रांची। झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी है। इससे पहले झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के नेता और विधायक जयराम महतो नई दिल्ली जाकर वांगचुक के आंदोलन के समर्थन में शामिल हुए थे। अब इरफान अंसारी ने सोशल मीडिया के माध्यम से वांगचुक के अनशन को लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय हित से जुड़ा मुद्दा बताया है।
अपने फेसबुक पोस्ट में स्वास्थ्य मंत्री ने लिखा कि सोनम वांगचुक का अनशन केवल व्यक्तिगत मांगों का आंदोलन नहीं, बल्कि राष्ट्र और देश के युवाओं के हितों से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने भी अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह और अनशन का मार्ग अपनाया था तथा वांगचुक उसी गांधीवादी विचारधारा का अनुसरण कर रहे हैं।
डॉ. अंसारी ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं, बल्कि उसकी आत्मा होती है। यदि कोई व्यक्ति अपनी मांगों को लेकर अनशन करता है, तो उसे किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के नजरिए से नहीं, बल्कि एक नागरिक और राष्ट्रभक्त के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार की पहली जिम्मेदारी अनशनकारी की बात सुनना, उसके स्वास्थ्य की रक्षा करना और संवाद का रास्ता खोलना है।
स्वास्थ्य मंत्री ने अपने संदेश में यह भी कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक ताकत विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनने और उसका समाधान खोजने में होती है। उन्होंने कहा कि चाहे सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो, उसकी संवेदनशीलता इस बात से आंकी जाती है कि वह सबसे कमजोर और पीड़ित नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करती है।
डॉ. इरफान अंसारी ने कहा कि सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन मानवीय मूल्य हमेशा स्थायी रहते हैं। उन्होंने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर संवाद, सहानुभूति और संवेदनशीलता के साथ समाधान निकालने की अपील की। उनके अनुसार, सरकार को ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए जिससे न किसी अनशनकारी का जीवन संकट में पड़े और न ही लोकतंत्र की गरिमा पर कोई प्रश्नचिह्न लगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
जामताड़ा। झारखंड के जामताड़ा में पुलिस ने साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए एक ही दिन में नौ आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई दो अलग-अलग छापेमारी अभियानों के दौरान की गई। आरोपियों के कब्जे से 27 मोबाइल फोन और 39 सिम कार्ड बरामद किए गए हैं। पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार अपराधी फर्जी कस्टमर केयर नंबर, कैशबैक ऑफर और बैंक अधिकारी बनकर लोगों से एटीएम, सीवीवी और ओटीपी की जानकारी हासिल कर देशभर के लोगों को साइबर ठगी का शिकार बनाते थे। जानकारी के मुताबिक जानकारी के मुताबिक, शुक्रवार को जामताड़ा के पुलिस अधीक्षक (एसपी) शंभू कुमार सिंह को गुप्त सूचना मिली कि जिले के सियाटांड़ और मठटांड़ क्षेत्र के जंगल में कुछ साइबर अपराधी सक्रिय हैं। सूचना मिलते ही एसपी ने एक विशेष टीम का गठन कर छापेमारी के निर्देश दिए। पुलिस जब जंगल में पहुंची तो अपराधियों में अफरा-तफरी मच गई और वे भागने लगे, लेकिन पहले से घेराबंदी कर चुकी टीम ने पीछा कर पांच आरोपियों को मौके से गिरफ्तार कर लिया। पहली कार्रवाई के बाद मिली दूसरी सूचना, चार और आरोपी दबोचे पहले चरण की कार्रवाई के बाद पुलिस गिरफ्तार आरोपियों को लेकर लौट रही थी, तभी एसपी को एक और गुप्त सूचना मिली। इसके बाद छापेमारी दल तुरंत जामताड़ा थाना क्षेत्र के पोसोई मार्ग पहुंचा, जहां चार अन्य संदिग्ध साइबर अपराधी सक्रिय मिले। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए चारों को भी मौके से गिरफ्तार कर लिया। इस प्रकार एक ही दिन में कुल नौ साइबर अपराधियों को गिरफ्तार करने में पुलिस को सफलता मिली। इस पूरे अभियान का नेतृत्व उपाधीक्षक (साइबर अपराध) अमित ने किया। एसपी शंभू कुमार सिंह ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी गई है। जांच में यह भी सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपियों में से दो के खिलाफ पहले से साइबर अपराध के मामले दर्ज हैं। पुलिस अब इनके नेटवर्क, सहयोगियों और ठगी से जुड़े अन्य मामलों की भी जांच कर रही है। इस अभियान में साइबर थाना प्रभारी राजेश मंडल, निरीक्षक नितिश कुमार, अवर निरीक्षक बिनोद सिंह समेत पुलिस बल के अन्य जवान शामिल रहे।
हजारीबाग। हजारीबाग का ऐतिहासिक जय प्रकाश नारायण केंद्रीय कारा जल्द ही देश के चुनिंदा हाई सिक्योरिटी जेलों में शामिल होने जा रहा है। लगभग 98 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा यह अत्याधुनिक जेल 2023 से निर्माणाधीन है और अब तक इसका 80 प्रतिशत से अधिक कार्य पूरा हो चुका है। जेल परिसर से सटी 25 एकड़ भूमि पर विकसित हो रही इस हाई सिक्योरिटी जेल को जल्द ही शुरू करने की तैयारी की जा रही है। इस जेल में 250 से 280 बंदियों को रखने की क्षमता होगी यहां झारखंड के अलावा अन्य राज्यों के कुख्यात अपराधियों, गैंगस्टरों और संगठित अपराध से जुड़े हाई-रिस्क बंदियों को रखा जाएगा। इसके लिए सुरक्षा के अत्याधुनिक इंतजाम किए जा रहे हैं, ताकि जेल के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित की जा सके। निर्माण कार्य के तहत प्रशासनिक भवन, जेल अधीक्षक आवास, कार्यालय, डॉक्टर आवास, कारापाल आवास, कर्मचारियों के बैरक, क्वार्टर, पाकशाला, वॉच टावर, फेंसिंग और चहारदीवारी का काम लगभग पूरा हो चुका है। केवल जेल अस्पताल का निर्माण कार्य तेजी से जारी है और इसे भी जल्द पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सेलुलर जेल की तर्ज पर होगी सुरक्षा व्यवस्था निर्माण एजेंसी के अनुसार, इस हाई सिक्योरिटी जेल का डिजाइन पोर्ट ब्लेयर के सेलुलर जेल की अवधारणा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। जेल को 5जी जैमर, इलेक्ट्रिक फेंसिंग, हाई-रिजॉल्यूशन सीसीटीवी कैमरे, एआई आधारित सर्विलांस सिस्टम, ड्रोन निगरानी और अन्य आधुनिक सुरक्षा उपकरणों से लैस किया जाएगा। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य बंदियों की गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखना और किसी भी सुरक्षा चूक की संभावना को समाप्त करना है। जेपी केंद्रीय कारा, हजारीबाग के अधीक्षक चंद्रशेखर प्रसाद सुमन ने बताया कि हाई सिक्योरिटी जेल का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। अस्पताल का काम तेजी से चल रहा है और इसकी प्रगति रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है। शेष कार्य पूरा होते ही इस अत्याधुनिक हाई सिक्योरिटी जेल को शुरू कर दिया जाएगा, जिससे झारखंड में हाई-रिस्क बंदियों के सुरक्षित प्रबंधन की क्षमता और मजबूत होगी।
रांची। रांची नगर निगम ने मोरहाबादी वेंडिंग जोन-2 में नियमों का उल्लंघन करने वाले दुकानदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। जांच में अनियमितताएं मिलने के बाद निगम ने 80 वेंडरों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। सभी दुकानदारों को 48 घंटे के भीतर शपथ-पत्र के साथ अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। निगम ने स्पष्ट किया है कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने या आरोप सही पाए जाने पर दुकान का आवंटन रद्द करने के साथ अन्य कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। जांच में सामने आईं कई गंभीर अनियमितताएं नगर निगम के अनुसार, 13 जुलाई को मोरहाबादी वेंडिंग जोन-2 में विशेष जांच अभियान चलाया गया था। जांच के दौरान पाया गया कि कई लाभुकों ने निगम से आवंटित दुकानें दूसरे लोगों को किराये पर दे दी हैं। कुछ वेंडरों ने दुकान मिलने के बावजूद अब तक अपना व्यवसाय शुरू नहीं किया है। इसके अलावा कई दुकानदार निर्धारित नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। अधिकारियों को कुछ दुकानों में नशीले पदार्थों की बिक्री की शिकायत भी सही मिली, जिसे गंभीर उल्लंघन माना गया है। आवंटित दुकान छोड़ सड़क किनारे कर रहे थे कारोबार जांच में यह भी सामने आया कि कुछ लाभुकों को वेंडिंग जोन में दुकान आवंटित होने के बावजूद वे सड़क किनारे अवैध रूप से व्यवसाय कर रहे थे। इससे न केवल वेंडिंग जोन की व्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि शहर में अतिक्रमण और यातायात संबंधी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। निगम ने ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए सभी संबंधित दुकानदारों से स्पष्टीकरण मांगा है। नियमों का पालन नहीं करने वालों पर होगी कानूनी कार्रवाई नगर निगम ने कहा है कि निर्धारित 48 घंटे के भीतर शपथ-पत्र के साथ जवाब देना अनिवार्य होगा। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया या जांच में लगाए गए आरोपों की पुष्टि हुई, तो संबंधित दुकानदारों का आवंटन रद्द कर दिया जाएगा। साथ ही नगर निगम अधिनियम के तहत वैधानिक कार्रवाई भी की जाएगी। निगम का कहना है कि वेंडिंग जोन की व्यवस्था को पारदर्शी, व्यवस्थित और नियमों के अनुरूप संचालित करने के लिए यह अभियान आगे भी जारी रहेगा।