नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को लेकर जाने-माने कवि और वक्ता कुमार विश्वास ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बिना किसी व्यक्ति या संगठन का नाम लिए कहा कि विदेशों में बैठे कुछ लोग सोशल मीडिया और डिजिटल प्रभाव के जरिए भारत की दिशा प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। नैनीताल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कुमार विश्वास ने कहा कि कुछ लोग विदेशों में रहकर ऑनलाइन अभियानों और सोशल मीडिया समर्थन के सहारे देश के युवाओं को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि भारत को दूसरे देशों की राह पर ले जाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जबकि देश के युवाओं को अपने विवेक और संस्कारों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था को लेकर प्रदर्शन शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले बड़ी संख्या में छात्रों, युवाओं और अभिभावकों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने विभिन्न प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन में कई लोग कॉकरोच के मुखौटे पहनकर पहुंचे और परीक्षा व्यवस्था में सुधार तथा जवाबदेही की मांग करते हुए नारेबाजी की। अभिजीत दीपके ने आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि उनका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती। उन्होंने दावा किया कि जंतर-मंतर पर हुआ प्रदर्शन सफल रहा और इसमें बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। दीपके ने कहा कि अब आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने की योजना बनाई जा रही है। देशव्यापी अभियान की तैयारी प्रदर्शन के बाद मीडिया से बातचीत में दीपके ने कहा कि संगठन आने वाले दिनों में देशभर में अभियान चलाएगा। उनके अनुसार, यदि सरकार उनकी मांगों पर विचार नहीं करती है तो आंदोलन को और व्यापक स्वरूप दिया जाएगा। संगठन ने केंद्र सरकार को एक सप्ताह का समय देते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो विभिन्न राज्यों में विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। किन मुद्दों को उठा रही है CJP? कॉकरोच जनता पार्टी खुद को युवाओं के नेतृत्व वाला ऑनलाइन और सामाजिक आंदोलन बताती है। संगठन विभिन्न प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों, परीक्षा प्रबंधन, मूल्यांकन प्रक्रिया और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को उठा रहा है। इस अभियान में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET), केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE), कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) से जुड़े मामलों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है। कई सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता भी हुए शामिल जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में जलवायु कार्यकर्ता Sonam Wangchuk भी शामिल हुए। इसके अलावा विभिन्न छात्र संगठनों, युवा समूहों और वामपंथी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी प्रदर्शन में भाग लिया। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई थी और पुलिस की निगरानी में कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।
नई दिल्ली: सोशल मीडिया से शुरू हुई पहल अब सड़क पर उतर चुकी है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया, जिसमें परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की जा रही है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके सुबह दिल्ली पहुंचे और प्रदर्शन में शामिल हुए। जंतर-मंतर पहुंचने के दौरान उनके हाथ में डॉ. भीमराव अंबेडकर की जीवनी भी देखी गई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हाल के वर्षों में विभिन्न परीक्षाओं और मूल्यांकन प्रक्रियाओं में सामने आए विवादों ने छात्रों का भरोसा कमजोर किया है। NEET और CBSE मूल्यांकन विवाद बना प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा प्रदर्शनकारियों ने NEET-UG पेपर लीक मामले और CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम से जुड़े विवादों को प्रमुख मुद्दा बताया है। उनका आरोप है कि इन घटनाओं ने लाखों छात्रों और अभ्यर्थियों को प्रभावित किया है। इसी को लेकर शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही तय करने और शिक्षा मंत्री से इस्तीफा देने की मांग की जा रही है। सोनम वांगचुक भी होंगे आंदोलन में शामिल लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता Sonam Wangchuk ने भी इस प्रदर्शन को समर्थन दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पहले ही घोषणा की थी कि वह दिल्ली पहुंचकर आंदोलन में शामिल होंगे। वांगचुक का कहना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां सामने आती हैं, तो जिम्मेदार पदाधिकारियों को जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए। क्या है कॉकरोच जनता पार्टी? कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत सोशल मीडिया पर हुई थी। यह नाम उस टिप्पणी के बाद चर्चा में आया था, जिसमें अदालत की एक सुनवाई के दौरान कुछ लोगों की तुलना "कॉकरोच" से की गई थी। इसके बाद अभिजीत दिपके ने इस नाम से एक सोशल मीडिया अभियान शुरू किया, जो धीरे-धीरे युवाओं और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों के बीच लोकप्रिय हो गया। अब यह अभियान ऑनलाइन दायरे से निकलकर जमीनी विरोध प्रदर्शन का रूप ले चुका है। कौन हैं अभिजीत दिपके? Abhijeet Dipke महाराष्ट्र के रहने वाले हैं और पत्रकारिता की पढ़ाई कर चुके हैं। उन्होंने आगे की शिक्षा के लिए अमेरिका का रुख किया और Boston University से पब्लिक रिलेशन्स में मास्टर डिग्री प्राप्त की। दिपके इससे पहले चुनावी और सोशल मीडिया अभियानों से भी जुड़े रहे हैं। अब वह शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। जंतर-मंतर पर जारी रहेगा विरोध आयोजकों के अनुसार, प्रदर्शन का उद्देश्य केवल एक मंत्री के इस्तीफे की मांग करना नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना है। आंदोलन में देश के विभिन्न राज्यों से छात्र, अभ्यर्थी और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं।
लेह, एजेंसियां। लद्दाख में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की रिहाई के बावजूद विरोध-प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहा है। 14 मार्च 2026 को उनकी रिहाई के बाद जहां लोगों ने खुशी जताई, वहीं 16 मार्च को एक बार फिर हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने लद्दाख बंद का आह्वान किया। लेह में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ, जबकि कारगिल में पूरी तरह शटडाउन देखा गया। संगठनों का कहना है कि उनकी मूल मांगों पर अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, इसलिए आंदोलन जारी रहेगा। चार मुख्य मांगों को लेकर आंदोलन तेज लद्दाख में विरोध-प्रदर्शन ‘चार-सूत्रीय एजेंडा’ को लेकर हो रहा है। * पहली मांग है पूर्ण राज्य का दर्जा। लोग चाहते हैं कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश से राज्य बनाया जाए, ताकि वहां अपनी चुनी हुई सरकार और विधानसभा हो। * दूसरी बड़ी मांग है छठी अनुसूची में शामिल करना। इससे जनजातीय समाज को अपनी जमीन, जंगल और संस्कृति की कानूनी सुरक्षा मिल सकेगी। * तीसरी मांग है अलग पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना, जिससे सरकारी नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिल सके। * चौथी मांग के तहत लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें बनाने की मांग उठाई जा रही है, ताकि संसद में क्षेत्र की आवाज और मजबूत हो सके। 2019 के बाद बदली स्थिति 31 अक्टूबर 2019 को लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इससे पहले यह जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यहां की प्रशासनिक व्यवस्था सीधे केंद्र सरकार के अधीन आ गई और यहां कोई विधानसभा नहीं है।यही कारण है कि अब स्थानीय लोग अपने राजनीतिक अधिकारों को मजबूत करने के लिए राज्य का दर्जा मांग रहे हैं। उनका मानना है कि चुनी हुई सरकार के बिना उनके मुद्दों को सही तरीके से नहीं उठाया जा सकता। रिहाई से खुशी, लेकिन मांगों पर चुप्पी से नाराजगी सोनम वांगचुक की रिहाई को लेकर लोगों में खुशी जरूर है, लेकिन उनकी प्रमुख मांगों पर सरकार की ओर से कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिलने से नाराजगी बनी हुई है। LAB और KDA ने साफ कर दिया है कि जब तक चारों मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। आगे क्या? लद्दाख में जारी यह आंदोलन आने वाले समय में और तेज हो सकता है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़ा मामला बन चुका है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।