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आमिर खान को धमकी मामले में नया खुलासा, ऑडियो मैसेज भेजने के लिए स्वीडन VPN का इस्तेमाल

anjali kumari जुलाई 30, 2026 0
Aamir Khan threat case
Aamir Khan threat case

मुंबई, एजेंसियां। बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान को कथित तौर पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम से मिली धमकी के मामले में नया खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि धमकी भरा ऑडियो मैसेज भेजने के लिए स्वीडन आधारित VPN का इस्तेमाल किया गया था। पुलिस अब डिजिटल ट्रेल्स की मदद से मैसेज भेजने वाले की पहचान करने में जुटी है।

 

ऑडियो मैसेज में दी गई थी धमकी

 

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, वायरल ऑडियो क्लिप में कॉलर ने खुद को आरज़ू बिश्नोई बताया और आमिर खान पर 'लव जिहाद' को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। ऑडियो में अभिनेता को 'सबक सिखाने' की धमकी भी दी गई थी। इस मामले की जांच जारी है, हालांकि अब तक कोई आधिकारिक एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।

 

VPN और Tor Browser से छिपाई गई पहचान

 

जांच के दौरान शुरुआती IP एड्रेस स्वीडन से जुड़ा मिला, लेकिन पुलिस का मानना है कि मैसेज भेजने वाले ने अपनी वास्तविक लोकेशन छिपाने के लिए VPN और Tor Browser का इस्तेमाल किया। ऐसे डिजिटल टूल्स के कारण मैसेज के वास्तविक स्रोत तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। फिलहाल साइबर विशेषज्ञ उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों का विश्लेषण कर रहे हैं।

 

18 जुलाई को भी मिली थी धमकी

 

इससे पहले 18 जुलाई को भी आमिर खान को सोशल मीडिया के जरिए कथित तौर पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम से धमकी दी गई थी। उस पोस्ट में अभिनेता पर 'लव जिहाद' को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। बताया जा रहा है कि यह विवाद उनकी हालिया निजी जिंदगी से जुड़े घटनाक्रम के बाद सामने आया। पुलिस सभी पहलुओं की जांच कर रही है और मामले में डिजिटल साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Anjali Kumari Anjali123

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EWS कोटे पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, ₹8 लाख सालाना आय सीमा को बताया पहली नजर में उचित

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण मामले में कोर्ट ने कहा- मानदंड की समीक्षा संभव, अंतिम फैसला बाद में   नई दिल्ली, एजेंसियां। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने ₹8 लाख सालाना पारिवारिक आय सीमा को पहली नजर में उचित बताया है। यह टिप्पणी 10% EWS आरक्षण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अभी अंतिम फैसला नहीं है और मामले की विस्तृत सुनवाई आगे जारी रहेगी।   EWS आरक्षण के लिए आय सीमा पर उठे सवाल   सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से EWS कोटे के लिए तय आय सीमा और इसके आधार को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आर्थिक स्थिति तय करने के मानदंडों की समीक्षा जरूरी है, जबकि सरकार का पक्ष है कि यह सीमा जरूरतमंद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तय की गई है।   2019 में लागू हुआ था 10% EWS आरक्षण   केंद्र सरकार ने 103वें संविधान संशोधन (2019) के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण का प्रावधान किया था। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2022 में बहुमत के फैसले से इस संशोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था।   अंतिम फैसला आना बाकी   सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी केवल प्रारंभिक राय है। अदालत आगे यह तय करेगी कि EWS आरक्षण के लिए तय आय सीमा और अन्य मानदंड संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। इस मामले के फैसले का असर भविष्य में EWS आरक्षण की पात्रता तय करने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

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ग्रीन क्लीयरेंस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और सुनवाई
ग्रीन क्लीयरेंस मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, परियोजनाओं को बाद में पर्यावरण मंजूरी देने की नीति पर रोक

कोर्ट ने कहा- पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने के बाद मंजूरी देना गलत परंपरा को बढ़ावा देगा   नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंजूरी से जुड़े मामले में सख्त रुख अपनाते हुए उन नीतियों पर रोक लगा दी है, जिनके तहत परियोजनाओं को नियमों का उल्लंघन करने के बाद बाद में ग्रीन क्लीयरेंस देने का रास्ता खुलता था। अदालत ने कहा कि पर्यावरण कानूनों का पालन परियोजना शुरू करने से पहले होना चाहिए, बाद में मंजूरी देकर उल्लंघन को नियमित नहीं किया जा सकता।   'पहले उल्लंघन, फिर मंजूरी' की व्यवस्था पर सवाल   सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी परियोजना को बिना जरूरी पर्यावरण मंजूरी के शुरू कर दिया जाता है और बाद में उसे मंजूरी दे दी जाती है, तो इससे पर्यावरण संरक्षण कानूनों का उद्देश्य कमजोर होता है। अदालत ने माना कि ऐसी व्यवस्था से नियमों का पालन करने वाले लोगों के साथ अन्याय होता है।   पर्यावरण संरक्षण को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता   कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उन्हें पर्यावरणीय मानकों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। पर्यावरण मंजूरी केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संभावित पर्यावरणीय नुकसान का आकलन करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।   सरकार की नीति पर पड़ेगा असर   सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का असर उद्योग, खनन, निर्माण और बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर पड़ सकता है। अब कंपनियों को परियोजना शुरू करने से पहले पर्यावरण मंजूरी लेने की प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना होगा।   विशेषज्ञों ने फैसले को महत्वपूर्ण बताया   पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला पर्यावरण कानूनों की गंभीरता को मजबूत करता है और कंपनियों को नियमों के पालन के लिए अधिक जिम्मेदार बनाएगा। वहीं उद्योग जगत का मानना है कि मंजूरी प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने की जरूरत है ताकि विकास कार्यों में अनावश्यक देरी न हो।  

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तमिलनाडु के सरकारी स्कूलों में भोजन का नया प्रस्ताव, मिड-डे मील में हफ्ते में एक दिन चिकन बिरयानी देने पर विचार

सरकार का लक्ष्य- बच्चों के पोषण और स्कूल भोजन को अधिक आकर्षक बनाना, शिक्षा विभाग कर रहा प्रस्ताव की समीक्षा   चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु सरकार सरकारी स्कूलों में मिलने वाले दोपहर के भोजन (पीएम-पोषण योजना) के मेन्यू में बदलाव करने की तैयारी कर रही है। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग ने स्कूलों में सप्ताह में एक दिन चिकन बिरयानी शामिल करने के प्रस्ताव पर विचार शुरू किया है। सरकार का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्कूल भोजन योजना को और आकर्षक बनाना है।   बच्चों के पोषण और उपस्थिति बढ़ाने पर जोर   तमिलनाडु में सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए भोजन योजनाएं लंबे समय से चल रही हैं। राज्य में पहले से ही प्राथमिक कक्षाओं के लिए मुख्यमंत्री नाश्ता योजना भी संचालित है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों के कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को स्कूल के दिनों में नाश्ता उपलब्ध कराया जाता है।   सरकार का मानना है कि भोजन की गुणवत्ता और विविधता बढ़ाने से बच्चों के पोषण स्तर में सुधार होगा और स्कूलों में उपस्थिति भी बढ़ सकती है।   स्कूल संगठनों ने रखा था बिरयानी शामिल करने का सुझाव   रिपोर्ट के अनुसार, कुछ स्कूल संगठनों की ओर से मांग की गई थी कि बच्चों को दिए जाने वाले भोजन में कभी-कभी लोकप्रिय व्यंजन भी शामिल किए जाएं। इसी के बाद शिक्षा विभाग ने चिकन बिरयानी को मेन्यू में शामिल करने के प्रस्ताव पर विचार शुरू किया है।   प्रस्ताव पर अंतिम फैसला बाकी   हालांकि अभी यह प्रस्ताव विचाराधीन है और इसे लागू करने से पहले पोषण मानकों, लागत और प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी। सरकार अंतिम निर्णय के बाद ही इसकी आधिकारिक घोषणा करेगी।  

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