एक नई स्टडी में सामने आया है कि गंभीर मानसिक बीमारियों (Serious Mental Illness - SMI) से जूझ रहे Veterans ने स्वास्थ्य निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले Wearable Devices को काफी सकारात्मक तरीके से स्वीकार किया। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये डिवाइस मरीजों की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखने में मदद कर सकते हैं, खासकर तब जब डॉक्टर की अपॉइंटमेंट्स के बीच लंबा अंतर हो।
यह अध्ययन अमेरिका के Greater Los Angeles Veterans Affairs System के तहत इलाज करा रहे मरीजों पर किया गया। इसमें schizophrenia spectrum disorders, bipolar disorder और post-traumatic stress disorder (PTSD) से पीड़ित 15 Veterans को शामिल किया गया।
प्रतिभागियों ने दो हफ्ते से लेकर एक महीने तक wearable health devices का इस्तेमाल किया। इसके बाद शोधकर्ताओं ने उनके अनुभवों को समझने के लिए विस्तृत इंटरव्यू किए।
स्टडी में शामिल कई मरीजों ने बताया कि wearable devices को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करना आसान था। इन डिवाइस की मदद से वे अपनी:
जैसी चीजों को ट्रैक कर पा रहे थे।
कई प्रतिभागियों ने कहा कि इन आंकड़ों को देखने से उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूकता मिली और स्वस्थ आदतें अपनाने की प्रेरणा भी मिली। कुछ मरीजों ने नियमित वॉक, एक्सरसाइज और बेहतर नींद की दिनचर्या बनाए रखने की बात कही।
स्टडी की एक अहम बात यह रही कि अधिकांश प्रतिभागियों ने Privacy या Location Tracking को लेकर कोई चिंता नहीं जताई। मरीजों का मानना था कि डॉक्टरों के साथ यह स्वास्थ्य डेटा साझा करने से बेहतर इलाज और सही निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि मरीजों ने Patient-Generated Health Data को Healthcare Providers के लिए उपयोगी माना।
हालांकि, लंबे समय तक wearable devices इस्तेमाल करने में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं। प्रतिभागियों ने बताया कि:
विशेष रूप से Anxiety और Relapse जैसे संकेतों को ट्रैक करने की क्षमता पर सवाल उठाए गए।
शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर तकनीकी सहायता बेहतर की जाए और Mood Tracking, Medication Reminders जैसे फीचर्स जोड़े जाएं, तो यह तकनीक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में बड़ा बदलाव ला सकती है।
हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि अभी बड़े स्तर पर और अध्ययन की जरूरत है ताकि यह समझा जा सके कि नियमित इलाज में Wearable Data को शामिल करने से मरीजों के Clinical Outcomes में कितना सुधार हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
आजकल “फाइबर” सिर्फ पोषण से जुड़ा शब्द नहीं रह गया है, बल्कि हेल्दी लाइफस्टाइल का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर को स्वस्थ रखने और कई गंभीर बीमारियों से बचाने में पर्याप्त फाइबर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बावजूद ज्यादातर लोग अपनी रोजाना की जरूरत के अनुसार फाइबर का सेवन नहीं कर पा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त फाइबर लेने से: पाचन तंत्र बेहतर रहता है ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद मिलती है दिल स्वस्थ रहता है लंबे समय तक पेट भरा महसूस होता है कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा कम हो सकता है US Food and Drug Administration के अनुसार एक स्वस्थ वयस्क को रोजाना लगभग 28 ग्राम फाइबर लेना चाहिए। लेकिन कई शोध बताते हैं कि अधिकतर लोग इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं। आइए जानते हैं रोजाना फाइबर बढ़ाने के 7 आसान और असरदार तरीके। 1. फलों और सब्जियों का छिलका न हटाएं विशेषज्ञों का कहना है कि कई फलों और सब्जियों के छिलकों में अंदरूनी हिस्से से ज्यादा फाइबर होता है। उदाहरण के तौर पर, अगर सेब को छिलके सहित खाया जाए तो लगभग 2 ग्राम अतिरिक्त फाइबर मिलता है। जहां संभव हो, पूरे फल खाना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। 2. दाल और बीन्स को भोजन में शामिल करें मसूर दाल, राजमा, चना और दूसरी दालें फाइबर का बेहतरीन स्रोत मानी जाती हैं। इन्हें: सलाद सूप चावल पास्ता जैसे भोजन में मिलाकर आसानी से खाया जा सकता है। इससे खाना ज्यादा पौष्टिक और पेट भरने वाला बनता है। 3. बीज और मेवे का सेवन बढ़ाएं Chia seed, अलसी के बीज और दूसरे पौष्टिक बीज फाइबर बढ़ाने का आसान तरीका हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक: चिया सीड्स में लगभग 10 ग्राम फाइबर अलसी में करीब 8 ग्राम फाइबर पाया जाता है। इन्हें दही, दलिया, सलाद या स्मूदी में मिलाकर खाया जा सकता है। 4. मिठाई के साथ फल खाएं अगर आपको मीठा पसंद है तो मिठाई के साथ ताजे फल खाना बेहतर विकल्प हो सकता है। कुछ ज्यादा फाइबर वाले फल: नाशपाती सेब रसभरी ये शरीर को विटामिन और खनिज भी प्रदान करते हैं। 5. ज्यादा फाइबर वाले स्नैक्स चुनें तले-भुने और प्रोसेस्ड स्नैक्स की जगह ऐसे विकल्प चुनें जिनमें प्राकृतिक फाइबर ज्यादा हो, जैसे: भुना चना पॉपकॉर्न मेवे बीज उदाहरण के तौर पर, बिना ज्यादा तेल वाला पॉपकॉर्न फाइबर का अच्छा स्रोत माना जाता है। 6. “पकाएं और ठंडा करें” तरीका अपनाएं विशेषज्ञों के अनुसार आलू, चावल, पास्ता और कुछ दालों को पकाकर ठंडा करने से उनमें “रेजिस्टेंट स्टार्च” बनता है। यह तरीका: ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद करता है कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक हो सकता है पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है लंबे समय तक पेट भरा रखता है 7. जूस की बजाय पूरा फल खाएं फलों के रस की तुलना में पूरा फल ज्यादा फायदेमंद माना जाता है क्योंकि उसमें फाइबर सुरक्षित रहता है। पूरा फल: पाचन को धीमा करता है ज्यादा देर तक पेट भरा रखता है अचानक शुगर बढ़ने की संभावना कम करता है इसीलिए विशेषज्ञ जूस की जगह पूरे फल खाने की सलाह देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे-छोटे बदलाव करके भी रोजाना फाइबर का सेवन काफी बढ़ाया जा सकता है। संतुलित आहार के साथ फाइबर से भरपूर चीजों को शामिल करना लंबे समय तक अच्छी सेहत बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्मियों के मौसम में तेज धूप और UV किरणों का असर त्वचा पर तेजी से दिखाई देने लगता है। लंबे समय तक धूप में रहने से टैनिंग, सनबर्न, ड्रायनेस, जलन और समय से पहले झुर्रियों जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में ज्यादातर लोग सनस्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन बाजार में मिलने वाले कई प्रोडक्ट्स में केमिकल्स और आर्टिफिशियल फ्रेगरेंस मौजूद होते हैं, जो संवेदनशील त्वचा वाले लोगों में एलर्जी या जलन पैदा कर सकते हैं। इसी वजह से अब लोग नेचुरल और होममेड सनस्क्रीन की ओर रुख कर रहे हैं। होममेड सनस्क्रीन क्यों हो रहा है लोकप्रिय? घर पर तैयार किया गया सनस्क्रीन प्राकृतिक चीजों से बनता है, जिससे त्वचा को मॉइस्चराइज रखने और धूप के असर को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह मेडिकल ग्रेड सनस्क्रीन का पूरा विकल्प नहीं माना जाता, लेकिन रोजमर्रा के इस्तेमाल में यह स्किन केयर रूटीन का अच्छा हिस्सा बन सकता है। खासकर हल्की धूप में यह त्वचा को राहत देने में सहायक माना जाता है। होममेड सनस्क्रीन बनाने के लिए जरूरी सामग्री नेचुरल सनस्क्रीन तैयार करने के लिए कुछ आसान चीजों की जरूरत होती है, जो घर में आसानी से मिल सकती हैं— • 2 चम्मच नारियल तेल • 2 चम्मच एलोवेरा जेल • 1 चम्मच शीया बटर • 1 चम्मच जिंक ऑक्साइड एलोवेरा त्वचा को ठंडक पहुंचाने में मदद करता है, जबकि नारियल तेल स्किन को मुलायम और मॉइस्चराइज रखने में सहायक माना जाता है। जिंक ऑक्साइड धूप के असर को कम करने में मदद कर सकता है। ऐसे तैयार करें नेचुरल सनस्क्रीन सबसे पहले शीया बटर और नारियल तेल को हल्का गर्म करके पिघला लें। इसके बाद इसमें एलोवेरा जेल मिलाएं और अच्छी तरह मिक्स करें। आखिर में जिंक ऑक्साइड डालकर मिश्रण को अच्छी तरह फेंट लें। तैयार मिश्रण को ठंडा होने के बाद साफ कंटेनर में भर लें। इस्तेमाल करते समय रखें ये सावधानियां धूप में निकलने से 15-20 मिनट पहले इसे चेहरे, गर्दन और हाथों पर लगाएं। ज्यादा पसीना आने या चेहरा धोने के बाद दोबारा लगाना बेहतर माना जाता है। किसी भी नई चीज को इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट जरूर करें। अगर त्वचा पर खुजली, जलन या लालपन महसूस हो तो इसका उपयोग तुरंत बंद कर दें। तेज धूप में अतिरिक्त सुरक्षा भी जरूरी विशेषज्ञों के अनुसार घर पर बने सनस्क्रीन की SPF क्षमता सीमित हो सकती है। इसलिए बहुत तेज धूप में टोपी, सनग्लासेस और फुल स्लीव कपड़ों का इस्तेमाल करना भी जरूरी है। सही स्किन केयर और सावधानी अपनाकर गर्मियों में त्वचा को स्वस्थ और सुरक्षित रखा जा सकता है।
EuroPCR 2026 में पेश किए गए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि लेफ्ट मेन कोरोनरी आर्टरी डिजीज से पीड़ित मरीजों में स्टेंट आधारित इलाज (पीसीआई) और बायपास सर्जरी (सीएबीजी) दोनों से लंबे समय में लगभग समान जीवन लाभ मिला है। इस रिसर्च को हृदय रोग उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। क्या है लेफ्ट मेन कोरोनरी आर्टरी डिजीज? लेफ्ट मेन कोरोनरी आर्टरी हृदय की सबसे महत्वपूर्ण धमनियों में से एक होती है, जो दिल के बड़े हिस्से तक रक्त पहुंचाने का काम करती है। इस धमनी में रुकावट आने पर हार्ट अटैक और जानलेवा जटिलताओं का खतरा काफी बढ़ जाता है। अब तक ऐसी स्थिति में बायपास सर्जरी को सबसे भरोसेमंद इलाज माना जाता था। लेकिन आधुनिक ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट तकनीक आने के बाद अब स्टेंट आधारित इलाज भी मजबूत विकल्प के रूप में उभर रहा है। चार बड़ी स्टडी के आंकड़ों का विश्लेषण यह अध्ययन चार बड़े अंतरराष्ट्रीय ट्रायल – सिंटैक्स, प्रीकॉम्बैट, नोबल और एक्सेल – के आंकड़ों पर आधारित था। शोधकर्ताओं ने कुल 4,394 मरीजों के लंबे समय तक के परिणामों का विश्लेषण किया। इसमें 10 साल तक के फॉलो-अप डेटा को शामिल किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि स्टेंट या बायपास सर्जरी में कौन-सा इलाज लंबे समय में अधिक फायदेमंद है। दोनों इलाजों में मृत्यु दर लगभग समान रिसर्च के अनुसार स्टेंट आधारित इलाज कराने वाले मरीजों में कुल मृत्यु दर 23.5 प्रतिशत रही, जबकि बायपास सर्जरी कराने वाले मरीजों में यह 23.1 प्रतिशत दर्ज की गई। यानी दोनों उपचारों के बीच लंबे समय के परिणामों में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। अध्ययन में यह भी सामने आया कि अलग-अलग जोखिम स्तर और बीमारी की गंभीरता वाले मरीजों में भी दोनों प्रक्रियाओं के नतीजे लगभग समान रहे। बायपास सर्जरी का मजबूत विकल्प बन सकता है स्टेंट विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन साबित करता है कि सही मरीजों के लिए स्टेंट आधारित इलाज अब बायपास सर्जरी का सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बन सकता है। खासकर उन मरीजों के लिए जो सर्जरी से बचना चाहते हैं या जिनके लिए ऑपरेशन ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है। हालांकि डॉक्टरों ने यह भी कहा कि इलाज का फैसला हृदय रोग विशेषज्ञों और सर्जनों की संयुक्त टीम की सलाह से ही लिया जाना चाहिए। भविष्य में बदल सकती हैं इलाज की गाइडलाइन इस अध्ययन के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में लेफ्ट मेन कोरोनरी आर्टरी डिजीज के इलाज से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइंस में स्टेंट आधारित इलाज की भूमिका और मजबूत हो सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार भविष्य की रिसर्च यह तय करने में मदद करेगी कि किन मरीजों को स्टेंट से अधिक लाभ होगा और किन्हें बायपास सर्जरी की जरूरत पड़ेगी।