पश्चिम एशिया

Donald Trump and Benjamin Netanyahu amid reports of policy differences and intelligence concerns.
अमेरिका-इजरायल रिश्तों में बढ़ी दरार? जासूसी आशंकाओं के बीच पेंटागन अलर्ट मोड में

  अमेरिका और इजरायल के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान में इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी बीच पश्चिम एशिया की नीतियों और ईरान संकट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। पेंटागन में बढ़ी सतर्कता रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अस्थायी संचार उपकरणों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा स्थिति की पुष्टि नहीं की है। खुफिया गतिविधियों को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में अमेरिका और इजरायल करीबी सहयोगी माने जाते हैं, लेकिन अतीत में भी दोनों देशों के बीच खुफिया गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रहती है। इसी संदर्भ में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय चर्चाओं के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की चर्चा रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया नीति को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच हाल के महीनों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभरे हैं। बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच हुई एक बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर तीखी चर्चा हुई। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इजरायल ने आरोपों को किया खारिज वॉशिंगटन स्थित इजरायली अधिकारियों ने जासूसी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इजरायल अपने सहयोगी देशों के खिलाफ ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने भी इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है और कहा है कि अमेरिका-इजरायल सुरक्षा सहयोग पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई संवेदनशीलता विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग जारी है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। फिलहाल, जासूसी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं से जुड़े कई दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। आधिकारिक स्तर पर इनकी पुष्टि सीमित है, इसलिए इन्हें सावधानी के साथ देखने की आवश्यकता है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
Iranian Foreign Minister Abbas Araghchi speaking about attack on Ayatollah Khamenei's office during conflict.
खामेनेई के दफ्तर पर हमले में बाल-बाल बचे थे अराघची, बोले- दो दिन तक नहीं पता था सुप्रीम लीडर जिंदा हैं या नहीं

  ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका-इजरायल संघर्ष के दौरान हुए एक बड़े हमले को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया कि संघर्ष के शुरुआती दिनों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के कार्यालय पर हुए हमले के समय वह उसी इमारत में मौजूद थे और मलबे के बीच से निकलकर अपनी जान बचाने में सफल रहे। अराघची के अनुसार, हमले के बाद दो दिनों तक उन्हें यह भी नहीं पता था कि खामेनेई किस स्थिति में हैं। हमले के वक्त खामेनेई के कार्यालय में मौजूद थे अराघची लेबनान के टीवी चैनल अल-मयादीन को दिए इंटरव्यू में अराघची ने बताया कि संघर्ष के शुरुआती घंटों में खामेनेई के कार्यालय को निशाना बनाया गया था। उस समय वे भी वहां मौजूद थे। उन्होंने कहा, “विस्फोट के बाद मेरी पहली चिंता अपनी सुरक्षा नहीं, बल्कि सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की स्थिति को लेकर थी। उस समय हालात बेहद अराजक थे और इमारत के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे।” दो दिन तक नहीं मिली खामेनेई की जानकारी अराघची ने बताया कि हमले के बाद लगातार दो दिनों तक उन्हें खामेनेई के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। इस दौरान पूरा ध्यान राहत, बचाव और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर केंद्रित रहा। उनके मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार खामेनेई को सुरक्षित बंकर या विशेष स्थान पर जाने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। ‘जब तक जनता सुरक्षित नहीं, मैं भी नहीं’ विदेश मंत्री के अनुसार, खामेनेई का मानना था कि यदि आम ईरानी नागरिकों को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध नहीं है, तो वे भी किसी विशेष सुरक्षा सुविधा का लाभ नहीं लेंगे। अराघची ने दावा किया कि खामेनेई ने कहा था कि देश की जनता जिस स्थिति का सामना करेगी, वही स्थिति वे भी स्वीकार करेंगे। उन्होंने युद्ध के दौरान खामेनेई के नेतृत्व और फैसलों की भी सराहना की। खाड़ी देशों को पहले ही दी गई थी चेतावनी इंटरव्यू में अराघची ने कहा कि संघर्ष शुरू होने से पहले उन्होंने कई खाड़ी देशों का दौरा किया था और स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में क्षेत्रीय सैन्य अड्डों का उपयोग किया गया, तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति ही तनाव बढ़ाने का एक प्रमुख कारण रही है। ईरान की प्रतिक्रिया ने विरोधियों को चौंकाया अराघची ने दावा किया कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की जवाबी क्षमता को कम आंका था। उनके अनुसार, बड़े पैमाने पर हमलों के बावजूद ईरान ने बहुत कम समय में जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी, जिससे विरोधी पक्ष की रणनीतिक गणनाएं प्रभावित हुईं। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया की तीव्रता ने कई देशों को आश्चर्य में डाल दिया। नेतृत्व परिवर्तन पर भी दिया बयान ईरानी विदेश मंत्री ने देश के नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चाओं पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मोजतबा खामेनेई राष्ट्रीय मामलों और शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं तथा सरकारी संस्थानों के साथ उनका नियमित संवाद बना हुआ है। ईरान की आधिकारिक व्यवस्था में सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े किसी भी बदलाव पर अंतिम पुष्टि केवल संबंधित संवैधानिक संस्थाओं द्वारा ही की जा सकती है। कैसे शुरू हुआ था 2026 का संघर्ष? 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया था। इस अभियान में परमाणु ठिकानों, मिसाइल अड्डों, वायु रक्षा प्रणालियों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इसके जवाब में ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-IV’ के तहत मिसाइल और ड्रोन हमले किए। संघर्ष का प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया में देखा गया और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी इसका असर पड़ा। फिलहाल अप्रैल 2026 से संघर्षविराम लागू है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तनावपूर्ण बयानबाजी जारी है। ऐसे में क्षेत्र में स्थायी शांति को लेकर अब भी अनिश्चितता बनी हुई है।  

Deepshikha जून 6, 2026 0
Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu concerned over possible US-Iran agreement during ongoing diplomatic talks
अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच इजरायल की बढ़ी बेचैनी, नेतन्याहू को सता रहा ‘खराब समझौते’ का डर

अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति समझौते की बातचीत ने पश्चिम एशिया की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। इस बीच इजरायल की चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को आशंका है कि अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला संभावित समझौता इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व दिए बिना आगे बढ़ सकता है। वार्ता में इजरायल का प्रभाव घटने की चर्चा रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल की भूमिका पहले की तुलना में काफी सीमित हो गई है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू ने निजी बातचीत में स्वीकार किया है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया पर उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा और अंतिम निर्णय मुख्य रूप से वाशिंगटन और तेहरान के बीच ही तय हो रहे हैं। सार्वजनिक रूप से इजरायली नेतृत्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की आलोचना करने से बच रहा है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती चिंता की खबरें सामने आ रही हैं। ईरान पर दबाव बनाए रखने की थी मांग सूत्रों के अनुसार, अप्रैल में घोषित शुरुआती युद्धविराम के बाद नेतन्याहू लगातार इस बात की वकालत करते रहे कि ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बनाए रखा जाए। उनका मानना था कि लगातार दबाव से तेहरान की रणनीतिक क्षमता कमजोर की जा सकती है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने सैन्य दबाव बढ़ाने के बजाय कूटनीतिक बातचीत और समझौते के रास्ते को प्राथमिकता दी। इससे दोनों सहयोगी देशों के दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट हो गया। किन मुद्दों को लेकर चिंतित है इजरायल? इजरायल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संभावित समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों (प्रॉक्सी नेटवर्क) से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त प्रतिबंध या नियंत्रण शामिल न हो। इजरायली अधिकारियों का मानना है कि यदि इन प्रमुख सुरक्षा मुद्दों का समाधान किए बिना ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो तेहरान को रणनीतिक लाभ मिल सकता है। 'खराब अंतरिम समझौते' का डर रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारियों को आशंका है कि अमेरिका किसी ऐसे अंतरिम समझौते पर सहमत हो सकता है जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केवल सीमित नियंत्रण स्थापित करे। इजरायल चाहता है कि किसी भी समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को लेकर स्पष्ट और सत्यापित प्रावधान हों। इजरायली पक्ष का तर्क है कि केवल आश्वासनों के आधार पर किया गया समझौता भविष्य में नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। पश्चिम एशिया की राजनीति पर रहेगा असर विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई व्यापक समझौता होता है, तो उसका असर पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में इजरायल, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को लेकर लगातार अमेरिकी प्रशासन के संपर्क में बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि संभावित समझौते में इजरायल की मांगों को कितनी जगह मिलती है।  

surbhi मई 30, 2026 0
Donald Trump discusses Middle East diplomacy and urges Arab nations to normalize relations with Israel.
ईरान डील के बहाने मिडिल ईस्ट की नई रणनीति: ट्रंप ने अरब देशों से कहा- इजरायल को मान्यता दें

Donald Trump अब सिर्फ Iran के साथ युद्धविराम या शांति समझौते तक सीमित नहीं रहना चाहते। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप अब पूरे पश्चिम एशिया की राजनीतिक व्यवस्था को नए सिरे से आकार देने की कोशिश में जुटे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कई अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं से कहा है कि ईरान युद्ध खत्म होने के बाद वे Israel के साथ अपने संबंध सामान्य करें और Abraham Accords में शामिल हों। हाई-लेवल कॉल में उठी मांग रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शनिवार को हुई एक उच्चस्तरीय कॉन्फ्रेंस कॉल में ट्रंप ने यह मुद्दा उठाया। इस बातचीत में Saudi Arabia, United Arab Emirates, Qatar, Pakistan, Turkey, Egypt, Jordan और Bahrain के नेता शामिल थे। बताया गया कि ट्रंप ने कहा कि जो देश अब तक इजरायल को मान्यता नहीं देते हैं, उन्हें अब रिश्ते सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। ट्रंप की बात के बाद छा गया सन्नाटा अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप के इस बयान के बाद कॉल पर कुछ देर के लिए खामोशी छा गई। माहौल हल्का करने के लिए ट्रंप ने मजाक में पूछा, “क्या आप लोग अभी भी लाइन पर हैं?” रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। इन देशों के इजरायल के साथ अब तक औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। ईरान को भी दिया संकेत ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी कहा कि अगर पश्चिम एशिया के देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होते हैं तो क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा, “कौन जानता है, शायद ईरान भी इसमें शामिल होना चाहे। इसे फिलहाल बेहद मुश्किल संभावना माना जा रहा है। ईरान लंबे समय से इजरायल को मान्यता देने से इनकार करता रहा है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi पहले ही कह चुके हैं कि ईरान ऐसे शासन को कभी मान्यता नहीं देगा, जिस पर बच्चों की हत्या और नरसंहार के आरोप हों। क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स? अब्राहम अकॉर्ड्स की शुरुआत साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुई थी। इसका उद्देश्य अरब देशों और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करना था। सबसे पहले United Arab Emirates और Bahrain ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। बाद में Sudan और Morocco भी इसमें शामिल हुए। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहल पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव को सीमित करने और इजरायल व अरब देशों के बीच व्यापार, तकनीक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। सऊदी अरब सबसे बड़ी चुनौती ट्रंप की इस योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती Mohammed bin Salman के नेतृत्व वाला सऊदी अरब माना जा रहा है। सऊदी अरब ने साफ कहा है कि इजरायल के साथ किसी भी औपचारिक रिश्ते की शुरुआत तभी होगी, जब फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन की दिशा में ठोस और स्थायी कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर, इजरायल फिलहाल इस मांग को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं दिख रहा। ईरान समझौते पर अब भी कई अड़चनें ट्रंप पश्चिम एशिया में नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ईरान के साथ समझौता अभी आसान नहीं दिख रहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में 60 दिन का युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे की बातचीत शामिल हो सकती है। लेकिन प्रतिबंध हटाने, यूरेनियम भंडार और फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों जैसे मुद्दों पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है।  

surbhi मई 25, 2026 0
residential building in southern Lebanon amid rising Middle East tensions.
शांति वार्ता के बीच इजरायल का हमला: लेबनान में 3 की मौत, बढ़ा तनाव

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बेहद संवेदनशील मोड़ पर पश्चिम एशिया में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। एक ओर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर इजरायल ने लेबनान में ताजा हमला कर दिया है। इस हमले में कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई है, जिससे क्षेत्र में शांति प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान के नबातीह क्षेत्र के मेफादौन कस्बे में एक रिहायशी इमारत को निशाना बनाया। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्र में दो सप्ताह के संघर्षविराम (सीजफायर) को स्थायी रूप देने के लिए बातचीत की उम्मीदें जताई जा रही थीं। वार्ता पर मंडराया संकट इस पूरे घटनाक्रम ने इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता पर असर डाल दिया है। ईरान का दावा है कि हालिया सीजफायर में लेबनान भी शामिल था, जबकि इजरायल और अमेरिका इस दावे को खारिज करते रहे हैं। यही मतभेद अब शांति वार्ता के एजेंडे का सबसे बड़ा विवाद बनता दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, लेबनान को लेकर बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने पहले वार्ता में शामिल होने से हिचक दिखाई थी। हालांकि, इजरायल द्वारा बातचीत के संकेत देने के बाद ईरान वार्ता के लिए तैयार हुआ। 14 अप्रैल को नई उम्मीद इस बीच, लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने घोषणा की है कि 14 अप्रैल से इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत शुरू हो सकती है। यह बातचीत अमेरिका की मध्यस्थता में होने की संभावना है। जंग का बड़ा असर 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद से लेबनान में हालात बेहद खराब हो चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक करीब 1,900 लोगों की मौत हो चुकी है। लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है और वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है। क्या आगे बढ़ेगी शांति प्रक्रिया? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकती, तो अमेरिका-ईरान वार्ता का सकारात्मक परिणाम निकलना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्षेत्र स्थिरता की ओर बढ़ेगा या फिर एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर लौटेगा।  

surbhi अप्रैल 11, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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