दिग्गज फिल्म निर्माता और पूर्व सेंसर बोर्ड प्रमुख Pahlaj Nihalani के निधन के बाद लिवर सिरोसिस एक बार फिर चर्चा में है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि यह बीमारी केवल अत्यधिक शराब पीने से होती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार लिवर सिरोसिस का सबसे बड़ा कारण कई मामलों में हेपेटाइटिस C वायरस (HCV) संक्रमण भी होता है। क्या है लिवर सिरोसिस? लिवर सिरोसिस एक गंभीर बीमारी है, जिसमें लिवर की स्वस्थ कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होकर उनकी जगह स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त ऊतक (Scar Tissue) ले लेते हैं। इससे लिवर की कार्यक्षमता कम होने लगती है और समय के साथ लिवर फेलियर, आंतरिक रक्तस्राव और लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। शराब कैसे पहुंचाती है नुकसान? विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन लिवर को तीन चरणों में नुकसान पहुंचाता है: सबसे पहले लिवर में फैट जमा होने लगता है (फैटी लिवर)। इसके बाद सूजन और कोशिकाओं की क्षति बढ़ती है। अंत में लिवर का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर सिरोसिस में बदल जाता है। इसी वजह से शराब को लिवर सिरोसिस का प्रमुख कारण माना जाता है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। हेपेटाइटिस C क्यों है ज्यादा खतरनाक? हेपेटाइटिस C एक ब्लड-बोर्न वायरस है, जो संक्रमित रक्त के संपर्क से फैलता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में अधिकांश मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोग वर्षों तक इस संक्रमण के साथ रहते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कि उनका लिवर लगातार क्षतिग्रस्त हो रहा है। अगर समय पर इलाज न हो, तो यह संक्रमण लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर तक का कारण बन सकता है। टूथब्रश से कैसे फैल सकता है संक्रमण? हेपेटाइटिस C संक्रमित व्यक्ति के खून के जरिए फैलता है। यदि किसी संक्रमित व्यक्ति के मसूड़ों से खून टूथब्रश पर लग जाए और वही टूथब्रश किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल किया जाए, जिसके मुंह में कट, छाला या मसूड़ों से खून निकल रहा हो, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। इसी कारण डॉक्टर निम्नलिखित चीजें किसी के साथ साझा न करने की सलाह देते हैं: टूथब्रश रेजर नेल कटर टैटू या पियर्सिंग उपकरण इस्तेमाल की हुई सुई किन बातों का रखें ध्यान? कभी भी अपना टूथब्रश या रेजर किसी के साथ शेयर न करें। टैटू या पियर्सिंग हमेशा प्रमाणित और स्टेरिलाइज्ड उपकरणों से ही करवाएं। रक्त चढ़ाने या मेडिकल प्रक्रियाओं के दौरान सुरक्षा मानकों की पुष्टि करें। लिवर से जुड़ी समस्याओं के लक्षण दिखने पर तुरंत जांच कराएं। हेपेटाइटिस संक्रमण की आशंका होने पर समय रहते टेस्ट करवाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस C का आज प्रभावी इलाज उपलब्ध है। समय पर पहचान और उपचार से लिवर को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।
गर्मियों के मौसम में पेट से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ जाती हैं। पेट दर्द, उल्टी, दस्त, कमजोरी और डिहाइड्रेशन जैसी शिकायतें इस मौसम में आम हो जाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण फूड पॉइजनिंग है, जो दूषित भोजन और पानी के सेवन से होती है। गर्म मौसम बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। यही वजह है कि गर्मियों में भोजन को सुरक्षित तरीके से स्टोर करना और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी हो जाता है। गर्मियों में क्यों बढ़ जाते हैं फूड पॉइजनिंग के मामले? विशेषज्ञों के अनुसार जब भोजन लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखा रहता है, तो उसमें बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं। साल्मोनेला (Salmonella), ई.कोलाई (E. coli), नोरोवायरस और हेपेटाइटिस-ए जैसे संक्रमण पैदा करने वाले जीव भोजन और पानी को दूषित कर सकते हैं। ऐसा भोजन खाने के बाद व्यक्ति को उल्टी, दस्त, पेट में मरोड़, बुखार और कमजोरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। फूड पॉइजनिंग के प्रमुख कारण दूषित भोजन खराब या संक्रमित भोजन फूड पॉइजनिंग का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। भोजन में मौजूद बैक्टीरिया पेट में पहुंचकर संक्रमण पैदा कर सकते हैं। दूषित पानी गंदा या संक्रमित पानी भी कई प्रकार के बैक्टीरिया और वायरस शरीर में पहुंचाता है, जिससे पेट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। गलत तरीके से भोजन स्टोर करना अगर पका हुआ खाना लंबे समय तक कमरे के तापमान पर रखा जाए या सही तरीके से रेफ्रिजरेट न किया जाए, तो उसमें बैक्टीरिया तेजी से विकसित हो सकते हैं। कच्चे दूध का सेवन बिना उबाला गया दूध कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया का स्रोत हो सकता है, जो फूड पॉइजनिंग का कारण बनते हैं। फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी उपाय फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोएं खाने से पहले सभी फलों और सब्जियों को साफ पानी से अच्छी तरह धोना जरूरी है। इससे उन पर मौजूद धूल, गंदगी और बैक्टीरिया हट जाते हैं। खाना बनाने से पहले हाथ साफ करें भोजन तैयार करने से पहले कम से कम 20 से 30 सेकंड तक साबुन से हाथ धोना चाहिए। इससे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता है। खाने को ज्यादा समय तक स्टोर न करें हर खाद्य पदार्थ की एक निश्चित शेल्फ लाइफ होती है। लंबे समय तक रखा हुआ भोजन खराब हो सकता है और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। पाश्चराइज्ड या उबला हुआ दूध ही पिएं कच्चे दूध के बजाय उबले हुए या पाश्चराइज्ड दूध का सेवन करना सुरक्षित माना जाता है। बाहर के खुले भोजन से बचें खुले में रखे खाद्य पदार्थों में धूल, प्रदूषण और बैक्टीरिया आसानी से पहुंच सकते हैं। इसलिए सड़क किनारे या खुले भोजन का सेवन करने से बचना चाहिए। बच्चों और बुजुर्गों को रखें खास सुरक्षित विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग फूड पॉइजनिंग से अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए उन्हें हमेशा ताजा, स्वच्छ और सही तरीके से तैयार किया गया भोजन ही देना चाहिए। गर्मियों में थोड़ी सी सावधानी और स्वच्छता का पालन करके फूड पॉइजनिंग जैसी समस्या से आसानी से बचा जा सकता है।
National Health Service से जुड़े एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि ऑनलाइन सिंगिंग और ब्रीदिंग प्रोग्राम “ENO Breathe” लंबे समय से Long COVID से जूझ रहे मरीजों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। रिसर्च के मुताबिक इस कार्यक्रम से सांस फूलने की समस्या, एंग्जायटी और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है ENO Breathe Programme? ENO Breathe एक 6 हफ्तों का ऑनलाइन breathing और wellbeing programme है, जिसमें singing techniques के जरिए लोगों को सांस लेने के बेहतर तरीके सिखाए जाते हैं। यह प्रोग्राम खासतौर पर उन लोगों के लिए तैयार किया गया, जिन्हें COVID-19 के बाद लंबे समय तक सांस लेने में दिक्कत और थकान जैसी समस्याएं बनी रहीं। यह अध्ययन ब्रिटेन के 51 Long COVID Clinics से जुड़े 1,413 मरीजों पर किया गया। इन मरीजों की औसत उम्र 49 साल थी और करीब 80 प्रतिशत प्रतिभागी महिलाएं थीं। अधिकतर लोग लगभग 415 दिनों से Long COVID के लक्षणों से जूझ रहे थे। सांस फूलने और Anxiety में दिखा सुधार रिसर्च में पाया गया कि ENO Breathe प्रोग्राम पूरा करने के बाद मरीजों में सांस फूलने की समस्या में काफी कमी आई। Dyspnoea-12 स्कोर में औसतन 4.29 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। सीढ़ियां चढ़ने, चलने और दौड़ने जैसी गतिविधियों के दौरान भी मरीजों ने पहले के मुकाबले बेहतर सांस लेने की क्षमता महसूस की। साथ ही Anxiety और मानसिक तनाव में भी कमी देखने को मिली। हालांकि, आराम की स्थिति में सांस लेने की समस्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं पाया गया। सभी उम्र और वर्ग के लोगों को मिला फायदा शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रोग्राम का असर उम्र, जेंडर, नस्ल या पहले से मौजूद अस्थमा जैसी बीमारियों के आधार पर अलग-अलग नहीं था। यानी लगभग सभी प्रतिभागियों को समान रूप से फायदा मिला। अध्ययन के दौरान कोई गंभीर साइड इफेक्ट भी सामने नहीं आया, जिससे इसे सुरक्षित और आसानी से अपनाए जाने वाला विकल्प माना जा रहा है। Long COVID मरीजों के लिए नई उम्मीद विशेषज्ञों का मानना है कि ENO Breathe जैसे ऑनलाइन प्रोग्राम Long COVID से जूझ रहे लोगों के लिए कम लागत और आसानी से उपलब्ध होने वाला प्रभावी समाधान बन सकते हैं। भविष्य में इसे chronic breathlessness यानी लंबे समय तक सांस लेने में परेशानी वाली अन्य बीमारियों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
Dupilumab पर हुई एक नई स्टडी में सामने आया है कि यह दवा Prurigo Nodularis (PN) से पीड़ित मरीजों को पहले से कहीं अधिक व्यापक लाभ दे सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भले ही कुछ मरीज क्लीनिकल ट्रायल के सबसे सख्त ट्रीटमेंट लक्ष्य तक नहीं पहुंचे, फिर भी उनमें खुजली, त्वचा के घावों और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है Prurigo Nodularis? Prurigo Nodularis एक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली त्वचा संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर पर बेहद खुजली वाले गांठदार घाव (nodules) बन जाते हैं। यह बीमारी मरीजों की: नींद मानसिक स्वास्थ्य दैनिक जीवन सामाजिक गतिविधियों पर गहरा असर डाल सकती है। दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स का विश्लेषण यह नई स्टडी LIBERTY-PN PRIME और PRIME2 नामक दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स के डेटा पर आधारित थी। पहले के परिणामों में पाया गया था कि 24 सप्ताह के इलाज के बाद: Dupilumab लेने वाले 35.3% मरीजों में खुजली और त्वचा दोनों में बड़ा सुधार हुआ जबकि placebo समूह में यह आंकड़ा केवल 8.9% था लेकिन वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि जो मरीज “optimal response” तक नहीं पहुंचे, क्या उन्हें भी फायदा मिला? लक्ष्य पूरा न होने पर भी मरीजों को मिला फायदा नई स्टडी में उन मरीजों का विश्लेषण किया गया जो 24 सप्ताह बाद भी ट्रायल के सबसे सख्त लक्ष्य तक नहीं पहुंचे थे। इसके बावजूद Dupilumab लेने वाले कई मरीजों में महत्वपूर्ण सुधार देखे गए: 61% से अधिक मरीजों की जीवन गुणवत्ता में बड़ा सुधार 55.8% मरीजों ने अपनी बीमारी को “हल्का” या “न के बराबर” बताया आधे से ज्यादा मरीजों में 75% तक त्वचा के घाव भर गए इन सभी परिणामों की तुलना placebo समूह से की गई और अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण पाया गया। सिर्फ “पूर्ण इलाज” ही सफलता नहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी इलाज की सफलता को केवल कठोर ट्रायल एंडपॉइंट्स से नहीं मापना चाहिए। कई मरीजों को: खुजली से राहत त्वचा में सुधार बेहतर नींद रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी जैसे फायदे मिले, भले ही वे “पूर्ण या लगभग पूर्ण” सुधार की श्रेणी में नहीं आए। लंबी अवधि की रणनीति पर जोर विशेषज्ञों ने कहा कि यह अध्ययन PN के इलाज में “Treat-to-Target” यानी लंबे समय तक लक्ष्य आधारित उपचार रणनीति की जरूरत को मजबूत करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, आंशिक सुधार वाले मरीजों में भी Dupilumab का इलाज जारी रखने से लंबे समय में और बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
Psilocybin यानी मैजिक मशरूम में पाया जाने वाला साइकेडेलिक कंपाउंड एक बार की हाई डोज लेने के बाद इंसानी दिमाग पर गहरा असर डाल सकता है। एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि सिर्फ 25 mg की एक डोज दिमाग की कार्यप्रणाली और संरचना में ऐसे बदलाव ला सकती है, जिन्हें एक घंटे से लेकर एक महीने तक देखा जा सकता है। यह स्टडी 2026 में 28 स्वस्थ लोगों पर की गई, जिन्होंने पहले कभी साइकेडेलिक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया था। रिसर्च में वैज्ञानिकों ने EEG और fMRI तकनीक की मदद से दिमाग में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया। पहले दी गई प्लेसीबो डोज, फिर 25 mg की हाई डोज रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों को सबसे पहले 1 mg की बहुत छोटी डोज दी गई, जिसे प्लेसीबो जैसा माना गया। इसके एक महीने बाद उन्हें 25 mg की हाई डोज दी गई, जो एक गहरा साइकेडेलिक अनुभव पैदा करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। सिर्फ एक घंटे में दिखने लगे बदलाव रिसर्च के मुताबिक, डोज लेने के एक घंटे के भीतर EEG स्कैन में “ब्रेन एंट्रॉपी” में तेजी देखी गई। इसका मतलब है कि दिमाग सामान्य से ज्यादा विविध तरीके से जानकारी प्रोसेस करने लगा और मानसिक अवस्थाओं की संभावनाएं बढ़ गईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति दिमाग को ज्यादा खुला और लचीला बना सकती है। दिमाग की संरचना में भी दिखे बदलाव रिसर्च में इस्तेमाल की गई Diffusion Tensor Imaging तकनीक से पता चला कि एक महीने बाद प्रतिभागियों के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और सबकॉर्टिकल हिस्सों में व्हाइट मैटर फाइबर्स पतले हुए। हालांकि शोधकर्ताओं ने कहा कि स्वस्थ लोगों में लंबे समय तक रहने वाले फंक्शनल बदलाव उतने मजबूत नहीं दिखे, जितने मानसिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों में देखे जाते हैं। मानसिक स्वास्थ्य और सोचने की क्षमता में सुधार स्टडी में यह भी सामने आया कि एक महीने बाद प्रतिभागियों में– Cognitive Flexibility (सोचने की क्षमता में लचीलापन) Psychological Insight (आत्म-समझ) Wellbeing (मानसिक संतुलन और खुशी) इनमें सुधार देखा गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि साइकेडेलिक अनुभव के दौरान मिलने वाली गहरी मानसिक समझ, लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य में सुधार का कारण बन सकती है। प्रतिभागियों ने बताया “जीवन का सबसे अलग अनुभव” 25 mg डोज लेने वाले लगभग सभी प्रतिभागियों ने इसे अपने जीवन का “सबसे असामान्य चेतन अनुभव” बताया। सिर्फ एक प्रतिभागी ने इसे अपने जीवन के “टॉप 5 सबसे अलग अनुभवों” में शामिल किया। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रिसर्च साइकेडेलिक थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के पदार्थों का इस्तेमाल केवल मेडिकल रिसर्च और विशेषज्ञ निगरानी में ही होना चाहिए। मैजिक मशरूम कई देशों में नियंत्रित या प्रतिबंधित पदार्थों की श्रेणी में आते हैं और इनके अनियंत्रित उपयोग से मानसिक और शारीरिक जोखिम भी हो सकते हैं।
किडनी रोगों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रिसर्च सामने आई है, जिसमें IgA Nephropathy के मरीजों में बीमारी की प्रगति का अनुमान लगाने के लिए नए तरीके की पुष्टि हुई है। अध्ययन के अनुसार, eGFR का “स्लोप” यानी समय के साथ इसमें गिरावट की गति, मरीज के भविष्य के किडनी जोखिम को बेहतर तरीके से दर्शा सकता है। क्या था अध्ययन का उद्देश्य जापान के एक बड़े कोहोर्ट अध्ययन में 937 वयस्क मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें IgA Nephropathy की पुष्टि बायोप्सी के जरिए हुई थी। करीब 6 साल तक मरीजों को फॉलो किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि eGFR में समय के साथ होने वाले बदलाव (slope) किडनी के परिणामों को कैसे प्रभावित करते हैं। eGFR में गिरावट से बढ़ता खतरा रिसर्च में पाया गया कि जिन मरीजों में eGFR तेजी से गिरता है, उनमें किडनी खराब होने का जोखिम काफी ज्यादा होता है। 8.3% मरीजों में गंभीर स्थिति (≥40% eGFR गिरावट या किडनी रिप्लेसमेंट की जरूरत) देखी गई हर 1 स्टैंडर्ड डिविएशन की गिरावट पर जोखिम लगभग 1.82 गुना बढ़ गया यह संबंध अन्य मेडिकल फैक्टर्स को ध्यान में रखने के बाद भी मजबूत बना रहा। क्यों अहम है eGFR स्लोप अब तक डॉक्टर आमतौर पर एक समय के eGFR स्तर को देखकर बीमारी का आकलन करते थे। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि समय के साथ eGFR का ट्रेंड यानी स्लोप, बीमारी की असली गति और जोखिम को बेहतर तरीके से दिखाता है। इलाज और रिसर्च में बड़ा बदलाव इस खोज से भविष्य में दो बड़े फायदे हो सकते हैं: मरीजों की जल्दी पहचान और सही समय पर इलाज नई दवाओं के ट्रायल में तेजी, क्योंकि लंबे समय तक इंतजार किए बिना प्रभाव का आकलन संभव होगा क्या है इसका मतलब यह रिसर्च इस बात को मजबूत करती है कि IgA Nephropathy जैसे धीमी गति से बढ़ने वाले किडनी रोगों में नियमित मॉनिटरिंग और डेटा आधारित विश्लेषण बेहद जरूरी है। eGFR स्लोप को अपनाने से डॉक्टर मरीजों के लिए अधिक सटीक और व्यक्तिगत उपचार योजना बना सकेंगे।
हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह सामने आया है कि लाइफस्टाइल फैक्टर्स का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे पुरुषों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इस रिसर्च में पाया गया कि रोजमर्रा की आदतें—जैसे व्यायाम, धूम्रपान और बॉडी वेट—सीधे तौर पर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। एक्सरसाइज से बेहतर हुआ दिमाग और मूड अध्ययन के अनुसार, जो मरीज नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में शामिल रहे, उनकी कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (सोचने और समझने की क्षमता) और भावनात्मक स्थिति बेहतर पाई गई। शोध में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण (p<0.05) पाया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि एक्सरसाइज न केवल शरीर बल्कि दिमाग को भी मजबूत बनाती है। स्मोकिंग और ज्यादा वजन बना खतरा इसके विपरीत, धूम्रपान करने वाले मरीजों में कॉग्निटिव स्कोर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही कमजोर पाए गए। इसी तरह, जिन लोगों का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) ज्यादा था, उनमें भी सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक स्थिरता कम देखी गई। यह संकेत देता है कि खराब लाइफस्टाइल आदतें मानसिक गिरावट का कारण बन सकती हैं। हेल्दी लाइफस्टाइल से मिल सकता है फायदा रिसर्च में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों की जीवनशैली संतुलित और स्वस्थ थी, उनके मानसिक और भावनात्मक स्कोर बेहतर थे। यह पैटर्न सभी परीक्षणों में लगातार देखने को मिला, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लाइफस्टाइल में बदलाव कर मरीज अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। इलाज में बदलाव की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में मानसिक समस्याएं अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इलाज के दौरान लाइफस्टाइल सुधार—जैसे नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण—को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों से सीधे कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं होता, लेकिन इनके बीच मजबूत संबंध जरूर है। आगे की रिसर्च जरूरी अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में और विस्तृत शोध किए जाने चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि किस तरह के लाइफस्टाइल बदलाव से मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा सुधार संभव है।
कैंसर इलाज के दौरान समान और सम्मानजनक देखभाल की जरूरत को रेखांकित करते हुए एक नई रिसर्च में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, ट्रांसजेंडर, जेंडर-नॉनकनफॉर्मिंग (GNC) और नॉन-बाइनरी (NB) मरीजों को स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ता है। भेदभाव और खराब स्वास्थ्य के बीच मजबूत संबंध रिसर्च में कुल 1,476 कैंसर सर्वाइवर्स को शामिल किया गया, जिनमें 246 ट्रांसजेंडर, GNC और NB व्यक्ति थे। आंकड़ों के मुताबिक: 63.8% ट्रांसजेंडर, GNC और NB मरीजों ने हेल्थकेयर में भेदभाव का अनुभव किया जबकि 48.5% सिसजेंडर महिलाओं और 29.8% सिसजेंडर पुरुषों ने ऐसा अनुभव किया इतना ही नहीं, इन मरीजों में खराब स्वास्थ्य की शिकायत करने की संभावना तीन गुना से अधिक पाई गई। मरीजों ने यह भी बताया कि उन्हें अक्सर नजरअंदाज किया गया, कम सम्मान मिला और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी कमजोर रही। कैंसर देखभाल में असमानताएं क्यों चिंता का विषय हैं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज लंबा और जटिल होता है। ऐसे में मरीज का अनुभव, डॉक्टर का व्यवहार और समय पर सही इलाज मिलना बेहद जरूरी होता है। लेकिन जब किसी समूह को बार-बार भेदभाव का सामना करना पड़े, तो उनका इलाज और रिकवरी दोनों प्रभावित हो सकते हैं। डॉक्टरों की तैयारी में कमी रिपोर्ट के अनुसार, National Institutes of Health द्वारा फंड किए गए प्रोजेक्ट्स में से सिर्फ 0.8% ही जेंडर और सेक्सुअल माइनॉरिटी हेल्थ पर केंद्रित हैं। वहीं, एक सर्वे में सामने आया कि अमेरिका में केवल 5 में से 1 ऑन्कोलॉजिस्ट ही ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों का इलाज करने में आत्मविश्वास महसूस करते हैं, हालांकि अधिकांश डॉक्टर इस क्षेत्र में प्रशिक्षण लेना चाहते हैं। यूरोप और UK में भी समान स्थिति यूरोप में भी LGBTQ+ समुदाय के कैंसर मरीजों को इलाज में देरी, स्क्रीनिंग की कमी और भेदभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह British Medical Association ने भी ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों के लिए बेहतर और समान स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया है। स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस में भी अंतर रिपोर्ट के अनुसार: LGBTQ+ समुदाय में मैमोग्राफी और सर्वाइकल स्क्रीनिंग की दर सामान्य आबादी से कम है इससे कैंसर का समय पर पता नहीं चल पाता और इलाज में देरी होती है आगे का रास्ता: सिस्टम स्तर पर बदलाव जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ भेदभाव खत्म करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे हेल्थकेयर सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। इसमें शामिल हैं: डॉक्टरों की बेहतर ट्रेनिंग समावेशी (inclusive) स्क्रीनिंग नीतियां सामाजिक स्तर पर जागरूकता और समर्थन हालांकि यह अध्ययन स्वयं-रिपोर्टेड डेटा पर आधारित है और इससे कारण-परिणाम का सीधा निष्कर्ष निकालना सीमित हो सकता है, फिर भी यह स्वास्थ्य सेवाओं में गहरी असमानताओं की ओर इशारा करता है।
गैस्ट्रिक कैंसर के इलाज और पूर्वानुमान (प्रोग्नोसिस) को लेकर एक नई रिसर्च ने अहम जानकारी सामने रखी है। इस अध्ययन में दो नए बायोमार्कर-CXCL12 और eotaxin-की पहचान की गई है, जो मरीजों की जीवित रहने की संभावना का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं। यह खोज Gastric Cancer के उपचार और निगरानी के तरीकों को बदल सकती है। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? गैस्ट्रिक कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है। इसकी बड़ी वजह है-देर से पहचान और एडवांस स्टेज में सीमित इलाज विकल्प। ऐसे में, ब्लड टेस्ट के जरिए मापे जा सकने वाले बायोमार्कर डॉक्टरों को यह समझने में मदद करते हैं कि कौन सा मरीज ज्यादा जोखिम में है और किसे ज्यादा निगरानी या अलग इलाज की जरूरत है। रिसर्च में क्या पाया गया? यह अध्ययन Helsinki University Hospital में 2000 से 2009 के बीच सर्जरी करा चुके 240 मरीजों पर आधारित था। वैज्ञानिकों ने 48 अलग-अलग प्रोटीन का विश्लेषण किया, जिनमें से तीन ने शुरुआती स्तर पर अहम भूमिका दिखाई: CXCL12 Stem Cell Factor Eotaxin लेकिन विस्तृत विश्लेषण (Multivariate Analysis) में केवल CXCL12 और Eotaxin ही स्वतंत्र (independent) रूप से सर्वाइवल के मजबूत संकेतक साबित हुए। कैसे काम करते हैं ये बायोमार्कर? CXCL12: यह एक केमोकिन है, जो इम्यून सेल्स की गतिविधि और ट्यूमर के माइक्रोएनवायरमेंट को नियंत्रित करता है। अध्ययन में यह बेहतर सर्वाइवल से जुड़ा पाया गया। Eotaxin: यह एक इंफ्लेमेटरी प्रोटीन है, जो शरीर में सूजन और इम्यून प्रतिक्रिया से संबंधित है। इसका भी स्वतंत्र प्रभाव सर्वाइवल पर देखा गया। यह संकेत देता है कि कैंसर के विकास में इम्यून सिस्टम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। क्लिनिकल महत्व क्या है? इस खोज से भविष्य में: मरीजों के लिए सटीक जोखिम आकलन संभव होगा डॉक्टर बेहतर तरीके से ट्रीटमेंट प्लान बना सकेंगे हाई-रिस्क मरीजों की करीबी निगरानी की जा सकेगी यह पर्सनलाइज्ड मेडिसिन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सीमाएं और आगे की जरूरत हालांकि, यह अध्ययन एक ही सेंटर और पुराने डेटा पर आधारित है, जिससे इसके परिणामों की व्यापकता सीमित हो सकती है। साथ ही, इन बायोमार्कर्स को रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में लागू करने से पहले बड़े और भविष्य-आधारित (prospective) अध्ययनों की जरूरत होगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।