सप्ताह की शुरुआत अक्सर कई कर्मचारियों के लिए तनाव और लंबे टू-डू लिस्ट के साथ होती है। दो दिन की छुट्टी के बाद अचानक काम के मोड में लौटना कई लोगों को भारी लगता है। ऐसे में अब एक नया वर्कप्लेस ट्रेंड 'Bare Minimum Mondays' तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसका उद्देश्य सोमवार के तनाव को कम करते हुए पूरे सप्ताह की उत्पादकता को बेहतर बनाना है।
Bare Minimum Mondays का मतलब काम से बचना या आलस करना नहीं है। इसका उद्देश्य सोमवार को केवल सबसे जरूरी और उच्च प्राथमिकता वाले कार्य पूरे करना है, जबकि कम महत्वपूर्ण कामों, गैर-जरूरी बैठकों और अन्य गतिविधियों को सप्ताह के बाकी दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है।
इस तरीके से कर्मचारी बिना अधिक दबाव महसूस किए धीरे-धीरे पूरे सप्ताह की गति बना सकते हैं।
सोमवार की शुरुआत उन कार्यों से करें जिनकी समय-सीमा नजदीक हो या जिनका प्रभाव सबसे अधिक हो। बाकी कम जरूरी कार्य बाद में किए जा सकते हैं।
पूरे दिन को लगातार मीटिंग्स और भारी कामों से भरने के बजाय सीमित कार्य रखें। इससे मानसिक दबाव कम होता है और फोकस बेहतर रहता है।
केवल उन्हीं बैठकों में शामिल हों जो वास्तव में आवश्यक हों। इससे महत्वपूर्ण कार्यों पर अधिक समय दिया जा सकता है।
ऐसी टू-डू लिस्ट बनाएं जिसे कार्य समय के भीतर आसानी से पूरा किया जा सके। छोटे और पूरे होने वाले लक्ष्य आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।
लगातार काम करने की बजाय छोटे-छोटे ब्रेक लें। कुछ मिनट टहलना या स्ट्रेचिंग करना मानसिक थकान कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद कर सकता है।
यदि इस तरीके को सही ढंग से अपनाया जाए तो इसके कई फायदे हो सकते हैं।
Bare Minimum Mondays हर पेशे में लागू नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य सेवाओं, आपातकालीन सेवाओं, कस्टमर सपोर्ट, रिटेल और ऐसे क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए यह मॉडल व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि वहां तत्काल प्रतिक्रिया और तय समय पर काम करना जरूरी होता है।
हालांकि, जिन कर्मचारियों के पास अपने कार्यों की प्राथमिकता तय करने की स्वतंत्रता होती है, वे इस रणनीति का उपयोग करके सप्ताह की शुरुआत अधिक संतुलित और कम तनावपूर्ण बना सकते हैं।
Bare Minimum Mondays का उद्देश्य कम काम करना नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से काम की प्राथमिकता तय करना है। सोमवार को केवल आवश्यक कार्यों पर ध्यान देकर कर्मचारी मानसिक दबाव कम कर सकते हैं, बेहतर फोकस बनाए रख सकते हैं और पूरे सप्ताह अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
सप्ताह की शुरुआत अक्सर कई कर्मचारियों के लिए तनाव और लंबे टू-डू लिस्ट के साथ होती है। दो दिन की छुट्टी के बाद अचानक काम के मोड में लौटना कई लोगों को भारी लगता है। ऐसे में अब एक नया वर्कप्लेस ट्रेंड 'Bare Minimum Mondays' तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसका उद्देश्य सोमवार के तनाव को कम करते हुए पूरे सप्ताह की उत्पादकता को बेहतर बनाना है। क्या है Bare Minimum Mondays? Bare Minimum Mondays का मतलब काम से बचना या आलस करना नहीं है। इसका उद्देश्य सोमवार को केवल सबसे जरूरी और उच्च प्राथमिकता वाले कार्य पूरे करना है, जबकि कम महत्वपूर्ण कामों, गैर-जरूरी बैठकों और अन्य गतिविधियों को सप्ताह के बाकी दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है। इस तरीके से कर्मचारी बिना अधिक दबाव महसूस किए धीरे-धीरे पूरे सप्ताह की गति बना सकते हैं। कैसे अपनाएं Bare Minimum Mondays? 1. सबसे जरूरी काम पहले करें सोमवार की शुरुआत उन कार्यों से करें जिनकी समय-सीमा नजदीक हो या जिनका प्रभाव सबसे अधिक हो। बाकी कम जरूरी कार्य बाद में किए जा सकते हैं। 2. सोमवार का शेड्यूल हल्का रखें पूरे दिन को लगातार मीटिंग्स और भारी कामों से भरने के बजाय सीमित कार्य रखें। इससे मानसिक दबाव कम होता है और फोकस बेहतर रहता है। 3. गैर-जरूरी मीटिंग्स से बचें केवल उन्हीं बैठकों में शामिल हों जो वास्तव में आवश्यक हों। इससे महत्वपूर्ण कार्यों पर अधिक समय दिया जा सकता है। 4. वास्तविक लक्ष्य तय करें ऐसी टू-डू लिस्ट बनाएं जिसे कार्य समय के भीतर आसानी से पूरा किया जा सके। छोटे और पूरे होने वाले लक्ष्य आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। 5. बीच-बीच में ब्रेक लें लगातार काम करने की बजाय छोटे-छोटे ब्रेक लें। कुछ मिनट टहलना या स्ट्रेचिंग करना मानसिक थकान कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद कर सकता है। क्या हैं इसके फायदे? यदि इस तरीके को सही ढंग से अपनाया जाए तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। सोमवार की चिंता और तनाव कम हो सकता है। कार्यस्थल पर बर्नआउट का जोखिम घट सकता है। जरूरी कार्यों पर बेहतर फोकस बना रहता है। पूरे सप्ताह के लिए सकारात्मक कार्य गति (Momentum) बनती है। काम की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार हो सकता है। क्या यह तरीका सभी के लिए उपयुक्त है? Bare Minimum Mondays हर पेशे में लागू नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य सेवाओं, आपातकालीन सेवाओं, कस्टमर सपोर्ट, रिटेल और ऐसे क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए यह मॉडल व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि वहां तत्काल प्रतिक्रिया और तय समय पर काम करना जरूरी होता है। हालांकि, जिन कर्मचारियों के पास अपने कार्यों की प्राथमिकता तय करने की स्वतंत्रता होती है, वे इस रणनीति का उपयोग करके सप्ताह की शुरुआत अधिक संतुलित और कम तनावपूर्ण बना सकते हैं। निष्कर्ष Bare Minimum Mondays का उद्देश्य कम काम करना नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से काम की प्राथमिकता तय करना है। सोमवार को केवल आवश्यक कार्यों पर ध्यान देकर कर्मचारी मानसिक दबाव कम कर सकते हैं, बेहतर फोकस बनाए रख सकते हैं और पूरे सप्ताह अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।
AI निवेश बढ़ा, लागत कम करने के लिए Microsoft का बड़ा कदम दिग्गज टेक कंपनी Microsoft ने अपने वैश्विक कर्मचारियों की संख्या में कटौती करते हुए करीब 4,800 कर्मचारियों की छंटनी करने का फैसला किया है। यह कंपनी के कुल वैश्विक कार्यबल का लगभग 2.1% है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब Microsoft कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जुड़ी तकनीकों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर रही है तथा साथ ही परिचालन लागत को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी अपने विभिन्न विभागों में दक्षता बढ़ाने और संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के उद्देश्य से यह बदलाव कर रही है। AI पर अरबों डॉलर का दांव, लेकिन बढ़ रहा है वित्तीय दबाव पूरे टेक उद्योग में इस समय AI को लेकर निवेश की होड़ मची हुई है। Microsoft के अलावा Amazon और Meta Platforms जैसी कंपनियां भी इस वर्ष हजारों कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी हैं। उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2026 में बड़ी टेक कंपनियों का AI संबंधी निवेश 700 अरब डॉलर से अधिक पहुंच सकता है। ऐसे में कंपनियों पर यह दबाव भी बढ़ गया है कि वे इन भारी निवेशों से बेहतर वित्तीय परिणाम हासिल करें। शेयरों में गिरावट के बाद बढ़ी चिंता Microsoft के लिए वर्ष 2026 की पहली छमाही आसान नहीं रही। कंपनी के शेयरों में जनवरी से जून के बीच लगभग 23% की गिरावट दर्ज की गई, जो 2022 के बाद उसका सबसे कमजोर पहला छह महीने का प्रदर्शन माना जा रहा है। इससे पहले भी कंपनी अमेरिका में लगभग 9,000 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेपरेशन पैकेज (Voluntary Buyout) की पेशकश कर चुकी थी, जो उसके अमेरिकी कर्मचारियों का करीब 7% था। Microsoft हर वर्ष जून में अपना वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बाद नए वित्तीय वर्ष की योजना के तहत कर्मचारियों और खर्चों की समीक्षा भी करती है। Azure की मजबूत मांग, लेकिन डेटा सेंटर का बढ़ता खर्च AI सेवाओं की बढ़ती मांग का सबसे अधिक फायदा Microsoft के Azure क्लाउड प्लेटफॉर्म को मिला है। अप्रैल तक Azure, OpenAI के AI मॉडल्स का विशेष क्लाउड प्रदाता था, जिससे कंपनी को AI सेवाओं की बढ़ती मांग का लाभ मिला। हालांकि, AI इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर बनाने और उनका विस्तार करने में भारी पूंजी खर्च हो रही है। इससे कंपनी के नकदी प्रवाह (Cash Flow) पर दबाव बढ़ा है। Microsoft ने पहले ही 2026 के लिए लगभग 190 अरब डॉलर के खर्च का अनुमान जताया था, जो बाजार की उम्मीदों से कहीं अधिक माना गया। Gaming कारोबार भी चुनौतियों से जूझ रहा AI पर बढ़ते खर्च का असर Microsoft के गेमिंग कारोबार पर भी दिखाई दे रहा है। AI डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग के कारण मेमोरी चिप्स की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे हार्डवेयर निर्माण की लागत में इजाफा हुआ है। इसी कारण कंपनी को अपने Xbox कंसोल की कीमतें भी बढ़ानी पड़ीं, जबकि बाजार में इसकी मांग पहले से ही कमजोर बनी हुई है। हाल ही में Microsoft के गेमिंग डिवीजन की प्रमुख Asha Sharma ने कर्मचारियों को भेजे गए संदेश में कहा कि कंपनी के गेमिंग व्यवसाय को "रीसेट" की जरूरत है। उन्होंने बताया कि इस डिवीजन का लाभ मार्जिन घटकर केवल 3% रह गया है, जिसके चलते पुनर्गठन जरूरी हो गया है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में विलय और अधिग्रहण (M&A) जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। शर्मा के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कंपनी ने कंटेंट, प्लेटफॉर्म और हार्डवेयर सब्सिडी पर 20 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया, लेकिन इस दौरान वार्षिक राजस्व में लगभग 50 करोड़ डॉलर की गिरावट दर्ज की गई। उनका कहना है कि यह स्थिति लंबे समय तक जारी नहीं रह सकती।
प्रयागराज, एजेंसियां। नैनी एयरोस्पेस लिमिटेड (NAeL), जो Hindustan Aeronautics Limited (HAL) की सहायक कंपनी है, ने ऑपरेटर (Operator SS) और जूनियर असिस्टेंट के कुल 28 पदों पर भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए हैं। आवेदन प्रक्रिया 27 जून से शुरू हो चुकी है और इच्छुक उम्मीदवार 17 जुलाई 2026 तक आवेदन कर सकते हैं। किन पदों पर होगी भर्ती? भर्ती अभियान के तहत ऑपरेटर (इलेक्ट्रॉनिक्स मैकेनिक, फिटर और इलेक्ट्रिशियन) तथा जूनियर असिस्टेंट (HR, Finance, IT और Material Management) के पद भरे जाएंगे। सभी नियुक्तियां 4 वर्ष के फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट (FTE) आधार पर होंगी। योग्यता और आयु सीमा ऑपरेटर पदों के लिए अभ्यर्थी का 10वीं पास होने के साथ संबंधित ट्रेड में 2 वर्षीय नियमित ITI (NTC) होना अनिवार्य है। जूनियर असिस्टेंट पदों के लिए B.Com, B.Sc, BCA, BA, BBA या BSW जैसी संबंधित स्नातक डिग्री मांगी गई है। आवेदन के लिए अधिकतम आयु 28 वर्ष निर्धारित की गई है, जबकि आरक्षित वर्गों को नियमानुसार आयु में छूट मिलेगी। वेतन और चयन प्रक्रिया ऑपरेटर पदों के लिए लगभग ₹4.56 लाख वार्षिक CTC और जूनियर असिस्टेंट के लिए करीब ₹4.96 लाख वार्षिक CTC मिलेगा। उम्मीदवारों का चयन 23 अगस्त 2026 को होने वाली कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT) के आधार पर किया जाएगा। एडमिट कार्ड 31 जुलाई से डाउनलोड किए जा सकेंगे।