पश्चिम बंगाल राजनीति

TMC MP Abhishek Banerjee during a political event amid controversy over party spending on chartered flights.
4 साल में अभिषेक बनर्जी की चार्टर्ड फ्लाइट्स पर TMC ने खर्च किए 141 करोड़ रुपये, कुणाल घोष भी नाराज

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। इस बीच पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद Abhishek Banerjee की चार्टर्ड फ्लाइट यात्राओं को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चार वर्षों में तृणमूल कांग्रेस ने चार्टर्ड विमानों पर करीब 141 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब चुनावी हार के बाद पार्टी के अंदर नेतृत्व और संसाधनों के उपयोग को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चार वर्षों में कितना हुआ खर्च? तृणमूल कांग्रेस की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक चार्टर्ड विमानों पर खर्च का ब्योरा इस प्रकार है: वर्ष खर्च 2022 35 करोड़ रुपये 2023 13 करोड़ रुपये 2024 56 करोड़ रुपये 2025 37 करोड़ रुपये चार वर्षों में कुल खर्च 141 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसे किसी क्षेत्रीय राजनीतिक दल द्वारा हवाई यात्रा पर किया गया असाधारण खर्च माना जा रहा है। बिजनेस क्लास के बजाय प्राइवेट जेट का इस्तेमाल रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जिन मार्गों पर बिजनेस क्लास का टिकट 15 से 20 हजार रुपये में उपलब्ध था, वहां भी चार्टर्ड विमानों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि कई यात्राओं में एक बार की उड़ान पर करीब 5 लाख रुपये तक खर्च किए गए। कुणाल घोष ने जताई नाराजगी टीएमसी के वरिष्ठ नेता Kunal Ghosh ने इस मुद्दे पर खुलकर असंतोष व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यदि चार्टर्ड विमानों पर खर्च किया गया पैसा पार्टी फंड से गया है, तो वह इसका समर्थन नहीं करते। कुणाल घोष ने कहा कि पार्टी के संसाधनों का उपयोग अधिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। बीजेपी ने साधा निशाना भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर तृणमूल कांग्रेस और बनर्जी परिवार पर हमला बोला है। भाजपा विधायक Sajal Ghosh ने तंज कसते हुए कहा कि जितनी राशि चार्टर्ड विमानों पर खर्च की गई, उतने पैसों में पार्टी अपना एक नया विमान खरीद सकती थी। उन्होंने आरोप लगाया कि आम कार्यकर्ताओं के पैसे का दुरुपयोग किया गया है और पार्टी नेतृत्व को इसका जवाब देना चाहिए। चुनावी हार के बाद बढ़ीं अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले से जारी अंदरूनी खींचतान के बीच चार्टर्ड फ्लाइट खर्च का यह विवाद अभिषेक बनर्जी के लिए नई चुनौती बन सकता है। पार्टी के भीतर उठते सवाल और विपक्ष के हमलों ने इस मुद्दे को राज्य की राजनीति का बड़ा विषय बना दिया है। अब देखने वाली बात यह होगी कि तृणमूल कांग्रेस इस विवाद पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देती है और क्या पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का कारण बनता है।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
TMC MP Mahua Moitra addresses media amid controversy over her allegations against rebel MPs over an alleged ₹40 crore defection deal.
बंगाल में ‘40 करोड़’ वाला ब्लास्ट! महुआ मोईत्रा पर भड़कीं शताब्दी रॉय, मानहानि केस की दी चेतावनी

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया सियासी तूफान खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोईत्रा द्वारा पार्टी छोड़ने वाले बागी सांसदों पर कथित तौर पर 40-40 करोड़ रुपये लेकर पाला बदलने का आरोप लगाने के बाद विवाद गहरा गया है। अब बागी सांसदों ने महुआ मोईत्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है। सोशल मीडिया पोस्ट से बढ़ा विवाद कृष्णनगर से सांसद महुआ मोईत्रा ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए महाराष्ट्र के राजनीतिक घटनाक्रम का जिक्र किया और दावा किया कि पश्चिम बंगाल के बागी सांसदों ने एनडीए समर्थित पार्टी में शामिल होने के लिए भारी रकम ली है। महुआ ने आरोप लगाया कि प्रत्येक सांसद को कथित तौर पर 40 करोड़ रुपये की डील ऑफर की गई, जिसमें 4 करोड़ रुपये एडवांस और शेष राशि मासिक किस्तों में देने की व्यवस्था की गई। महुआ मोईत्रा ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई दस्तावेजी साक्ष्य सार्वजनिक नहीं किया है। शताब्दी रॉय और काकोली घोष ने बुलाई बैठक महुआ के आरोपों से नाराज बागी गुट ने जवाबी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। बीरभूम से सांसद शताब्दी रॉय और बारासात से सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने इस मुद्दे पर 20 बागी सांसदों की एक वर्चुअल बैठक बुलाई। बैठक में शामिल सांसदों ने महुआ मोईत्रा के खिलाफ आपराधिक मानहानि (क्रिमिनल डिफेमेशन) का मुकदमा दायर करने पर सहमति जताई। शताब्दी रॉय का पलटवार शताब्दी रॉय ने महुआ मोईत्रा के आरोपों को गंभीर बताते हुए कहा कि सार्वजनिक मंच पर इस तरह के आरोप लगाकर उनकी और अन्य सांसदों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि बिना किसी सबूत के इस प्रकार के आरोप स्वीकार नहीं किए जा सकते और जरूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता अपनाया जाएगा। कई बड़े चेहरे बागी खेमे में शामिल तृणमूल कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं में कई हाई-प्रोफाइल चेहरे शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय, अभिनेता और सांसद देव (दीपक अधिकारी), सांसद सायोनी घोष, सांसद जून मालिया, पूर्व क्रिकेटर और सांसद यूसुफ पठान तथा नेता पार्थ भौमिक जैसे नाम शामिल हैं। बंगाल की राजनीति में बढ़ सकती है तल्खी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुआ यह सियासी संकट अब कानूनी लड़ाई का रूप ले सकता है। यदि महुआ मोईत्रा के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर होता है, तो यह मामला राज्य की राजनीति में और अधिक तनाव पैदा कर सकता है। फिलहाल, महुआ मोईत्रा के आरोपों और बागी सांसदों की कानूनी चेतावनी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
Former Siliguri Mayor Gautam Deb submits his resignation amid political uncertainty in North Bengal and TMC's organizational reshuffle.
गौतम देब ने सिलीगुड़ी मेयर पद से दिया इस्तीफा, उत्तर बंगाल में TMC के सामने नया राजनीतिक संकट

  उत्तर बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री Gautam Deb ने शुक्रवार को सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना त्यागपत्र नगर निगम आयुक्त को सौंप दिया, जिसके बाद उत्तर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सिलीगुड़ी नगर निगम को उत्तर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत शहरी गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में गौतम देब का इस्तीफा पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद बढ़ा दबाव हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को उत्तर बंगाल के कई प्रमुख जिलों—Darjeeling, Jalpaiguri, Alipurduar और Cooch Behar—में निराशाजनक प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। खुद गौतम देब भी सिलीगुड़ी विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे। इसके बाद से ही सिलीगुड़ी नगर निगम बोर्ड की स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी पराजय के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक रणनीति को लेकर दबाव बढ़ गया था। इस्तीफे पर पार्षदों में मतभेद सूत्रों के मुताबिक, गुरुवार को गौतम देब ने मेयर-इन-काउंसिल के सदस्यों और पार्टी पार्षदों के साथ बैठक की थी। इसी दौरान उन्होंने मेयर पद छोड़ने की इच्छा जताई। सिलीगुड़ी नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल अभी एक वर्ष से अधिक समय तक शेष है। ऐसे में कई पार्षद नहीं चाहते थे कि वे पद छोड़ें। बैठक में इस मुद्दे पर मतभेद भी सामने आए, लेकिन विरोध के बावजूद गौतम देब अपने फैसले पर कायम रहे और शुक्रवार को औपचारिक रूप से इस्तीफा दे दिया। संगठन में मिली नई जिम्मेदारी इस्तीफे के बीच पार्टी नेतृत्व ने गौतम देब को नई संगठनात्मक जिम्मेदारी भी सौंपी है। मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee ने उन्हें दार्जिलिंग जिला तृणमूल कांग्रेस (मैदानी क्षेत्र) का चेयरमैन नियुक्त किया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि गौतम देब प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर उत्तर बंगाल में संगठन को दोबारा मजबूत करने पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। सिलीगुड़ी नगर निगम के भविष्य पर सवाल गौतम देब के इस्तीफे के बाद सिलीगुड़ी नगर निगम की आगामी राजनीतिक दिशा को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। नगर निगम में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया और नए मेयर के चयन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर बंगाल में लगातार कमजोर पड़ती पकड़ के बीच तृणमूल कांग्रेस के लिए सिलीगुड़ी नगर निगम का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे समय में मेयर का इस्तीफा पार्टी के सामने संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी कर सकता है। उत्तर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की भविष्य की रणनीति और नए नेतृत्व की नियुक्ति पर अब सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।  

Deepshikha जून 20, 2026 0
Former West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee amid controversy over changes in her security personnel and Z-category protection.
बंगाल में ‘सुरक्षा’ पर संग्राम! ममता बनर्जी के पसंदीदा बॉडीगार्ड हटाने पर टीएमसी-भाजपा आमने-सामने, डेरेक बोले- रातभर बिना सुरक्षा रहीं दीदी

  पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने आरोप लगाया है कि नई भाजपा सरकार ने ममता बनर्जी की सुरक्षा में वर्षों से तैनात अधिकारियों को हटाकर उनकी सुरक्षा से खिलवाड़ किया है। वहीं, मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने स्पष्ट कर दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री को अपनी पसंद के सुरक्षा अधिकारी चुनने का अधिकार नहीं है और सुरक्षा तैनाती का फैसला पुलिस प्रशासन करेगा। क्या है पूरा विवाद? 2026 के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद ममता बनर्जी की सुरक्षा में तैनात कुछ पुराने सुरक्षा अधिकारियों को हटाकर नए अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। टीएमसी का दावा है कि ये अधिकारी कई वर्षों से, यहां तक कि ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहने के समय से उनकी सुरक्षा में तैनात थे। ममता बनर्जी के करीबी नेताओं ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात कर पुराने अधिकारियों को वापस तैनात करने की मांग की, लेकिन सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया। टीएमसी का आरोप- ‘राजनीतिक प्रतिशोध का नया निचला स्तर’ All India Trinamool Congress (AITC) की आधिकारिक वेबसाइट से जुड़े नेताओं ने इस कदम को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है। टीएमसी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि: “ममता बनर्जी की सुरक्षा में लंबे समय से तैनात कर्मियों को हटाना कोई प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि उन्हें अलग-थलग करने और खतरे में डालने की सोची-समझी कोशिश है।” पार्टी ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कदम ‘बदले की राजनीति’ और ‘सत्ता के दुरुपयोग’ का उदाहरण है। डेरेक ओब्रायन का दावा- रातभर नहीं था कोई सुरक्षाकर्मी Derek O'Brien ने दावा किया कि ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित कालीघाट आवास से लंबे समय से तैनात निजी सुरक्षा अधिकारियों (PSO) को हटा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि: “बुधवार रात ममता बनर्जी के घर के बाहर कोई सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं था।” डेरेक ने इसे पूर्व मुख्यमंत्री की सुरक्षा के साथ गंभीर लापरवाही बताया। सागरिका घोष ने उठाए सवाल टीएमसी की राज्यसभा सांसद Sagarika Ghose ने भी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि: पूर्व मुख्यमंत्री की सुरक्षा राजनीति का विषय नहीं है। यह राज्य सरकार की संस्थागत जिम्मेदारी है। अचानक सुरक्षा अधिकारियों को हटाने का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि ममता बनर्जी को देर रात बिना सुरक्षा छोड़ा गया, तो यह बेहद गंभीर मामला है। शुभेंदु सरकार का रुख क्या है? मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का कहना है कि: सुरक्षा अधिकारियों की तैनाती पुलिस प्रशासन का अधिकार है। किसी भी पूर्व मुख्यमंत्री को अपनी पसंद के अधिकारियों की मांग करने का विशेष अधिकार नहीं है। सुरक्षा व्यवस्था पेशेवर और प्रशासनिक मानकों के आधार पर तय की जाएगी। ममता बनर्जी को किस स्तर की सुरक्षा प्राप्त है? ममता बनर्जी को वर्तमान में ‘जेड श्रेणी (Z Category) सुरक्षा’ प्राप्त है। इस श्रेणी में प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की एक बड़ी टीम, व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) और अन्य सुरक्षा प्रबंध शामिल होते हैं। राजनीतिक महत्व यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद टीएमसी और भाजपा के बीच राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। ममता बनर्जी की सुरक्षा को लेकर उठा यह विवाद राज्य की राजनीति में एक नए टकराव का केंद्र बन गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करती है या नहीं, और क्या टीएमसी इस मुद्दे को राजनीतिक और कानूनी स्तर पर आगे बढ़ाती है।  

Deepshikha जून 19, 2026 0
TMC rebel leader Ritabrata Banerjee attends assembly meeting as Bengal's political crisis deepens before the budget session.
बजट सत्र से पहले ममता गुट को बड़ा झटका, सर्वदलीय बैठक में शोभनदेव को नहीं बुलाया; बागी नेता रीतब्रत को मिला न्योता

  पश्चिम बंगाल विधानसभा के 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आंतरिक कलह और गहरा गई है। विधानसभा की सर्वदलीय और कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार एवं ममता बनर्जी के करीबी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर बैठक में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया। इस घटनाक्रम को विधानसभा के भीतर बदलते सियासी समीकरणों और बागी गुट की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है। रीतब्रत को मिली मान्यता, शोभनदेव रहे बाहर विधानसभा सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक के लिए जारी सूची में शोभनदेव चट्टोपाध्याय और बेलेघाटा से विधायक कुणाल घोष का नाम शामिल नहीं था। इसके विपरीत, हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र नाथ बसु द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त रीतब्रत बनर्जी को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संकेत देता है कि विधानसभा प्रशासन सदन के भीतर उभरी नई संख्या-स्थिति को स्वीकार करने लगा है। बागी गुट के साथ 65 विधायक तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई बगावत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। कुछ दिन पहले पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले को खारिज करते हुए विपक्ष के नेता पद के लिए रीतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था। अब बागी गुट का दावा है कि उसके समर्थन में 65 विधायक हैं, जिससे विधानसभा में रीतब्रत की स्थिति और मजबूत हुई है। सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए अन्य विपक्षी नेता सर्वदलीय बैठक में विभिन्न विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इनमें शामिल थे: नौशाद सिद्दीकी हुमायूं कबीर मुस्तफिजुर रहमान संसद से विधानसभा तक टीएमसी में संकट विधानसभा में बढ़ते संकट के बीच तृणमूल कांग्रेस को संसद में भी बड़ा झटका लग चुका है। हाल ही में पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का फैसला किया और भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की। बजट सत्र से पहले बढ़ा सियासी तापमान बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू हो रहा है। उससे पहले विपक्ष के नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा के भीतर बदलते संख्या बल और टीएमसी की आंतरिक टूट का असर आगामी सत्र की कार्यवाही और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर किस रूप में पड़ता है।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
TMC leaders and legal representatives amid Calcutta High Court challenge over opposition leader recognition.
टीएमसी का हाईकोर्ट रुख, रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मान्यता देने के फैसले को दी चुनौती

  पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी खींचतान अब अदालत तक पहुंच गई है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें बागी नेता रीतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में होगी। कोर्ट ने इस याचिका को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करते हुए 11 जून को विस्तृत सुनवाई की तारीख तय की है। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कानूनी आपत्ति टीएमसी की ओर से दायर याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी गई है। पार्टी का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़ा फैसला पार्टी की आधिकारिक स्थिति और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप नहीं है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष के फैसले के कारण विधानसभा के भीतर संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। बागी गुट के समर्थन से बढ़ा विवाद विवाद की जड़ टीएमसी विधायकों के भीतर उभरा मतभेद है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद विपक्ष की भूमिका में पहुंची टीएमसी के 80 विधायकों में से बड़ी संख्या ने कथित तौर पर रीतब्रत बनर्जी के समर्थन में रुख अपनाया। इसी समर्थन के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पार्टी नेतृत्व इस फैसले को चुनौती दे रहा है और आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी दलील रख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी के संगठनात्मक निर्णयों की अनदेखी कर नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं बागी गुट का तर्क है कि उन्हें पर्याप्त विधायकों का समर्थन प्राप्त है और इसी आधार पर उन्हें मान्यता मिली है। इस विवाद ने विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और टीएमसी के आंतरिक नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर उभरे मतभेदों ने उसके सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सभी की निगाहें 11 जून को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष के पद की वैधता तय करेगा, बल्कि राज्य की विपक्षी राजनीति और टीएमसी के आंतरिक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।  

Deepshikha जून 9, 2026 0
TMC leaders amid political turmoil as anti-defection law shapes potential split discussions in Parliament.
TMC में संभावित टूट पर कानूनी दीवार, सांसदों के लिए आसान नहीं होगा अलग रास्ता

  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक हलचल अब राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचती दिखाई दे रही है. पार्टी के भीतर संभावित बगावत और सांसदों के अलग गुट बनाने की अटकलों के बीच दलबदल-रोधी कानून (Anti-Defection Law) एक बड़ी कानूनी बाधा बनकर सामने आया है. पार्टी नेतृत्व और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि संसद में अलग समूह बनाने की चर्चा जितनी आसान दिखाई दे रही है, व्यवहार में उतनी ही जटिल और कानूनी चुनौतियों से भरी हुई है. ऐसे किसी भी कदम के लिए सांसदों को कड़े संवैधानिक प्रावधानों का सामना करना पड़ेगा. सांसदों के बीच बढ़ी हलचल टीएमसी के पूर्व नेता रीतब्रत बनर्जी के दावों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के कुछ सांसद अलग राजनीतिक रास्ता तलाश सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, असंतुष्ट सांसदों के बीच समर्थन जुटाने को लेकर बातचीत भी चल रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि संसद में अलग गुट बनाने का कोई सीधा संवैधानिक प्रावधान मौजूद नहीं है और ऐसे प्रयासों को कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है. दो-तिहाई समर्थन के बिना संभव नहीं टूट दलबदल-रोधी कानून के तहत किसी भी संसदीय दल में वैध विभाजन या विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है. वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं. ऐसे में यदि कोई समूह पार्टी से अलग होना चाहता है, तो उसे कम से कम 19 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. इसके बिना अलग होने वाले सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है. अलग गुट नहीं, केवल विलय का विकल्प कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, दो-तिहाई सांसदों का समर्थन मिलने के बाद भी अलग संसदीय समूह बनाना आसान नहीं होगा. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत ऐसे सांसदों को किसी अन्य मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विलय करना होगा. केवल अलग गुट बनाकर स्वतंत्र रूप से काम करने का विकल्प कानून में उपलब्ध नहीं है. संसदीय नेता बदलने का अधिकार किसके पास? राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि असंतुष्ट सांसद लोकसभा अध्यक्ष के माध्यम से संसदीय दल के नेतृत्व में बदलाव की कोशिश कर सकते हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि संसदीय दल का नेता चुनने का अधिकार मूल राजनीतिक दल के पास होता है. इसलिए टीएमसी संसदीय दल के नेतृत्व में किसी भी बदलाव का अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष के स्तर पर ही संभव है. INDIA गठबंधन की बैठक से पहले बढ़ी सियासी चर्चा टीएमसी नेताओं का आरोप है कि संभावित टूट की खबरों को ऐसे समय में हवा दी जा रही है, जब विपक्षी गठबंधन INDIA की महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है. पार्टी का मानना है कि इन अटकलों का उद्देश्य विपक्षी एकजुटता से ध्यान हटाना और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाना है. दो मॉडल पर हो रही चर्चा राजनीतिक विश्लेषकों के बीच फिलहाल दो संभावित परिदृश्यों पर चर्चा हो रही है. पहला, पश्चिम बंगाल विधानसभा में हाल में हुई राजनीतिक टूट जैसा मॉडल, जहां विधायकों के एक वर्ग ने नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोला था. दूसरा, आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा अपनाया गया मॉडल, जिसमें संवैधानिक प्रावधानों का पालन करते हुए राजनीतिक पुनर्संरेखण किया गया था. कानूनी और राजनीतिक तैयारी में जुटी टीएमसी पार्टी नेतृत्व का कहना है कि संसद के आगामी सत्र से पहले किसी भी संभावित बगावत को रोकने के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर रणनीति तैयार की जा रही है. टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि दलबदल-रोधी कानून के कारण किसी भी असंतुष्ट समूह के लिए पार्टी से अलग होकर स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना आसान नहीं होगा. ऐसे में आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर की राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी.  

Deepshikha जून 8, 2026 0
TMC MP Kakoli Ghosh Dastidar resigns as Barasat district president amid growing internal party tensions.
TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह, काकोली घोष दस्तिदार ने छोड़ा जिला अध्यक्ष पद

All India Trinamool Congress में अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद Kakoli Ghosh Dastidar ने बारासात संगठनात्मक जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने क्षेत्र में पार्टी के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ा, लेकिन साथ ही पार्टी की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक ढांचे पर भी सवाल उठाए। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन के बाद टीएमसी के भीतर लगातार असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। काकोली घोष का इस्तीफा इसी कड़ी में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। I-PAC और नई रणनीति पर सवाल काकोली घोष दस्तिदार ने राज्य टीएमसी अध्यक्ष Subrata Bakshi को भेजे अपने इस्तीफे में कहा कि पार्टी को फिर से पुराने तरीके की “सड़क की राजनीति” में लौटना चाहिए। उन्होंने इशारों में Indian Political Action Committee (I-PAC) और पार्टी में उभरे नए राजनीतिक ढांचे पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि ईमानदार और पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं के साथ पहले की तरह काम करने से पार्टी की छवि दोबारा मजबूत हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी सीधे तौर पर I-PAC की भूमिका पर सवाल है, जिसे टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee के करीबी रणनीतिक ढांचे से जोड़ा जाता है। “पुराने कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार ठीक नहीं था” पत्रकारों से बातचीत में काकोली घोष ने कहा कि I-PAC से जुड़े कुछ युवा कार्यकर्ताओं का रवैया पुराने पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मानजनक नहीं था। उन्होंने कहा, “मैंने I-PAC को नियुक्त नहीं किया था, लेकिन मैंने देखा कि वे हम जैसे पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार करते थे।” पार्टी में बढ़ते भ्रष्टाचार पर भी जताई चिंता काकोली घोष दस्तिदार ने पार्टी में बढ़ते अपराधीकरण और भ्रष्टाचार को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हाल की घटनाओं से लोगों में डर और असंतोष बढ़ा है और राजनीति में पारदर्शिता तथा जवाबदेही को प्राथमिकता देने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि टीएमसी की सीटें घटकर 80 तक पहुंच जाना उनके लिए स्वीकार करना कठिन है। उन्होंने साफ किया कि वह पार्टी नहीं छोड़ रही हैं और एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में काम करती रहेंगी। ममता बनर्जी की करीबी मानी जाती हैं काकोली घोष Mamata Banerjee की करीबी मानी जाने वाली काकोली घोष दस्तिदार बारासात से चार बार सांसद रह चुकी हैं। वह पार्टी के महिला संगठन में भी अहम जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। हाल ही में उन्हें लोकसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक पद से हटाया गया था और उनकी जगह Kalyan Banerjee को नियुक्त किया गया।  

surbhi मई 25, 2026 0
Suvendu Adhikari oath ceremony preparations at Brigade Parade Ground amid speculation over Mamata Banerjee’s attendance
Suvendu Adhikari Oath: क्या शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण में शामिल होंगी ममता बनर्जी?

Suvendu Adhikari Oath: पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार का दिन ऐतिहासिक माना जा रहा है. भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी 9 मई 2026 को कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं. इस भव्य कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के शामिल होने की संभावना है. इसी बीच सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह बना हुआ है कि क्या निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगी या नहीं. क्या कहता है प्रोटोकॉल? संवैधानिक रूप से ऐसा कोई नियम नहीं है, जो किसी निवर्तमान मुख्यमंत्री को नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए बाध्य करता हो. यह पूरी तरह राजनीतिक परंपरा, शिष्टाचार और व्यक्तिगत-राजनीतिक संबंधों पर निर्भर करता है. भारत की लोकतांत्रिक परंपरा में कई बार सत्ता छोड़ने वाले मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नए नेतृत्व के शपथ समारोह में शामिल होकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान जताते रहे हैं. हालांकि कई मामलों में राजनीतिक मतभेदों या तनावपूर्ण रिश्तों के कारण पूर्व मुख्यमंत्री समारोह से दूरी भी बनाते रहे हैं. अभी तक नहीं आया कोई आधिकारिक बयान फिलहाल तृणमूल कांग्रेस या ममता बनर्जी की ओर से इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हालिया चुनावी मुकाबले और भाजपा-टीएमसी के बीच बढ़े तीखे टकराव को देखते हुए ममता बनर्जी के कार्यक्रम में शामिल होने की संभावना कम दिखाई दे रही है. बंगाल में गरमाया राजनीतिक माहौल शपथ ग्रहण से पहले पश्चिम बंगाल का राजनीतिक माहौल लगातार गरमाया हुआ है. 7 मई को राज्यपाल आर.एन. रवि ने विधानसभा भंग करने की अधिसूचना जारी की थी. इसके बाद से नई सरकार के गठन की प्रक्रिया तेज हो गई. हालांकि ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इनकार किया था, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के तहत नई सरकार के शपथ लेने तक वह कार्यवाहक भूमिका में मानी जा रही हैं. ब्रिगेड परेड ग्राउंड में तैयारियां पूरी भाजपा इस शपथ ग्रहण समारोह को ऐतिहासिक बनाने में जुटी हुई है. ब्रिगेड परेड ग्राउंड में विशाल मंच, सुरक्षा व्यवस्था और वीआईपी प्रबंधन की विशेष तैयारियां की गई हैं. कार्यक्रम में लाखों समर्थकों के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है. कोलकाता पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे इलाके को हाई-सिक्योरिटी जोन में बदल दिया है. ड्रोन निगरानी, नो-फ्लाई जोन और कई ट्रैफिक डायवर्जन भी लागू किए गए हैं.  

surbhi मई 9, 2026 0
Suvendu Adhikari leaving residence in saffron kurta for Bengal CM oath ceremony in Kolkata
Suvendu Adhikari Oath LIVE: शुभेंदु अधिकारी आज लेंगे बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ, ब्रिगेड ग्राउंड में भव्य तैयारी

Suvendu Adhikari आज पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं. कोलकाता के ऐतिहासिक Brigade Parade Ground में होने वाला यह समारोह राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. पहली बार बंगाल में भाजपा सरकार बनने जा रही है और इसे लेकर कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह दिखाई दे रहा है. घर से रवाना हुए शुभेंदु अधिकारी भगवा कुर्ते में शुभेंदु अधिकारी अपने आवास से शपथ ग्रहण समारोह के लिए रवाना हुए. उनके स्वागत के लिए घर के बाहर बड़े काफिले की व्यवस्था की गई थी. ब्रिगेड ग्राउंड के आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं. पूरे इलाके को कई सुरक्षा सेक्टरों में बांटा गया है और ड्रोन से निगरानी की जा रही है. अमित शाह की मौजूदगी में चुने गए विधायक दल के नेता शुक्रवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah की मौजूदगी में भाजपा विधायक दल की बैठक हुई थी, जिसमें शुभेंदु अधिकारी को सर्वसम्मति से नेता चुना गया. भाजपा के 206 नवनिर्वाचित विधायकों ने उनके नाम का समर्थन किया. समारोह में शामिल होंगे पीएम मोदी समेत कई दिग्गज शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री Narendra Modi, अमित शाह और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता शामिल होंगे. इसके अलावा करीब 20 राज्यों के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी कोलकाता पहुंच चुके हैं. Pushkar Singh Dhami, Conrad Sangma, Samrat Choudhary और Rekha Gupta जैसे नेता समारोह में शामिल होने के लिए कोलकाता पहुंचे. भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह उत्तर बंगाल, आरामबाग, गोघाट और गंगासागर समेत कई इलाकों से हजारों भाजपा कार्यकर्ता ब्रिगेड मैदान की ओर रवाना हुए हैं. सियालदह स्टेशन पर भाजपा की ओर से विशेष सहायता शिविर लगाए गए हैं. समर्थक ढोल-नगाड़ों और नारों के साथ समारोह में पहुंच रहे हैं. बंगाल में ‘डबल इंजन’ सरकार का दावा महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम Eknath Shinde ने कहा कि बंगाल में अब डबल इंजन की सरकार चलेगी और राज्य में विकास, रोजगार और बेहतर कानून-व्यवस्था देखने को मिलेगी. वहीं यूपी के डिप्टी सीएम Keshav Prasad Maurya ने इसे “40 साल की काली रात के बाद नया सूर्योदय” बताया. सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे खास शपथ ग्रहण समारोह में बंगाल की लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी. पुरुलिया छऊ नृत्य की विशेष प्रस्तुति रखी गई है. कई सांस्कृतिक हस्तियां और उद्योग जगत के बड़े नाम भी समारोह में शामिल होंगे. सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम ब्रिगेड ग्राउंड और आसपास के इलाकों में भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं. कार्यक्रम स्थल को 35 सेक्टरों में बांटा गया है. हर सेक्टर की निगरानी आईपीएस अधिकारियों के जिम्मे है. पुलिस ने साफ किया है कि बिना जांच किसी को प्रवेश नहीं मिलेगा. बैग, बोतल और छाते ले जाने पर रोक लगाई गई है. नंदीग्राम और भवानीपुर की जीत बनी सबसे बड़ी ताकत भाजपा नेतृत्व शुभेंदु अधिकारी की इस ताजपोशी को उनकी बड़ी राजनीतिक जीत मान रहा है. पहले Nandigram में और फिर भवानीपुर में Mamata Banerjee को कड़ी चुनौती देने के बाद पार्टी ने उन्हें बंगाल की कमान सौंपने का फैसला किया है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के घर भी जाएंगे शुभेंदु सूत्रों के मुताबिक शपथ ग्रहण के बाद शुभेंदु अधिकारी Kalighat Kali Temple और Syama Prasad Mukherjee के आवास पर भी जाएंगे. बुधवार को विधानसभा में नवनिर्वाचित विधायकों का शपथ ग्रहण कार्यक्रम होगा.  

surbhi मई 9, 2026 0
Police escorting former TMC councillor Nirmal Dutta to Bidhannagar court after arrest in voter intimidation case
बंगाल चुनाव: वोटरों को धमकाने के आरोप में TMC का पूर्व पार्षद गिरफ्तार, 10 दिन की न्यायिक हिरासत

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पूर्व पार्षद निर्मल दत्त को वोटरों को कथित रूप से धमकाने और चुनाव को प्रभावित करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। बुधवार को उन्हें विधाननगर कोर्ट में पेश किया गया, जहां अदालत ने उन्हें 10 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। शिकायत के बाद हुई कार्रवाई मामले की शुरुआत मंगलवार को हुई, जब भाजपा प्रत्याशी शरदबत मुखर्जी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्मल दत्त वोटरों को डराकर मतदान को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने विधाननगर पुलिस कमिश्नर से भी मुलाकात की थी। शिकायत के आधार पर विधाननगर दक्षिण थाने की पुलिस ने दत्ताबाद इलाके से निर्मल दत्त को गिरफ्तार किया। सुजीत बोस के करीबी बताए जाते हैं निर्मल दत्त को राज्य मंत्री सुजीत बोस का करीबी माना जाता है, जो विधाननगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। दत्त की पत्नी भी विधाननगर नगर निगम के वार्ड संख्या 38 से तृणमूल कांग्रेस की पार्षद हैं। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में इस्लामपुर में एक रैली के दौरान चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि तृणमूल के एक नेता को गिरफ्तार किया जाता है, तो उनकी जगह सौ अन्य नेता खड़े हो जाएंगे। वायरल वीडियो से बढ़ा विवाद बताया जा रहा है कि 13 अप्रैल को सॉल्टलेक में हुई एक बैठक का वीडियो वायरल होने के बाद मामला गरमा गया। इस वीडियो में निर्मल दत्त कथित तौर पर यह कहते नजर आ रहे हैं कि अगर किसी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि एक मोबाइल ऐप के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसने किसे वोट दिया है। इस बयान के सामने आने के बाद भाजपा प्रत्याशी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की। पहले भी लग चुके हैं आरोप यह पहली बार नहीं है जब निर्मल दत्त विवादों में आए हैं। इससे पहले भी उन पर सॉल्टलेक के दत्ताबाद इलाके में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले का आरोप लग चुका है। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच में जुटी है और आगे की कार्रवाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार की जाएगी।  

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
Suvendu Adhikari and Mamata Banerjee during the high-profile Nandigram 2021 election battle in West Bengal.
नंदीग्राम 2021: कैसे शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को दी मात? जानिए पूरा विश्लेषण

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2021 का नंदीग्राम चुनाव सबसे हाई-प्रोफाइल मुकाबलों में से एक रहा। इस सीट पर बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया था। आइए जानते हैं वे अहम कारण, जिनकी वजह से यह परिणाम सामने आया। 1. रणनीति का बड़ा फर्क: रैली vs संगठन ममता बनर्जी ने अपने कुल खर्च का 89.5% बड़ी रैलियों और जनसभाओं पर लगाया शुभेंदु अधिकारी ने जमीनी संगठन, लोकल नेटवर्क और लॉजिस्टिक्स पर ज्यादा ध्यान दिया नतीजा: लोकल स्तर पर बीजेपी की पकड़ मजबूत हुई 2. खर्च कम, लेकिन असरदार ममता बनर्जी: ₹21.88 लाख खर्च शुभेंदु अधिकारी: ₹23.62 लाख खर्च शुभेंदु ने ममता से करीब ₹1.74 लाख ज्यादा खर्च किया लेकिन असली फर्क खर्च की रणनीति ने डाला, न कि सिर्फ रकम ने 3. फंडिंग और उपयोग में अंतर ममता के पास कुल ₹40 लाख का फंड, लेकिन उन्होंने सिर्फ 54.7% खर्च किया शुभेंदु के पास ₹21.02 लाख, लेकिन उन्होंने 112% तक खर्च किया (अतिरिक्त संसाधनों के साथ) शुभेंदु ने आक्रामक निवेश मॉडल अपनाया 4. लोकल नेटवर्क और कैडर की ताकत ममता के पास 116 वाहन और 1,400+ कार्यकर्ता शुभेंदु को मिला BJP का मजबूत राष्ट्रीय कैडर और संगठन बूथ स्तर पर बेहतर मैनेजमेंट ने चुनाव का रुख बदला 5. वोट और प्रति वोट खर्च ममता बनर्जी: 41,505 वोट | ₹52.73 प्रति वोट खर्च शुभेंदु अधिकारी: 43,461 वोट | ₹54.36 प्रति वोट खर्च मामूली अंतर, लेकिन निर्णायक जीत 6. अंदरूनी फूट भी बनी वजह TMC में स्थानीय स्तर पर मतभेद शुभेंदु पहले TMC में थे, जिससे उन्हें स्थानीय समीकरणों की गहरी समझ थी

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
ED raids I-PAC offices in Delhi, Bengaluru, Hyderabad over alleged coal scam linked to TMC
I-PAC के ठिकानों पर ED की रेड: कोयला घोटाले से जुड़ा मामला, TMC से कनेक्शन

नई दिल्ली/कोलकाता/बेंगलुरु/हैदराबाद: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार को पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC (Indian Political Action Committee) के कई ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद स्थित कंपनी के दफ्तरों में की गई। अधिकारियों के अनुसार, यह छापेमारी कथित कोयला चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ी है। 2,742 करोड़ के घोटाले से जुड़ा मामला ED की यह कार्रवाई करीब 2,742 करोड़ रुपए के कोयला घोटाले से संबंधित बताई जा रही है। इस मामले में CBI ने 27 नवंबर 2020 को FIR दर्ज की थी, जिसके बाद ED ने मनी लॉन्ड्रिंग एंगल से जांच शुरू की। डायरेक्टर और को-फाउंडर भी जांच के दायरे में छापेमारी के दायरे में कंपनी के को-फाउंडर और डायरेक्टर ऋषि राज सिंह के ठिकाने भी शामिल हैं। इसके अलावा डायरेक्टर प्रतीक जैन पहले से ही जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। ED ने हाल ही में दोनों को बयान दर्ज कराने के लिए समन भी भेजा था। हालांकि, सिंह और जैन ने इन समन को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, यह कहते हुए कि वे इस समय पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनावी कार्यों में व्यस्त हैं। पहले भी हो चुकी है कार्रवाई इससे पहले जनवरी में ED ने कोलकाता में I-PAC के दफ्तर और प्रतीक जैन के घर पर छापा मारा था। उस दौरान कोलकाता के लाउडन स्ट्रीट स्थित आवास और सॉल्टलेक स्थित ऑफिस में जांच की गई थी। ममता बनर्जी भी पहुंची थीं मौके पर जनवरी में हुई कार्रवाई के दौरान एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला था। छापेमारी सुबह करीब 6 बजे शुरू हुई बाद में कोलकाता पुलिस कमिश्नर मौके पर पहुंचे कुछ ही देर बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद प्रतीक जैन के घर पहुंचीं बताया जाता है कि ममता बनर्जी कुछ समय वहां रुकीं और बाहर निकलते समय उनके हाथ में एक फाइल भी देखी गई। इसके बाद वे I-PAC के दफ्तर भी गईं। TMC के लिए चुनावी रणनीति संभालती है I-PAC I-PAC फिलहाल तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए चुनावी रणनीति और कैंपेन मैनेजमेंट का काम कर रही है। कंपनी डेटा-आधारित चुनावी रणनीति, मीडिया प्लानिंग और वोटर आउटरीच में विशेषज्ञ मानी जाती है। I-PAC का इतिहास I-PAC की शुरुआत 2013 में प्रशांत किशोर और प्रतीक जैन ने की थी पहले इसका नाम Citizens for Accountable Governance (CAG) था बाद में इसे I-PAC नाम दिया गया प्रशांत किशोर के अलग होने के बाद कंपनी की कमान पूरी तरह प्रतीक जैन के पास आ गई आगे क्या? ED की यह कार्रवाई राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ा असर डाल सकती है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और इसके राजनीतिक निहितार्थ पर सभी की नजर रहेगी।  

surbhi अप्रैल 2, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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