Health Research

Doctor explaining Dupilumab treatment benefits for Prurigo Nodularis patients suffering from severe itching and skin lesions.
Prurigo Nodularis मरीजों के लिए राहत की उम्मीद, Dupilumab से खुजली और जीवन गुणवत्ता में सुधार

Dupilumab पर हुई एक नई स्टडी में सामने आया है कि यह दवा Prurigo Nodularis (PN) से पीड़ित मरीजों को पहले से कहीं अधिक व्यापक लाभ दे सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भले ही कुछ मरीज क्लीनिकल ट्रायल के सबसे सख्त ट्रीटमेंट लक्ष्य तक नहीं पहुंचे, फिर भी उनमें खुजली, त्वचा के घावों और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है Prurigo Nodularis? Prurigo Nodularis एक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली त्वचा संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर पर बेहद खुजली वाले गांठदार घाव (nodules) बन जाते हैं। यह बीमारी मरीजों की: नींद मानसिक स्वास्थ्य दैनिक जीवन सामाजिक गतिविधियों पर गहरा असर डाल सकती है। दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स का विश्लेषण यह नई स्टडी LIBERTY-PN PRIME और PRIME2 नामक दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स के डेटा पर आधारित थी। पहले के परिणामों में पाया गया था कि 24 सप्ताह के इलाज के बाद: Dupilumab लेने वाले 35.3% मरीजों में खुजली और त्वचा दोनों में बड़ा सुधार हुआ जबकि placebo समूह में यह आंकड़ा केवल 8.9% था लेकिन वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि जो मरीज “optimal response” तक नहीं पहुंचे, क्या उन्हें भी फायदा मिला? लक्ष्य पूरा न होने पर भी मरीजों को मिला फायदा नई स्टडी में उन मरीजों का विश्लेषण किया गया जो 24 सप्ताह बाद भी ट्रायल के सबसे सख्त लक्ष्य तक नहीं पहुंचे थे। इसके बावजूद Dupilumab लेने वाले कई मरीजों में महत्वपूर्ण सुधार देखे गए: 61% से अधिक मरीजों की जीवन गुणवत्ता में बड़ा सुधार 55.8% मरीजों ने अपनी बीमारी को “हल्का” या “न के बराबर” बताया आधे से ज्यादा मरीजों में 75% तक त्वचा के घाव भर गए इन सभी परिणामों की तुलना placebo समूह से की गई और अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण पाया गया। सिर्फ “पूर्ण इलाज” ही सफलता नहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी इलाज की सफलता को केवल कठोर ट्रायल एंडपॉइंट्स से नहीं मापना चाहिए। कई मरीजों को: खुजली से राहत त्वचा में सुधार बेहतर नींद रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी जैसे फायदे मिले, भले ही वे “पूर्ण या लगभग पूर्ण” सुधार की श्रेणी में नहीं आए। लंबी अवधि की रणनीति पर जोर विशेषज्ञों ने कहा कि यह अध्ययन PN के इलाज में “Treat-to-Target” यानी लंबे समय तक लक्ष्य आधारित उपचार रणनीति की जरूरत को मजबूत करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, आंशिक सुधार वाले मरीजों में भी Dupilumab का इलाज जारी रखने से लंबे समय में और बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।  

surbhi मई 19, 2026 0
Medical illustration of psoriasis treatment showing IL-17 inhibitors reducing risk of psoriatic arthritis in patients
IL-17 Inhibitors से Psoriatic Arthritis का खतरा कम, नई स्टडी में बड़ा दावा

Psoriatic Arthritis के खतरे को लेकर नई रिसर्च में अहम खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, सोरायसिस मरीजों में बायोलॉजिक दवाओं के चयन और उनके क्रम (sequencing) का भविष्य में Psoriatic Arthritis विकसित होने के जोखिम पर असर पड़ सकता है। खासतौर पर IL-17 inhibitors लेने वाले मरीजों में बीमारी का खतरा कम पाया गया। बायोलॉजिक थेरेपी के क्रम पर बढ़ी रुचि Psoriasis से पीड़ित मरीजों में Psoriatic Arthritis होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होता है। हालांकि अब तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि अलग-अलग बायोलॉजिक थेरेपी इस जोखिम को कैसे प्रभावित करती हैं। पहले के कुछ अध्ययनों में संकेत मिले थे कि first-line IL-23p19 inhibitors Psoriatic Arthritis के खतरे को कम कर सकते हैं, लेकिन second-line बायोलॉजिक थेरेपी के प्रभाव को लेकर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसी को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। 20 साल के डेटा का विश्लेषण इस population-based cohort study में 2002 से 2022 के बीच सोरायसिस के लिए बायोलॉजिक थेरेपी शुरू करने वाले 2,819 मरीजों का विश्लेषण किया गया। मरीजों को अलग-अलग दवा समूहों में बांटा गया, जिनमें शामिल थे: Tumour Necrosis Factor (TNF) inhibitors IL-17 inhibitors IL-23p19 inhibitors IL-12/23 inhibitors शोधकर्ताओं ने first-line और second-line दोनों प्रकार की बायोलॉजिक थेरेपी का अलग-अलग विश्लेषण किया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह देखना था कि कितने मरीजों में बाद में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। IL-17 Inhibitors में सबसे कम जोखिम अध्ययन में first-line biologic therapy लेने वाले 2,819 मरीजों में से 400 मरीजों (14.2%) में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। विश्लेषण में पाया गया कि first-line IL-23p19 inhibitors लेने वाले मरीजों में TNF inhibitors की तुलना में बीमारी का खतरा काफी कम था। वहीं second-line biologic therapy लेने वाले 1,246 मरीजों में से 125 मरीजों (10%) में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। Second-line treatment analysis में IL-17 inhibitors ही एकमात्र दवा वर्ग था, जिसने TNF inhibitors की तुलना में बीमारी के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से कम किया। रिसर्च के अनुसार: IL-17 inhibitors से बीमारी का खतरा लगभग 63% तक कम देखा गया IL-12/23 inhibitors और IL-23p19 inhibitors में भी जोखिम कम होने के संकेत मिले, लेकिन परिणाम सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह मजबूत नहीं थे इलाज की रणनीति बदल सकती है शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन भविष्य में सोरायसिस मरीजों के लिए बायोलॉजिक थेरेपी चुनने की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर TNF inhibitor therapy असफल होने के बाद IL-17 inhibitors बेहतर second-line विकल्प बन सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए आगे prospective studies की जरूरत होगी, ताकि Psoriatic Arthritis की रोकथाम पर आधारित बेहतर treatment guidelines तैयार की जा सकें।  

surbhi मई 14, 2026 0
Rheumatoid arthritis patient consulting doctor about steroid treatment and bone density health risks
Rheumatoid Arthritis के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा से हड्डियों पर असर, नई स्टडी में खुलासा

एक नई रिसर्च में सामने आया है कि Rheumatoid Arthritis के इलाज में इस्तेमाल होने वाले लो-डोज ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट से रीढ़ की हड्डी यानी लम्बर स्पाइन की बोन डेंसिटी पर असर पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि इससे फ्रैक्चर का खतरा सामान्य इलाज की तुलना में ज्यादा नहीं पाया गया। यह निष्कर्ष एक बड़े मेटा-एनालिसिस में सामने आया है, जिसमें कई क्लिनिकल ट्रायल्स के डेटा का विश्लेषण किया गया। क्या है ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट? ग्लूकोकॉर्टिकोइड दवाएं आमतौर पर Rheumatoid Arthritis के मरीजों में सूजन और दर्द को नियंत्रित करने के लिए दी जाती हैं। इन्हें अक्सर Disease-Modifying Antirheumatic Drugs (DMARDs) के साथ इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि लंबे समय से यह सवाल बना हुआ था कि इन दवाओं का हड्डियों की सेहत पर कितना असर पड़ता है। स्टडी में क्या पाया गया? रिसर्चर्स ने 1,112 मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया। इसमें उन मरीजों को शामिल किया गया जिन्हें प्रतिदिन 7.5 mg या उससे कम प्रेडनिसोन समकक्ष ग्लूकोकॉर्टिकोइड दिया गया था। दो साल तक किए गए अध्ययन में पाया गया कि ग्लूकोकॉर्टिकोइड लेने वाले मरीजों में लम्बर स्पाइन की बोन मिनरल डेंसिटी में हल्की कमी देखी गई। हालांकि फीमर यानी जांघ की हड्डी पर कोई बड़ा असर नहीं पाया गया। फ्रैक्चर का खतरा नहीं बढ़ा स्टडी के दौरान कुल 35 मरीजों में क्लिनिकल फ्रैक्चर दर्ज किए गए, लेकिन ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट लेने वाले और सामान्य इलाज पाने वाले मरीजों के बीच फ्रैक्चर के खतरे में कोई बड़ा अंतर नहीं मिला। रिसर्चर्स का कहना है कि बोन लॉस की गंभीरता हर मरीज में अलग हो सकती है और यह व्यक्ति की पहले से मौजूद ऑस्टियोपोरोसिस रिस्क पर भी निर्भर करती है। आगे और रिसर्च की जरूरत विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य में लंबी अवधि के प्रभावों को समझने और हड्डियों को नुकसान से बचाने के उपायों पर और रिसर्च की जरूरत है। डॉक्टरों का मानना है कि इलाज के फायदे और संभावित जोखिमों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है, ताकि मरीजों को बेहतर राहत मिलने के साथ हड्डियों की सेहत भी सुरक्षित रह सके। मरीजों के लिए क्या है जरूरी? नियमित बोन डेंसिटी जांच कैल्शियम और विटामिन D का संतुलित सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद न करना ऑस्टियोपोरोसिस रिस्क का समय-समय पर मूल्यांकन

surbhi मई 12, 2026 0
Doctor checking blood pressure of heart patient during cardiovascular health assessment in hospital
हाई Pulse Pressure बन सकता है दिल की बीमारी का बड़ा संकेत, नई स्टडी में सामने आया गंभीर खतरा

दिल से जुड़ी बीमारियों के जोखिम को समझने के लिए वैज्ञानिक लगातार नए संकेतकों की तलाश कर रहे हैं। अब एक नई रिसर्च में सामने आया है कि बढ़ा हुआ Pulse Pressure, stable coronary artery disease यानी स्थिर कोरोनरी आर्टरी डिजीज के मरीजों में बीमारी की गंभीरता और भविष्य में होने वाले cardiovascular events का मजबूत संकेतक हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार Pulse Pressure, systolic और diastolic blood pressure के अंतर को कहा जाता है। यह धमनियों की कठोरता और vascular ageing को दर्शाता है, जो हृदय रोगों के प्रमुख कारण माने जाते हैं। क्या कहती है नई रिसर्च? इस prospective study में 7,027 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें stable coronary artery disease था और जिनका ejection fraction सामान्य था। शोधकर्ताओं ने पाया कि जैसे-जैसे Gensini Score बढ़ता गया, वैसे-वैसे systolic blood pressure और pulse pressure दोनों में वृद्धि देखी गई। Gensini Score कोरोनरी धमनियों में blockage और lesion severity मापने का एक महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। तीन धमनियों में बीमारी का बढ़ा खतरा अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों का pulse pressure ज्यादा था, उनमें three-vessel disease की संभावना भी अधिक थी। विशेष रूप से pulse pressure के उच्च quartiles में मरीजों में तीन प्रमुख coronary arteries के प्रभावित होने की दर काफी ज्यादा देखी गई। इससे यह संकेत मिला कि बढ़ा हुआ pulse pressure अधिक गंभीर coronary involvement से जुड़ा हो सकता है। Stroke और दिल से जुड़ी घटनाओं का बढ़ा जोखिम करीब 36.4 महीनों के median follow-up के दौरान कुल 289 cardiovascular events दर्ज किए गए। शुरुआती विश्लेषण में pulse pressure और systolic blood pressure दोनों का संबंध cardiovascular death, stroke और अन्य adverse outcomes से पाया गया। हालांकि confounding factors को adjust करने के बाद भी pulse pressure stroke और combined cardiovascular outcomes के साथ स्वतंत्र रूप से जुड़ा रहा। स्टडी के अनुसार– Stroke risk के लिए hazard ratio: 1.019 Combined outcomes के लिए hazard ratio: 1.014 वहीं systolic blood pressure केवल stroke risk से ही जुड़ा रहा। क्यों महत्वपूर्ण है Pulse Pressure? विशेषज्ञों का मानना है कि pulse pressure एक आसान और सुलभ clinical marker बन सकता है, जिसकी मदद से stable CAD मरीजों में जोखिम का आकलन किया जा सकता है। अन्य जटिल imaging tests या biomarkers की तुलना में pulse pressure को नियमित blood pressure जांच के दौरान आसानी से मापा जा सकता है। रिसर्च के अनुसार यह केवल blood pressure का हिस्सा नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाले गंभीर cardiovascular events का महत्वपूर्ण संकेतक भी हो सकता है। आगे और रिसर्च की जरूरत शोधकर्ताओं ने कहा कि भविष्य में और बड़े अध्ययनों की जरूरत होगी ताकि pulse pressure को clinical risk models में बेहतर तरीके से शामिल किया जा सके और इसकी उपयोगिता को नियमित cardiovascular assessment का हिस्सा बनाया जा सके।  

surbhi मई 9, 2026 0
Doctor analyzing kidney report with eGFR levels for IgA Nephropathy patient monitoring
किडनी रोग IgA Nephropathy में बड़ा संकेत: eGFR स्लोप से पता चल सकता है बीमारी का भविष्य

किडनी रोगों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रिसर्च सामने आई है, जिसमें IgA Nephropathy के मरीजों में बीमारी की प्रगति का अनुमान लगाने के लिए नए तरीके की पुष्टि हुई है। अध्ययन के अनुसार, eGFR का “स्लोप” यानी समय के साथ इसमें गिरावट की गति, मरीज के भविष्य के किडनी जोखिम को बेहतर तरीके से दर्शा सकता है। क्या था अध्ययन का उद्देश्य जापान के एक बड़े कोहोर्ट अध्ययन में 937 वयस्क मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें IgA Nephropathy की पुष्टि बायोप्सी के जरिए हुई थी। करीब 6 साल तक मरीजों को फॉलो किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि eGFR में समय के साथ होने वाले बदलाव (slope) किडनी के परिणामों को कैसे प्रभावित करते हैं। eGFR में गिरावट से बढ़ता खतरा रिसर्च में पाया गया कि जिन मरीजों में eGFR तेजी से गिरता है, उनमें किडनी खराब होने का जोखिम काफी ज्यादा होता है। 8.3% मरीजों में गंभीर स्थिति (≥40% eGFR गिरावट या किडनी रिप्लेसमेंट की जरूरत) देखी गई हर 1 स्टैंडर्ड डिविएशन की गिरावट पर जोखिम लगभग 1.82 गुना बढ़ गया यह संबंध अन्य मेडिकल फैक्टर्स को ध्यान में रखने के बाद भी मजबूत बना रहा। क्यों अहम है eGFR स्लोप अब तक डॉक्टर आमतौर पर एक समय के eGFR स्तर को देखकर बीमारी का आकलन करते थे। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि समय के साथ eGFR का ट्रेंड यानी स्लोप, बीमारी की असली गति और जोखिम को बेहतर तरीके से दिखाता है। इलाज और रिसर्च में बड़ा बदलाव इस खोज से भविष्य में दो बड़े फायदे हो सकते हैं: मरीजों की जल्दी पहचान और सही समय पर इलाज नई दवाओं के ट्रायल में तेजी, क्योंकि लंबे समय तक इंतजार किए बिना प्रभाव का आकलन संभव होगा क्या है इसका मतलब यह रिसर्च इस बात को मजबूत करती है कि IgA Nephropathy जैसे धीमी गति से बढ़ने वाले किडनी रोगों में नियमित मॉनिटरिंग और डेटा आधारित विश्लेषण बेहद जरूरी है। eGFR स्लोप को अपनाने से डॉक्टर मरीजों के लिए अधिक सटीक और व्यक्तिगत उपचार योजना बना सकेंगे।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
HER2 cancer vaccine research showing immune response targeting tumor cells in lab study
कैंसर इलाज में नई उम्मीद: HER-2 वैक्सीन ने दिखाया असर, एंटीबॉडी थेरेपी के साथ भी कायम रही ताकत

कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक नई रिसर्च ने उम्मीद जगाई है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नई HER-2 वैक्सीन ने न सिर्फ मजबूत इम्यून रिस्पॉन्स दिखाया है, बल्कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी के साथ भी प्रभावी बनी रही है। यह खोज खासतौर पर HER-2 पॉजिटिव कैंसर–जैसे कुछ प्रकार के ब्रेस्ट कैंसर–के इलाज के लिए अहम मानी जा रही है। क्या है नई HER-2 वैक्सीन? यह नई वैक्सीन, ES2B-C001, वायरस जैसे कणों (Virus-like particles) पर आधारित है, जो HER-2 प्रोटीन के पूरे बाहरी हिस्से को प्रदर्शित करती है। प्रीक्लिनिकल (प्रयोगशाला) अध्ययनों में इस वैक्सीन ने शरीर में मजबूत एंटीबॉडी प्रतिक्रिया पैदा की, जो ट्यूमर और मेटास्टेसिस (फैलाव) को खत्म करने में सक्षम रही। मजबूत इम्यून रिस्पॉन्स का दावा शोध में पाया गया कि इस वैक्सीन से शरीर में एंटी-HER-2 इम्यूनोग्लोबुलिन G (IgG) का स्तर काफी ऊंचा रहा और यह प्रभाव 6 महीने से अधिक समय तक बना रहा। साथ ही, T-सेल्स की सक्रियता भी बढ़ी, जो कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एंटीबॉडी थेरेपी के साथ भी असर बरकरार सबसे अहम बात यह रही कि जब इस वैक्सीन को एंटी-HER-2 मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (जैसे 4D5) के साथ दिया गया, तब भी इसकी प्रभावशीलता कम नहीं हुई। इसका मतलब है कि पहले से चल रहे इलाज के साथ भी यह वैक्सीन असरदार बनी रह सकती है। ट्यूमर पर कितना असर? माउस मॉडल (चूहों पर किए गए अध्ययन) में: केवल वैक्सीन देने पर 20 में से 13 चूहे लंबे समय तक ट्यूमर-फ्री रहे वैक्सीन + एंटीबॉडी थेरेपी के साथ यह आंकड़ा बढ़कर 20 में से 15 हो गया यह दर्शाता है कि वैक्सीन अकेले और कॉम्बिनेशन दोनों में प्रभावी है। भविष्य के लिए क्या संकेत? यह वैक्सीन अब क्लिनिकल डेवलपमेंट के चरण में पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इंसानों पर भी इसके परिणाम सकारात्मक रहते हैं, तो यह HER-2 पॉजिटिव कैंसर के इलाज में बड़ा बदलाव ला सकती है। खासतौर पर उन मरीजों के लिए, जो पहले से एंटी-HER-2 थेरेपी जैसे ट्रास्टुजुमैब ले रहे हैं, यह एक अतिरिक्त और प्रभावी विकल्प बन सकता है। क्या है इसका महत्व? यह रिसर्च इस दिशा में एक बड़ा कदम है कि भविष्य में कैंसर इलाज सिर्फ दवाओं तक सीमित न रहकर वैक्सीन आधारित इम्यून थेरेपी तक भी विस्तारित हो सकता है।  

surbhi अप्रैल 28, 2026 0
Young person using e-cigarette vape device highlighting potential cognitive health risks and dementia study findings
ई-सिगरेट से बढ़ सकता है डिमेंशिया का खतरा, युवाओं पर नए शोध में चौंकाने वाला खुलासा

नई दिल्ली: युवाओं में तेजी से बढ़ते ई-सिगरेट (E-Cigarette) के इस्तेमाल को लेकर एक नया शोध सामने आया है, जिसने गंभीर चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन के मुताबिक, 18 से 25 वर्ष के युवाओं में ई-सिगरेट का उपयोग शुरुआती संज्ञानात्मक गिरावट (Cognitive Decline) और डिमेंशिया के बढ़ते जोखिम से जुड़ा पाया गया है। यह शोध ऐसे समय में आया है जब दुनियाभर में किशोरों और युवाओं के बीच ई-सिगरेट का चलन तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि मस्तिष्क के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में निकोटिन का प्रभाव सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है। कैसे किया गया अध्ययन? इस क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में थाईलैंड के 232 युवाओं को शामिल किया गया, जिन्हें दो समूहों में बांटा गया–ई-सिगरेट उपयोग करने वाले और नॉन-स्मोकर्स। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की कार्यक्षमता को मापने के लिए Montreal Cognitive Assessment जैसे टूल्स का इस्तेमाल किया, साथ ही ADHD (Attention-Deficit/Hyperactivity Disorder) और इमोशनल इंटेलिजेंस से जुड़े पहलुओं का भी आकलन किया गया। क्या निकला निष्कर्ष? अध्ययन में पाया गया कि: ई-सिगरेट उपयोग करने वालों में डिमेंशिया के जोखिम वाले व्यक्तियों की संख्या काफी अधिक थी। जो युवा एक महीने के भीतर ई-सिगरेट छोड़ने की योजना नहीं बना रहे थे, उनमें जोखिम 6 गुना तक बढ़ा पाया गया। वहीं, छह महीने तक छोड़ने की कोई योजना न रखने वालों में यह जोखिम 4 गुना अधिक था। हालांकि, ADHD के लक्षण और इमोशनल इंटेलिजेंस के स्तर में दोनों समूहों के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। शुरुआती संकेत, लेकिन खतरे की घंटी विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन डिमेंशिया की पुष्टि नहीं करता, बल्कि इसके शुरुआती संकेतों की ओर इशारा करता है। यानी यह जोखिम भविष्य में गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है। कारण और सीमाएं शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी है, इसलिए यह तय नहीं किया जा सकता कि ई-सिगरेट सीधे तौर पर डिमेंशिया का कारण बनती है। इसके पीछे अन्य सामाजिक या व्यवहारिक कारण भी हो सकते हैं। क्यों जरूरी है सतर्कता? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर युवाओं में इस तरह के शुरुआती संज्ञानात्मक बदलाव बढ़ते हैं, तो भविष्य में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि: युवाओं में ई-सिगरेट के नुकसान को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए निकोटिन की लत से बचने के लिए काउंसलिंग और रोकथाम कार्यक्रम चलाए जाएं आगे और लंबे समय तक चलने वाले शोध किए जाएं

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Healthcare worker on night shift monitoring blood sugar levels for Type 2 diabetes management.
नाइट शिफ्ट में काम करने वालों के लिए चेतावनी: टाइप 2 डायबिटीज मैनेजमेंट पर गहरा असर, नई स्टडी में खुलासा

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों पर की गई एक नई रिसर्च ने यह संकेत दिया है कि नाइट शिफ्ट में काम करना टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है। 10 दिनों तक चले इस ऑब्जर्वेशनल अध्ययन में पाया गया कि रात में काम करने से खानपान की आदतें, जागने का समय और ब्लड शुगर का उतार-चढ़ाव काफी प्रभावित होता है। स्टडी में क्या पाया गया? इस अध्ययन में टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित 37 हेल्थकेयर वर्कर्स को शामिल किया गया, जिनमें से अधिकतर महिलाएं थीं और नर्स या मिडवाइफ के रूप में कार्यरत थीं। रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों की ब्लड शुगर, फिजिकल एक्टिविटी, डाइट और नींद के पैटर्न को बारीकी से मॉनिटर किया गया। हालांकि औसत ब्लड शुगर लेवल में खास अंतर नहीं पाया गया, लेकिन ग्लूकोज में उतार-चढ़ाव (ग्लाइसेमिक वेरिएबिलिटी) नाइट शिफ्ट के दौरान ज्यादा देखा गया। खासतौर पर ‘मीन एब्सोल्यूट ग्लूकोज चेंज’ और ‘कंटीन्यूस ओवरलैपिंग नेट ग्लाइसेमिक एक्शन’ जैसे संकेतकों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो यह दिखाता है कि रात में काम करने से ब्लड शुगर ज्यादा अस्थिर हो सकता है। खानपान पर असर नाइट शिफ्ट के दौरान लोगों की खाने की आदतों में भी बड़ा बदलाव देखा गया। इन दिनों में कैलोरी इनटेक सबसे ज्यादा (लगभग 2199 kcal) रहा। साथ ही मीठे स्नैक्स का सेवन भी बढ़ गया - जो कुल ऊर्जा का करीब 13.4% था, जबकि आराम के दिनों में यह घटकर 7.8% रह गया। खाने की संख्या भी नाइट शिफ्ट में सबसे ज्यादा रही (औसतन 7 बार), जबकि आराम के दिनों में यह घटकर लगभग 3.4 बार रह गई। एक्टिविटी और जागने का समय रात में काम करने वाले लोग ज्यादा समय तक जागते रहे - औसतन 22 घंटे से अधिक। इसके साथ ही उनकी फिजिकल एक्टिविटी भी बढ़ी, जहां स्टेप काउंट 13,775 तक पहुंच गया। यह बदलाव शरीर के मेटाबॉलिज्म और शुगर कंट्रोल को प्रभावित कर सकते हैं। क्यों है यह चिंता का विषय? विशेषज्ञों के अनुसार, नाइट शिफ्ट में काम करने से शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित होती है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है। यह डायबिटीज के मरीजों में ब्लड शुगर कंट्रोल को और कठिन बना देता है। क्या है समाधान? इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नाइट शिफ्ट करने वाले डायबिटीज मरीजों के लिए अलग तरह की डाइट, नींद और लाइफस्टाइल प्लानिंग जरूरी है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे लोगों के लिए विशेष गाइडलाइन और सपोर्ट सिस्टम विकसित किए जाने चाहिए, ताकि वे अपनी बीमारी को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकें।  

surbhi अप्रैल 10, 2026 0
liver illustration highlighting fibrosis risk from binge drinking
महीने में एक बार ‘बिंज ड्रिंकिंग’ भी खतरनाक: लीवर फाइब्रोसिस का खतरा तीन गुना बढ़ा, नई स्टडी में खुलासा

अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च के मुताबिक, Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease से पीड़ित लोग अगर महीने में कम से कम एक बार भी ‘बिंज ड्रिंकिंग’ करते हैं, तो उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है। क्या है यह स्टडी? यह अध्ययन National Health and Nutrition Examination Survey (NHANES) के 2017–2023 के डेटा पर आधारित है। इसमें 8,000 से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिनमें विभिन्न प्रकार की लीवर बीमारियों से पीड़ित मरीज शामिल थे। शोधकर्ताओं ने ‘बिंज ड्रिंकिंग’ को इस तरह परिभाषित किया: महिलाओं के लिए: एक दिन में 4 या उससे ज्यादा ड्रिंक पुरुषों के लिए: एक दिन में 5 या उससे ज्यादा ड्रिंक और यह आदत महीने में कम से कम एक बार चौंकाने वाले नतीजे स्टडी में पाया गया कि: MASLD के मरीज जो बिंज ड्रिंकिंग करते हैं, उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा करीब 3 गुना ज्यादा होता है। ऐसे मरीजों में गंभीर फाइब्रोसिस का खतरा 1.69 गुना और एडवांस्ड फाइब्रोसिस का खतरा 2.76 गुना अधिक पाया गया। जितनी ज्यादा मात्रा में एक बार में शराब पी जाती है, लीवर को उतना ही ज्यादा नुकसान होता है। किन लोगों में ज्यादा खतरा? रिसर्च के अनुसार: युवाओं और पुरुषों में बिंज ड्रिंकिंग की आदत ज्यादा देखी गई MASLD के लगभग 15.9% मरीज इस तरह की पीने की आदत रखते हैं लीवर फाइब्रोसिस कैसे मापा गया? शोधकर्ताओं ने लीवर की कठोरता (liver stiffness) के आधार पर बीमारी की गंभीरता तय की: 8 kPa या उससे ज्यादा: महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस 12 kPa या उससे ज्यादा: एडवांस्ड फाइब्रोसिस रिसर्च से क्या संकेत मिले? अभी तक लीवर बीमारी की श्रेणियों में केवल औसत शराब सेवन को ध्यान में रखा जाता था, लेकिन यह स्टडी बताती है कि ‘कभी-कभार ज्यादा पीना’ भी उतना ही खतरनाक है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर बिंज ड्रिंकिंग को ध्यान में रखकर मरीजों को दोबारा वर्गीकृत किया जाए, तो MetALD (MASLD + Alcohol) के मामलों की संख्या अमेरिका में दोगुनी से भी ज्यादा हो सकती है। क्या है इसका मतलब? यह रिसर्च साफ संकेत देती है कि: “कभी-कभी ज्यादा पीना” भी सुरक्षित नहीं है लीवर रोग के मरीजों को शराब से पूरी तरह बचना चाहिए डॉक्टरों को मरीजों की पीने की आदतों का और गहराई से आकलन करना चाहिए

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
Microscopic view of bacteria linked to Noma disease affecting oral tissues in children.
Noma पर बड़ी वैज्ञानिक खोज: जानलेवा बीमारी के पीछे बैक्टीरिया की पहचान

एक नई रिसर्च ने बच्चों में होने वाली खतरनाक बीमारी Noma को लेकर बड़ा खुलासा किया है। यह बीमारी बेहद तेजी से फैलती है और कुछ ही दिनों में चेहरे और मुंह के ऊतकों को नष्ट कर सकती है। खासकर गरीबी में रहने वाले बच्चों के लिए यह जानलेवा साबित होती है। हालांकि World Health Organization ने 2023 में इसे Neglected Tropical Disease घोषित किया था, लेकिन अब तक इसके पीछे के असली माइक्रोबियल कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे।   क्या कहती है नई स्टडी? नाइजीरिया के Sokoto स्थित Noma अस्पताल में बच्चों के सैंपल्स पर की गई स्टडी में आधुनिक metagenomic sequencing तकनीक का इस्तेमाल किया गया।  इसमें पाया गया कि Noma से पीड़ित बच्चों के मुंह में बैक्टीरिया का संतुलन पूरी तरह बिगड़ा हुआ था।  ज्यादा पाए गए खतरनाक बैक्टीरिया: Treponema Porphyromonas Bacteroides  कम पाए गए “अच्छे” बैक्टीरिया: Streptococcus Rothia नई बैक्टीरिया प्रजाति की खोज स्टडी में एक नई प्रजाति Treponema sp. A की पहचान हुई, जो: 19 में से 15 बच्चों में पाई गई स्वस्थ बच्चों में नहीं मिली इससे संकेत मिलता है कि यह बैक्टीरिया बीमारी का कारण भी हो सकता है या एक अहम “बायोमार्कर” बन सकता है। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस भी चिंता का कारण रिसर्च में यह भी सामने आया कि: कई बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोध (resistance) दिखा रहे हैं खासकर beta-lactam और metronidazole जैसी दवाओं के खिलाफ  इससे इलाज और मुश्किल हो सकता है। क्यों है यह खोज महत्वपूर्ण? Noma की शुरुआती पहचान (early diagnosis) आसान हो सकती है नए ट्रीटमेंट और दवाओं के रास्ते खुल सकते हैं गरीब और संसाधन-सीमित क्षेत्रों में बच्चों की जान बचाने में मदद मिलेगी

surbhi अप्रैल 7, 2026 0
Child sleeping with breathing difficulty, highlighting impact of sleep disorder on brain development
बच्चों में स्लीप ब्रीदिंग डिसऑर्डर का खतरा: दिमागी विकास पर पड़ सकता है गहरा असर

नई रिसर्च में एक गंभीर खुलासा हुआ है-बच्चों में नींद के दौरान सांस लेने से जुड़ी समस्याएं, यानी Sleep Breathing Disorders, उनके मानसिक और बौद्धिक विकास को प्रभावित कर सकती हैं। यह अध्ययन एक व्यापक सिस्टमैटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस पर आधारित है, जिसमें 1,137 बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया गया। क्या कहती है रिसर्च? इस शोध में 15 केस-कंट्रोल स्टडीज़ को शामिल किया गया, जिनमें 659 बच्चों को स्लीप ब्रीदिंग डिसऑर्डर की पुष्टि हुई थी। बच्चों की मानसिक क्षमता को मापने के लिए Wechsler Intelligence Scale for Children (WISC) का उपयोग किया गया। नतीजों में पाया गया कि जिन बच्चों को यह समस्या थी, उनका प्रदर्शन लगभग हर कॉग्निटिव क्षेत्र जैसे ध्यान, याददाश्त और निर्णय क्षमत में सामान्य बच्चों की तुलना में कमजोर रहा। दिमाग पर कैसे पड़ता है असर? शोधकर्ताओं के अनुसार, इन समस्याओं का असर सीधे दिमाग के उस हिस्से पर पड़ता है जिसे Prefrontal Cortex कहा जाता है। यही हिस्सा निर्णय लेने, सीखने और व्यवहार को नियंत्रित करता है। हालांकि, ‘Vocabulary’ (शब्द ज्ञान) में कोई खास अंतर नहीं पाया गया, लेकिन बाकी सभी क्षेत्रों में स्पष्ट गिरावट देखी गई। क्या हैं इसके पीछे के कारण? विशेषज्ञों ने इसके दो प्रमुख कारण बताए: रात में ऑक्सीजन की कमी (Hypoxia): बार-बार सांस रुकने से दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती नींद में बार-बार रुकावट (Sleep Fragmentation): बार-बार जागने से नींद पूरी नहीं हो पाती इन दोनों वजहों से बच्चों की एकाग्रता, याददाश्त और स्कूल परफॉर्मेंस पर सीधा असर पड़ता है। लंबे समय में कितना खतरनाक? अगर समय रहते इलाज न किया जाए, तो यह समस्या बच्चों के बौद्धिक विकास पर स्थायी असर डाल सकती है। खासतौर पर Obstructive Sleep Apnea और मुंह से सांस लेने जैसी आदतों को नजरअंदाज करना आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकता है। क्या करें माता-पिता? विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बच्चे में ये लक्षण दिखें, तो तुरंत जांच करानी चाहिए: सोते समय खर्राटे लेना बार-बार जागना दिन में थकान या ध्यान की कमी पढ़ाई में गिरावट समय पर पहचान और इलाज से बच्चों के मानसिक विकास को बेहतर किया जा सकता है।  

surbhi अप्रैल 6, 2026 0
Doctor consulting patient via telemedicine app discussing diet plan for fatty liver and diabetes management
नई स्टडी में खुलासा: टेलीमेडिसिन से कम हो सकता है फैटी लिवर का खतरा, डायबिटीज मरीजों के लिए उम्मीद की किरण

एक नई स्टडी में सामने आया है कि न्यूट्रिशन आधारित टेलीमेडिसिन मॉडल, टाइप 2 डायबिटीज और मोटापे से जूझ रहे लोगों में लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारी Metabolic dysfunction-associated steatotic liver disease (MASLD) के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है। MASLD एक ऐसी स्थिति है, जिसमें लिवर में फैट जमा होने लगता है और यह आगे चलकर गंभीर बीमारी Metabolic dysfunction-associated steatohepatitis में बदल सकती है, जिससे मृत्यु और अन्य जटिलताओं का जोखिम बढ़ जाता है। क्यों खतरनाक है MASLD? Type 2 Diabetes और मोटापे से पीड़ित लोगों में MASLD तेजी से बढ़ती समस्या बनती जा रही है। दुनियाभर में इसके मामलों में बढ़ोतरी के कारण डॉक्टर अब ऐसे उपायों की तलाश में हैं, जो आसान, सुलभ और लंबे समय तक असरदार हों। टेलीमेडिसिन से मिला बड़ा फायदा इस स्टडी में 2015 से 2024 के बीच 5,000 से ज्यादा मरीजों पर एक खास टेलीमेडिसिन प्रोग्राम कार्बोहाइड्रेट कम करने पर आधारित न्यूट्रिशन थेरेपी का असर देखा गया। रिसर्च में सामने आया कि: टेलीमेडिसिन अपनाने वाले मरीजों में लिवर रोग का खतरा 36% कम था गंभीर स्थिति (MASH) में जाने का खतरा 62% कम हुआ एडवांस्ड लिवर डिजीज का रिस्क 67% तक घटा लिवर से जुड़ी जटिलताएं 75% तक कम देखी गईं वजन घटाना बना सबसे बड़ा हथियार स्टडी में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों ने 15% या उससे ज्यादा वजन कम किया, उनमें लिवर बीमारी का खतरा और भी कम हो गया। यानी डाइट कंट्रोल और वजन घटाना, दोनों मिलकर इस बीमारी के खिलाफ मजबूत सुरक्षा दे सकते हैं। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के लिए बड़ा समाधान टेलीमेडिसिन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह उन लोगों तक भी पहुंच सकता है, जहां हेल्थकेयर सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में यह मॉडल भविष्य में बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।  

surbhi अप्रैल 4, 2026 0
Person practicing short mental exercise for depression relief using mindfulness and cognitive techniques
क्या सिर्फ 10 मिनट का मानसिक व्यायाम कम कर सकता है डिप्रेशन? नई रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे

  डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण दुनियाभर में डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। हर साल करोड़ों लोग इससे प्रभावित होते हैं, लेकिन महंगी थेरेपी, सामाजिक झिझक और विशेषज्ञों की कमी के कारण बहुत से मरीज समय पर इलाज नहीं करा पाते। इसी बीच एक नई रिसर्च ने उम्मीद की किरण दिखाई है। जर्नल Nature Human Behaviour में प्रकाशित 2026 के अध्ययन के अनुसार, सिर्फ 10 मिनट के मनोवैज्ञानिक अभ्यास भी डिप्रेशन के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं और इसका असर एक महीने तक बना रह सकता है।   10 मिनट के छोटे अभ्यास से दिखा असर इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अमेरिका के 7,505 वयस्कों को शामिल किया, जो डिप्रेशन के लक्षणों से जूझ रहे थे। शोधकर्ताओं ने इन प्रतिभागियों को अलग-अलग डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यासों के समूहों में बांटा। हर अभ्यास 10 मिनट से कम समय का था और इसमें ऐसे व्यावहारिक कौशल सिखाए गए, जो आमतौर पर मनोचिकित्सा (Psychotherapy) में इस्तेमाल किए जाते हैं। इन अभ्यासों में शामिल थे: नकारात्मक विचारों को नए नजरिए से देखना लक्ष्य तय करना और प्रेरणा बढ़ाना दूसरों की मदद करके जीवन के अर्थ को समझना प्रतिभागियों की मानसिक स्थिति का आकलन अभ्यास के तुरंत बाद और फिर एक महीने बाद किया गया।   दो तकनीकों ने दिखाया सबसे बेहतर परिणाम अध्ययन में पाया गया कि कुछ अभ्यासों से लोगों में तुरंत उम्मीद और प्रेरणा बढ़ी। लेकिन दो विशेष तकनीकों ने लंबे समय तक असर दिखाया: नकारात्मक विचारों को नए और सकारात्मक नजरिए से समझने की मानसिक तकनीक। ध्यान केंद्रित करना इन तकनीकों का उपयोग करने वाले प्रतिभागियों में एक महीने बाद भी डिप्रेशन के लक्षणों में औसतन 4% अधिक कमी देखी गई, जो कंट्रोल ग्रुप के मुकाबले बेहतर थी।   छोटे उपाय भी बन सकते हैं बड़ी मदद शोधकर्ताओं के अनुसार यह सुधार भले ही छोटा लगे, लेकिन इसका महत्व काफी बड़ा है। क्योंकि ऐसे छोटे डिजिटल अभ्यास लाखों लोगों तक आसानी से पहुंच सकते हैं, खासकर उन लोगों तक जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास थेरेपी का विकल्प नहीं हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए शुरुआती सहायक उपकरण के रूप में देखे जाने चाहिए।   अन्य शोध भी देते हैं इसी तरह के संकेत मानसिक स्वास्थ्य पर छोटे-छोटे अभ्यासों के सकारात्मक प्रभाव को लेकर पहले भी कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। 2024 में British Journal of Health Psychology में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि रोजाना 10 मिनट की माइंडफुलनेस प्रैक्टिस से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ और डिप्रेशन व एंग्जायटी के लक्षण कम हुए। इसके अलावा National Institutes of Health की 2019 की समीक्षा में भी बताया गया कि शारीरिक गतिविधि और व्यायाम मूड बेहतर करने और डिप्रेशन के लक्षण घटाने में मदद कर सकते हैं।   छोटे कदम भी बदल सकते हैं मानसिक स्थिति डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को अक्सर लगता है कि स्थिति से बाहर निकलना मुश्किल है। लेकिन यह नई रिसर्च बताती है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। कभी-कभी सिर्फ 10 मिनट का मानसिक अभ्यास, नई सोच सीखना या किसी छोटे लक्ष्य पर काम करना भी मनोदशा को बेहतर बनाने की दिशा में पहला कदम बन सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यास मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।  

surbhi मार्च 7, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Indian delegation at international cyber security meeting after India assumed CCDB chairmanship role
राष्ट्रीय

भारत को मिली बड़ी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी, संभाला CCDB के अध्यक्ष का पद

surbhi मई 15, 2026 0