar disorder और post-traumatic stress disorder (PTSD) से पीड़ित 15 Veterans को शामिल किया गया। प्रतिभागियों ने दो हफ्ते से लेकर एक महीने तक wearable health devices का इस्तेमाल किया। इसके बाद शोधकर्ताओं ने उनके अनुभवों को समझने के लिए विस्तृत इंटरव्यू किए। Sleep, Stress और Activity Monitoring से मिला फायदा स्टडी में शामिल कई मरीजों ने बताया कि wearable devices को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करना आसान था। इन डिवाइस की मदद से वे अपनी: नींद की गुणवत्ता (Sleep Patterns) Heart Rate Stress Levels Physical Activity Daily Step Count जैसी चीजों को ट्रैक कर पा रहे थे। कई प्रतिभागियों ने कहा कि इन आंकड़ों को देखने से उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूकता मिली और स्वस्थ आदतें अपनाने की प्रेरणा भी मिली। कुछ मरीजों ने नियमित वॉक, एक्सरसाइज और बेहतर नींद की दिनचर्या बनाए रखने की बात कही। Privacy को लेकर नहीं दिखी चिंता स्टडी की एक अहम बात यह रही कि अधिकांश प्रतिभागियों ने Privacy या Location Tracking को लेकर कोई चिंता नहीं जताई। मरीजों का मानना था कि डॉक्टरों के साथ यह स्वास्थ्य डेटा साझा करने से बेहतर इलाज और सही निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि मरीजों ने Patient-Generated Health Data को Healthcare Providers के लिए उपयोगी माना। तकनीकी दिक्कतें बनी चुनौती हालांकि, लंबे समय तक wearable devices इस्तेमाल करने में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं। प्रतिभागियों ने बताया कि: Smartphone Apps को समझना कभी-कभी मुश्किल था तकनीकी समस्याएं उपयोग में बाधा बनीं लंबे समय तक डिवाइस पहनना असहज महसूस हुआ कुछ लोगों को संदेह था कि डिवाइस मानसिक स्वास्थ्य के जटिल लक्षणों को सही तरीके से पकड़ पाएंगे या नहीं विशेष रूप से Anxiety और Relapse जैसे संकेतों को ट्रैक करने की क्षमता पर सवाल उठाए गए। भविष्य में Mental Healthcare बदल सकते हैं Wearables शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर तकनीकी सहायता बेहतर की जाए और Mood Tracking, Medication Reminders जैसे फीचर्स जोड़े जाएं, तो यह तकनीक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में बड़ा बदलाव ला सकती है। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि अभी बड़े स्तर पर और अध्ययन की जरूरत है ताकि यह समझा जा सके कि नियमित इलाज में Wearable Data को शामिल करने से मरीजों के Clinical Outcomes में कितना सुधार हो सकता है।
National Health Service से जुड़े एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि ऑनलाइन सिंगिंग और ब्रीदिंग प्रोग्राम “ENO Breathe” लंबे समय से Long COVID से जूझ रहे मरीजों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। रिसर्च के मुताबिक इस कार्यक्रम से सांस फूलने की समस्या, एंग्जायटी और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है ENO Breathe Programme? ENO Breathe एक 6 हफ्तों का ऑनलाइन breathing और wellbeing programme है, जिसमें singing techniques के जरिए लोगों को सांस लेने के बेहतर तरीके सिखाए जाते हैं। यह प्रोग्राम खासतौर पर उन लोगों के लिए तैयार किया गया, जिन्हें COVID-19 के बाद लंबे समय तक सांस लेने में दिक्कत और थकान जैसी समस्याएं बनी रहीं। यह अध्ययन ब्रिटेन के 51 Long COVID Clinics से जुड़े 1,413 मरीजों पर किया गया। इन मरीजों की औसत उम्र 49 साल थी और करीब 80 प्रतिशत प्रतिभागी महिलाएं थीं। अधिकतर लोग लगभग 415 दिनों से Long COVID के लक्षणों से जूझ रहे थे। सांस फूलने और Anxiety में दिखा सुधार रिसर्च में पाया गया कि ENO Breathe प्रोग्राम पूरा करने के बाद मरीजों में सांस फूलने की समस्या में काफी कमी आई। Dyspnoea-12 स्कोर में औसतन 4.29 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। सीढ़ियां चढ़ने, चलने और दौड़ने जैसी गतिविधियों के दौरान भी मरीजों ने पहले के मुकाबले बेहतर सांस लेने की क्षमता महसूस की। साथ ही Anxiety और मानसिक तनाव में भी कमी देखने को मिली। हालांकि, आराम की स्थिति में सांस लेने की समस्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं पाया गया। सभी उम्र और वर्ग के लोगों को मिला फायदा शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रोग्राम का असर उम्र, जेंडर, नस्ल या पहले से मौजूद अस्थमा जैसी बीमारियों के आधार पर अलग-अलग नहीं था। यानी लगभग सभी प्रतिभागियों को समान रूप से फायदा मिला। अध्ययन के दौरान कोई गंभीर साइड इफेक्ट भी सामने नहीं आया, जिससे इसे सुरक्षित और आसानी से अपनाए जाने वाला विकल्प माना जा रहा है। Long COVID मरीजों के लिए नई उम्मीद विशेषज्ञों का मानना है कि ENO Breathe जैसे ऑनलाइन प्रोग्राम Long COVID से जूझ रहे लोगों के लिए कम लागत और आसानी से उपलब्ध होने वाला प्रभावी समाधान बन सकते हैं। भविष्य में इसे chronic breathlessness यानी लंबे समय तक सांस लेने में परेशानी वाली अन्य बीमारियों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
King’s College London और University of Porto के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में यह सामने आया है कि दिमाग में मौजूद Histamine केवल एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसा विस्तृत “Brain Histamine Map” तैयार किया है, जो यह दिखाता है कि जीवन के अलग-अलग चरणों में Histamine से जुड़े जीन दिमाग के विकास, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक बीमारियों से कैसे जुड़े होते हैं। Histamine सिर्फ एलर्जी तक सीमित नहीं आमतौर पर Histamine को एलर्जी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह दिमाग में एक महत्वपूर्ण न्यूरोमॉड्यूलेटर की तरह काम करता है। यह कई जरूरी कार्यों में भूमिका निभाता है, जैसे: भावनाओं को नियंत्रित करना नींद और जागने का चक्र याददाश्त व्यवहारिक लचीलापन सीखने की क्षमता लाखों डेटा पॉइंट्स का किया गया विश्लेषण इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों और डेटा सेट्स का इस्तेमाल किया। अध्ययन में शामिल थे: 49,495 brain cell nuclei का RNA sequencing analysis 24 से 57 वर्ष की उम्र के postmortem brain samples गर्भावस्था के 8 सप्ताह से लेकर 40 वर्ष तक के developmental brain data PET imaging और neurotransmitter receptor mapping इन सभी डेटा को मिलाकर वैज्ञानिकों ने दिमाग में Histamine सिस्टम का विस्तृत अध्ययन किया। मानसिक बीमारियों से मिला सीधा संबंध रिसर्च में पाया गया कि Histamine receptors का संबंध कई मानसिक और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से हो सकता है। वैज्ञानिकों ने Histamine expression patterns को इन स्थितियों से जुड़ा पाया: Attention Deficit Hyperactivity Disorder Major Depressive Disorder Schizophrenia Anorexia Nervosa शोधकर्ताओं के अनुसार दिमाग के frontal और limbic क्षेत्रों में Histamine activity ज्यादा देखी गई, जबकि occipital cortex में इसका स्तर कम पाया गया। उम्र के साथ बदलता है Histamine सिस्टम अध्ययन में यह भी सामने आया कि: Histidine decarboxylase नामक enzyme का स्तर शुरुआती विकास में सबसे ज्यादा था जबकि H3 receptor expression उम्र बढ़ने के साथ adulthood तक बढ़ता गया इससे संकेत मिलता है कि Histamine सिस्टम जीवनभर दिमाग के विकास और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में नई मानसिक स्वास्थ्य थेरेपी का रास्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च मानसिक बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खोल सकती है। यह “Brain Histamine Atlas” भविष्य में: Depression ADHD Schizophrenia Neurodevelopmental disorders के लिए targeted therapies विकसित करने में मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी और रिसर्च की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि Histamine signaling को नियंत्रित करके मानसिक स्वास्थ्य उपचार को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।
कनाडा में की गई एक नई जनसंख्या-आधारित स्टडी में यह सामने आया है कि अपेक्षाकृत कम स्तर का वायु प्रदूषण भी दिमागी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक फाइन पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) के संपर्क में रहने से संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive performance) कमजोर हो सकती है और मस्तिष्क में “छुपी हुई” वेस्कुलर क्षति का खतरा बढ़ सकता है। क्या कहती है यह रिसर्च? यह अध्ययन Canadian Alliance for Healthy Hearts and Minds Cohort Study के डेटा पर आधारित है, जिसमें 2014 से 2018 के बीच 5 प्रांतों के 6,878 वयस्कों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों की औसत उम्र लगभग 57.6 वर्ष थी, जिनमें 55% से अधिक महिलाएं थीं। शोध में वायु प्रदूषण के 5 साल के औसत एक्सपोजर को मापा गया और उसका असर दिमागी टेस्ट और MRI स्कैन पर देखा गया। प्रदूषण और दिमागी प्रदर्शन के बीच संबंध स्टडी में पाया गया कि: PM2.5 के हर 5 μg/m³ बढ़ने पर MoCA स्कोर में गिरावट देखी गई इसी तरह NO₂ के बढ़ने से भी मानसिक क्षमता परीक्षण के स्कोर कम हुए कार्य-आधारित स्मृति और स्पीड टेस्ट (Digit Symbol Substitution Test) पर भी नकारात्मक असर पाया गया शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि NO₂ के संपर्क से “covert vascular brain injury” यानी छुपी हुई मस्तिष्क रक्तवाहिका क्षति का जोखिम बढ़ सकता है। खास बात: कम प्रदूषण में भी असर यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल क्षेत्रों में प्रदूषण स्तर अपेक्षाकृत कम था। इसके बावजूद दिमागी कार्यक्षमता पर असर देखा गया। इससे संकेत मिलता है कि: केवल अत्यधिक प्रदूषण ही नहीं, बल्कि कम स्तर का लंबे समय का संपर्क भी जोखिम पैदा कर सकता है अन्य फैक्टरों का सीमित असर स्टडी में यह भी देखा गया कि: कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर और ग्रीन स्पेस (हरियाली) इनका इस संबंध पर कोई बड़ा असर नहीं दिखा। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए क्या संकेत? शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष इस ओर इशारा करते हैं कि: वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों या दिल तक सीमित समस्या नहीं है यह सीधे तौर पर ब्रेन हेल्थ को भी प्रभावित कर सकता है लंबे समय में यह डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है आगे की जरूरत वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि: लंबी अवधि के (longitudinal) अध्ययन जरूरी हैं यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण कम करने से क्या वास्तव में ब्रेन डिक्लाइन को रोका जा सकता है
सोने से पहले एक छोटा टुकड़ा बन सकता है हेल्दी आदत अगर आपको रात में मीठा खाने की आदत है, तो डार्क चॉकलेट आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकती है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, सोने से पहले थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने से शरीर को रिलैक्स महसूस हो सकता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व शरीर में मेलाटोनिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन को सपोर्ट करते हैं, जो बेहतर नींद और मानसिक शांति से जुड़े होते हैं। मेलाटोनिन और रिलैक्सेशन में कैसे करती है मदद? डार्क चॉकलेट में ट्रिप्टोफैन नामक तत्व पाया जाता है, जो शरीर में सेरोटोनिन और मेलाटोनिन के निर्माण में मदद करता है। मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो शरीर की स्लीप साइकिल को नियंत्रित करता है। वहीं सेरोटोनिन मूड को बेहतर बनाने और तनाव कम करने में सहायक माना जाता है। इसके अलावा डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम भी भरपूर मात्रा में होता है। यह मिनरल मांसपेशियों को रिलैक्स करने और तनाव कम करने में मदद करता है, जिससे शरीर को आराम महसूस होता है। ब्लड सर्कुलेशन और मूड पर भी असर विशेषज्ञों के मुताबिक, डार्क चॉकलेट में मौजूद फ्लेवोनॉयड्स ब्लड फ्लो को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इससे दिमाग तक ऑक्सीजन की सप्लाई बेहतर होती है और मानसिक शांति महसूस हो सकती है। यही कारण है कि कई लोग रात में थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने के बाद अधिक रिलैक्स महसूस करते हैं। क्या रात में चॉकलेट खाने से नींद खराब भी हो सकती है? हालांकि हर व्यक्ति पर इसका असर अलग हो सकता है। डार्क चॉकलेट में थोड़ी मात्रा में कैफीन भी मौजूद होती है। ऐसे में जो लोग कैफीन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उन्हें रात में इसे खाने से नींद आने में परेशानी हो सकती है या बेचैनी महसूस हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर आपको कॉफी या कैफीन वाली चीजों से जल्दी असर होता है, तो रात में बहुत ज्यादा डार्क चॉकलेट खाने से बचना चाहिए। वजन बढ़ने का डर कितना सही? पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित मात्रा में डार्क चॉकलेट खाना वजन बढ़ाने का बड़ा कारण नहीं बनता। करीब 10 ग्राम डार्क चॉकलेट में लगभग 60 कैलोरी होती है। अगर इसे संतुलित मात्रा में लिया जाए, तो यह लो-कैलोरी डाइट में भी शामिल की जा सकती है। डार्क या मिल्क चॉकलेट, कौन बेहतर? डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट आमतौर पर 65-70 प्रतिशत या उससे ज्यादा कोको वाली डार्क चॉकलेट को बेहतर मानते हैं, क्योंकि इसमें चीनी कम और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं। हालांकि इसमें कैफीन की मात्रा मिल्क चॉकलेट से थोड़ी अधिक होती है। अगर आपको कैफीन से दिक्कत नहीं होती, तो डार्क चॉकलेट बेहतर विकल्प मानी जाती है। वहीं कैफीन से संवेदनशील लोग कम मात्रा में मिल्क चॉकलेट चुन सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।