स्वास्थ्य

Antidepressants Show Promise for Pain Relief

दर्द से राहत के लिए ओपिओइड्स का नया विकल्प? अध्ययन में एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को बताया असरदार

surbhi जून 16, 2026 0
Doctor reviewing antidepressant medication as a potential alternative to opioids for chronic pain management
Antidepressants May Help Relieve Chronic Pain

दर्द के इलाज में बदल सकती है सोच

दुनियाभर में लंबे समय से गंभीर और लगातार रहने वाले दर्द के इलाज के लिए ओपिओइड दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि, इन दवाओं से जुड़ी लत और दुष्प्रभावों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच वैज्ञानिक अब सुरक्षित विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। इसी कड़ी में सामने आए एक नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दर्द से राहत दिलाने में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं।

UCSF अध्ययन में क्या सामने आया?

अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को (UCSF) के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किए गए एक व्यापक अध्ययन में पाया गया कि कई गैर-ओपिओइड दवाएं सामान्य दर्द संबंधी समस्याओं के उपचार में उपयोगी साबित हो सकती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं ने पीठ दर्द, नसों के दर्द और अन्य पुरानी दर्द संबंधी स्थितियों में राहत देने के सकारात्मक संकेत दिखाए हैं। इससे उन मरीजों को फायदा मिल सकता है जो ओपिओइड दवाओं के जोखिम से बचना चाहते हैं।

ओपिओइड्स की जगह क्यों खोजे जा रहे विकल्प?

ओपिओइड दवाएं दर्द कम करने में प्रभावी मानी जाती हैं, लेकिन इनके लंबे समय तक इस्तेमाल से लत लगने, ओवरडोज और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। कई देशों में ओपिओइड संकट सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन चुका है।

इसी वजह से चिकित्सा विशेषज्ञ ऐसी दवाओं की तलाश कर रहे हैं जो दर्द में राहत तो दें, लेकिन उनमें लत लगने का खतरा कम हो।

किन दवाओं को बताया गया उपयोगी?

अध्ययन में विभिन्न प्रकार के दर्द के लिए अलग-अलग गैर-ओपिओइड दवाओं का उल्लेख किया गया है।

  • कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को पीठ दर्द के उपचार में उपयोगी पाया गया।
  • मसल रिलैक्सेंट्स को भी कमर दर्द से राहत के विकल्प के रूप में देखा गया।
  • कुछ मामलों में पेट दर्द और सिरदर्द के लिए एंटीसाइकोटिक दवाओं के उपयोग की संभावना पर चर्चा की गई।

हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि हर मरीज के लिए एक ही दवा उपयुक्त नहीं होती और उपचार का निर्णय डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों की क्या है राय?

विशेषज्ञों का मानना है कि दर्द केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और न्यूरोलॉजिकल कारकों से भी जुड़ा हो सकता है। ऐसे में कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दर्द को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका मार्गों पर प्रभाव डालकर राहत प्रदान कर सकती हैं।

हालांकि, इन दवाओं का उपयोग केवल चिकित्सकीय सलाह के तहत ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इनके भी अपने दुष्प्रभाव और सीमाएं हो सकती हैं।

भविष्य में बदल सकता है दर्द उपचार का तरीका

अध्ययन से संकेत मिलता है कि दर्द प्रबंधन के क्षेत्र में गैर-ओपिओइड उपचारों की भूमिका आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। यदि आगे के शोध इन निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं, तो लाखों मरीजों को दर्द से राहत पाने के लिए अधिक सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।

नोट: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी दवा का सेवन या बदलाव करने से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Woman holding her lower abdomen during period cramps while reviewing pain relief medication options
पीरियड्स के दर्द में क्या आप गलत दवा ले रही हैं? अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

मासिक धर्म के दौरान होने वाला दर्द लाखों महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है। हालांकि, एक नए अध्ययन में सामने आया है कि कई महिलाएं पीरियड्स के दर्द से राहत पाने के लिए ऐसी दवा का इस्तेमाल कर रही हैं, जो हमेशा सबसे प्रभावी विकल्प नहीं हो सकती। इंग्लैंड में किए गए एक बड़े शोध के अनुसार, पीरियड्स से जुड़े दर्द के लिए सबसे अधिक खरीदी जाने वाली दवा पैरासिटामोल है, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में इबुप्रोफेन अधिक असरदार साबित हो सकती है। करोड़ों खरीदारी रिकॉर्ड के विश्लेषण में सामने आई जानकारी शोधकर्ताओं ने 2006 से 2015 के बीच एक प्रमुख रिटेल चेन के 21.1 करोड़ से अधिक लेनदेन और 34 लाख ग्राहकों के खरीदारी डेटा का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि मासिक धर्म से जुड़े उत्पादों जैसे सैनिटरी पैड और टैम्पोन के साथ खरीदे गए दर्द निवारक उत्पादों में पैरासिटामोल आधारित दवाओं की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई थी, जबकि इबुप्रोफेन आधारित दवाएं केवल एक-तिहाई थीं। यह अध्ययन PLOS Digital Health जर्नल में प्रकाशित हुआ है। पीरियड्स के दर्द में इबुप्रोफेन क्यों हो सकती है ज्यादा प्रभावी? विशेषज्ञों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान गर्भाशय की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं ताकि उसकी आंतरिक परत बाहर निकल सके। इस प्रक्रिया में शरीर में प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन बनता है, जो ऐंठन और दर्द का प्रमुख कारण माना जाता है। इबुप्रोफेन एक नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जो प्रोस्टाग्लैंडिन के निर्माण को कम करने में मदद करती है। इसी वजह से यह पीरियड्स के दौरान होने वाली ऐंठन और मांसपेशियों के दर्द में अधिक प्रभावी मानी जाती है। वहीं, पैरासिटामोल मुख्य रूप से मस्तिष्क में दर्द के संकेतों को कम करने का काम करती है। इसलिए यह सिरदर्द और बुखार जैसी स्थितियों में अधिक उपयोगी मानी जाती है। पीरियड दर्द पर अभी भी सीमित है शोध अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दर्द और उसके उपचार पर अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने और सही दवा के चयन के बारे में जानकारी देने की आवश्यकता है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? सामान्य पीरियड दर्द मासिक धर्म का एक सामान्य हिस्सा हो सकता है, लेकिन यदि दर्द इतना अधिक हो कि दैनिक गतिविधियां प्रभावित होने लगें या दर्द लगातार असामान्य रूप से बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक पीरियड दर्द एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड्स या अन्य स्त्री रोग संबंधी समस्याओं का संकेत भी हो सकता है। दवा लेने से पहले रखें इन बातों का ध्यान हालांकि इबुप्रोफेन कई महिलाओं के लिए प्रभावी विकल्प हो सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होती। कुछ लोगों में इसके दुष्प्रभाव या स्वास्थ्य संबंधी जोखिम हो सकते हैं। इसलिए किसी भी दर्द निवारक दवा का उपयोग करने से पहले पैक पर दी गई जानकारी पढ़ना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी दवा का सेवन चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करें।  

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घने और मजबूत बाल चाहते हैं? रोज खाएं ये पौष्टिक चीजें

नई दिल्ली, एजेंसियां। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बढ़ता तनाव और प्रदूषण बाल झड़ने की समस्या को तेजी से बढ़ा रहे हैं। कई लोग महंगे शैम्पू, सीरम और हेयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बालों की सेहत का सबसे मजबूत आधार संतुलित और पौष्टिक आहार है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया है कि शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी बालों के झड़ने और कमजोर होने का प्रमुख कारण बन सकती है। आप इन्हें नाश्ते में उबले अंडे के रूप में या सब्जियों के साथ आमलेट बनाकर खा सकते हैं।    अंडे अंडे बालों के लिए सबसे लाभकारी खाद्य पदार्थों में गिने जाते हैं। इनमें उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, बायोटिन, जिंक और सेलेनियम होता है, जो केराटिन के निर्माण में मदद कर बालों की जड़ों को मजबूत बनाते हैं।   पालक पालक आयरन, फोलेट तथा विटामिन A और C का अच्छा स्रोत है। आयरन की कमी, विशेषकर महिलाओं में, बाल झड़ने का एक प्रमुख कारण मानी जाती है। विटामिन C आयरन के अवशोषण को बढ़ाकर बालों तक ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करता है।   फैटी फिश फैटी फिश जैसे सैल्मन, सार्डिन और मैकेरल में भरपूर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन D और B-विटामिन पाए जाते हैं। ये पोषक तत्व स्कैल्प की सूजन कम करने, बालों की घनत्व बढ़ाने और उन्हें प्राकृतिक चमक देने में सहायक होते हैं।   नट्स और बीज बादाम, अखरोट, चिया सीड्स और कद्दू के बीज विटामिन E और जिंक से भरपूर होते हैं। ये बालों की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने, ऊतकों की मरम्मत करने और नई बालों की वृद्धि को बढ़ावा देने में मदद करते हैं।   शकरकंद  वहीं शकरकंद में मौजूद बीटा-कैरोटीन शरीर में विटामिन A में परिवर्तित होकर स्कैल्प में प्राकृतिक तेल (सीबम) के उत्पादन को बढ़ाता है, जिससे बालों का रूखापन कम होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि प्रोटीन, आयरन और हेल्दी फैट से भरपूर संतुलित आहार नियमित रूप से लिया जाए, तो 3 से 6 महीनों के भीतर बालों की गुणवत्ता और मजबूती में सकारात्मक बदलाव देखा जा सकता है।

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Employee working at office despite illness due to attendance policy pressure and fear of penalties
बीमार होने पर भी ऑफिस क्यों जा रहे कर्मचारी? नई रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

Attendance Policy बना रही कर्मचारियों पर दबाव, स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर दुनियाभर की कंपनियां कर्मचारियों के स्वास्थ्य और वेलबीइंग पर जोर देने की बात करती हैं, लेकिन एक नई रिसर्च ने कार्यस्थलों की कुछ नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अध्ययन में सामने आया है कि कई कर्मचारी बीमार होने के बावजूद छुट्टी लेने से बचते हैं और काम पर पहुंच जाते हैं, क्योंकि उन्हें अनुपस्थिति पर मिलने वाली सजा या अंक कटने का डर रहता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसी नीतियां कर्मचारियों के स्वास्थ्य, उत्पादकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य तीनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती हैं। क्या है Attendance Points System? कई कंपनियां कर्मचारियों की उपस्थिति पर नजर रखने के लिए "Attendance Points System" का उपयोग करती हैं। इस व्यवस्था में देर से आने, जल्दी जाने या अनुपस्थित रहने पर कर्मचारियों को नकारात्मक अंक (Demerits) दिए जाते हैं। यदि किसी कर्मचारी के अंक एक तय सीमा से अधिक हो जाते हैं, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नौकरी पर भी खतरा पैदा हो सकता है। अध्ययन में शामिल लगभग आधे कर्मचारियों ने बताया कि वे ऐसी ही किसी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं। बीमार होने पर भी काम करने को मजबूर शोध में पाया गया कि जिन कर्मचारियों पर Attendance Points System लागू था, वे अन्य कर्मचारियों की तुलना में बीमारी के दौरान भी ऑफिस आने की अधिक संभावना रखते थे। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब कर्मचारी पहले से कुछ अंक हासिल कर चुके हों या उन्हें पहले अनुपस्थिति के लिए चेतावनी मिल चुकी हो। ऐसे कर्मचारी नौकरी की सुरक्षा को लेकर अधिक चिंतित रहते हैं और स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद छुट्टी लेने से बचते हैं। Productivity पर भी पड़ता है असर विशेषज्ञों के अनुसार, बीमार अवस्था में काम करना, जिसे "Presenteeism" कहा जाता है, कई समस्याओं को जन्म देता है। काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कर्मचारी की रिकवरी में अधिक समय लगता है। बीमारी अन्य सहकर्मियों तक फैल सकती है। टीम की कुल उत्पादकता में गिरावट आती है। यानी कर्मचारी भले ही ऑफिस पहुंच जाए, लेकिन उसका प्रदर्शन सामान्य नहीं रह पाता। Paid Sick Leave भी नहीं कर पा रही मदद रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि केवल Paid Sick Leave उपलब्ध होने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती। अध्ययन के अनुसार, जिन कर्मचारियों को भुगतान सहित बीमार अवकाश (Paid Sick Leave) का अधिकार मिला हुआ था, वे भी Attendance Penalty के डर से बीमार होने पर काम पर पहुंच रहे थे। इससे स्पष्ट होता है कि सिर्फ छुट्टी की सुविधा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कंपनियों को अपनी उपस्थिति संबंधी नीतियों की भी समीक्षा करनी होगी। कंपनियों के लिए चेतावनी शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर संस्थान वास्तव में कर्मचारी कल्याण को प्राथमिकता देना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनमें कर्मचारी बीमारी के दौरान बिना डर के छुट्टी ले सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ कर्मचारी ही लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। इसलिए कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव बनाने वाली नीतियों के बजाय संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना कंपनियों और कर्मचारियों दोनों के हित में होगा। बदलती कार्यसंस्कृति में बड़ा सवाल कोविड महामारी के बाद कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है। ऐसे में यह अध्ययन कंपनियों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखता है—क्या उनकी उपस्थिति नीतियां वास्तव में कर्मचारियों के हित में हैं, या वे अनजाने में उन्हें बीमार अवस्था में भी काम करने के लिए मजबूर कर रही हैं?  

surbhi जून 13, 2026 0
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