नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय टेबल टेनिस महासंघ (TTFI) को बड़ा झटका लगा है। युवा मामले एवं खेल मंत्रालय ने TTFI की मान्यता निलंबित कर दी है। मंत्रालय की यह कार्रवाई महासंघ के संचालन और प्रशासन से जुड़ी कथित खामियों को लेकर की गई है। इस फैसले के बाद भारतीय टेबल टेनिस के प्रशासनिक ढांचे को लेकर सवाल और तेज हो गए हैं।
खेल मंत्रालय की कार्रवाई के पीछे TTFI के कामकाज और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर सामने आई चिंताओं को प्रमुख वजह माना जा रहा है। मंत्रालय ने महासंघ के संचालन में नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन पर सवाल उठाए हैं। मान्यता निलंबित होने से TTFI की गतिविधियों और उसके द्वारा लिए जाने वाले प्रशासनिक फैसलों पर असर पड़ सकता है।
TTFI भारत में राष्ट्रीय स्तर पर टेबल टेनिस की गतिविधियों और प्रमुख प्रतियोगिताओं के संचालन से जुड़ा संगठन है। ऐसे में मान्यता निलंबित होने के बाद खिलाड़ियों, टूर्नामेंटों और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों को लेकर भी स्थिति पर नजर बनी हुई है। हालांकि, खिलाड़ियों की तैयारी और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उनकी भागीदारी प्रभावित न हो, इसके लिए संबंधित स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था किए जाने की उम्मीद है।
खेल महासंघों में पारदर्शिता और बेहतर प्रशासन को लेकर केंद्र सरकार लगातार जोर देती रही है। TTFI पर हुई कार्रवाई को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। मंत्रालय की ओर से उठाया गया यह कदम अन्य राष्ट्रीय खेल महासंघों के लिए भी प्रशासनिक जवाबदेही और नियमों के पालन का संदेश माना जा रहा है।
अब TTFI के सामने प्रशासनिक कमियों को दूर करने और मंत्रालय की आपत्तियों का समाधान करने की चुनौती होगी। आगे की प्रक्रिया में महासंघ को संबंधित नियमों और शर्तों का अनुपालन सुनिश्चित करना होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश की घरेलू क्रिकेट लीग यूपी टी20 लीग 2026 का चौथा सीजन आज 14 अगस्त से शुरू हो रहा है। उद्घाटन मुकाबले में काशी रुद्रास और मेरठ मेवरिक्स लखनऊ के भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम में आमने-सामने होंगे। टूर्नामेंट का फाइनल 6 सितंबर को कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में खेला जाएगा। छह टीमें लेंगी हिस्सा यूपी टी20 लीग 2026 में कुल छह फ्रेंचाइजी हिस्सा ले रही हैं—गोरखपुर लायंस, मेरठ मेवरिक्स, नोएडा किंग्स, काशी रुद्रास, कानपुर सुपरस्टार्स और लखनऊ फाल्कन्स। इस सीजन में कुल 34 मुकाबले खेले जाएंगे। रिंकू सिंह और भुवनेश्वर कुमार समेत कई सितारे इस सीजन में यूपी के कई चर्चित क्रिकेटरों पर नजर रहेगी। रिंकू सिंह, भुवनेश्वर कुमार, ध्रुव जुरेल, प्रियम गर्ग, समीर रिजवी और विपराज निगम जैसे खिलाड़ी टूर्नामेंट का आकर्षण बढ़ाएंगे। लीग में आईपीएल अनुभव वाले कुल 14 खिलाड़ी शामिल हैं। लखनऊ और कानपुर में होंगे मुकाबले लीग के मैच मुख्य रूप से इकाना क्रिकेट स्टेडियम, लखनऊ और ग्रीन पार्क स्टेडियम, कानपुर में आयोजित किए जाएंगे। लीग चरण के बाद सितंबर की शुरुआत में प्लेऑफ मुकाबले होंगे और 6 सितंबर को ग्रीन पार्क में फाइनल खेला जाएगा। युवा खिलाड़ियों के लिए बड़ा मंच यूपी टी20 लीग का उद्देश्य उत्तर प्रदेश के उभरते खिलाड़ियों को उच्च स्तर के घरेलू क्रिकेट का मंच देना है। यहां अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के लिए आईपीएल फ्रेंचाइजी और राष्ट्रीय चयनकर्ताओं की नजर में आने का मौका भी बनता है। इस लिहाज से 2026 सीजन युवा क्रिकेटरों के लिए काफी अहम माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम की उपकप्तान एश्ले गार्डनर (Ashleigh Gardner) ने अपनी अलग रह रही पत्नी मोनिका राइट के साथ रिश्ते और उससे जुड़े विवाद पर पहली बार सार्वजनिक बयान दिया है। गार्डनर ने रिश्ते के टूटने से हुई तकलीफ के लिए माफी मांगी और इस मुश्किल दौर में निजता का सम्मान करने की अपील की। गार्डनर ने क्या कहा? गार्डनर ने अपने बयान में कहा कि यह उनके लिए बेहद निजी और कठिन समय है। उन्होंने कहा कि रिश्ते के दौरान हुई घटनाओं से जिन लोगों को दर्द पहुंचा, उसके लिए उन्हें अफसोस है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस मामले पर आगे कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करेंगी। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने जताया समर्थन विवाद के बावजूद क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने गार्डनर को ऑस्ट्रेलियाई टीम की उपकप्तान की भूमिका में बनाए रखा है। गार्डनर ने क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के समर्थन के लिए भी आभार जताया। बोर्ड के सीईओ टॉड ग्रीनबर्ग ने कहा कि टीम चयन से जुड़े संभावित हितों के टकराव को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किए जाएंगे। जॉर्जिया वोल के साथ रिश्ते को लेकर विवाद गार्डनर की अलग रह रही पत्नी मोनिका राइट ने उन पर ऑस्ट्रेलियाई टीम की साथी खिलाड़ी जॉर्जिया वोल के साथ संबंध होने के आरोप लगाए थे। इसी विवाद के बाद गार्डनर की नेतृत्व भूमिका और क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। हालांकि गार्डनर ने अपने ताजा बयान में आरोपों के विवरण पर चर्चा करने से इनकार किया है। टीम चयन में लागू होंगे अतिरिक्त नियम क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने संकेत दिया है कि गार्डनर और वोल से जुड़े मामलों में हितों के टकराव से बचने के लिए चयन प्रक्रिया में अतिरिक्त व्यवस्था की जाएगी। गार्डनर को वोल से जुड़े चयन संबंधी फैसलों से अलग रखा जा सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व स्पिनर हरभजन सिंह ने मुख्य कोच गौतम गंभीर की कार्यशैली की तारीफ की है। उन्होंने गंभीर को स्पष्टवादी और टीम-फर्स्ट सोच वाला व्यक्ति बताया। हरभजन के मुताबिक, गंभीर फैसले लेते समय व्यक्तिगत पसंद से ज्यादा टीम के हित को प्राथमिकता देते हैं। गंभीर की बेबाक शैली की तारीफ हरभजन सिंह ने गंभीर की सीधी और बेबाक बातचीत की शैली को उनकी बड़ी खूबियों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि गंभीर अपनी बात खुलकर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर कठिन फैसले लेने से भी पीछे नहीं हटते। पूर्व भारतीय स्पिनर के मुताबिक, गंभीर का ध्यान खिलाड़ियों की व्यक्तिगत छवि के बजाय टीम के प्रदर्शन और सामूहिक लक्ष्य पर रहता है। टीम हित को देते हैं प्राथमिकता हरभजन ने गंभीर की कार्यशैली की सबसे बड़ी खासियत उनकी टीम-फर्स्ट अप्रोच को बताया। उनका मानना है कि भारतीय क्रिकेट में कोच की भूमिका केवल रणनीति बनाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि खिलाड़ियों को एकजुट रखना और सही समय पर सही फैसले लेना भी उतना ही जरूरी है। गंभीर के नेतृत्व में भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम में टीम के सामूहिक हित को प्राथमिकता देने की कोशिश लगातार दिखाई देती रही है। गंभीर के कार्यकाल पर नजर गौतम गंभीर के मुख्य कोच बनने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के प्रदर्शन और उनकी रणनीति पर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में हरभजन सिंह जैसे पूर्व खिलाड़ी की यह टिप्पणी गंभीर की कोचिंग शैली को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर देखी जा रही है। भारतीय टीम के सामने आने वाले मुकाबलों में अब गंभीर की रणनीति और टीम चयन पर भी नजर रहेगी।