नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय रसोई में घी और मक्खन दोनों का लंबे समय से उपयोग होता आ रहा है, लेकिन स्वास्थ्य को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि दोनों में से कौन अधिक फायदेमंद है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, घी और मक्खन दोनों ही डेयरी उत्पाद हैं और इनमें आवश्यक वसा, विटामिन तथा ऊर्जा देने वाले पोषक तत्व मौजूद होते हैं। हालांकि, इनके सेवन की मात्रा और उपयोग का तरीका ही तय करता है कि यह शरीर के लिए कितना लाभकारी होगा। विशेषज्ञ बताते हैं कि मक्खन दूध की मलाई या क्रीम से तैयार किया जाता है, जबकि घी मक्खन को गर्म करके बनाया जाता है, जिससे उसमें मौजूद पानी और दूध के ठोस तत्व अलग हो जाते हैं। घी में विटामिन A, D, E और K के साथ ब्यूटिरिक एसिड पाया जाता है, जिसे आंतों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। वहीं, मक्खन में विटामिन A के साथ कुछ मात्रा में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। खाना पकाने के लिहाज से घी को बेहतर माना जाता है क्योंकि इसका स्मोक पॉइंट मक्खन की तुलना में अधिक होता है, जिससे यह तेज आंच पर भी स्थिर रहता है। दूसरी ओर, मक्खन का उपयोग ब्रेड, पराठे, बेकिंग और कम तापमान पर बनने वाले व्यंजनों में अधिक किया जाता है। हालांकि, दोनों में ही कैलोरी और संतृप्त वसा (सैचुरेटेड फैट) की मात्रा अधिक होती है। इसलिए वजन नियंत्रित करने वाले लोगों या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे व्यक्तियों को इनका सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार घी या मक्खन का सेवन करना ही सबसे बेहतर विकल्प है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। डिजिटल युग में मोबाइल फोन, लैपटॉप और इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इनका अत्यधिक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर भी डाल रहा है। लगातार स्क्रीन से जुड़े रहने, सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल और ऑनलाइन काम के दबाव के कारण लोगों में डिजिटल स्ट्रेस तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते इसके लक्षणों को पहचानकर डिजिटल आदतों में संतुलन लाना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन देखने से मानसिक थकान, आंखों में तनाव, सिरदर्द, नींद की समस्या और एकाग्रता में कमी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। वहीं, मोबाइल पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, ईमेल और सोशल मीडिया अलर्ट दिमाग को लगातार सक्रिय रखते हैं, जिससे तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। सोशल मीडिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी डिजिटल स्ट्रेस का एक बड़ा कारण माना जाता है। दूसरों की जीवनशैली और उपलब्धियों से लगातार तुलना करने की प्रवृत्ति आत्मविश्वास में कमी, चिंता और असंतोष जैसी भावनाओं को जन्म दे सकती है। इसके अलावा, वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन कार्य संस्कृति के कारण ऑफिस और निजी जीवन के बीच की दूरी कम हो गई है, जिससे लोग हर समय ऑनलाइन रहने का दबाव महसूस करते हैं। डिजिटल स्ट्रेस के सामान्य लक्षणों में बार-बार मोबाइल चेक करने की इच्छा, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, नींद प्रभावित होना, मानसिक थकान और काम में रुचि कम होना शामिल हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्क्रीन टाइम सीमित रखें, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करें, सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग करें और नियमित अंतराल पर डिजिटल ब्रेक लेकर मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए राजनीतिक चुनौतियां लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं। हाल ही में तीन राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद अब एक और सांसद के इस्तीफे की चर्चाओं ने सियासी हलचल तेज कर दी है। सूत्रों के अनुसार राज्यसभा सांसद रुक्मणी मलिक ने अपना इस्तीफा राज्यसभा के उपसभापति को ई-मेल के माध्यम से भेजा है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। राज्यसभा में संख्या बल घटने की आशंका सूत्रों का दावा है कि आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस के कुछ और राज्यसभा सांसद पार्टी से दूरी बना सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो उच्च सदन में पार्टी का संख्या बल और प्रभाव दोनों कमजोर हो सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार सामने आ रहे इस्तीफे केवल संख्यात्मक नुकसान नहीं हैं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और नेतृत्व संबंधी चुनौतियों का भी संकेत देते हैं। बताया जा रहा है कि अब तक करीब 20 सांसद अलग-अलग समय पर पार्टी छोड़ चुके हैं या अन्य दलों में शामिल हो चुके हैं। संगठन में भी बढ़ी चुनौती राज्यसभा के घटनाक्रम के साथ-साथ टीएमसी संगठन के भीतर भी संकट गहराता दिख रहा है। ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट समानांतर संगठन खड़ा करने में सक्रिय है। इस गुट ने पहले ही नई वर्किंग कमेटी का गठन कर खुद को "असली तृणमूल" बताया है और संबंधित दस्तावेज चुनाव आयोग को सौंपने का दावा किया है। अब राज्य और जिला स्तर पर नई संगठनात्मक इकाइयों के गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। नेतृत्व पर बढ़ता दबाव बताया जा रहा है कि कोलकाता में आयोजित दो दिवसीय बैठक में राज्य अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष और विभिन्न प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों के नामों पर मंथन किया जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सांसदों का पलायन जारी रहता है और समानांतर संगठन अपनी पकड़ मजबूत करता है, तो तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर संघर्ष आने वाले समय में और तेज हो सकता है। फिलहाल पार्टी की ओर से इन अटकलों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
शोध में मांसपेशियों की गुणवत्ता और हृदय स्वास्थ्य के बीच मिला मजबूत संबंध दिल की बीमारियां दुनिया भर में मौत के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। ऐसे में एक नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि सिर्फ स्वस्थ खानपान और कार्डियो एक्सरसाइज ही नहीं, बल्कि छाती और पीठ की मजबूत व स्वस्थ मांसपेशियां भी हार्ट अटैक के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि मांसपेशियों की गुणवत्ता किसी व्यक्ति की समग्र फिटनेस और लंबे समय तक हृदय स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। क्या कहता है नया अध्ययन? यह अध्ययन प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Radiology में प्रकाशित हुआ है। इसमें 1,722 वयस्कों को शामिल किया गया, जिनकी औसत आयु 57 वर्ष थी। सभी प्रतिभागियों का कोरोनरी कंप्यूटेड टोमोग्राफी एंजियोग्राफी (CCTA) स्कैन किया गया, जिससे हृदय की धमनियों की स्थिति का आकलन किया जाता है। शोधकर्ताओं ने इन लोगों के स्वास्थ्य पर लगभग 10 वर्षों तक नजर रखी। 31% तक कम हुआ हार्ट अटैक का जोखिम अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों की छाती और पीठ की मांसपेशियों की गुणवत्ता बेहतर थी, उनमें हार्ट अटैक का खतरा काफी कम पाया गया। मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार रहे— मांसपेशियों की गुणवत्ता में हर 10 अंकों की बढ़ोतरी पर हार्ट अटैक का जोखिम 31% तक कम हुआ। अगले 10 वर्षों में मृत्यु का जोखिम 39% तक कम पाया गया। उम्र, लिंग और धमनियों में कैल्शियम जमाव जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी यह संबंध बना रहा। मांसपेशियों का आकार नहीं, गुणवत्ता ज्यादा महत्वपूर्ण शोध की सबसे अहम बात यह रही कि मांसपेशियों का बड़ा आकार नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता अधिक मायने रखती है। स्वस्थ मांसपेशियों में वसा कम होती है और वे स्कैन में अधिक घनी दिखाई देती हैं। इसके विपरीत, केवल अधिक मांसपेशियां होने से समान लाभ नहीं मिला। विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी मांसपेशियां इस बात का संकेत हैं कि व्यक्ति नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियां करता है और उसकी जीवनशैली अपेक्षाकृत स्वस्थ है। AI ने आसान बनाया विश्लेषण इस अध्ययन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का भी उपयोग किया गया। AI सॉफ्टवेयर ने हार्ट स्कैन के दौरान छाती और पीठ की मांसपेशियों, वसा, हड्डियों और अन्य अंगों का कुछ ही सेकंड में विश्लेषण किया। जहां किसी रेडियोलॉजिस्ट को यह काम करने में कई घंटे लग सकते थे, वहीं AI ने प्रति स्कैन एक मिनट से भी कम समय में यह प्रक्रिया पूरी कर दी। शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक हृदय रोग के जोखिम की पहचान को और आसान बना सकती है। क्या मजबूत मांसपेशियां सीधे हार्ट अटैक से बचाती हैं? विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल संबंध (Association) दिखाता है। इससे यह साबित नहीं होता कि मजबूत मांसपेशियां सीधे हार्ट अटैक को रोकती हैं। संभव है कि जिन लोगों की मांसपेशियां बेहतर होती हैं, वे नियमित व्यायाम करते हों, उनका वजन नियंत्रित हो और उनकी जीवनशैली अधिक स्वस्थ हो। यही सभी कारक मिलकर हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं। मांसपेशियों की गुणवत्ता कैसे बढ़ाएं? विशेषज्ञों के अनुसार बेहतर मांसपेशियां बनाने के लिए घंटों जिम में समय बिताना जरूरी नहीं है। सप्ताह में 2 से 3 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करना भी पर्याप्त हो सकता है। इन एक्सरसाइज से फायदा मिल सकता है— पुश-अप्स चेस्ट प्रेस रो (Rows) प्लैंक रेजिस्टेंस बैंड एक्सरसाइज बॉडीवेट वर्कआउट इसके साथ ही रोजाना पैदल चलना, साइकिल चलाना या तैराकी जैसी एरोबिक गतिविधियां भी हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी जाती हैं। विशेषज्ञों की सलाह स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत और सक्रिय मांसपेशियां स्वस्थ जीवनशैली का संकेत हैं। इसलिए केवल वजन कम करने पर नहीं, बल्कि शरीर की ताकत और फिटनेस बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और स्वस्थ आदतें लंबे समय तक दिल को स्वस्थ रखने में मदद कर सकती हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 13 जुलाई को देश के सभी सरकारी बैंकों (पीएसबी) और आईडीबीआई बैंक के प्रमुखों के साथ एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक करेंगी। बैठक का मुख्य उद्देश्य विदेशी मुद्रा के प्रवाह को बढ़ाना, बैंकों द्वारा विदेशी मुद्रा जमा (एफसीएनआर-बी) जुटाने की प्रगति की समीक्षा करना और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा हाल में घोषित रियायती उपायों के प्रभाव का आकलन करना है। सरकार का लक्ष्य प्रवासी भारतीयों और विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश के लिए अधिक आकर्षित करना है। तीन प्रमुख मुद्दों पर रहेगा फोकस बैठक में विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (FCNR-B) खातों में जमा राशि बढ़ाने, सरकारी बैंकों द्वारा विदेशों से पूंजी जुटाने के लिए जारी किए जाने वाले विदेशी बॉन्ड तथा भारतीय कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) की स्थिति की समीक्षा की जाएगी। इन तीनों माध्यमों से देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा। आरबीआई की रियायतों की होगी समीक्षा पिछले महीने आरबीआई ने 30 सितंबर तक के लिए कई राहत उपाय लागू किए थे। इनमें 3 से 5 वर्ष की अवधि वाले नए एफसीएनआर (बी) जमा पर ब्याज दर की अधिकतम सीमा को अस्थायी रूप से हटाना शामिल है, जिससे बैंक विदेशी जमाकर्ताओं को अधिक आकर्षक ब्याज दर की पेशकश कर सकते हैं। इसके अलावा, विदेशी मुद्रा विनिमय जोखिम कम करने के लिए बैंकों और सरकारी कंपनियों को रियायती दर पर फॉरेक्स स्वैप सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। विदेशी निवेश में तेजी की उम्मीद बैंकिंग क्षेत्र के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, नई रियायतों के बाद 3 जुलाई तक एफसीएनआर (बी) जमा के माध्यम से करीब 3 से 4 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई जा चुकी है। बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि विशेष रूप से खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की भागीदारी बढ़ने से आने वाले महीनों में यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है। अनुमान है कि इन उपायों से भविष्य में 40 से 50 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सकता है, जिससे भारतीय रुपये को मजबूती मिलने के साथ-साथ देश की विदेशी मुद्रा स्थिति भी और सुदृढ़ होगी।
रोजाना कॉफी पीने वालों में गंभीर लिवर रोगों का खतरा कम पाया गया अगर आप रोजाना कॉफी पीते हैं, तो यह आदत सिर्फ आपको तरोताजा ही नहीं रखती, बल्कि आपके लिवर की सेहत के लिए भी फायदेमंद हो सकती है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में दावा किया गया है कि नियमित रूप से कॉफी का सेवन करने वाले लोगों में लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों का जोखिम कम देखा गया। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन नतीजों के आधार पर हर किसी को अचानक ज्यादा कॉफी पीना शुरू नहीं कर देना चाहिए। करीब साढ़े तीन लाख लोगों पर किया गया अध्ययन यह शोध मेडिकल जर्नल Clinical Gastroenterology and Hepatology में प्रकाशित हुआ है। इसमें ब्रिटेन के यूके बायोबैंक (UK Biobank) के लगभग 3.55 लाख वयस्कों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का 10 वर्षों से अधिक समय तक विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की कॉफी पीने की आदत, लिवर की स्कैन रिपोर्ट, रक्त जांच और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया। इसके बाद कॉफी के सेवन और लिवर स्वास्थ्य के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आए। 5 या उससे अधिक कप कॉफी पीने वालों को मिला सबसे ज्यादा लाभ अध्ययन के अनुसार, जो लोग प्रतिदिन 5 या उससे अधिक कप कॉफी पीते थे, उनमें लिवर संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा उल्लेखनीय रूप से कम पाया गया। शोध में सामने आए प्रमुख निष्कर्ष: लिवर सिरोसिस का खतरा 32% तक कम लिवर कैंसर का जोखिम 47% तक घटा लिवर संबंधी कारणों से मृत्यु का खतरा 42% कम हालांकि, रोजाना 1 से 2 कप कॉफी पीने वालों में भी कुछ हद तक सकारात्मक प्रभाव देखा गया। कैफीन नहीं, कॉफी के प्राकृतिक तत्व भी हैं असरदार शोध की एक दिलचस्प बात यह रही कि कैफीनयुक्त (Regular) और डिकैफ (Decaffeinated) दोनों तरह की कॉफी पीने वालों में लगभग समान लाभ देखने को मिले। इससे वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल कैफीन ही नहीं, बल्कि कॉफी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, पॉलीफेनॉल और अन्य प्राकृतिक यौगिक भी लिवर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कैसे पहुंचाती है कॉफी लिवर को फायदा? विशेषज्ञों के अनुसार कॉफी में मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर में सूजन कम करने, कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से बचाने और लिवर में अतिरिक्त वसा जमा होने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। यही कारण है कि लंबे समय में लिवर को होने वाले नुकसान का जोखिम कम हो सकता है। ज्यादा चीनी मिलाने से घट सकते हैं फायदे शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कॉफी में अधिक मात्रा में चीनी, आर्टिफिशियल स्वीटनर या अत्यधिक प्रोसेस्ड क्रीमर मिलाने से लिवर को मिलने वाले कुछ फायदे कम हो सकते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि कॉफी पीनी हो तो कम या बिना चीनी वाली कॉफी बेहतर विकल्प हो सकती है। क्या अब सभी लोगों को 5 कप कॉफी पीनी चाहिए? इस अध्ययन के बावजूद वैज्ञानिकों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है। यह शोध केवल कॉफी और बेहतर लिवर स्वास्थ्य के बीच संबंध दिखाता है, लेकिन यह साबित नहीं करता कि कॉफी सीधे लिवर रोगों को रोकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान, शराब का सेवन, वजन, खानपान और जीवनशैली जैसे कई अन्य कारक भी लिवर की सेहत को प्रभावित करते हैं। अधिक कॉफी पीने के हो सकते हैं नुकसान हर व्यक्ति का शरीर कैफीन को अलग-अलग तरीके से सहन करता है। जरूरत से ज्यादा कॉफी पीने पर कुछ लोगों में ये समस्याएं हो सकती हैं— बेचैनी और घबराहट नींद में बाधा दिल की धड़कन तेज होना पेट संबंधी परेशानियां गर्भवती महिलाओं और कुछ विशेष स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही कैफीन का सेवन करना चाहिए। क्या कहता है यह अध्ययन? यह शोध संकेत देता है कि नियमित और संतुलित मात्रा में कॉफी पीना लिवर की सेहत के लिए लाभकारी हो सकता है। हालांकि, केवल कॉफी के भरोसे स्वस्थ रहने की बजाय संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी उतना ही जरूरी है।
देश के कई राज्यों में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच लोगों को जलभराव, ट्रैफिक और मौसम से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बारिश गर्मी से राहत जरूर देती है, लेकिन इसके साथ संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। अधिक नमी के कारण बैक्टीरिया, वायरस और फंगस तेजी से पनपते हैं, जिससे सर्दी-जुकाम से लेकर त्वचा और पानी से फैलने वाली बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में यदि आप बारिश में भीग जाते हैं, तो कुछ जरूरी सावधानियां अपनाकर संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बारिश में भीगने के तुरंत बाद क्या करें? बारिश में भीगने के बाद शरीर का तापमान सामान्य बनाए रखना और खुद को साफ रखना सबसे जरूरी होता है। 1. सबसे पहले सुरक्षित जगह पर पहुंचें यदि आप बारिश में फंस गए हैं, तो जल्द से जल्द किसी सुरक्षित स्थान या छत के नीचे पहुंचें ताकि और अधिक भीगने से बच सकें। 2. गीले कपड़े तुरंत बदलें भीगे हुए कपड़े लंबे समय तक पहनने से शरीर ठंडा हो सकता है और संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए घर पहुंचते ही सूखे और साफ कपड़े पहनें। 3. शरीर और बाल अच्छी तरह सुखाएं साफ तौलिये से शरीर और बालों को पूरी तरह सुखाएं। लंबे समय तक नमी रहने से फंगल संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। 4. हल्के गर्म पानी से नहाएं गुनगुने पानी से स्नान करने से शरीर का तापमान सामान्य होता है। साथ ही बारिश के पानी, धूल, बैक्टीरिया और अन्य अशुद्धियां भी साफ हो जाती हैं। 5. गर्म पेय पदार्थ लें गुनगुना पानी, हर्बल चाय या गर्म सूप पीने से शरीर को गर्माहट मिलती है और आराम महसूस होता है। संक्रमण से बचने के लिए रखें इन बातों का ध्यान मानसून के दौरान केवल भीगने से ही नहीं, बल्कि गंदे पानी और बढ़ी हुई नमी से भी संक्रमण फैल सकता है। घर लौटते ही साबुन से अच्छी तरह हाथ धोएं। यदि बाढ़ या गंदे पानी से होकर आए हैं, तो त्वचा को एंटीसेप्टिक से साफ करें। पैरों को धोकर उंगलियों के बीच की जगह अच्छी तरह सुखाएं। बिना हाथ धोए आंख, नाक और मुंह को छूने से बचें। विटामिन C से भरपूर फल और खाद्य पदार्थों का सेवन करें। केवल उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ पानी पिएं। छाता, रेनकोट और जूतों को इस्तेमाल के बाद अच्छी तरह सुखाएं। जहां संभव हो, जलभराव वाले क्षेत्रों में चलने से बचें। मानसून के दौरान बाहर का खाना खाने की बजाय ताजा और घर का बना भोजन करें। किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? यदि बारिश में भीगने के बाद लगातार बुखार, तेज खांसी, गले में दर्द, शरीर दर्द, त्वचा पर दाने या पैरों में फंगल संक्रमण जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। मानसून में थोड़ी सावधानी है जरूरी बारिश का मौसम आनंद के साथ कई स्वास्थ्य चुनौतियां भी लेकर आता है। समय पर कपड़े बदलना, शरीर को गर्म रखना, साफ-सफाई का ध्यान रखना और संतुलित खानपान अपनाना संक्रमण से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि किसी प्रकार के गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर विकल्प है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हाल के सैन्य घटनाक्रम और दोनों देशों के तीखे बयानों के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंता गहरा गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। सैन्य गतिविधियों से बढ़ी क्षेत्रीय चिंता हाल के घटनाक्रम के बाद अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत किया है, जबकि ईरान ने भी अपनी सैन्य क्षमता और जवाबी कार्रवाई की तैयारी पर जोर दिया है। दोनों देशों के बीच बढ़ती तल्खी ने पूरे पश्चिम एशिया में तनाव का माहौल बना दिया है। तेल बाजार पर निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। निवेशक विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली तेल आपूर्ति पर नजर बनाए हुए हैं। भारत समेत कई देशों की बढ़ी चिंता भारत सहित कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर हैं। इसलिए क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर तेल आयात, परिवहन लागत और घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और कूटनीतिक प्रयास जारी हैं।
असम सरकार ने दावा किया है कि राज्य में कैंसर के मरीजों की सर्वाइवल रेट (जीवित रहने की दर) देश में सबसे अधिक है। सरकार के अनुसार, बड़े पैमाने पर कैंसर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और राज्यभर में इलाज की बेहतर व्यवस्था के कारण यह उपलब्धि हासिल हुई है। बजट सत्र के दौरान असम के स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने बताया कि अब तक करीब 47 लाख लोगों की कैंसर स्क्रीनिंग की जा चुकी है। इस अभियान के दौरान 900 से अधिक मरीजों में शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान हुई, जिससे समय पर इलाज संभव हो सका। 62% सर्वाइवल रेट का दावा असम सरकार का कहना है कि राज्य में कैंसर मरीजों की सर्वाइवल रेट 62 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो राष्ट्रीय औसत करीब 40 प्रतिशत से काफी अधिक बताई जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने से इलाज की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है और मरीजों के स्वस्थ होने की उम्मीद भी बेहतर होती है। 1.24 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य सरकार ने कैंसर स्क्रीनिंग अभियान को और तेज करने का फैसला किया है। स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार, राज्य में 1.24 करोड़ लोगों की जांच करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह लक्ष्य पूरा होता है, तो यह देश का सबसे बड़ा कैंसर स्क्रीनिंग अभियान माना जा सकता है। गुवाहाटी तक सीमित नहीं रहा इलाज पहले गंभीर कैंसर मरीजों को इलाज के लिए गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ या पूर्वोत्तर से बाहर बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था। अब राज्य सरकार ने कैंसर उपचार सेवाओं का विस्तार कई जिलों तक कर दिया है। असम कैंसर केयर फाउंडेशन, जिसे असम सरकार और टाटा ट्रस्ट्स ने मिलकर शुरू किया है, राज्य में विशेष कैंसर अस्पतालों और उपचार केंद्रों का नेटवर्क विकसित कर रहा है। कई जिलों में मिल रही इलाज की सुविधा राज्य में बारपेटा, डिब्रूगढ़, दीफू और सिलचर में कैंसर अस्पताल संचालित किए जा रहे हैं। वहीं गोलाघाट, जोरहाट, कोकराझार, लखीमपुर, मंगलदई, तेजपुर और तिनसुकिया में जांच और डे-केयर सेंटर भी स्थापित किए गए हैं। इससे मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करने की जरूरत कम हुई है। शुरुआती चरण में हो रही पहचान स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पहले अधिकांश मरीजों में कैंसर का पता बीमारी के अंतिम चरण में चलता था। लेकिन अब बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान के कारण कई मामलों की पहचान स्टेज-1 और स्टेज-2 में ही हो रही है। इससे इलाज जल्दी शुरू हो रहा है और मरीजों के स्वस्थ होने की संभावना भी बढ़ रही है। सस्ता इलाज उपलब्ध कराने का दावा स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने कहा कि कैंसर का इलाज आमतौर पर काफी महंगा होता है। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के साथ साझेदारी के बाद राज्य सरकार मरीजों को अपेक्षाकृत कम खर्च में इलाज उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। प्रोटॉन बीम थेरेपी की तैयारी असम सरकार ने यह भी जानकारी दी कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जल्द ही प्रोटॉन बीम थेरेपी मशीन शुरू करने की तैयारी चल रही है। यह आधुनिक रेडिएशन थेरेपी तकनीक मानी जाती है, जिसमें प्रोटॉन किरणों की मदद से कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाया जाता है। इसकी खासियत यह है कि आसपास के स्वस्थ ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है, जिससे इलाज अधिक सटीक और प्रभावी माना जाता है। कैंसर से लड़ाई में स्क्रीनिंग बनी सबसे बड़ा हथियार विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सबसे अहम भूमिका समय पर जांच और शुरुआती पहचान की होती है। असम सरकार का कहना है कि स्क्रीनिंग, इलाज, पेलिएटिव केयर, रिसर्च और मरीजों के पुनर्वास को एक साथ जोड़कर राज्य में कैंसर देखभाल की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। यदि यह मॉडल लगातार प्रभावी रहता है, तो अन्य राज्यों के लिए भी यह एक उदाहरण बन सकता है।
भारत में विटामिन D की कमी से जूझ रहे लोगों के लिए एक अहम खबर सामने आई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने देश के पहले प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 सप्लीमेंट को मंजूरी दे दी है। इसे Fermenta Biotech ने विकसित किया है और अब इसका उपयोग सप्लीमेंट्स, फोर्टिफाइड फूड और पेय पदार्थों में किया जा सकेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में बड़ी आबादी विटामिन D की कमी से प्रभावित है। ऐसे में यह नया विकल्प खासकर शाकाहारी और वीगन लोगों के लिए राहत लेकर आ सकता है। क्या है प्लांट-बेस्ड Vitamin D3? यह Vitamin D3 पौधों से प्राप्त फाइटोस्टेरॉल (Phytosterols) से तैयार किया जाता है। फाइटोस्टेरॉल ऐसे प्राकृतिक यौगिक हैं जो पौधों में पाए जाते हैं और इनसे Vitamin D3 बनाया जा सकता है। चूंकि यह पूरी तरह पौधों पर आधारित है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर विकल्प माना जा रहा है जो पशु-आधारित उत्पादों का सेवन नहीं करते। सामान्य Vitamin D3 से कैसे अलग है? बाजार में उपलब्ध अधिकांश Vitamin D3 सप्लीमेंट लैनोलिन (Lanolin) से बनाए जाते हैं। लैनोलिन भेड़ की ऊन से प्राप्त एक प्राकृतिक पदार्थ है, जिससे Vitamin D3 तैयार किया जाता है। इसके विपरीत, नया प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 किसी भी पशु स्रोत पर निर्भर नहीं है। यही वजह है कि इसे शाकाहारी, वीगन और जैन समुदाय के लोगों के लिए अधिक उपयुक्त माना जा रहा है। क्या असर में भी उतना ही प्रभावी है? विशेषज्ञों का कहना है कि प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 की रासायनिक संरचना और शरीर में अवशोषित होने की क्षमता (Bioavailability) पारंपरिक Vitamin D3 के समान है। यानी यह शरीर में Vitamin D के स्तर को बढ़ाने में उतना ही प्रभावी हो सकता है। हालांकि, इसका असर व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और शरीर की जरूरत के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। Vitamin D2 और Vitamin D3 में क्या अंतर है? Vitamin D के दो प्रमुख रूप होते हैं— Vitamin D2 (Ergocalciferol): आमतौर पर पौधों से प्राप्त होता है। Vitamin D3 (Cholecalciferol): पारंपरिक रूप से पशु स्रोतों से बनाया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, Vitamin D3 शरीर में Vitamin D का स्तर बढ़ाने में Vitamin D2 की तुलना में अधिक प्रभावी माना जाता है। यही कारण है कि डॉक्टर अक्सर Vitamin D3 सप्लीमेंट की सलाह देते हैं। किन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है? यह नया प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 विशेष रूप से इन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है— शाकाहारी और वीगन लोग जैन समुदाय के लोग जिनमें Vitamin D की कमी पाई गई हो ऐसे लोग जो पशु-आधारित सप्लीमेंट का इस्तेमाल नहीं करना चाहते क्या इसे खाने-पीने की चीजों में मिलाया जा सकेगा? इस नए Vitamin D3 को पाउडर और ऑयल दोनों रूपों में तैयार किया गया है। इसकी मदद से दूध, पेय पदार्थ, हेल्थ ड्रिंक, गमीज़ और अन्य फोर्टिफाइड खाद्य उत्पादों में Vitamin D मिलाया जा सकेगा। इससे लोगों तक Vitamin D पहुंचाना पहले की तुलना में अधिक आसान हो सकता है। Vitamin D की कमी के क्या हैं लक्षण? यदि शरीर में लंबे समय तक Vitamin D की कमी बनी रहे तो कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं— हड्डियों में दर्द मांसपेशियों की कमजोरी लगातार थकान बार-बार फ्रैक्चर होना बच्चों में विकास की धीमी गति रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना ऐसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से सलाह लेकर जांच करानी चाहिए। डॉक्टर की सलाह के बिना सप्लीमेंट न लें हालांकि प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 एक नया और बेहतर विकल्प माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी प्रकार का Vitamin D सप्लीमेंट शुरू करने से पहले जांच कराना और डॉक्टर से उचित मात्रा (Dose) व अवधि के बारे में सलाह लेना जरूरी है। नई मंजूरी के बाद उम्मीद की जा रही है कि यह विकल्प भारत में Vitamin D की कमी से जूझ रहे लाखों लोगों, खासकर शाकाहारी समुदाय, के लिए एक सुलभ और प्रभावी समाधान साबित हो सकता है।
अगर परिवार में किसी को डायबिटीज है, तो अक्सर माता-पिता को यह चिंता रहती है कि कहीं उनके बच्चों को भी भविष्य में यह बीमारी न हो जाए। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि पारिवारिक इतिहास जोखिम जरूर बढ़ाता है, लेकिन यह तय नहीं करता कि बच्चे को डायबिटीज होगी ही। सही खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। एंडोक्राइनोलॉजिस्ट्स के अनुसार, बचपन में अपनाई गई अच्छी आदतें लंबे समय तक मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। क्या केवल जेनेटिक्स ही जिम्मेदार हैं? विशेषज्ञों के मुताबिक, टाइप-2 डायबिटीज केवल आनुवंशिक कारणों से नहीं होती। यह जेनेटिक प्रवृत्ति और जीवनशैली दोनों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। यदि माता-पिता या भाई-बहन को डायबिटीज है, तो बच्चे में इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन यह जोखिम बीमारी में बदलेगा या नहीं, यह काफी हद तक उसकी रोजमर्रा की आदतों पर निर्भर करता है। बचपन से डालें स्वस्थ खानपान की आदत डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों को सख्त डाइट पर रखने की बजाय पूरे परिवार में हेल्दी खाने की आदत विकसित करनी चाहिए। दैनिक भोजन में शामिल करें: ताजे फल हरी सब्जियां साबुत अनाज दालें और फलियां कम वसा वाले प्रोटीन हेल्दी फैट्स वहीं, इन चीजों का सेवन सीमित रखें: मीठे पेय पदार्थ पैकेज्ड स्नैक्स प्रोसेस्ड फूड फास्ट फूड विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे वही आदतें सीखते हैं जो वे घर में रोज देखते हैं। रोजाना शारीरिक गतिविधि है जरूरी बच्चों को जिम भेजने की जरूरत नहीं है। उन्हें ऐसी गतिविधियों के लिए प्रेरित करें जिनमें उन्हें आनंद आता हो। बेहतर विकल्प हो सकते हैं: साइकिल चलाना तैराकी क्रिकेट या फुटबॉल खेलना दौड़ना डांस करना स्केटिंग आउटडोर गेम्स डॉक्टरों की सलाह है कि बच्चों को हर दिन कम से कम 60 मिनट मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। पर्याप्त नींद भी उतनी ही महत्वपूर्ण अक्सर लोग खानपान और एक्सरसाइज पर ध्यान देते हैं, लेकिन अच्छी नींद को नजरअंदाज कर देते हैं। कम नींद लेने से शरीर के उन हार्मोन्स पर असर पड़ता है जो नियंत्रित करते हैं: भूख भूख बढ़ाने वाले हार्मोन ब्लड शुगर वजन इसलिए बच्चों के लिए नियमित सोने और जागने का समय तय करना जरूरी है। साथ ही रात में मोबाइल और अन्य स्क्रीन का उपयोग कम करना चाहिए। स्क्रीन टाइम रखें सीमित लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या टैबलेट का इस्तेमाल बच्चों की शारीरिक गतिविधि कम कर देता है, जिससे: वजन बढ़ सकता है मोटापे का खतरा बढ़ता है नींद प्रभावित होती है टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है इसलिए स्क्रीन टाइम और एक्टिव प्ले के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इन शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें यदि परिवार में डायबिटीज का इतिहास है और बच्चे में नीचे दिए गए लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें। बार-बार प्यास लगना बार-बार पेशाब आना बिना कारण वजन घटना लगातार थकान महसूस होना गर्दन या बगल में काले, मखमली धब्बे (Acanthosis Nigricans) तेजी से वजन बढ़ना या मोटापा जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ब्लड शुगर टेस्ट, बीएमआई और कमर की माप जैसी जांच की सलाह भी दे सकते हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो माता-पिता करते हैं विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे केवल सलाह नहीं, बल्कि अपने माता-पिता की आदतों की नकल करते हैं। यदि माता-पिता: संतुलित भोजन खाते हैं नियमित व्यायाम करते हैं समय-समय पर हेल्थ चेकअप करवाते हैं मीठे पेय पदार्थों से बचते हैं पर्याप्त नींद लेते हैं तो बच्चों में भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की संभावना अधिक रहती है। परिवार में डायबिटीज है तो घबराएं नहीं, सतर्क रहें डॉक्टरों का मानना है कि पारिवारिक इतिहास को डर की तरह नहीं, बल्कि समय रहते बचाव करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जेनेटिक्स बदले नहीं जा सकते, लेकिन सही जीवनशैली अपनाकर भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यदि बच्चे में डायबिटीज से जुड़े लक्षण दिखाई दें या परिवार में बीमारी का मजबूत इतिहास हो, तो चिकित्सक से व्यक्तिगत सलाह अवश्य लें।
US-Iran Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि अंतरिम युद्धविराम (सीजफायर) अब समाप्त हो चुका है। लगातार दो दिनों से दोनों देशों के बीच हमले जारी हैं। इस बीच, पहले मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश कर चुका पाकिस्तान अब दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील कर रहा है। पाकिस्तान ने जताई चिंता पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुआ सैन्य संघर्ष किसी के हित में नहीं है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में सभी पक्षों से संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की, जिनसे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचे। पाकिस्तान ने कहा कि स्थायी समाधान केवल संवाद, कूटनीति और बातचीत से ही संभव है। मध्यस्थता की पेशकश पाकिस्तान ने यह भी कहा कि यदि दोनों पक्ष सहमत हों तो इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पहले हुए समझौतों और प्रतिबद्धताओं का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि क्षेत्र में शांति बनी रहे। ट्रंप ने कहा- सीजफायर खत्म अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के बीच हुआ अंतरिम समझौता अब समाप्त हो चुका है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कूटनीतिक बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। ट्रंप के बयान के बाद वैश्विक बाजारों में भी असर देखने को मिला और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी दर्ज की गई। दोनों ओर से जारी हैं हमले अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने बहरीन, कुवैत और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन घटनाओं के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है तथा व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका जताई जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा तनाव का सबसे बड़ा केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल निर्यात होता है। यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति तथा समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। ईरान का सख्त रुख ईरान के वरिष्ठ नेताओं ने भी अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो उसका जवाब और कड़े तरीके से दिया जाएगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय अधिकारों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा। बढ़ी वैश्विक चिंता अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुए सैन्य टकराव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील की है, ताकि पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध की स्थिति से बचा जा सके।
आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। काम, पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल करना आम बात है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्क्रीन के सामने बिताया गया समय ही नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है, यह भी मानसिक स्वास्थ्य और याददाश्त पर बड़ा असर डालता है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के अनुसार, स्क्रीन टाइम को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है—Passive Screen Time और Active Screen Time। इनमें से पैसिव स्क्रीन टाइम दिमाग के लिए अधिक नुकसानदायक माना जाता है। क्या होता है Passive Screen Time? Passive Screen Time वह होता है, जिसमें व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य के लगातार स्क्रीन पर समय बिताता रहता है। इसमें सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करना, ऑटो-प्ले वीडियो देखते रहना या बैकग्राउंड में वीडियो चलाकर अन्य काम करना शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग पर बहुत कम मानसिक दबाव डालता है, लेकिन धीरे-धीरे यह याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कैसे प्रभावित होती है याददाश्त और फोकस? विशेषज्ञों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति औसतन रोजाना 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताता है, जिसमें बड़ा हिस्सा पैसिव स्क्रीन टाइम का होता है। लगातार बिना सोचे-समझे कंटेंट देखने की आदत से कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे— ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई वर्किंग मेमोरी कमजोर होना मानसिक थकान बढ़ना किसी काम पर लंबे समय तक टिके रहने में परेशानी छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन विशेषज्ञ बताते हैं कि छोटे-छोटे वीडियो और लगातार मिलने वाली तुरंत संतुष्टि (Instant Gratification) दिमाग को इसी तरह के कंटेंट का आदी बना सकती है, जिससे ध्यान अवधि (Attention Span) धीरे-धीरे कम होने लगती है। Active Screen Time क्यों है बेहतर? Active Screen Time में व्यक्ति स्क्रीन का इस्तेमाल किसी उद्देश्य के साथ करता है। जैसे— नई स्किल सीखना ऑनलाइन कोर्स करना किताब पढ़ना नई भाषा सीखना पजल या ब्रेन गेम खेलना डिजिटल जर्नलिंग ऑनलाइन फिटनेस क्लास लेना क्रिएटिव कंटेंट बनाना ऐसी गतिविधियां दिमाग को सक्रिय रखती हैं और सोचने, समझने तथा समस्या सुलझाने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। क्या स्क्रीन टाइम से बढ़ सकता है डिमेंशिया का खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार, केवल स्क्रीन टाइम को डिमेंशिया का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि लंबे समय तक दिमाग को पर्याप्त मानसिक चुनौती न मिलने पर याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, सीखने और दिमाग को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां "कॉग्निटिव रिजर्व" को मजबूत बनाने में मदद करती हैं, जिससे उम्र बढ़ने के साथ मानसिक कार्यक्षमता को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। कैसे करें स्क्रीन का सही इस्तेमाल? अगर आप स्क्रीन का उपयोग करते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें— बिना उद्देश्य के लगातार स्क्रॉल करने से बचें। सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए समय सीमा तय करें। हर 30–45 मिनट बाद स्क्रीन से ब्रेक लें। स्क्रीन का उपयोग सीखने और नई स्किल विकसित करने के लिए करें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें। निष्कर्ष स्क्रीन अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप उसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं। यदि स्क्रीन का उपयोग केवल मनोरंजन और लगातार स्क्रॉलिंग तक सीमित है, तो यह आपकी याददाश्त, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। वहीं, सीखने और रचनात्मक कार्यों के लिए किया गया स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकता है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। यदि आपको याददाश्त, ध्यान या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी लगातार समस्या हो रही है, तो किसी योग्य डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।
दर्द के इलाज में बदल सकती है सोच दुनियाभर में लंबे समय से गंभीर और लगातार रहने वाले दर्द के इलाज के लिए ओपिओइड दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि, इन दवाओं से जुड़ी लत और दुष्प्रभावों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच वैज्ञानिक अब सुरक्षित विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। इसी कड़ी में सामने आए एक नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दर्द से राहत दिलाने में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। UCSF अध्ययन में क्या सामने आया? अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को (UCSF) के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किए गए एक व्यापक अध्ययन में पाया गया कि कई गैर-ओपिओइड दवाएं सामान्य दर्द संबंधी समस्याओं के उपचार में उपयोगी साबित हो सकती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं ने पीठ दर्द, नसों के दर्द और अन्य पुरानी दर्द संबंधी स्थितियों में राहत देने के सकारात्मक संकेत दिखाए हैं। इससे उन मरीजों को फायदा मिल सकता है जो ओपिओइड दवाओं के जोखिम से बचना चाहते हैं। ओपिओइड्स की जगह क्यों खोजे जा रहे विकल्प? ओपिओइड दवाएं दर्द कम करने में प्रभावी मानी जाती हैं, लेकिन इनके लंबे समय तक इस्तेमाल से लत लगने, ओवरडोज और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। कई देशों में ओपिओइड संकट सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी वजह से चिकित्सा विशेषज्ञ ऐसी दवाओं की तलाश कर रहे हैं जो दर्द में राहत तो दें, लेकिन उनमें लत लगने का खतरा कम हो। किन दवाओं को बताया गया उपयोगी? अध्ययन में विभिन्न प्रकार के दर्द के लिए अलग-अलग गैर-ओपिओइड दवाओं का उल्लेख किया गया है। कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को पीठ दर्द के उपचार में उपयोगी पाया गया। मसल रिलैक्सेंट्स को भी कमर दर्द से राहत के विकल्प के रूप में देखा गया। कुछ मामलों में पेट दर्द और सिरदर्द के लिए एंटीसाइकोटिक दवाओं के उपयोग की संभावना पर चर्चा की गई। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि हर मरीज के लिए एक ही दवा उपयुक्त नहीं होती और उपचार का निर्णय डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही लिया जाना चाहिए। विशेषज्ञों की क्या है राय? विशेषज्ञों का मानना है कि दर्द केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और न्यूरोलॉजिकल कारकों से भी जुड़ा हो सकता है। ऐसे में कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दर्द को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका मार्गों पर प्रभाव डालकर राहत प्रदान कर सकती हैं। हालांकि, इन दवाओं का उपयोग केवल चिकित्सकीय सलाह के तहत ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इनके भी अपने दुष्प्रभाव और सीमाएं हो सकती हैं। भविष्य में बदल सकता है दर्द उपचार का तरीका अध्ययन से संकेत मिलता है कि दर्द प्रबंधन के क्षेत्र में गैर-ओपिओइड उपचारों की भूमिका आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। यदि आगे के शोध इन निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं, तो लाखों मरीजों को दर्द से राहत पाने के लिए अधिक सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। नोट: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी दवा का सेवन या बदलाव करने से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।
दिग्गज फिल्म निर्माता और पूर्व सेंसर बोर्ड प्रमुख Pahlaj Nihalani के निधन के बाद लिवर सिरोसिस एक बार फिर चर्चा में है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि यह बीमारी केवल अत्यधिक शराब पीने से होती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार लिवर सिरोसिस का सबसे बड़ा कारण कई मामलों में हेपेटाइटिस C वायरस (HCV) संक्रमण भी होता है। क्या है लिवर सिरोसिस? लिवर सिरोसिस एक गंभीर बीमारी है, जिसमें लिवर की स्वस्थ कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होकर उनकी जगह स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त ऊतक (Scar Tissue) ले लेते हैं। इससे लिवर की कार्यक्षमता कम होने लगती है और समय के साथ लिवर फेलियर, आंतरिक रक्तस्राव और लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। शराब कैसे पहुंचाती है नुकसान? विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन लिवर को तीन चरणों में नुकसान पहुंचाता है: सबसे पहले लिवर में फैट जमा होने लगता है (फैटी लिवर)। इसके बाद सूजन और कोशिकाओं की क्षति बढ़ती है। अंत में लिवर का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर सिरोसिस में बदल जाता है। इसी वजह से शराब को लिवर सिरोसिस का प्रमुख कारण माना जाता है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। हेपेटाइटिस C क्यों है ज्यादा खतरनाक? हेपेटाइटिस C एक ब्लड-बोर्न वायरस है, जो संक्रमित रक्त के संपर्क से फैलता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में अधिकांश मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोग वर्षों तक इस संक्रमण के साथ रहते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कि उनका लिवर लगातार क्षतिग्रस्त हो रहा है। अगर समय पर इलाज न हो, तो यह संक्रमण लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर तक का कारण बन सकता है। टूथब्रश से कैसे फैल सकता है संक्रमण? हेपेटाइटिस C संक्रमित व्यक्ति के खून के जरिए फैलता है। यदि किसी संक्रमित व्यक्ति के मसूड़ों से खून टूथब्रश पर लग जाए और वही टूथब्रश किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल किया जाए, जिसके मुंह में कट, छाला या मसूड़ों से खून निकल रहा हो, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। इसी कारण डॉक्टर निम्नलिखित चीजें किसी के साथ साझा न करने की सलाह देते हैं: टूथब्रश रेजर नेल कटर टैटू या पियर्सिंग उपकरण इस्तेमाल की हुई सुई किन बातों का रखें ध्यान? कभी भी अपना टूथब्रश या रेजर किसी के साथ शेयर न करें। टैटू या पियर्सिंग हमेशा प्रमाणित और स्टेरिलाइज्ड उपकरणों से ही करवाएं। रक्त चढ़ाने या मेडिकल प्रक्रियाओं के दौरान सुरक्षा मानकों की पुष्टि करें। लिवर से जुड़ी समस्याओं के लक्षण दिखने पर तुरंत जांच कराएं। हेपेटाइटिस संक्रमण की आशंका होने पर समय रहते टेस्ट करवाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस C का आज प्रभावी इलाज उपलब्ध है। समय पर पहचान और उपचार से लिवर को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।
गर्मियों के मौसम में पेट से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ जाती हैं। पेट दर्द, उल्टी, दस्त, कमजोरी और डिहाइड्रेशन जैसी शिकायतें इस मौसम में आम हो जाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण फूड पॉइजनिंग है, जो दूषित भोजन और पानी के सेवन से होती है। गर्म मौसम बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। यही वजह है कि गर्मियों में भोजन को सुरक्षित तरीके से स्टोर करना और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी हो जाता है। गर्मियों में क्यों बढ़ जाते हैं फूड पॉइजनिंग के मामले? विशेषज्ञों के अनुसार जब भोजन लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखा रहता है, तो उसमें बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं। साल्मोनेला (Salmonella), ई.कोलाई (E. coli), नोरोवायरस और हेपेटाइटिस-ए जैसे संक्रमण पैदा करने वाले जीव भोजन और पानी को दूषित कर सकते हैं। ऐसा भोजन खाने के बाद व्यक्ति को उल्टी, दस्त, पेट में मरोड़, बुखार और कमजोरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। फूड पॉइजनिंग के प्रमुख कारण दूषित भोजन खराब या संक्रमित भोजन फूड पॉइजनिंग का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। भोजन में मौजूद बैक्टीरिया पेट में पहुंचकर संक्रमण पैदा कर सकते हैं। दूषित पानी गंदा या संक्रमित पानी भी कई प्रकार के बैक्टीरिया और वायरस शरीर में पहुंचाता है, जिससे पेट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। गलत तरीके से भोजन स्टोर करना अगर पका हुआ खाना लंबे समय तक कमरे के तापमान पर रखा जाए या सही तरीके से रेफ्रिजरेट न किया जाए, तो उसमें बैक्टीरिया तेजी से विकसित हो सकते हैं। कच्चे दूध का सेवन बिना उबाला गया दूध कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया का स्रोत हो सकता है, जो फूड पॉइजनिंग का कारण बनते हैं। फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी उपाय फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोएं खाने से पहले सभी फलों और सब्जियों को साफ पानी से अच्छी तरह धोना जरूरी है। इससे उन पर मौजूद धूल, गंदगी और बैक्टीरिया हट जाते हैं। खाना बनाने से पहले हाथ साफ करें भोजन तैयार करने से पहले कम से कम 20 से 30 सेकंड तक साबुन से हाथ धोना चाहिए। इससे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता है। खाने को ज्यादा समय तक स्टोर न करें हर खाद्य पदार्थ की एक निश्चित शेल्फ लाइफ होती है। लंबे समय तक रखा हुआ भोजन खराब हो सकता है और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। पाश्चराइज्ड या उबला हुआ दूध ही पिएं कच्चे दूध के बजाय उबले हुए या पाश्चराइज्ड दूध का सेवन करना सुरक्षित माना जाता है। बाहर के खुले भोजन से बचें खुले में रखे खाद्य पदार्थों में धूल, प्रदूषण और बैक्टीरिया आसानी से पहुंच सकते हैं। इसलिए सड़क किनारे या खुले भोजन का सेवन करने से बचना चाहिए। बच्चों और बुजुर्गों को रखें खास सुरक्षित विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग फूड पॉइजनिंग से अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए उन्हें हमेशा ताजा, स्वच्छ और सही तरीके से तैयार किया गया भोजन ही देना चाहिए। गर्मियों में थोड़ी सी सावधानी और स्वच्छता का पालन करके फूड पॉइजनिंग जैसी समस्या से आसानी से बचा जा सकता है।
National Health Service से जुड़े एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि ऑनलाइन सिंगिंग और ब्रीदिंग प्रोग्राम “ENO Breathe” लंबे समय से Long COVID से जूझ रहे मरीजों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। रिसर्च के मुताबिक इस कार्यक्रम से सांस फूलने की समस्या, एंग्जायटी और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है ENO Breathe Programme? ENO Breathe एक 6 हफ्तों का ऑनलाइन breathing और wellbeing programme है, जिसमें singing techniques के जरिए लोगों को सांस लेने के बेहतर तरीके सिखाए जाते हैं। यह प्रोग्राम खासतौर पर उन लोगों के लिए तैयार किया गया, जिन्हें COVID-19 के बाद लंबे समय तक सांस लेने में दिक्कत और थकान जैसी समस्याएं बनी रहीं। यह अध्ययन ब्रिटेन के 51 Long COVID Clinics से जुड़े 1,413 मरीजों पर किया गया। इन मरीजों की औसत उम्र 49 साल थी और करीब 80 प्रतिशत प्रतिभागी महिलाएं थीं। अधिकतर लोग लगभग 415 दिनों से Long COVID के लक्षणों से जूझ रहे थे। सांस फूलने और Anxiety में दिखा सुधार रिसर्च में पाया गया कि ENO Breathe प्रोग्राम पूरा करने के बाद मरीजों में सांस फूलने की समस्या में काफी कमी आई। Dyspnoea-12 स्कोर में औसतन 4.29 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। सीढ़ियां चढ़ने, चलने और दौड़ने जैसी गतिविधियों के दौरान भी मरीजों ने पहले के मुकाबले बेहतर सांस लेने की क्षमता महसूस की। साथ ही Anxiety और मानसिक तनाव में भी कमी देखने को मिली। हालांकि, आराम की स्थिति में सांस लेने की समस्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं पाया गया। सभी उम्र और वर्ग के लोगों को मिला फायदा शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रोग्राम का असर उम्र, जेंडर, नस्ल या पहले से मौजूद अस्थमा जैसी बीमारियों के आधार पर अलग-अलग नहीं था। यानी लगभग सभी प्रतिभागियों को समान रूप से फायदा मिला। अध्ययन के दौरान कोई गंभीर साइड इफेक्ट भी सामने नहीं आया, जिससे इसे सुरक्षित और आसानी से अपनाए जाने वाला विकल्प माना जा रहा है। Long COVID मरीजों के लिए नई उम्मीद विशेषज्ञों का मानना है कि ENO Breathe जैसे ऑनलाइन प्रोग्राम Long COVID से जूझ रहे लोगों के लिए कम लागत और आसानी से उपलब्ध होने वाला प्रभावी समाधान बन सकते हैं। भविष्य में इसे chronic breathlessness यानी लंबे समय तक सांस लेने में परेशानी वाली अन्य बीमारियों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
Dupilumab पर हुई एक नई स्टडी में सामने आया है कि यह दवा Prurigo Nodularis (PN) से पीड़ित मरीजों को पहले से कहीं अधिक व्यापक लाभ दे सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भले ही कुछ मरीज क्लीनिकल ट्रायल के सबसे सख्त ट्रीटमेंट लक्ष्य तक नहीं पहुंचे, फिर भी उनमें खुजली, त्वचा के घावों और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है Prurigo Nodularis? Prurigo Nodularis एक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली त्वचा संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर पर बेहद खुजली वाले गांठदार घाव (nodules) बन जाते हैं। यह बीमारी मरीजों की: नींद मानसिक स्वास्थ्य दैनिक जीवन सामाजिक गतिविधियों पर गहरा असर डाल सकती है। दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स का विश्लेषण यह नई स्टडी LIBERTY-PN PRIME और PRIME2 नामक दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स के डेटा पर आधारित थी। पहले के परिणामों में पाया गया था कि 24 सप्ताह के इलाज के बाद: Dupilumab लेने वाले 35.3% मरीजों में खुजली और त्वचा दोनों में बड़ा सुधार हुआ जबकि placebo समूह में यह आंकड़ा केवल 8.9% था लेकिन वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि जो मरीज “optimal response” तक नहीं पहुंचे, क्या उन्हें भी फायदा मिला? लक्ष्य पूरा न होने पर भी मरीजों को मिला फायदा नई स्टडी में उन मरीजों का विश्लेषण किया गया जो 24 सप्ताह बाद भी ट्रायल के सबसे सख्त लक्ष्य तक नहीं पहुंचे थे। इसके बावजूद Dupilumab लेने वाले कई मरीजों में महत्वपूर्ण सुधार देखे गए: 61% से अधिक मरीजों की जीवन गुणवत्ता में बड़ा सुधार 55.8% मरीजों ने अपनी बीमारी को “हल्का” या “न के बराबर” बताया आधे से ज्यादा मरीजों में 75% तक त्वचा के घाव भर गए इन सभी परिणामों की तुलना placebo समूह से की गई और अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण पाया गया। सिर्फ “पूर्ण इलाज” ही सफलता नहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी इलाज की सफलता को केवल कठोर ट्रायल एंडपॉइंट्स से नहीं मापना चाहिए। कई मरीजों को: खुजली से राहत त्वचा में सुधार बेहतर नींद रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी जैसे फायदे मिले, भले ही वे “पूर्ण या लगभग पूर्ण” सुधार की श्रेणी में नहीं आए। लंबी अवधि की रणनीति पर जोर विशेषज्ञों ने कहा कि यह अध्ययन PN के इलाज में “Treat-to-Target” यानी लंबे समय तक लक्ष्य आधारित उपचार रणनीति की जरूरत को मजबूत करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, आंशिक सुधार वाले मरीजों में भी Dupilumab का इलाज जारी रखने से लंबे समय में और बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
Psilocybin यानी मैजिक मशरूम में पाया जाने वाला साइकेडेलिक कंपाउंड एक बार की हाई डोज लेने के बाद इंसानी दिमाग पर गहरा असर डाल सकता है। एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि सिर्फ 25 mg की एक डोज दिमाग की कार्यप्रणाली और संरचना में ऐसे बदलाव ला सकती है, जिन्हें एक घंटे से लेकर एक महीने तक देखा जा सकता है। यह स्टडी 2026 में 28 स्वस्थ लोगों पर की गई, जिन्होंने पहले कभी साइकेडेलिक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया था। रिसर्च में वैज्ञानिकों ने EEG और fMRI तकनीक की मदद से दिमाग में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया। पहले दी गई प्लेसीबो डोज, फिर 25 mg की हाई डोज रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों को सबसे पहले 1 mg की बहुत छोटी डोज दी गई, जिसे प्लेसीबो जैसा माना गया। इसके एक महीने बाद उन्हें 25 mg की हाई डोज दी गई, जो एक गहरा साइकेडेलिक अनुभव पैदा करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। सिर्फ एक घंटे में दिखने लगे बदलाव रिसर्च के मुताबिक, डोज लेने के एक घंटे के भीतर EEG स्कैन में “ब्रेन एंट्रॉपी” में तेजी देखी गई। इसका मतलब है कि दिमाग सामान्य से ज्यादा विविध तरीके से जानकारी प्रोसेस करने लगा और मानसिक अवस्थाओं की संभावनाएं बढ़ गईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति दिमाग को ज्यादा खुला और लचीला बना सकती है। दिमाग की संरचना में भी दिखे बदलाव रिसर्च में इस्तेमाल की गई Diffusion Tensor Imaging तकनीक से पता चला कि एक महीने बाद प्रतिभागियों के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और सबकॉर्टिकल हिस्सों में व्हाइट मैटर फाइबर्स पतले हुए। हालांकि शोधकर्ताओं ने कहा कि स्वस्थ लोगों में लंबे समय तक रहने वाले फंक्शनल बदलाव उतने मजबूत नहीं दिखे, जितने मानसिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों में देखे जाते हैं। मानसिक स्वास्थ्य और सोचने की क्षमता में सुधार स्टडी में यह भी सामने आया कि एक महीने बाद प्रतिभागियों में– Cognitive Flexibility (सोचने की क्षमता में लचीलापन) Psychological Insight (आत्म-समझ) Wellbeing (मानसिक संतुलन और खुशी) इनमें सुधार देखा गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि साइकेडेलिक अनुभव के दौरान मिलने वाली गहरी मानसिक समझ, लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य में सुधार का कारण बन सकती है। प्रतिभागियों ने बताया “जीवन का सबसे अलग अनुभव” 25 mg डोज लेने वाले लगभग सभी प्रतिभागियों ने इसे अपने जीवन का “सबसे असामान्य चेतन अनुभव” बताया। सिर्फ एक प्रतिभागी ने इसे अपने जीवन के “टॉप 5 सबसे अलग अनुभवों” में शामिल किया। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रिसर्च साइकेडेलिक थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के पदार्थों का इस्तेमाल केवल मेडिकल रिसर्च और विशेषज्ञ निगरानी में ही होना चाहिए। मैजिक मशरूम कई देशों में नियंत्रित या प्रतिबंधित पदार्थों की श्रेणी में आते हैं और इनके अनियंत्रित उपयोग से मानसिक और शारीरिक जोखिम भी हो सकते हैं।
किडनी रोगों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रिसर्च सामने आई है, जिसमें IgA Nephropathy के मरीजों में बीमारी की प्रगति का अनुमान लगाने के लिए नए तरीके की पुष्टि हुई है। अध्ययन के अनुसार, eGFR का “स्लोप” यानी समय के साथ इसमें गिरावट की गति, मरीज के भविष्य के किडनी जोखिम को बेहतर तरीके से दर्शा सकता है। क्या था अध्ययन का उद्देश्य जापान के एक बड़े कोहोर्ट अध्ययन में 937 वयस्क मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें IgA Nephropathy की पुष्टि बायोप्सी के जरिए हुई थी। करीब 6 साल तक मरीजों को फॉलो किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि eGFR में समय के साथ होने वाले बदलाव (slope) किडनी के परिणामों को कैसे प्रभावित करते हैं। eGFR में गिरावट से बढ़ता खतरा रिसर्च में पाया गया कि जिन मरीजों में eGFR तेजी से गिरता है, उनमें किडनी खराब होने का जोखिम काफी ज्यादा होता है। 8.3% मरीजों में गंभीर स्थिति (≥40% eGFR गिरावट या किडनी रिप्लेसमेंट की जरूरत) देखी गई हर 1 स्टैंडर्ड डिविएशन की गिरावट पर जोखिम लगभग 1.82 गुना बढ़ गया यह संबंध अन्य मेडिकल फैक्टर्स को ध्यान में रखने के बाद भी मजबूत बना रहा। क्यों अहम है eGFR स्लोप अब तक डॉक्टर आमतौर पर एक समय के eGFR स्तर को देखकर बीमारी का आकलन करते थे। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि समय के साथ eGFR का ट्रेंड यानी स्लोप, बीमारी की असली गति और जोखिम को बेहतर तरीके से दिखाता है। इलाज और रिसर्च में बड़ा बदलाव इस खोज से भविष्य में दो बड़े फायदे हो सकते हैं: मरीजों की जल्दी पहचान और सही समय पर इलाज नई दवाओं के ट्रायल में तेजी, क्योंकि लंबे समय तक इंतजार किए बिना प्रभाव का आकलन संभव होगा क्या है इसका मतलब यह रिसर्च इस बात को मजबूत करती है कि IgA Nephropathy जैसे धीमी गति से बढ़ने वाले किडनी रोगों में नियमित मॉनिटरिंग और डेटा आधारित विश्लेषण बेहद जरूरी है। eGFR स्लोप को अपनाने से डॉक्टर मरीजों के लिए अधिक सटीक और व्यक्तिगत उपचार योजना बना सकेंगे।
हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह सामने आया है कि लाइफस्टाइल फैक्टर्स का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे पुरुषों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इस रिसर्च में पाया गया कि रोजमर्रा की आदतें—जैसे व्यायाम, धूम्रपान और बॉडी वेट—सीधे तौर पर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। एक्सरसाइज से बेहतर हुआ दिमाग और मूड अध्ययन के अनुसार, जो मरीज नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में शामिल रहे, उनकी कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (सोचने और समझने की क्षमता) और भावनात्मक स्थिति बेहतर पाई गई। शोध में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण (p<0.05) पाया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि एक्सरसाइज न केवल शरीर बल्कि दिमाग को भी मजबूत बनाती है। स्मोकिंग और ज्यादा वजन बना खतरा इसके विपरीत, धूम्रपान करने वाले मरीजों में कॉग्निटिव स्कोर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही कमजोर पाए गए। इसी तरह, जिन लोगों का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) ज्यादा था, उनमें भी सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक स्थिरता कम देखी गई। यह संकेत देता है कि खराब लाइफस्टाइल आदतें मानसिक गिरावट का कारण बन सकती हैं। हेल्दी लाइफस्टाइल से मिल सकता है फायदा रिसर्च में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों की जीवनशैली संतुलित और स्वस्थ थी, उनके मानसिक और भावनात्मक स्कोर बेहतर थे। यह पैटर्न सभी परीक्षणों में लगातार देखने को मिला, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लाइफस्टाइल में बदलाव कर मरीज अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। इलाज में बदलाव की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में मानसिक समस्याएं अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इलाज के दौरान लाइफस्टाइल सुधार—जैसे नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण—को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों से सीधे कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं होता, लेकिन इनके बीच मजबूत संबंध जरूर है। आगे की रिसर्च जरूरी अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में और विस्तृत शोध किए जाने चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि किस तरह के लाइफस्टाइल बदलाव से मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा सुधार संभव है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।