स्वास्थ्य

पीरियड्स में असहनीय दर्द को न करें नजरअंदाज, एंडोमेट्रियोसिस बन सकता है बांझपन की वजह

abhishek singh जून 28, 2026 0
Periods
Periods Problem

नई दिल्ली, एजेंसियां। हर महीने होने वाला मासिक धर्म महिलाओं के शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रिया है, लेकिन यदि पीरियड्स के दौरान दर्द असहनीय हो जाए और रोजमर्रा के कामकाज प्रभावित होने लगें, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक दर्द कई बार एंडोमेट्रियोसिस जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है, जो समय पर इलाज न मिलने पर प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) को भी प्रभावित कर सकती है।

 

क्या है एंडोमेट्रियोसिस?


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में प्रजनन आयु की लगभग 10 प्रतिशत महिलाएं और किशोरियां एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित हैं। इस स्थिति में गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) जैसे ऊतक गर्भाशय के बाहर अंडाशय, फैलोपियन ट्यूब या पेट के अन्य हिस्सों में विकसित होने लगते हैं। मासिक चक्र के दौरान इन ऊतकों में भी रक्तस्राव और सूजन होती है, जिससे तेज दर्द, स्कारिंग और कई बार सिस्ट बनने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

 

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज


विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि हर माह पीरियड्स के दौरान असहनीय दर्द हो, बार-बार दर्द निवारक दवाओं की जरूरत पड़े, पेल्विक हिस्से में लगातार दर्द बना रहे, संभोग, पेशाब या शौच के समय दर्द महसूस हो, अत्यधिक रक्तस्राव, थकान, पेट फूलना, कब्ज या दस्त जैसी समस्याएं हों, तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। कई मामलों में बीमारी की पहचान वर्षों बाद हो पाती है क्योंकि इसके लक्षणों को सामान्य पीरियड्स का हिस्सा मान लिया जाता है।

 

बांझपन का बढ़ सकता है खतरा


अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट (ACOG) के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस महिलाओं में बांझपन के प्रमुख कारणों में शामिल है। यह बीमारी अंडाणु और शुक्राणु के मिलन की प्रक्रिया में बाधा डाल सकती है, जिससे गर्भधारण कठिन हो जाता है। हालांकि समय पर जांच, उचित दवाओं, हार्मोनल उपचार और जीवनशैली में सुधार के जरिए इसके जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

 

समय पर जांच है सबसे बड़ा बचाव


विशेषज्ञों का कहना है कि पीरियड्स के दौरान होने वाले अत्यधिक दर्द को सामान्य समझकर अनदेखा करना भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। इसलिए ऐसे किसी भी लक्षण के दिखने पर बिना देरी किए डॉक्टर से परामर्श लेना और आवश्यक जांच कराना ही सुरक्षित विकल्प है।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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सुप्रीम कोर्ट में कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित करने का मामला
कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने का निर्देश, सुप्रीम कोर्ट ने 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मांगा जवाब

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की शुरुआती पहचान और मरीजों के बेहतर उपचार के लिए 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने की दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार से भी इस मामले में अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए हलफनामा दाखिल करने को कहा है।   कैंसर के मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग पर जोर   सुप्रीम कोर्ट के सामने दायर याचिका में कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित करने की मांग की गई थी। इसका उद्देश्य देश में कैंसर के मामलों का ज्यादा सटीक आंकड़ा तैयार करना और बीमारी की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना है। नोटिफिएबल बीमारी घोषित होने के बाद संबंधित स्वास्थ्य संस्थानों के लिए बीमारी के मामलों की जानकारी सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को देना अनिवार्य हो जाता है। इससे सरकार को बीमारी के प्रसार, अलग-अलग क्षेत्रों में मरीजों की संख्या और उपचार की जरूरतों का बेहतर आकलन करने में मदद मिल सकती है।   19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर नजर   रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित करने पर विचार करने को कहा है। अदालत ने इस मामले में केंद्र से भी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। बताया गया है कि देश के कई राज्यों में कैंसर की रिपोर्टिंग और निगरानी की व्यवस्था पहले से लागू है। तेलंगाना ने भी 2026 में कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित करते हुए मामलों की रिपोर्टिंग की व्यवस्था शुरू की है।   जल्दी पहचान और इलाज में मिल सकती है मदद   कैंसर के मामलों की नियमित और अनिवार्य रिपोर्टिंग से बीमारी के वास्तविक बोझ का आकलन करने में मदद मिल सकती है। इससे सरकार को कैंसर स्क्रीनिंग, उपचार केंद्रों, दवाओं और अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं की योजना बनाने में बेहतर आंकड़े मिलेंगे। याचिका में भी तर्क दिया गया था कि कैंसर की जल्दी पहचान और समय पर उपचार के लिए देशभर में बेहतर निगरानी व्यवस्था जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम राष्ट्रीय स्तर पर कैंसर की निगरानी और स्वास्थ्य नीति को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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पैरों में सूजन या उभरी नसें? वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा में क्या अंतर, जानें कारण, लक्षण और खतरे

पैरों में सूजन, भारीपन या नसों का उभरना कई लोगों के लिए आम समस्या हो सकती है। खासकर लंबे समय तक खड़े रहने, लगातार बैठकर काम करने या दिनभर चलने-फिरने के बाद पैरों में ऐसी परेशानी महसूस हो सकती है। लेकिन हर बार इसे सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। कई मामलों में पैरों की उभरी हुई नसें वैरिकोज वेन्स का संकेत हो सकती हैं, जबकि पैर, टखने या पंजे में आने वाली सूजन लेग एडिमा से जुड़ी हो सकती है। देखने में दोनों समस्याएं कुछ हद तक समान लग सकती हैं, लेकिन इनके कारण, लक्षण और उपचार अलग-अलग होते हैं। वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा क्या एक ही समस्या है? नहीं। वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा दो अलग-अलग स्वास्थ्य स्थितियां हैं। वैरिकोज वेन्स में पैरों की सतही नसों के अंदर मौजूद वाल्व ठीक से काम नहीं कर पाते। इससे रक्त पैरों से ऊपर की ओर लौटने के बजाय नसों में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे नसें फैल जाती हैं और त्वचा के नीचे नीली, बैंगनी या टेढ़ी-मेढ़ी उभरी हुई दिखाई देने लगती हैं। वहीं लेग एडिमा में पैरों के ऊतकों में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा हो जाता है। इसके कारण पैर, टखने या पंजे में सूजन दिखाई देती है। एडिमा केवल लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने से नहीं, बल्कि कुछ दवाओं, गर्भावस्था और हृदय, किडनी, लिवर या लसीका तंत्र से जुड़ी समस्याओं के कारण भी हो सकती है। वैरिकोज वेन्स के प्रमुख लक्षण वैरिकोज वेन्स का सबसे स्पष्ट संकेत पैरों की नसों का सामान्य से अधिक उभरकर दिखाई देना है। इसके साथ कई अन्य लक्षण भी हो सकते हैं: नीली या बैंगनी रंग की उभरी हुई नसें नसों का टेढ़ा-मेढ़ा या गुच्छेदार दिखाई देना पैरों में भारीपन या थकान लंबे समय तक खड़े रहने पर दर्द या असहजता पैरों में खुजली या जलन रात के समय पैरों में ऐंठन टखनों के आसपास हल्की सूजन कुछ लोगों में लंबे समय तक वैरिकोज वेन्स रहने पर त्वचा के रंग में बदलाव, त्वचा में कठोरता या घाव जैसी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं। इसलिए लगातार दिखाई देने वाली उभरी नसों को केवल कॉस्मेटिक समस्या मानना उचित नहीं है। लेग एडिमा क्यों होती है? लेग एडिमा का अर्थ है पैरों के ऊतकों में जरूरत से ज्यादा तरल पदार्थ जमा होना। यह एक लक्षण है, जिसके पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। संभावित कारणों में शामिल हैं: लंबे समय तक बैठना या खड़े रहना गर्भावस्था अधिक नमक का सेवन कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव किडनी से जुड़ी बीमारी लिवर संबंधी समस्या हृदय संबंधी बीमारी लसीका तंत्र की समस्या डीप वेन थ्रॉम्बोसिस यानी डीवीटी कई मामलों में सूजे हुए हिस्से को उंगली से दबाने पर कुछ समय के लिए गड्ढा दिखाई दे सकता है। इसे पिटिंग एडिमा कहा जाता है। हालांकि, हर तरह की एडिमा में ऐसा होना जरूरी नहीं है। एक पैर अचानक सूज जाए तो सावधान पैरों में सूजन होने पर यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि सूजन एक पैर में है या दोनों पैरों में। अगर एक पैर में अचानक सूजन, दर्द, लालिमा या गर्माहट महसूस हो, तो इसे सामान्य समस्या मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण डीप वेन थ्रॉम्बोसिस जैसी गंभीर स्थिति से जुड़े हो सकते हैं और चिकित्सकीय जांच की जरूरत पड़ सकती है। अगर पैर की सूजन के साथ सांस लेने में परेशानी या सीने में दर्द हो, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा में मुख्य अंतर विशेषता वैरिकोज वेन्स लेग एडिमा मुख्य समस्या नसों के वाल्व का कमजोर होना ऊतकों में अतिरिक्त तरल जमा होना प्रमुख पहचान नीली, बैंगनी, उभरी या टेढ़ी नसें पैर, टखने या पंजे में सूजन सामान्य लक्षण भारीपन, दर्द, जलन और ऐंठन सूजन, खिंचाव और भारीपन त्वचा पर असर नसें स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं त्वचा तनी हुई या चमकदार लग सकती है दबाने पर गड्ढा आमतौर पर प्रमुख संकेत नहीं कुछ प्रकार की एडिमा में हो सकता है संभावित कारण नसों में रक्त का जमा होना शरीर के ऊतकों में तरल पदार्थ का जमा होना उपचार स्थिति के अनुसार कंप्रेशन, जीवनशैली में बदलाव या अन्य चिकित्सा उपचार मूल कारण के अनुसार उपचार दोनों समस्याओं का इलाज अलग होता है वैरिकोज वेन्स के मामले में डॉक्टर समस्या की गंभीरता के अनुसार व्यायाम, पैरों को कुछ समय के लिए ऊंचा रखने, कंप्रेशन स्टॉकिंग या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में नसों को बंद करने या हटाने से जुड़ी प्रक्रियाओं की आवश्यकता भी हो सकती है। लेग एडिमा में सबसे महत्वपूर्ण बात इसके मूल कारण का पता लगाना है। यदि सूजन किसी बीमारी या दवा के कारण है, तो उपचार उसी वजह के अनुसार किया जाता है। इसलिए केवल सूजन कम करने के लिए खुद से दवा लेना उचित नहीं है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? यदि पैरों में लगातार सूजन, दर्द, भारीपन, उभरी हुई नसें, त्वचा के रंग में बदलाव या बार-बार ऐंठन जैसी समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। खासकर अचानक एक पैर में सूजन आने, तेज दर्द होने, त्वचा लाल या गर्म होने अथवा इसके साथ सांस लेने में परेशानी या सीने में दर्द होने पर तुरंत चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।      

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Abdominal pain moving from the navel to the lower right side may indicate appendicitis and require medical evaluation.
नाभि से शुरू होकर पेट के दाईं तरफ खिसक रहा है दर्द? इसे गैस समझकर न करें नजरअंदाज, हो सकता है अपेंडिसाइटिस

पेट में दर्द होना आम समस्या है। कई बार गैस, कब्ज, अपच या एसिडिटी की वजह से होने वाला दर्द कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन अगर दर्द पहले नाभि के आसपास शुरू हो और कुछ घंटों के भीतर पेट के निचले दाहिने हिस्से में पहुंचकर लगातार तेज होने लगे, तो इसे सामान्य गैस समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, दर्द का इस तरह नाभि से पेट के निचले दाहिने हिस्से की ओर जाना अपेंडिसाइटिस का एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। अपेंडिसाइटिस में अपेंडिक्स में सूजन आ जाती है और समय पर उपचार नहीं मिलने पर यह फट भी सकता है। ऐसी स्थिति गंभीर संक्रमण का कारण बन सकती है। नाभि से दाईं तरफ क्यों खिसकता है दर्द? अपेंडिक्स बड़ी आंत से जुड़ी एक छोटी, उंगली जैसी संरचना होती है और आमतौर पर पेट के निचले दाहिने हिस्से में स्थित रहती है। अपेंडिक्स में सूजन की शुरुआत होने पर दर्द कई बार नाभि के आसपास महसूस होता है। शुरुआती चरण में यह दर्द आंतों से जुड़ी नसों के जरिए महसूस होता है। जैसे-जैसे सूजन बढ़ती है और पेट की अंदरूनी परत प्रभावित होती है, दर्द अपेंडिक्स की वास्तविक जगह यानी पेट के निचले दाहिने हिस्से में अधिक स्पष्ट और तेज महसूस होने लगता है। दर्द के इस स्थान बदलने को चिकित्सकीय भाषा में दर्द का स्थानांतरण कहा जाता है। हालांकि, हर व्यक्ति में अपेंडिसाइटिस के लक्षण बिल्कुल एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं है। किन लक्षणों के साथ बढ़ सकती है अपेंडिसाइटिस की आशंका? अगर पेट दर्द के साथ कुछ अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो चिकित्सकीय जांच जरूरी हो जाती है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं: 1. नाभि से दाईं तरफ जाता दर्द शुरुआत में दर्द नाभि के आसपास हो सकता है और कुछ घंटों के भीतर पेट के निचले दाहिने हिस्से में पहुंच सकता है। समय के साथ दर्द अधिक तेज और लगातार हो सकता है। 2. चलने या खांसने पर दर्द बढ़ना अपेंडिसाइटिस में पेट की हल्की गतिविधि भी दर्द बढ़ा सकती है। खांसने, चलने, शरीर को हिलाने या अचानक झटका लगने पर दर्द ज्यादा महसूस हो सकता है। 3. भूख कम लगना अपेंडिसाइटिस के दौरान अचानक खाने की इच्छा कम हो सकती है। इसके साथ कमजोरी या असहज महसूस होना भी हो सकता है। 4. मतली और उल्टी पेट दर्द के साथ जी मिचलाना या उल्टी होना भी अपेंडिसाइटिस के संभावित लक्षणों में शामिल है। 5. बुखार अपेंडिक्स में सूजन या संक्रमण बढ़ने पर हल्का बुखार हो सकता है। गंभीर स्थिति में बुखार अधिक भी हो सकता है। हर दाईं तरफ का दर्द अपेंडिसाइटिस नहीं होता यह समझना भी जरूरी है कि पेट के निचले दाहिने हिस्से में दर्द होने का मतलब हमेशा अपेंडिसाइटिस नहीं होता। गैस, आंतों से जुड़ी दूसरी समस्याएं, मूत्र संबंधी परेशानी और महिलाओं में कुछ स्त्री रोग संबंधी स्थितियां भी इसी क्षेत्र में दर्द का कारण बन सकती हैं। इसीलिए केवल लक्षणों के आधार पर खुद से बीमारी तय करना उचित नहीं है। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं में लक्षण अलग तरीके से दिखाई दे सकते हैं। समय पर इलाज क्यों जरूरी है? अपेंडिसाइटिस का समय पर उपचार न होने पर अपेंडिक्स फट सकता है। इसके बाद संक्रमण पेट के अंदर फैल सकता है और पेरिटोनाइटिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। कुछ मामलों में पेट के अंदर पस जमा हो सकती है और संक्रमण खून तक फैलने पर सेप्सिस का खतरा भी पैदा हो सकता है। इसी वजह से लगातार बढ़ते पेट दर्द को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। चिकित्सकीय जांच के बाद डॉक्टर स्थिति के अनुसार सर्जरी या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं। कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें? अगर पेट का दर्द नाभि से शुरू होकर निचले दाहिने हिस्से में पहुंच रहा है और लगातार बढ़ रहा है, तो जल्द चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। खासतौर पर दर्द के साथ बुखार, उल्टी, भूख न लगना, पेट में अत्यधिक संवेदनशीलता या चलने-खांसने पर तेज दर्द हो तो देरी नहीं करनी चाहिए।  

surbhi अगस्त 10, 2026 0
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