स्वास्थ्य

Arthritis Drug Study Highlights Bone Density Concerns

Rheumatoid Arthritis के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा से हड्डियों पर असर, नई स्टडी में खुलासा

surbhi मई 12, 2026 0
Rheumatoid arthritis patient consulting doctor about steroid treatment and bone density health risks
Rheumatoid Arthritis Drug Bone Density Study

एक नई रिसर्च में सामने आया है कि Rheumatoid Arthritis के इलाज में इस्तेमाल होने वाले लो-डोज ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट से रीढ़ की हड्डी यानी लम्बर स्पाइन की बोन डेंसिटी पर असर पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि इससे फ्रैक्चर का खतरा सामान्य इलाज की तुलना में ज्यादा नहीं पाया गया।

यह निष्कर्ष एक बड़े मेटा-एनालिसिस में सामने आया है, जिसमें कई क्लिनिकल ट्रायल्स के डेटा का विश्लेषण किया गया।

क्या है ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट?

ग्लूकोकॉर्टिकोइड दवाएं आमतौर पर Rheumatoid Arthritis के मरीजों में सूजन और दर्द को नियंत्रित करने के लिए दी जाती हैं। इन्हें अक्सर Disease-Modifying Antirheumatic Drugs (DMARDs) के साथ इस्तेमाल किया जाता है।

हालांकि लंबे समय से यह सवाल बना हुआ था कि इन दवाओं का हड्डियों की सेहत पर कितना असर पड़ता है।

स्टडी में क्या पाया गया?

रिसर्चर्स ने 1,112 मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया। इसमें उन मरीजों को शामिल किया गया जिन्हें प्रतिदिन 7.5 mg या उससे कम प्रेडनिसोन समकक्ष ग्लूकोकॉर्टिकोइड दिया गया था।

दो साल तक किए गए अध्ययन में पाया गया कि ग्लूकोकॉर्टिकोइड लेने वाले मरीजों में लम्बर स्पाइन की बोन मिनरल डेंसिटी में हल्की कमी देखी गई।

हालांकि फीमर यानी जांघ की हड्डी पर कोई बड़ा असर नहीं पाया गया।

फ्रैक्चर का खतरा नहीं बढ़ा

स्टडी के दौरान कुल 35 मरीजों में क्लिनिकल फ्रैक्चर दर्ज किए गए, लेकिन ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट लेने वाले और सामान्य इलाज पाने वाले मरीजों के बीच फ्रैक्चर के खतरे में कोई बड़ा अंतर नहीं मिला।

रिसर्चर्स का कहना है कि बोन लॉस की गंभीरता हर मरीज में अलग हो सकती है और यह व्यक्ति की पहले से मौजूद ऑस्टियोपोरोसिस रिस्क पर भी निर्भर करती है।

आगे और रिसर्च की जरूरत

विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य में लंबी अवधि के प्रभावों को समझने और हड्डियों को नुकसान से बचाने के उपायों पर और रिसर्च की जरूरत है।

डॉक्टरों का मानना है कि इलाज के फायदे और संभावित जोखिमों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है, ताकि मरीजों को बेहतर राहत मिलने के साथ हड्डियों की सेहत भी सुरक्षित रह सके।

मरीजों के लिए क्या है जरूरी?

  • नियमित बोन डेंसिटी जांच
  • कैल्शियम और विटामिन D का संतुलित सेवन
  • डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद न करना
  • ऑस्टियोपोरोसिस रिस्क का समय-समय पर मूल्यांकन
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से मांगा जवाब, पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लागू करने में देरी पर सख्ती

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन वार्निंग लेबल लागू करने में देरी को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने FSSAI को दो सप्ताह के भीतर यह बताने को कहा है कि इस दिशा में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।   चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी प्रमुखता से देने की मांग     मामला उन पैकेज्ड खाद्य पदार्थों से जुड़ा है जिनमें चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि ऐसे उत्पादों के पैकेट के सामने की तरफ स्पष्ट चेतावनी दी जाए, ताकि ग्राहक खरीदारी से पहले ही उसके पोषण संबंधी जोखिम को आसानी से समझ सकें।     सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI की देरी पर जताई नाराजगी     जस्टिस जेबी पार्डीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने FSSAI की ओर से अब तक हुई प्रगति पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि मामला सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य, से जुड़ा है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि पहले दिए गए निर्देशों पर अब तक ठोस प्रगति क्यों नहीं हुई।     FSSAI ने चेतावनी चिन्हों के बजाय दूसरा मॉडल सुझाया     FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हालिया प्रस्ताव में पैकेट पर प्रति 100 ग्राम/100 मिलीलीटर पोषक तत्वों की मात्रा, सर्विंग साइज और अनुशंसित दैनिक सीमा जैसी जानकारी देने का सुझाव दिया है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उपभोक्ताओं को खुद गणना करनी पड़ेगी, जबकि फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी का उद्देश्य जानकारी को एक नजर में समझने योग्य बनाना है।     दो सप्ताह बाद फिर होगी मामले पर सुनवाई     सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को दो सप्ताह का समय देते हुए इस मुद्दे पर आगे की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि संतोषजनक कदम नहीं उठाए गए तो वह मामले में आगे आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।  

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नई दिल्ली, एजेंसियां। अंगदान को महादान कहा जाता है, लेकिन दिल्ली-एनसीआर में मौत के बाद अंगदान की स्थिति राष्ट्रीय औसत की तुलना में बेहद कमजोर है। यहां मौत के बाद दान से होने वाले प्रत्यारोपण की हिस्सेदारी करीब 3 फीसदी है, जबकि देश में यह औसत 17.5 से 18 फीसदी के बीच है। विशेषज्ञों ने अंगदान को बढ़ावा देने के लिए इसे सामाजिक आंदोलन बनाने पर जोर दिया है।   1.05 लाख से ज्यादा मरीज प्रत्यारोपण की कतार में   विश्व अंगदान दिवस की पूर्व संध्या पर ओखला स्थित एक निजी अस्पताल में आयोजित ‘गिव द गिफ्ट ऑफ लाइफ’ कार्यक्रम में एनओटीटीओ के निदेशक डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि देश में 1,05,560 मरीज अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में हैं। इनमें 73,646 किडनी और 23,396 मरीज लीवर प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं। हर 20 मिनट में एक नया मरीज इस सूची में जुड़ रहा है।   किडनी प्रत्यारोपण की सबसे ज्यादा जरूरत   हर साल दो लाख से अधिक नए मरीज किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत वाली श्रेणी में आते हैं, लेकिन करीब 14 हजार किडनी प्रत्यारोपण ही हो पाते हैं। वहीं, लीवर और हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत वाले मरीजों की संख्या भी सालाना करीब 50 हजार है। पिछले साल लगभग 5,100 लीवर और सिर्फ 239 हृदय प्रत्यारोपण हुए।   एक अंगदाता बचा सकता है आठ लोगों की जिंदगी   विशेषज्ञों के मुताबिक, एक व्यक्ति मृत्यु के बाद अपने अंगदान से आठ लोगों की जिंदगी बचाने में मदद कर सकता है। किडनी, लीवर, हृदय, फेफड़े, आंत और पैंक्रियाज के अलावा कॉर्निया, त्वचा और हड्डी जैसे ऊतक भी दान किए जा सकते हैं।   एक दशक में चार गुना बढ़े अंग प्रत्यारोपण   देश में वर्ष 2013 में करीब 4,900 अंग प्रत्यारोपण हुए थे। पिछले साल यह संख्या बढ़कर 20,138 से अधिक हो गई। इसके बावजूद जरूरत और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। वर्ष 2020 से 2024 के बीच 2,805 मरीजों की मौत अंग प्रत्यारोपण का इंतजार करते हुए हुई।   अंगदान को सामाजिक आंदोलन बनाने की अपील   विश्व अंगदान दिवस पर दधीचि देहदान समिति ने डिफेंस एन्कलेव में कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें दिल्ली भाजपा अध्यक्ष एवं केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा, राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी और समिति के राष्ट्रीय संयोजक एडवोकेट आलोक कुमार ने अंगदान को सामाजिक आंदोलन बनाने की अपील की। वक्ताओं ने लोगों से अंगदान का संकल्प लेने के साथ अपनी इच्छा परिवार के सदस्यों को बताने की अपील की, ताकि जरूरत के समय परिवार उनकी इच्छा का सम्मान कर सके। विशेषज्ञों का कहना है कि अंगदान को लेकर मौजूद भ्रम और डर को दूर कर जागरूकता बढ़ाना इस दिशा में सबसे अहम कदम है।

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Cold Plunge और Ice Bath के फायदे और नुकसान
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नई दिल्ली, एजेंसियां। सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटीज और फिटनेस लवर्स के बीच Ice Bath, Ice Therapy और Cold Plunge का ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। हाल ही में अभिनेत्री हिना खान का बर्फ से भरे टब में बैठने का वीडियो भी चर्चा में रहा। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि बेहद ठंडे पानी में शरीर को डुबोना हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं है और इसे सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।   क्या है Ice Therapy या Cold Plunge?     Cold Plunge एक तरह की हाइड्रोथेरेपी तकनीक है, जिसमें शरीर को कुछ समय के लिए बेहद ठंडे पानी में डुबोया जाता है। आमतौर पर पानी का तापमान करीब 3 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच रखा जाता है।   इसका इस्तेमाल लंबे समय से एथलीट और फिटनेस ट्रेनिंग करने वाले लोग करते रहे हैं। खासकर भारी एक्सरसाइज के बाद मांसपेशियों के दर्द और थकान से राहत पाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। ठंडे पानी के संपर्क में आने पर रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं, जिससे कुछ समय के लिए सूजन और दर्द कम हो सकता है। पानी से बाहर निकलने के बाद रक्त वाहिकाएं दोबारा फैलती हैं, जिससे शरीर में रक्त संचार सामान्य होने लगता है।   Cold Plunge के क्या हैं फायदे?     मांसपेशियों के दर्द से राहत   भारी वर्कआउट के बाद मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन हो सकती है। Cold Plunge से कुछ लोगों को इन लक्षणों में अस्थायी राहत मिल सकती है और रिकवरी में मदद मिल सकती है। सूजन कम करने में मदद ठंड शरीर के किसी हिस्से में रक्त प्रवाह को कुछ समय के लिए कम कर सकती है। इससे एक्सरसाइज के बाद होने वाली सूजन को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। तनाव और थकान में राहत बहुत ठंडे पानी के संपर्क में आने से नर्वस सिस्टम सक्रिय होता है। इससे व्यक्ति को कुछ समय के लिए अधिक अलर्ट और एनर्जेटिक महसूस हो सकता है। ब्लड सर्कुलेशन पर असर ठंडे पानी से बाहर आने के बाद शरीर अपना सामान्य तापमान बनाए रखने की कोशिश करता है। इस दौरान रक्त वाहिकाओं में बदलाव होता है, जिससे सर्कुलेशन प्रभावित होता है। हालांकि, Cold Plunge से इम्यूनिटी बढ़ने, डिप्रेशन ठीक होने या वजन घटने जैसे कई दावों के लिए उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित और मिश्रित हैं।   किन लोगों को Cold Plunge से बचना चाहिए?     हर व्यक्ति के लिए Ice Bath सुरक्षित नहीं है। खासतौर पर कुछ स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोगों को इसे शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।   दिल की बीमारी और हाई ब्लड प्रेशर: अचानक बहुत ठंडे पानी में जाने से हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर तेजी से बदल सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह जोखिम पैदा कर सकता है। ब्लड सर्कुलेशन की समस्या: जिन लोगों को रक्त संचार से जुड़ी समस्या है, उन्हें Cold Plunge लेने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है। नसों से जुड़ी समस्या: हाथ-पैर में सुन्नपन या संवेदना कम होने की स्थिति में ठंड से होने वाले नुकसान का पता देर से चल सकता है। कमजोर इम्यून सिस्टम या गंभीर बीमारी: ऐसे लोगों को बिना चिकित्सकीय सलाह के Ice Bath नहीं लेना चाहिए।   Ice Bath लेते समय इन बातों का रखें ध्यान     पहली बार इसे अकेले करने के बजाय ट्रेंड एक्सपर्ट की निगरानी में करें।   शुरुआत बहुत कम समय से करें और शरीर की प्रतिक्रिया पर ध्यान दें। अचानक बेहद ठंडे पानी में लंबे समय तक न रहें। चक्कर, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द या अत्यधिक कंपकंपी महसूस हो तो तुरंत बाहर निकलें। किसी बीमारी या नियमित दवा की स्थिति में पहले डॉक्टर से सलाह लें। सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटीज को देखकर Cold Plunge को रूटीन का हिस्सा बनाने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। यह हर व्यक्ति के लिए जरूरी या उपयुक्त थेरेपी नहीं है।

ranjan kumar tiwari अगस्त 12, 2026 0
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