मुंबई, एजेंसियां। ‘गजनी’ और ‘लगान’ जैसी फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से पहचान बनाने वाले दिग्गज अभिनेता प्रदीप रावत का 4 अगस्त 2026 की शाम 74 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके मैनेजर सिद्धार्थ तिवारी ने निधन की पुष्टि की है। रिपोर्टों के मुताबिक प्रदीप रावत लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे और करीब डेढ़ महीने पहले बीमारी दोबारा उभरने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ‘महाभारत’ से शुरू हुआ अभिनय का सफर प्रदीप रावत ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत बी.आर. चोपड़ा के लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ से की थी, जिसमें उन्होंने अश्वत्थामा का किरदार निभाया था। इस भूमिका से उन्हें घर-घर में पहचान मिली और आगे चलकर उन्होंने हिंदी के साथ-साथ दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम किया। ‘लगान’ और ‘गजनी’ से मिली खास पहचान आमिर खान की ‘लगान’ में उनके अभिनय को काफी सराहा गया। इसके बाद ‘गजनी’ में निभाए गए खलनायक के किरदार ने उन्हें बड़े स्तर पर लोकप्रियता दिलाई। उनकी दमदार आवाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और निगेटिव किरदारों को अलग अंदाज में निभाने की क्षमता उनकी पहचान बनी। उन्होंने हिंदी के अलावा तेलुगु, तमिल और अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी कई यादगार भूमिकाएं निभाईं। कैंसर से जूझ रहे थे अभिनेता रिपोर्ट के अनुसार प्रदीप रावत पहले भी कैंसर की बीमारी से उबर चुके थे, लेकिन करीब डेढ़ महीने पहले बीमारी दोबारा सामने आने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई। प्लेटलेट्स में गिरावट के बाद उनकी हालत गंभीर होती चली गई और इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। अभिनेता के निधन की खबर सामने आने के बाद फिल्म जगत और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर है। ‘लगान’ और ‘गजनी’ समेत उनकी फिल्मों में काम कर चुके कलाकारों और प्रशंसकों की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (Erectile Dysfunction) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा वियाग्रा (Viagra) अब कैंसर रिसर्च में भी चर्चा का विषय बन गई है। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में दावा किया गया है कि वियाग्रा का सक्रिय तत्व सिल्डेनाफिल (Sildenafil) कैंसर कोशिकाओं के शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने यानी मेटास्टेसिस (Metastasis) की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद कर सकता है। यह अध्ययन इजराइल के वाइजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस और क्लैलिट हेल्थ सर्विसेज के वैज्ञानिकों ने किया है। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह शुरुआती शोध है और इसे कैंसर का नया इलाज नहीं माना जाना चाहिए। कैसे काम कर सकता है सिल्डेनाफिल? शोध के अनुसार, कैंसर कोशिकाएं शरीर में फैलने के लिए काफी हद तक कोलेस्ट्रॉल पर निर्भर रहती हैं। सिल्डेनाफिल कोशिकाओं के भीतर कोलेस्ट्रॉल पहुंचाने वाले प्रोटीन की गतिविधि को बाधित करता है। इससे कैंसर कोशिकाओं को अपनी बाहरी झिल्ली (मेम्ब्रेन) बनाए रखने के लिए पर्याप्त कोलेस्ट्रॉल नहीं मिल पाता और उनका दूसरे अंगों तक फैलना कठिन हो सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि यदि सिल्डेनाफिल को स्टैटिन (कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा) के साथ दिया जाए तो इसका प्रभाव और बेहतर हो सकता है, क्योंकि यह संयोजन कैंसर कोशिकाओं को नया कोलेस्ट्रॉल बनाने और उपलब्ध कोलेस्ट्रॉल का उपयोग करने से भी रोक सकता है। 50 लाख लोगों के डेटा का विश्लेषण, लेकिन निष्कर्ष अभी अंतिम नहीं शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में कैंसर कोशिकाओं और चूहों पर अध्ययन करने के अलावा करीब 50 लाख लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, जिसमें 40 हजार से अधिक कैंसर मरीज भी शामिल थे। अध्ययन में पाया गया कि जिन पुरुषों ने कैंसर का पता चलने से पहले सिल्डेनाफिल का इस्तेमाल किया था, उनमें जीवित रहने की दर अपेक्षाकृत बेहतर थी। जिन मरीजों ने सिल्डेनाफिल के साथ स्टैटिन भी ली थी, उनमें परिणाम और अधिक सकारात्मक दिखाई दिए। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि इस अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि बेहतर परिणाम केवल वियाग्रा की वजह से ही मिले। विशेषज्ञों की सलाह- डॉक्टर की सलाह के बिना न लें वियाग्रा स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस शोध के नतीजे उत्साहजनक जरूर हैं, लेकिन इन्हें अभी कैंसर के उपचार के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। सिल्डेनाफिल को कैंसर के मानक इलाज का हिस्सा बनने से पहले बड़े स्तर पर क्लिनिकल ट्रायल और अतिरिक्त वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि कैंसर की रोकथाम या इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह के बिना वियाग्रा का सेवन बिल्कुल न करें। फिलहाल कैंसर के इलाज के लिए डॉक्टर द्वारा सुझाई गई मानक चिकित्सा ही सबसे सुरक्षित और प्रभावी विकल्प है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। 40–50 वर्ष की उम्र में पेरिमेनोपॉज (मेनोपॉज से पहले का चरण) के दौरान महिलाओं में होने वाले हार्मोनल बदलावों के कारण कई शारीरिक लक्षण सामान्य माने जाते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बने रहने वाले कुछ लक्षण ओवेरियन (अंडाशय) कैंसर का संकेत भी हो सकते हैं। इसी वजह से इस कैंसर को अक्सर 'साइलेंट किलर' कहा जाता है, क्योंकि शुरुआती चरण में इसके लक्षण आसानी से पहचान में नहीं आते। वडोदरा के भाईलाल अमीन जनरल हॉस्पिटल की मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. इति पारिख के अनुसार, पेरिमेनोपॉज में अनियमित पीरियड्स, हॉट फ्लैश, रात में पसीना, मूड में बदलाव और हल्का पेट फूलना सामान्य हो सकता है। लेकिन यदि पेट लगातार फूला रहे, पेल्विक या पेट में दर्द बना रहे, थोड़ा खाने पर ही पेट भर जाए, बार-बार पेशाब आए, लगातार थकान रहे या कब्ज जैसी समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक, ओवेरियन कैंसर के लिए फिलहाल सामान्य महिलाओं में कोई प्रभावी स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं है। इसलिए अधिकांश मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। किन महिलाओं में ज्यादा खतरा? 40–50 वर्ष या मेनोपॉज के बाद की महिलाएं परिवार में ओवेरियन या ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास कुछ आनुवंशिक (Genetic) म्यूटेशन एंडोमेट्रियोसिस बांझपन धूम्रपान कब डॉक्टर से संपर्क करें? यदि ऊपर बताए गए लक्षण दो से तीन सप्ताह से अधिक समय तक लगातार बने रहें, तो डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर अल्ट्रासाउंड और CA-125 ब्लड टेस्ट जैसी जांच की जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि हर पेट दर्द या पेट फूलने का मतलब कैंसर नहीं होता। कई बार इसकी वजह हार्मोनल बदलाव, यूरिन इन्फेक्शन या फाइब्रॉइड जैसी सामान्य समस्याएं भी हो सकती हैं। फिर भी लगातार रहने वाले लक्षणों को केवल मेनोपॉज का हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शुरुआती जांच से बीमारी का समय पर पता लगने और बेहतर इलाज की संभावना बढ़ जाती है।
कैंसर का सफल इलाज होने के बाद अधिकांश मरीज सामान्य जीवन की ओर लौटने लगते हैं। लेकिन कुछ लोगों में इलाज के महीनों या वर्षों बाद भी शरीर के किसी हिस्से में दर्द, अकड़न, सूजन या हरकत करने में परेशानी बनी रह सकती है। ऐसे लक्षणों को सामान्य रिकवरी समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि यह रेडिएशन फाइब्रोसिस (Radiation Fibrosis) का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार रेडिएशन थेरेपी कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में प्रभावी होती है, लेकिन इसका असर आसपास के स्वस्थ ऊतकों (Healthy Tissues) पर भी पड़ सकता है। कुछ मरीजों में यही असर लंबे समय बाद रेडिएशन फाइब्रोसिस के रूप में सामने आता है। क्या है रेडिएशन फाइब्रोसिस? रेडिएशन फाइब्रोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें रेडिएशन दिए गए हिस्से के सामान्य टिशू धीरे-धीरे कठोर (Scar Tissue) बनने लगते हैं। शरीर मरम्मत की प्रक्रिया के दौरान जरूरत से ज्यादा कोलेजन बनाने लगता है, जिससे मांसपेशियां, त्वचा और अन्य नरम ऊतक अपनी लचक खोने लगते हैं। यह समस्या गर्दन, छाती, स्तन, सिर, पेल्विक क्षेत्र या शरीर के किसी भी उस हिस्से में हो सकती है जहां रेडिएशन थेरेपी दी गई हो। कई मरीजों में इसके लक्षण इलाज के छह महीने बाद दिखाई देते हैं, जबकि कुछ मामलों में यह वर्षों बाद भी विकसित हो सकता है। रेडिएशन थेरेपी के बाद यह समस्या क्यों होती है? रेडिएशन थेरेपी कैंसर कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाकर उन्हें खत्म करती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में आसपास के स्वस्थ ऊतक भी प्रभावित हो सकते हैं। कुछ मरीजों में लगातार सूजन और फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाओं की अधिक सक्रियता के कारण जरूरत से ज्यादा कोलेजन बनने लगता है। यही अतिरिक्त कोलेजन धीरे-धीरे टिशू को कठोर बना देता है। कुछ आनुवंशिक (Genetic) कारण भी इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं। रेडिएशन फाइब्रोसिस के शुरुआती लक्षण प्रभावित हिस्से में अकड़न शुरुआत में केवल सुबह या लंबे समय तक बैठे रहने के बाद अकड़न महसूस हो सकती है। धीरे-धीरे यह समस्या लगातार बनी रहती है और मांसपेशियों की लचक कम होने लगती है। लगातार दर्द रहना अगर रेडिएशन थेरेपी खत्म होने के काफी समय बाद भी दर्द बना रहे या धीरे-धीरे बढ़ने लगे, तो इसे सामान्य रिकवरी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नसों और मांसपेशियों पर दबाव बढ़ने से दर्द और खिंचाव महसूस हो सकता है। त्वचा का सख्त और मोटा होना रेडिएशन वाले हिस्से की त्वचा पहले की तुलना में अधिक कठोर, मोटी और कम लचीली महसूस हो सकती है। कई बार त्वचा का रंग भी बदल जाता है। हाथ-पैर या गर्दन हिलाने में परेशानी यदि रेडिएशन कंधे, गर्दन, हाथ, पैर या पेल्विक हिस्से में दिया गया था, तो जोड़ों की मूवमेंट कम हो सकती है। हाथ ऊपर उठाने, गर्दन घुमाने, चलने या सीढ़ियां चढ़ने में कठिनाई महसूस हो सकती है। सूजन या लिम्फेडेमा कुछ मरीजों में लिम्फेटिक सिस्टम प्रभावित होने के कारण हाथ, पैर या प्रभावित हिस्से में लगातार सूजन, भारीपन और कपड़े तंग महसूस होने जैसी समस्या हो सकती है। किन लोगों में ज्यादा होता है खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार इन मरीजों में रेडिएशन फाइब्रोसिस का खतरा अधिक होता है— हाई-डोज रेडिएशन थेरेपी लेने वाले मरीज जिनका सर्जरी और रेडिएशन दोनों हुआ हो डायबिटीज से पीड़ित मरीज जिनमें घाव भरने की प्रक्रिया धीमी हो क्या इसका इलाज संभव है? रेडिएशन फाइब्रोसिस को पूरी तरह खत्म करना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन समय पर पहचान और सही उपचार से इसके प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है। विशेषज्ञ आमतौर पर इन उपायों की सलाह देते हैं— नियमित फिजियोथेरेपी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज दर्द और सूजन नियंत्रित करने वाली दवाएं नियमित फॉलो-अप ऑन्कोलॉजिस्ट और फिजिकल मेडिसिन विशेषज्ञ की निगरानी यदि रेडिएशन थेरेपी के बाद दर्द, अकड़न, सूजन या शरीर के किसी हिस्से को हिलाने में लगातार परेशानी महसूस हो रही है, तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करें। समय पर उपचार शुरू करने से जीवन की गुणवत्ता और शारीरिक क्षमता को बेहतर बनाए रखा जा सकता है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हाल के सैन्य घटनाक्रम और दोनों देशों के तीखे बयानों के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंता गहरा गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। सैन्य गतिविधियों से बढ़ी क्षेत्रीय चिंता हाल के घटनाक्रम के बाद अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत किया है, जबकि ईरान ने भी अपनी सैन्य क्षमता और जवाबी कार्रवाई की तैयारी पर जोर दिया है। दोनों देशों के बीच बढ़ती तल्खी ने पूरे पश्चिम एशिया में तनाव का माहौल बना दिया है। तेल बाजार पर निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। निवेशक विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली तेल आपूर्ति पर नजर बनाए हुए हैं। भारत समेत कई देशों की बढ़ी चिंता भारत सहित कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर हैं। इसलिए क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर तेल आयात, परिवहन लागत और घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और कूटनीतिक प्रयास जारी हैं।
असम सरकार ने दावा किया है कि राज्य में कैंसर के मरीजों की सर्वाइवल रेट (जीवित रहने की दर) देश में सबसे अधिक है। सरकार के अनुसार, बड़े पैमाने पर कैंसर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और राज्यभर में इलाज की बेहतर व्यवस्था के कारण यह उपलब्धि हासिल हुई है। बजट सत्र के दौरान असम के स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने बताया कि अब तक करीब 47 लाख लोगों की कैंसर स्क्रीनिंग की जा चुकी है। इस अभियान के दौरान 900 से अधिक मरीजों में शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान हुई, जिससे समय पर इलाज संभव हो सका। 62% सर्वाइवल रेट का दावा असम सरकार का कहना है कि राज्य में कैंसर मरीजों की सर्वाइवल रेट 62 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो राष्ट्रीय औसत करीब 40 प्रतिशत से काफी अधिक बताई जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने से इलाज की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है और मरीजों के स्वस्थ होने की उम्मीद भी बेहतर होती है। 1.24 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य सरकार ने कैंसर स्क्रीनिंग अभियान को और तेज करने का फैसला किया है। स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार, राज्य में 1.24 करोड़ लोगों की जांच करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह लक्ष्य पूरा होता है, तो यह देश का सबसे बड़ा कैंसर स्क्रीनिंग अभियान माना जा सकता है। गुवाहाटी तक सीमित नहीं रहा इलाज पहले गंभीर कैंसर मरीजों को इलाज के लिए गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ या पूर्वोत्तर से बाहर बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था। अब राज्य सरकार ने कैंसर उपचार सेवाओं का विस्तार कई जिलों तक कर दिया है। असम कैंसर केयर फाउंडेशन, जिसे असम सरकार और टाटा ट्रस्ट्स ने मिलकर शुरू किया है, राज्य में विशेष कैंसर अस्पतालों और उपचार केंद्रों का नेटवर्क विकसित कर रहा है। कई जिलों में मिल रही इलाज की सुविधा राज्य में बारपेटा, डिब्रूगढ़, दीफू और सिलचर में कैंसर अस्पताल संचालित किए जा रहे हैं। वहीं गोलाघाट, जोरहाट, कोकराझार, लखीमपुर, मंगलदई, तेजपुर और तिनसुकिया में जांच और डे-केयर सेंटर भी स्थापित किए गए हैं। इससे मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करने की जरूरत कम हुई है। शुरुआती चरण में हो रही पहचान स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पहले अधिकांश मरीजों में कैंसर का पता बीमारी के अंतिम चरण में चलता था। लेकिन अब बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान के कारण कई मामलों की पहचान स्टेज-1 और स्टेज-2 में ही हो रही है। इससे इलाज जल्दी शुरू हो रहा है और मरीजों के स्वस्थ होने की संभावना भी बढ़ रही है। सस्ता इलाज उपलब्ध कराने का दावा स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने कहा कि कैंसर का इलाज आमतौर पर काफी महंगा होता है। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के साथ साझेदारी के बाद राज्य सरकार मरीजों को अपेक्षाकृत कम खर्च में इलाज उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। प्रोटॉन बीम थेरेपी की तैयारी असम सरकार ने यह भी जानकारी दी कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जल्द ही प्रोटॉन बीम थेरेपी मशीन शुरू करने की तैयारी चल रही है। यह आधुनिक रेडिएशन थेरेपी तकनीक मानी जाती है, जिसमें प्रोटॉन किरणों की मदद से कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाया जाता है। इसकी खासियत यह है कि आसपास के स्वस्थ ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है, जिससे इलाज अधिक सटीक और प्रभावी माना जाता है। कैंसर से लड़ाई में स्क्रीनिंग बनी सबसे बड़ा हथियार विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सबसे अहम भूमिका समय पर जांच और शुरुआती पहचान की होती है। असम सरकार का कहना है कि स्क्रीनिंग, इलाज, पेलिएटिव केयर, रिसर्च और मरीजों के पुनर्वास को एक साथ जोड़कर राज्य में कैंसर देखभाल की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। यदि यह मॉडल लगातार प्रभावी रहता है, तो अन्य राज्यों के लिए भी यह एक उदाहरण बन सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आज की आरामदायक जिंदगी में डेस्क पर काम, कार में सफर और स्क्रीन के सामने आराम ने हमें शारीरिक रूप से बेहद सुस्त बना दिया है। वड़ोदरा के भाईलाल अमीन जनरल हॉस्पिटल की कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. इति पारिख के अनुसार, दिन के 6 या उससे अधिक घंटे बैठे रहना और फिजिकल एक्टिविटी न करना कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण बन रहा है। कैसे बढ़ता है कैंसर का खतरा? डॉ. पारिख के अनुसार फिजिकल इनएक्टिविटी से चार तरह से कैंसर का खतरा बढ़ता है। पहला, वजन बढ़ने और मोटापे से हार्मोन असंतुलन होता है। दूसरा, शरीर में लंबे समय तक सूजन रहने से DNA को नुकसान पहुंचता है। तीसरा, इंसुलिन और एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन का स्तर बढ़ने से ब्रेस्ट और एंडोमेट्रियल कैंसर का जोखिम बढ़ता है। चौथा, इम्यून सिस्टम कमजोर होने से कैंसर सेल्स को पनपने का मौका मिलता है। छोटे बदलाव, बड़ा फर्क डॉ. पारिख बताती हैं कि बचाव के लिए बड़े बदलाव जरूरी नहीं। हर घंटे दो मिनट टहलें, हफ्ते में 150 मिनट मीडियम एक्सरसाइज करें, लिफ्ट की बजाय सीढ़ियां चुनें और स्क्रीन टाइम कम करें। बैलेंस्ड डाइट के साथ नियमित फिजिकल एक्टिविटी कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम कर सकती है। 40% कैंसर रोके जा सकते हैं WHO के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत कैंसर मामलों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर रोका जा सकता है। डॉ. पारिख कहती हैं कि फिजिकल एक्टिविटी न केवल कैंसर बल्कि दिल की सेहत, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बनाती है।
काठमांडू, एजेंसियां। जापान के बाद अब नेपाल ने भारत से आम मंगाने पर रोक लगा दी है। नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि जांच में कुछ खेपों में तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक मिले। नेपाल सरकार के मुताबिक, यह फैसला खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन कराने के लिए लिया गया है। सरकार ने साफ किया कि इसका मकसद भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को प्रभावित करना नहीं है। रोक लगने से पहले करीब 15.8 मीट्रिक टन भारतीय आम नेपाल पहुंच चुके थे। इनकी कीमत लगभग 10 लाख नेपाली रुपये बताई गई है। जापान ने सफाई कारणों से लगाई रोक यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब पिछले महीने जापान ने भी भारतीय आमों के आयात पर रोक लगाई थी। हालांकि जापान ने यह कदम कीटनाशकों की वजह से नहीं, बल्कि जांच और सफाई से जुड़े नियमों में कमी मिलने पर उठाया था। जापान के फैसले से अल्फांसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी भारतीय आम की मशहूर किस्मों का निर्यात प्रभावित हुआ था। करीब 20 साल में पहली बार जापान ने भारतीय आमों पर ऐसी रोक लगाई थी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।