गढ़वा: बरवाडीह-चिरमिरी रेल लाइन परियोजना को लेकर एक बार फिर मांग तेज हो गयी है। झारखंड विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष और पूर्व विधायक इंदर सिंह नामधारी ने केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर प्रस्तावित रेल लाइन के मार्ग पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यदि आदिवासी बहुल बड़गड़ और भंडरिया क्षेत्र को रेलवे लाइन से नहीं जोड़ा गया, तो इस इलाके के लोगों का करीब सौ साल पुराना सपना अधूरा रह जाएगा। नामधारी ने रेल मंत्री से आग्रह किया है कि बरवाडीह-चिरमिरी रेल परियोजना के लिए पुरानी योजना में प्रस्तावित मार्ग को ही प्राथमिकता दी जाए। उनके अनुसार बरवाडीह से बड़गड़ और भंडरिया होते हुए बलरामपुर तक रेल लाइन का निर्माण इस क्षेत्र के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांग रही है। छह बार विधायक रहे हैं इंदर सिंह नामधारी इंदर सिंह नामधारी ने रेल मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि वह इस क्षेत्र से छह बार विधायक रह चुके हैं। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान उन्होंने बरवाडीह-चिरमिरी रेल परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किया। हालांकि, लंबे समय तक प्रयासों के बावजूद परियोजना को जमीन पर उतारने में सफलता नहीं मिल सकी। करीब एक दशक पहले सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी उनका क्षेत्र की जनता से जुड़ाव बना हुआ है। अब उन्होंने एक बार फिर इस पुरानी रेल परियोजना को लेकर आवाज उठायी है। नामधारी का कहना है कि प्रस्तावित नयी रेल लाइन में बड़गड़ और भंडरिया को शामिल किया जाना बेहद जरूरी है। इन इलाकों को जोड़ने से आदिवासी बहुल क्षेत्र के लोगों को परिवहन की बेहतर सुविधा मिलेगी और इलाके के विकास का रास्ता भी खुलेगा। 1932 में शुरू हुई थी रेल लाइन की योजना बरवाडीह-चिरमिरी रेल लाइन परियोजना का इतिहास करीब एक सदी पुराना बताया जाता है। दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे से जुड़ी इस चर्चित परियोजना की शुरुआत वर्ष 1932 में हुई थी। उस समय इसका उद्देश्य झारखंड और छत्तीसगढ़ के बीच रेल संपर्क स्थापित करना था। हालांकि, अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गयी। इसके बाद वर्ष 1970 से स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों की ओर से इसे दोबारा शुरू कराने के लिए लगातार प्रयास किये जाते रहे हैं। कई बार इस मुद्दे को संसद और दूसरे मंचों पर भी उठाया गया। इसके बावजूद अब तक यह रेल परियोजना पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर सकी है। बड़गड़-भंडरिया से होकर रेल लाइन की मांग पुरानी योजना के अनुसार बरवाडीह से बड़गड़ और भंडरिया होते हुए बलरामपुर तक रेल लाइन का प्रस्ताव था। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मार्ग आदिवासी बहुल और अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों को मुख्य रेल नेटवर्क से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इंदर सिंह नामधारी ने कहा है कि पुरानी योजना के तहत जिस क्षेत्र में रेल लाइन बिछाने की बात थी, उसे नयी योजना में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि केवल रेल लाइन का निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसका लाभ उन इलाकों तक पहुंचना भी जरूरी है, जहां लंबे समय से रेल संपर्क की मांग की जा रही है। रामानुजगंज की जगह बलरामपुर को बनाया जाए जंक्शन नामधारी ने रेल मंत्री के सामने एक और महत्वपूर्ण मांग रखी है। उन्होंने रामानुजगंज के स्थान पर बलरामपुर को रेलवे जंक्शन बनाने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि यदि पुराना मार्ग बरकरार रखते हुए बरवाडीह से बड़गड़ और भंडरिया होते हुए बलरामपुर तक रेल संपर्क बनाया जाता है, तो इससे पूरे क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी मिल सकती है। उन्होंने रेल मंत्रालय से परियोजना के मार्ग को लेकर स्थानीय परिस्थितियों और लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांग को ध्यान में रखने की अपील की है। रेल संघर्ष समिति भी कर रही आंदोलन बरवाडीह-चिरमिरी रेल परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर रेलवे संघर्ष समिति का भी गठन किया गया है। समिति की प्रमुख मांगों में बड़गड़ और भंडरिया को रेल परियोजना में शामिल करना तथा बलरामपुर को जंक्शन बनाया जाना शामिल है। समिति में आनंद प्रसाद, जयप्रकाश मिंज, जितेंद्र चंद्रवंशी, ओमप्रकाश, संदीप गुप्ता, बजरंग प्रसाद, अर्जुन मिंज, अमानत अंसारी, वरुण केशरी और आजाद अंसारी समेत कई लोग शामिल हैं। समिति का कहना है कि रेल संपर्क मिलने से इस आदिवासी बहुल इलाके में शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, व्यापार और आवागमन के अवसर बढ़ेंगे। लंबे समय से रेल सुविधा का इंतजार कर रहे लोगों को उम्मीद है कि इस बार परियोजना के मार्ग पर उनकी मांगों को गंभीरता से लिया जाएगा। 100 साल पुरानी उम्मीद अब भी कायम बरवाडीह-चिरमिरी रेल लाइन को लेकर स्थानीय लोगों का संघर्ष कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। करीब सौ साल पहले देखे गये रेल संपर्क के सपने को आज भी क्षेत्र के लोग पूरा होते देखना चाहते हैं। इंदर सिंह नामधारी की रेल मंत्री से की गयी मांग के बाद एक बार फिर इस परियोजना को लेकर चर्चा तेज हो गयी है। अब देखना होगा कि रेल मंत्रालय प्रस्तावित मार्ग में बड़गड़ और भंडरिया को शामिल करने तथा बलरामपुर को जंक्शन बनाने की मांग पर क्या फैसला लेता है।
गुमला: नेतरहाट की तराई में बसे सखुआपानी गांव की तस्वीर अब धीरे-धीरे बदल रही है। कभी गरीबी, अशिक्षा और सीमित संसाधनों के बीच जीवन गुजारने वाला असुर समुदाय अब शिक्षा को अपनी तरक्की का सबसे बड़ा माध्यम बना रहा है। इस बदलाव का असर गांव के बच्चों और युवाओं के भविष्य में साफ दिखाई देने लगा है। समुदाय के युवा अब शिक्षक बनने के साथ-साथ सेना में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं और उच्च शिक्षा के जरिए शोध के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहे हैं। इस बदलाव की कहानी सिर्फ नौकरी हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सोच में आए परिवर्तन की कहानी है, जहां एक पीढ़ी ने पढ़ाई की अहमियत समझी और अब अगली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। बाइक की आवाज सुनते ही बच्चों को पता चल जाता है- गणपति असुर आए हैं सखुआपानी गांव में जब भी बाइक की आवाज सुनाई देती है, कई बच्चे उत्सुकता से अपने घरों से बाहर निकल आते हैं। उन्हें पता होता है कि गणपति असुर गांव में पहुंचे हैं। कभी सरकारी सेवा में रहकर असुर समाज के बीच काम करने वाले गणपति असुर अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन समाज के लिए काम करने का उनका उत्साह आज भी बरकरार है। सेवानिवृत्ति के बाद वह शहर में आराम की जिंदगी जी सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने गांव और समाज के बीच रहकर बच्चों के भविष्य के लिए काम करना चुना। खेती-बाड़ी के साथ समय निकालकर वह बाइक से आसपास के गांवों में जाते हैं। बच्चों से पढ़ाई के बारे में बात करते हैं और अभिभावकों को भी शिक्षा के महत्व के बारे में समझाते हैं। उनका प्रयास है कि आर्थिक परेशानियों या संसाधनों की कमी के कारण कोई बच्चा पढ़ाई से दूर न हो। 90 घरों वाले गांव में दिख रहा बदलाव नेतरहाट की तराई में स्थित सखुआपानी में करीब 90 घर हैं, जिनमें लगभग 75 घर असुर परिवारों के हैं। कुछ समय पहले तक यहां के लोगों के सामने शिक्षा और रोजगार को लेकर कई चुनौतियां थीं। सीमित आर्थिक संसाधनों के कारण बच्चों की पढ़ाई जारी रखना भी आसान नहीं था। अब स्थिति में बदलाव दिखाई दे रहा है। गांव और आसपास के असुर समुदाय से कई युवा शिक्षक बने हैं। कुछ युवाओं ने सेना में जाकर देश की सेवा का रास्ता चुना है, जबकि कई युवा उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं। यह बदलाव समुदाय के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब बच्चों के सामने रोजगार और करियर के नए विकल्प दिखाई दे रहे हैं। पहली पीढ़ी बनी शिक्षक, अब अगली पीढ़ी को दे रही शिक्षा सखुआपानी के टिपुन असुर, एतवा असुर, ज्योति असुर और भिखराम असुर शिक्षक के रूप में काम कर रहे हैं। उनके लिए स्कूल में पढ़ाना भले ही रोजमर्रा की जिम्मेदारी हो, लेकिन असुर समाज के लिए यह बदलाव का बड़ा संकेत है। ये उन शुरुआती लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा हासिल की और रोजगार तक पहुंचे। अब यही पीढ़ी समाज के दूसरे बच्चों के लिए उदाहरण बन रही है। गणपति असुर के दोस्त रविनंदन असुर ने भी शिक्षा के महत्व को समझते हुए अपनी बेटी को आगे की पढ़ाई के लिए नागपुर भेजने का फैसला किया। बेटियों को घर और गांव तक सीमित रखने के बजाय उन्हें उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजना भी समाज में बदलती सोच का संकेत माना जा रहा है। शिक्षा से खुल रहे हैं रोजगार के नए रास्ते असुर समुदाय के युवाओं के लिए शिक्षा अब सिर्फ स्कूल तक पहुंचने का माध्यम नहीं रह गयी है। पढ़ाई के जरिए रोजगार और बेहतर जीवन की संभावनाएं भी खुल रही हैं। शिक्षक बनने वाले युवाओं से लेकर सेना में जाने वाले युवाओं तक, अलग-अलग क्षेत्रों में समुदाय की भागीदारी बढ़ रही है। उच्च शिक्षा और शोध की दिशा में आगे बढ़ने वाले युवा भी आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। इससे बच्चों और अभिभावकों के बीच यह विश्वास मजबूत हो रहा है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद पढ़ाई के जरिए भविष्य बदला जा सकता है। 15 अगस्त पर असुर समाज की कहानी देती है आजादी का नया अर्थ 15 अगस्त को देश आजादी की 79वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। ऐसे समय में असुर समाज की यह कहानी आजादी के एक अलग और व्यापक अर्थ को सामने रखती है। इस समुदाय के लिए आजादी अब केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। अशिक्षा और गरीबी की पीढ़ियों पुरानी जकड़न से बाहर निकलना, बच्चों को बेहतर शिक्षा देना, बेटियों को दूर शहरों में पढ़ने का अवसर देना और युवाओं को अपनी पसंद का करियर चुनने की स्वतंत्रता देना भी आजादी का हिस्सा बन चुका है। यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसकी शुरुआत उन लोगों से हुई, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा हासिल की और अपने पैरों पर खड़े हुए। गणपति असुर जैसे लोग अब उसी बदलाव को गांव-गांव तक पहुंचाने में जुटे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।