राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों के विलय पर सियासी घमासान आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों, जिनमें राघव चड्ढा भी शामिल हैं, के बीजेपी में विलय को मंजूरी मिलने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम पर कांग्रेस ने बीजेपी पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेता अजय माकन ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने पंजाब के जनादेश का अनादर किया है और इससे राज्य में अलगाववादी ताकतों को बल मिल सकता है। "पंजाब में वही हुआ, जो अलगाववादी चाहते थे" अजय माकन ने कहा कि पंजाब जैसे संवेदनशील और सीमावर्ती राज्य में यह राजनीतिक बदलाव गंभीर चिंता का विषय है। उनके मुताबिक, अलगाववादी ताकतें लंबे समय से यह प्रचार करती रही हैं कि पंजाब के लोगों की आवाज को दबाया जाता है। माकन ने आरोप लगाया कि बीजेपी का यह कदम उसी नैरेटिव को मजबूती देता है। 6 फीसदी वोट, लेकिन 86 फीसदी राज्यसभा सीटें कांग्रेस नेता ने कहा कि 2021 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी को केवल 6.6 प्रतिशत वोट और दो सीटें मिली थीं। इसके बावजूद अब पंजाब से राज्यसभा की सात में से छह सीटों पर बीजेपी का प्रभाव हो गया है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक जनादेश के साथ अन्याय बताया। AAP पर भी साधा निशाना अजय माकन ने आम आदमी पार्टी पर भी जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि AAP अब आम आदमी की नहीं, बल्कि अरबपतियों की पार्टी बन चुकी है। माकन के अनुसार, बीजेपी में शामिल हुए सातों सांसदों की औसत घोषित संपत्ति 800 करोड़ रुपये से अधिक है। केजरीवाल पर लगाए गंभीर आरोप कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर धनाढ्य लोगों को राज्यसभा भेजा। उन्होंने यह भी कहा कि AAP को कांग्रेस का वोट काटने के लिए खड़ा किया गया था, लेकिन अब उसका "मुखौटा" उतर चुका है। INDIA गठबंधन पर भी उठे सवाल माकन ने स्वीकार किया कि कांग्रेस और AAP के बीच पहले भी वैचारिक मतभेद रहे हैं। हालांकि, गठबंधन की मजबूरियों के चलते दोनों दल साथ आए थे। अब इस घटनाक्रम के बाद INDIA गठबंधन के भीतर भी नई बहस शुरू होने की संभावना है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आम आदमी पार्टी (AAP) को शुक्रवार को बड़ा राजनीतिक झटका लगा, जब राज्यसभा सांसद Raghav Chadha ने पार्टी छोड़ने और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान किया। उनके साथ स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, विक्रम साहनी और राजिंदर गुप्ता सहित कुल सात राज्यसभा सांसद भी बीजेपी में जाने की तैयारी में हैं। AAP के लिए बड़ा झटका यह घटनाक्रम AAP के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि राज्यसभा में पार्टी के कुल 10 सांसद हैं और इनमें से दो-तिहाई यानी 7 सांसदों का एक साथ जाना पार्टी के लिए लगभग ‘सफाए’ जैसा माना जा रहा है। राजनीतिक दृष्टि से यह कदम एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत भी अहम है। संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ दल बदलते हैं, तो इसे वैध माना जाता है और उनकी सदस्यता पर खतरा नहीं रहता। ऐसे में राघव चड्ढा और उनके साथियों का यह फैसला कानूनी रूप से भी सुरक्षित माना जा रहा है। राघव चड्ढा ने पार्टी पर गंभीर आरोप लगाया अपने फैसले को लेकर राघव चड्ढा ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि AAP अब अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी है और देशहित के बजाय निजी हितों के लिए काम कर रही है। उन्होंने कहा, “मैंने इस पार्टी को 15 साल दिए, लेकिन अब महसूस होता है कि मैं गलत पार्टी में था।” इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। AAP की राज्यसभा में स्थिति कमजोर होती दिख रही है, वहीं BJP को ऊपरी सदन में मजबूती मिलने की संभावना है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बड़े राजनीतिक बदलाव का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर पड़ता है।
नई दिल्ली में AAP को बड़ा झटका, राज्यसभा में संख्या घटकर रह गई सिर्फ 3 आम आदमी पार्टी (AAP) को राज्यसभा में बड़ा राजनीतिक नुकसान हुआ है। पार्टी के 10 में से 7 सांसदों ने संगठन से नाता तोड़ लिया है। इस बड़े घटनाक्रम के बाद पार्टी के पास अब सिर्फ 3 राज्यसभा सांसद बचे हैं। कौन-कौन से सांसद पार्टी में रह गए? बड़े पैमाने पर हुए इस बदलाव के बाद जो तीन सांसद AAP के साथ बने हुए हैं, वे हैं: Balbir Singh Seechewal Sanjay Singh ND Gupta इन नेताओं के साथ पार्टी अब उच्च सदन में बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच गई है। 7 सांसदों ने छोड़ा AAP का साथ सूत्रों के मुताबिक, सात सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ जाने का फैसला किया है। यह फैसला AAP के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। इनमें कई वरिष्ठ नाम शामिल हैं, जिससे पार्टी के भीतर राजनीतिक हलचल और तेज हो गई है। राघव चड्ढा का दावा: दो-तिहाई समर्थन मिला इस पूरे घटनाक्रम के बीच Raghav Chadha ने दावा किया कि उनके पास AAP के राज्यसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक समर्थन है, जो कानून के अनुसार किसी भी पार्टी में विलय के लिए जरूरी माना जाता है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय राजनीतिक मजबूरी नहीं बल्कि सिद्धांतों के आधार पर लिया गया है। “AAP अब अपनी मूल विचारधारा से भटक गई” चड्ढा ने आरोप लगाया कि जिस पार्टी को उन्होंने वर्षों तक मजबूत किया, वह अब अपने मूल आदर्शों से दूर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति में पार्टी की दिशा और कार्यशैली बदल गई है। केजरीवाल की प्रतिक्रिया पार्टी प्रमुख Arvind Kejriwal ने इस पूरे घटनाक्रम पर संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह पंजाब के लोगों के साथ “धोखा” है और बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए। राजनीतिक तनाव और बढ़ा इस घटनाक्रम के बाद AAP के भीतर तनाव और बढ़ गया है। पार्टी में नेतृत्व, नीतियों और अंदरूनी मतभेदों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव AAP के लिए राज्यसभा में बड़ा नुकसान साबित हो सकता है।
नई दिल्ली में राजनीति का बड़ा उलटफेर देश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद Raghav Chadha ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान कर दिया है। उनके इस फैसले ने AAP के राष्ट्रीय संयोजक Arvind Kejriwal को गहरा राजनीतिक झटका दिया है। सूत्रों के अनुसार, AAP के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 सांसदों ने BJP के साथ जाने का फैसला किया है। यह बदलाव पार्टी के लिए बड़ी टूट के रूप में देखा जा रहा है। 7 सांसदों का एक साथ पाला बदला राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि AAP के कई सांसद अब BJP के साथ जुड़ रहे हैं। इनमें कुछ बड़े नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला लंबे विचार-विमर्श के बाद लिया गया है। चड्ढा ने आरोप लगाया कि जिस पार्टी ने कभी ईमानदार राजनीति का वादा किया था, वह अब अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी है। उनके अनुसार, AAP में अब पारदर्शिता और नैतिकता की कमी देखी जा रही है। “AAP अब अपनी राह से भटक चुकी है” – चड्ढा का बयान राघव चड्ढा ने कहा कि उन्होंने पार्टी को कई साल दिए, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास राजनीति छोड़ने या सही रास्ता चुनने का विकल्प था, और उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। उनका कहना है कि राज्यसभा के दो-तिहाई सांसदों के साथ मिलकर BJP में शामिल होने का निर्णय लिया गया है। AAP का पलटवार, BJP पर गंभीर आरोप AAP ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी ने इसे “धोखा” करार देते हुए कहा कि जिन नेताओं को AAP ने पहचान दी, वही अब विरोधी खेमे में चले गए हैं। पार्टी नेताओं ने यह भी दावा किया कि यह कदम राजनीतिक दबाव और रणनीति का हिस्सा हो सकता है। केजरीवाल की पहली प्रतिक्रिया घटना के बाद Arvind Kejriwal ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए BJP पर हमला बोला और इसे पंजाब के लोगों के साथ “विश्वासघात” बताया। राजनीतिक माहौल में बढ़ी हलचल इस बड़े राजनीतिक बदलाव के बाद देश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। अब सबकी नजर इस पर है कि आने वाले दिनों में AAP और BJP की रणनीति क्या होगी और संसद में इसका क्या असर पड़ेगा।
आम आदमी पार्टी में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बीच राज्यसभा सांसद Raghav Chadha ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पार्टी नेतृत्व को लेकर तीखा संदेश दिया है। उपनेता पद से हटाए जाने के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी खामोशी को कमजोरी या हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। Aam Aadmi Party के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि उन्हें जानबूझकर खामोश करने की कोशिश की गई है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पार्टी के भीतर उठाए गए मुद्दों और जनता से जुड़े सवालों के कारण उन्हें इस कार्रवाई का सामना करना पड़ा। “जनता की आवाज उठाना क्या अपराध है?” अपने बयान में चड्ढा ने सीधे सवाल उठाया कि क्या जनता के मुद्दों को उठाना गलत है। उन्होंने कहा कि वह लगातार आम लोगों से जुड़े विषयों को संसद और सार्वजनिक मंचों पर रखते रहे हैं, लेकिन इसके चलते उन्हें राजनीतिक नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपने सिद्धांतों से पीछे हटने वाले नहीं हैं और भविष्य में भी जनता की आवाज बुलंद करते रहेंगे। राजनीतिक संकेत और संभावित असर राघव चड्ढा का यह बयान पार्टी के अंदरूनी हालात की ओर इशारा करता है। उनके शब्दों से यह साफ झलकता है कि AAP के भीतर मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले समय में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और रणनीति पर असर डाल सकता है। आगे क्या? हालांकि, पार्टी की ओर से इस बयान पर आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है, लेकिन चड्ढा का यह खुला संदेश सियासी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि AAP नेतृत्व इस मुद्दे को कैसे संभालता है और इसका व्यापक राजनीतिक प्रभाव क्या पड़ता है।
नई दिल्ली: संसद में सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष Om Birla के खिलाफ प्रस्ताव की चर्चा के बाद अब विपक्ष ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar को भी निशाने पर ले लिया है। जानकारी के अनुसार विपक्षी दल उन्हें हटाने के प्रस्ताव की तैयारी में जुट गए हैं और इसके लिए सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस सप्ताह ही लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालयों में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने से संबंधित नोटिस जमा कराया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह भारतीय संसदीय इतिहास में पहली बार होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए औपचारिक नोटिस दिया जाएगा। TMC की अगुवाई में तैयार हो रहा प्रस्ताव मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस पहल की अगुवाई All India Trinamool Congress कर रही है। प्रस्ताव पर विपक्षी गठबंधन INDIA Alliance से जुड़े दलों के अलावा Aam Aadmi Party के सांसदों ने भी हस्ताक्षर किए हैं। सूत्रों के अनुसार नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर करीब आधा दर्जन आरोप लगाए गए हैं। इनमें कथित पक्षपातपूर्ण रवैया और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे गंभीर आरोप शामिल बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि गुरुवार तक यह नोटिस संसद सचिवालय में जमा किया जा सकता है। आवश्यक संख्या से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर बुधवार रात तक लोकसभा के लिए करीब 120 सांसदों और राज्यसभा के लिए लगभग 60 सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा चुके थे। नियमों के अनुसार लोकसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar को लेकर विपक्षी दलों की नाराजगी पिछले कुछ महीनों से बढ़ती रही है। तृणमूल कांग्रेस पहले से ही उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही थी। इसी बीच कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने भी ‘वोट चोरी’ अभियान के जरिए चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव के बाद नया राजनीतिक मोर्चा हाल ही में विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष Om Birla को हटाने के प्रस्ताव का भी समर्थन किया था। हालांकि बजट सत्र के दौरान यह प्रस्ताव वॉइस वोट से खारिज हो गया। इसके बाद विपक्ष ने दोनों सदनों के सांसदों के हस्ताक्षर जुटाकर अपनी राजनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल और सख्त है। यह प्रक्रिया लगभग उसी तरह होती है जैसे Supreme Court of India के न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है। कानून के अनुसार यह कार्रवाई केवल ‘कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर ही संभव है। 1968 के जजेस (इंक्वायरी) एक्ट के तहत यदि नोटिस स्वीकार हो जाता है, तो लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करते हैं। यह समिति आरोपों की जांच कर रिपोर्ट तैयार करती है। इसके बाद दोनों सदनों में इस पर चर्चा होती है। प्रस्ताव पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है-जिसमें सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत शामिल होता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।