झारखंड

झारखंड में आज से पल्स पोलियो अभियान शुरू, 61 लाख से अधिक बच्चों को पिलाई जाएगी दो बूंद जिंदगी की

abhishek singh जून 28, 2026 0
Pulse Polio
Pulse Polio Vaccination

रांची। झारखंड में आज (28 जून) से तीन दिवसीय पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान की शुरुआत हो गई है। राज्य सरकार का लक्ष्य 5 वर्ष से कम उम्र के 61.26 लाख बच्चों को पोलियो रोधी दवा की खुराक पिलाना है, ताकि राज्य को पोलियो मुक्त बनाए रखने की दिशा में प्रयास जारी रहें। अभियान 28 जून से 30 जून तक चलेगा।

 

पहले दिन बूथों पर पिलाई जा रही है दवा

 

अभियान के पहले दिन राज्यभर में 24 हजार से अधिक पोलियो बूथ बनाए गए हैं, जहां अभिभावक अपने बच्चों को लेकर पहुंच रहे हैं। सभी सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनबाड़ी केंद्रों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भी विशेष बूथ लगाए गए हैं।

 

घर-घर जाकर पिलाई जाएगी दवा

 

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, 29 और 30 जून को स्वास्थ्यकर्मी, आंगनबाड़ी सेविकाएं, सहिया और आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर उन बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाएंगे, जो पहले दिन बूथ तक नहीं पहुंच पाए। अभियान में हजारों स्वास्थ्यकर्मियों और स्वयंसेवकों की तैनाती की गई है।

 

सभी विभागों को दिए गए समन्वय के निर्देश

 

स्वास्थ्य विभाग ने अभियान की सफलता के लिए आईसीडीएस, पंचायती राज, ग्रामीण विकास, शिक्षा विभाग और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को आपसी समन्वय के साथ काम करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे अपने पांच वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को पोलियो की खुराक अवश्य दिलाएं।

 

पोलियो मुक्त भारत बनाए रखने की पहल

 

भारत वर्ष 2014 से पोलियो मुक्त घोषित है, लेकिन संक्रमण की आशंका को देखते हुए नियमित रूप से पल्स पोलियो अभियान चलाया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्रत्येक बच्चे को पोलियो की दवा पिलाना बेहद जरूरी है, भले ही उसे पहले भी कई बार पोलियो की खुराक मिल चुकी हो।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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गढ़वा में हाथियों के झुंड का आतंक, बुजुर्ग को कुचलकर मार डाला; गांव में दहशत का माहौल

गढ़वा। झारखंड के गढ़वा जिले में जंगली हाथियों के झुंड ने एक बुजुर्ग पर हमला कर उन्हें कुचलकर मार डाला। घटना के बाद इलाके में दहशत फैल गई और ग्रामीणों ने वन विभाग से हाथियों के आतंक से सुरक्षा की मांग की है।    सुबह टहलने के दौरान हुआ हमला   जानकारी के अनुसार, बुजुर्ग सुबह घर से बाहर निकले थे। इसी दौरान जंगल की ओर से आए जंगली हाथियों के झुंड ने उन पर हमला कर दिया। स्थानीय लोगों ने शोर मचाकर हाथियों को भगाने की कोशिश की, लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची।    वन विभाग ने शुरू किया अभियान   घटना के बाद वन विभाग की टीम ने हाथियों के झुंड को आबादी वाले क्षेत्र से दूर जंगल की ओर खदेड़ने के लिए अभियान शुरू किया है। अधिकारियों ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे हाथियों के झुंड के पास न जाएं और उनकी गतिविधियों की जानकारी तुरंत प्रशासन को दें।    ग्रामीणों में नाराजगी   लगातार जंगली हाथियों के आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने से ग्रामीणों में आक्रोश है। उनका कहना है कि फसलों और संपत्ति के नुकसान के साथ अब मानव जीवन भी खतरे में पड़ रहा है। लोगों ने प्रभावित परिवार को मुआवजा देने और हाथियों की आवाजाही रोकने के लिए स्थायी उपाय करने की मांग की है।    प्रशासन ने सतर्क रहने की अपील   वन विभाग ने आसपास के गांवों में अलर्ट जारी करते हुए लोगों से सुबह और देर शाम जंगल या खेतों की ओर अकेले न जाने की सलाह दी है। साथ ही हाथियों की मौजूदगी की सूचना मिलने पर तत्काल वन विभाग या स्थानीय प्रशासन को सूचित करने को कहा गया है।

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गुमला में भगवान भरोसे जमीन के रिकॉर्ड, जर्जर रिकॉर्ड रूम से लाखों दस्तावेजों पर खतरा

गुमला। गुमला जिले के कचहरी परिसर स्थित रिकॉर्ड रूम की जर्जर हालत ने लाखों लोगों की जमीन-जायदाद से जुड़े महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्षों पुराने समाहरणालय भवन में संचालित इस रिकॉर्ड रूम में रखे अभिलेख बदहाल व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही के बीच असुरक्षित पड़े हैं। बरसात के मौसम में भवन की टूटी छत, सीलन और नमी के कारण दस्तावेजों के खराब होने का खतरा लगातार बना हुआ है।   जमीन पर बिखरे पड़े हैं महत्वपूर्ण अभिलेख रिकॉर्ड रूम में भूमि स्वामित्व, दाखिल-खारिज, पंजीकरण और अन्य राजस्व मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण रजिस्टर और दस्तावेज सुरक्षित अलमारियों में रखने के बजाय कई जगह जमीन पर बिखरे पड़े हैं। ये अभिलेख हजारों परिवारों के भूमि अधिकारों का आधार हैं और किसी भी कानूनी विवाद या नकल निर्गत करने के लिए इन्हीं पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके बावजूद इनके संरक्षण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई है।   टूटी खिड़की से सुरक्षा पर बड़ा खतरा रिकॉर्ड रूम की वह खिड़की, जहां से जमीन संबंधी नकल जारी की जाती है, लंबे समय से टूटी हुई है। स्थानीय लोगों और समाजसेवियों का कहना है कि यदि कोई असामाजिक तत्व इस रास्ते ज्वलनशील पदार्थ अंदर फेंक दे, तो वर्षों पुराने दस्तावेज कुछ ही मिनटों में नष्ट हो सकते हैं। इससे हजारों लोगों के भूमि रिकॉर्ड हमेशा के लिए खत्म होने का खतरा है।   सुरक्षित भवन में स्थानांतरण की उठी मांग स्थानीय अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिला प्रशासन रिकॉर्ड रूम की बदहाल स्थिति से पूरी तरह अवगत है, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। अधिवक्ता अरुण कुमार ने मांग की है कि रिकॉर्ड रूम को जल्द किसी सुरक्षित, आधुनिक और व्यवस्थित भवन में स्थानांतरित किया जाए। उनका कहना है कि जमीन से जुड़े अभिलेख आम नागरिकों के अधिकारों का आधार हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो किसी भी दुर्घटना की स्थिति में अपूरणीय क्षति हो सकती है।

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झारखंड मे  पीछे चार सालों में सड़क हादसे से कितने लोगों की गई जान

रांची। झारखंड में सड़क हादसे लगातार जानलेवा साबित हो रहे हैं। रामगढ़-बोकारो मुख्य मार्ग पर गुरुवार देर रात हुए भीषण सड़क हादसे में सात लोगों की मौत ने एक बार फिर सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लारी गांव के समीप होटल सम्राट के पास तेज रफ्तार कोयला लदे ट्रक और पिकअप वाहन की आमने-सामने टक्कर में पिकअप के परखच्चे उड़ गए। हादसे में सात लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। घायल को पहले रामगढ़ सदर अस्पताल और बाद में बेहतर इलाज के लिए रांची के रिम्स रेफर किया गया।   मुहर्रम कार्यक्रम से लौट रहे थे ताशा पार्टी के सदस्य जानकारी के अनुसार, पिकअप वाहन में सवार सभी लोग ताशा पार्टी के सदस्य थे। वे गोला में मुहर्रम का कार्यक्रम संपन्न कर अपने गांव लौट रहे थे। इसी दौरान सामने से आ रहे तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी। हादसे के बाद ट्रक चालक वाहन छोड़कर फरार हो गया। पुलिस ने ट्रक जब्त कर लिया है और चालक की तलाश शुरू कर दी है। मृतकों में दो लोग रजरप्पा थाना क्षेत्र के मारंगमरचा गांव तथा पांच लोग कुजू के बलसगरा गांव के निवासी बताए गए हैं।   ग्रामीणों का प्रदर्शन, मुआवजे की मांग दुर्घटना के बाद स्थानीय लोगों ने सड़क जाम कर मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा और इस मार्ग पर भारी वाहनों की तेज रफ्तार पर रोक लगाने की मांग की। पुलिस और प्रशासन के समझाने के बाद यातायात बहाल कराया गया।   चार वर्षों में 15 हजार से अधिक मौतें राज्य में सड़क हादसों के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2021 में 3,513, वर्ष 2022 में 3,898, वर्ष 2023 में 4,173 और वर्ष 2024 (नवंबर तक) 3,659 लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हो चुकी है। यानी पिछले चार वर्षों में झारखंड में कुल 15,243 लोगों ने सड़क हादसों में अपनी जान गंवाई है।   देश में भी गंभीर स्थिति केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री ने भी हाल में संसद में कहा कि भारत में हर वर्ष लगभग 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें 1.8 लाख से अधिक लोगों की मौत हो जाती है। उन्होंने बताया कि सड़क हादसों में मरने वालों में सबसे बड़ी संख्या 18 से 34 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेज रफ्तार, लापरवाही से वाहन चलाना और यातायात नियमों की अनदेखी सड़क दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी वजह हैं।

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